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दलितों का ‘भव्य उत्सव’ थी मायावती की फगवाड़ा रैली , मगर मीडिया पचा गया !

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  अभिषेक श्रीवास्तव/पंजाब से
सोमवार 30 जनवरी को पंजाब के फगवाड़ा में बहुजन समाज पार्टी की मुखिया सुश्री मायावती की पहली चुनावी रैली हुई। रैली में करीब एक लाख की भीड उन्‍हें सुनने के लिए राज्‍य भर से आई थी। शहर की विशाल अनाज मंडी में हुई इस रैली को किसी भी प्राइवेट चैनल  ने कवर नहीं किया।
यह महज एक चुनावी रैली नहीं थी बल्कि पंजाब के दलितों का एक भव्‍य उत्‍सव था जहां गहनों से लेकर किताबें, पोस्‍टर, बैनर, बिल्‍ला, झंडा, ऊनी कपड़े, खाने-पीने के सामान आदि बिक रहे थे। केवल कमी थी तो झूलों की वरना यह सच में एक विशाल मेला ही हो जाता।
इस रैली की सबसे खास बात रही कि यहां तमाम पोस्‍टर बैनर हिंदी में थे और मायावती ने भी पूरा भाषण हिंदी में दिया। इसके बरअक्‍स जब हम नरेंद्र मोदी या अरविंद केजरीवाल जैसे गैर-पंजाबी नेताओं की रैली देखते हैं, तो आश्‍चर्य होता है कि पंजाबी के जुमले बोलने और गुरमुखी में प्रचार सामग्री छापने के बावजूद उनकी रैलियों में वैसा हुजूम और जश्‍न क्‍यों नहीं दिखता जैसा मायावती की रैली में था।
सीधी सी बात है कि मामला सामाजिक आधार से जुड़ा है। पंजाब सबसे ज्‍यादा 32 फीसदी दलितों का राज्‍य है और यहां के दलित घूम फिर कर अब भी मायावती में ही उम्‍मीद की किरण खोजते हैं। समर्थकों की आस्‍था का आलम ये है कि वे आज भी मान रहे हैं कि इस बार राज्‍य में बसपा की सरकार बनेगी।
इस रैली में मीडियाविजिल ने कुछ लोगों से बात की और विशेष रूप से यह देखने की कोशिश की कि कैसे एक चुनावी रैली किसी समुदाय के लिए जश्‍न का सबब भी हो सकती है। एक समय था जब कुछ पत्रकार मायावती की रैलियों को कवर करते थे, लेकिन फगवाड़ा में तमाम टीवी कैमरे नदारद रहे। दलितों की इतनी बड़ी आबादी की राजनीतिक नुमाइंदगी की उपेक्षा करना मीडिया की विश्‍वसनीयता के लिए घातक हो सकता है।
.अभिषेक श्रीवास्तव
नीचे देखिए फगवाड़ा रैली के पाँच रंग…अभिषेक के संग–
 

7 COMMENTS

  1. जबरदस्त अभिषेक भाई। पंजाब की खबर आपके हवाले से बेहतर बाहर आ रही है। कल बीबीसी में मायावती की राजनीति और उनके मुस्कुराने को लेकर एक रिपोर्ट पढ़ा। जिसमें केवल यह साबित करने का प्रयास किया गया कि मुसलमान वोटों के लिए वे ऐसा कर रही हैं। जबकि इस बार यूपी (पंजाब नहीं) में उनके मुस्कुराने की वजह शायद और सिर्फ माया बेहतर समझ रही हैं। डेस्क पर बैठकर कुछ भी लिखा जा सकता है कोई सूत्र को पकड़कर, जबकि दस्तावेज सडकों, गांवों, मोहल्लों में फैले हुए है।

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