लॉकडाउन में देह व्यापार के दलदल में फँसा घुमंतू समुदाय !

अश्वनी कबीर
समाज Published On :


“हमने 5 दिन पहले 15 अगस्त का जश्न मनाया है लेकिन घुमन्तू समुदायों को ‘अभ्यस्त आपराधिक कानून’ से कब मुक्त करेंगे? उनकी आज़ादी कब मिलेगी? हमारे जैसे 10 फीसदी लोग तो आज भी इसी जन्मजात अपराधी का दंश झेल रहे हैं. हमें ये तो याद है कि ये गांधी के जन्म का 150 वां वर्ष चल रहा, लेकिन हम ये भूल गए कि उनके जन्म के दो वर्ष बाद ब्रिटिश सरकार ने जन्मजात आपराधिक कानून बनाकर करीब 191 घुमन्तू समुदायों को बैन कर दिया था. उनकी स्वतंत्र आवाजाही को रोक दिया था. इतने वर्ष बीतने के बाद भी क्या उनके जीवन में कोई सुधार आया? उनको भी अगले वर्ष 150 साल पूरे हो जाएंगे. हिंदुस्तान में घुमन्तू समुदायों की संख्या 1200 से भी ज्यादा है. जो हमारी कुल जनसंख्या का 10 फीसदी हिस्सा है.” (रैनके आयोग)

जयपुर शहर से करीब 10 किलोमीटर दूरी पर ‘कानोता’ स्थित है. जो एक कस्बे की शक्ल लिए हुए है. ऐसा कस्बा जो न गांव का हो सका और न ही पूरी तरह से शहर का. ये कस्बा घुमन्तू- समुदायों का डंपिंग यार्ड है. जयपुर शहर से घूमन्तुओं को पकड़कर यहीं लाकर छोड़ा जाता है. यहां गंदगी के ढेर पर करीब 3000 घुमन्तू परिवारों के डेरे हैं. जिसमें 25 घुमन्तू समुदायों के लोग रहते हैं.

यहां न बिजली की सप्लाई है. न ही कोई पानी का कनेक्शन। इन लोगों के पास गरीबी रेखा का बीपीएल राशन कार्ड नहीं हैं. बुढापा और विधवा पेंशन का दूर- दूर तक कोई नाता नहीं. न कोई टॉयलेट की सुविधा और न नहाने और खाना बनाने का कोई स्थान.

ये सभी समुदाय खेल-तमाशा दिखाकर, नाच गाना करके, जड़ी -बूटी बेचकर, पत्थर की मूर्तियां, फूस के हाथी, घोड़े और ऊंट, मिट्टी के खिलौने, झाड़ू बनाकर, साड़ियों पर जरी- गोटा लगाकर तथा बेलदारी करके अपनी आजीविका चलाते हैं.

लॉक डाउन के दौरान और लॉक डाउन के बाद यहां सब काम बन्द है. ये शहरी क्षेत्र में आता है तो यहां मनरेगा के गड्ढे भी नहीं खुदवाये गए. सरकार ने कोई राशन की मदद नहीं की. सरकार ने इनका नाम सूची में जोड़ा है किन्तु पहचान के दस्तावेज न होने के कारण कोई सहायता नहीं मिली. इनके यहां एक आंगनवाड़ी तक नहीं है.

यहां एक-एक डेरे में 10- 12 लोगों का परिवार रहता है. ऐसे ही एक डेरे में मोहिनी नटनी (बदली हुई पहचान) उम्र करीब 15/16 वर्ष, नट घुमन्तू समुदाय से हैं. वो कहती हैं कि हमारे पास इस धंधे (देह व्यापार) के अलावा कोई उपाय नहीं है.

मेरे 5 छोटे भाई-बहन हैं. उनको क्या खिलायें ? हम सड़क किनारे बैठकर फूस के घोड़े, हाथी, ऊंट और गुब्बारे बेचते हैं. वो काम पिछले 3 महीने से बन्द है. सरकार पहले कह रही थी कि लॉक डाउन खुलने के बाद शुरू हो जाएगा किन्तु हमें सड़क पर नहीं बैठने दे रहे. हमारा सब काम रुक गया.

हमें सरकार तो कुछ देती नहीं. हम ऊंट घोड़ा बनाने के लिए घास-फूस तो सब्जी मंडी में आने वाली फलों की पेटियों से लाते हैं. वहां ये कूड़ा करकट है. ये कपड़ा सिलाई की दुकानों से लेकर आते हैं या फटे पुराने कपड़े को मंडते हैं. मोटा धागा या ऊनी धागा लाते हैं. इसी से ये फूस का ऊंट, घोड़ा ओर हाथी बनाते हैं.

एक ऊंट-घोड़े को बनाने की कीमत 20-30 रु आती है. हम इसे 35- 40 रु में बेच देते हैं. हमारा सारा परिवार मिलकर दिन भर में 15-20 ऊंट, घोड़े बना लेते हैं. इस तरह से हम एक दिन में 150-200 रु तक कमा लेते थे.

अधिक गर्मी के समय और अधिक सर्दी में, मेलों के समय हम खेल करतब दिखाने चले जाते हैं क्योंकि तब हमारे ये घास-फूस के घोड़े-हाथी और ऊंट कोई नहीं खरीदता. मैं रस्सी पर चलती हुं और मेरे पिताजी लकड़ी को पैरों में बांधकर करतब दिखलाते हैं. इस बीमारी की वजह से मेले भी बन्द हैं और गांव में खेल-तमाशा भी नहीं दिखला सकते.

पिछले एक महीने से हमारा समय बहुत बुरी स्थिति में गुजरा. घर में कुछ खाने को नहीं था. दुकान वाले ने भी राशन देने से मना कर दिया. किस से सहायता मांगे पूरी बस्ती की यही हालत है. दिन भर चूल्हा नहीं जला. मेरा बाप शराब भी पिता है.

“यहीं नजदीक गांव के एक व्यक्ति ने मुझे 1500 रु की मदद की. जिससे घर पर राशन आया. लेकिन बदले में उसने कहा कि मुझे एक दिन उसके साथ रहना होगा. मैं क्या करती?” मजबूरी में और कोई उपाय नहीं था. मुझे पहले बहुत बुरा लगा. लेकिन अब मुझे बुरा नहीं लगता. मुझे लगता है कि हम इसीलिए पैदा हुए हैं. जब सरकार को ही शर्म नहीं आती तो हमें क्यों शर्म आयेगी?

मोहिनी आगे कहती है कि हमारी इस बस्ती में एक हज़ार से ज्यादा लड़कियां हैं. पिछले एक महीने में आधे से ज्यादा लड़कियां इस धंधे में आ गईं. जो बची हैं वे सब लडकियां अब क्या करेंगी? या तो बेच दी जाएंगी या फिर मजबूरी में यहीं काम करना पड़ेगा.

मैंने इस स्थिति को सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग की प्रिंसिपल सेक्रेटरी गायत्री राठौड़ जी को अवगत करवाया. उनको सचिवालय में मिलकर उनसे विस्तृत चर्चा की. उनको सुझाव दिए.  व्हात्सट्स किया किन्तु आज 30 दिन बीतने के बाद भी न कोई बीपीएल कार्ड बना, न किसी को विधवा पेंशन मिली, न कोई राशन की सप्लाई हुई और न हीं कोई आंगनवाड़ी बनाई.

अजमेर, पुष्कर

अजमेर जिले के पुष्कर में मिट्टी के धोरों पर सैंकड़ों की संख्या में तम्बू लगे हैं. जिसमें भोपा, गिलारा, भाट,  कालबेलिया और कुचबन्दा समेत 10 घुमन्तू समुदायों के डेरे/तम्बू हैं. ये लोग नाच-गाना करके, मिट्टी के खिलौने, नकली चोटी, लकड़ी की मूर्ति बनाकर, कठपुतली का खेल दिखाकर अपना गुजारा करते हैं.

डोंगरी (पहाड़ी) के पास लगे डेरे में कुछ चहलकदमी है. ये डेरे कुचबन्दा घुमन्तू समुदाय के हैं. बस्ती में आगे वाले तम्बू में एक अधेड़ उम्र की महिला फुल्ली (बदला हुआ नाम) उम्र करीब 45/48 वर्ष.

फुल्ली, मिट्टी के खिलौने बनाती है. फुल्ली के पति गांव-गांव जाकर महिलाओं के सर के बाल एकत्रित करता है. जिसे फुल्ली, गिट्टी (दो लकड़ियों के बीच) के मध्य फंसाकर उसे सीधा करती है. उसके बाद उसकी नकली चोंटीयाँ गूँथती है. फुल्ली ये चोटीयाँ अपने जजमानों के यहां शादी में लेकर जाती है.

जब शादी विवाह बन्द रहते हैं तो फुल्ली मिट्टी के खिलौने बनाती है. घरेलू उपयोग की वस्तुएं बनाती है. वो पिछले 40 वर्षों से ये काम करती आ रही है. उसने ये काम अपने बाप दादा से सीखा था. उसके पिताजी जाने माने मिट्टीबाज थे. उनके पास चिकनी मिट्टी, कांप मिट्टी और पीली मिट्टी का गजब का ज्ञान था.

फुल्ली कहती हैं कि “हमें कोई सरकरी सहायता नहीं मिलती. हमारे पास न तो गरीबी रेखा का राशन कार्ड है और न ही हमें मनरेगा में काम मिलता है. हमारे किसी भी टोले में एक आंगनवाडी तक नहीं है. हम बेलदारी करें तो वो भी बन्द है. लॉक डाउन खुलने के बाद भी बेलदारी का काम नहीं है.

मिट्टी के खिलौने बेचे कहाँ? हमें जो धागा चाहिए। कांप मिट्टी चाहिए. वो कहाँ से लाएं ? कांप मिट्टी गांव के जोहड़ में होती है. गांव में कोई घुसने नहीं दे रहा, तो हम क्या करें? बिना मिट्टी के हमारा जीवन कैसा?

माटी एवं शिल्प कला बोर्ड पर सवाल उठाते हुए फुल्ली कहती है कि हमें देह व्यापार में धकेलने वाला ये बोर्ड ही है. ये बोर्ड किसलिये बनाया गया था? इसका काम क्या है? क्या आज तक इस बोर्ड ने कुछ किया? क्या उसके सदस्यों को ये पता है कि माटी पर काम करने वाले कितने समुदाय हैं? वे कहाँ रहते हैं? क्या आज तक उस बोर्ड के सदस्यों ने किसी भी समुदाय से कोई बात की? हमारे जीवन की कठिनाई को जाना?

फुल्ली कहती है कि गांव की महिलाएँ हमें अपने गांव में घुसने नही दे रहीं थीं. हमारे जाने पर रोक लगा दी. उसी गांव के उन्ही घरों के पुरुष हमारे साथ सोते हैं. क्या अब कोरोना का डर नहीं हैं? हमारे टोलें में सभी महिलाएँ आज यही धंधा कर रही हैं. हमने अपने पेट की आग बुझाने के लिए शरीर के एक हिस्से को गिरवी रख दिया तो क्या गलत किया?

राजस्थान में घुमन्तू समुदायों के साथ पिछले 18 वर्ष से काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता रॉय डेनियल कहते हैं कि अजमेर एक मात्र ऐसा जिला है जहां बीपीएल राशन कार्ड बनाने से लेकर पेंशन तक का रेट फिक्स है. यदि आपके पास 10 हज़ार रुपये हैं तो आपका काम तुरंत हो जाएगा भले ही आपके पास कोई कागज हो या नहीं. अन्यथा आप भटकते रहे कोई सुनने वाला नहीं है.

बारां जिला

बारां जिले की कंजर-पेरना समुदाय की महिला लाड़ो (बदला हुआ नाम) साड़ियों पर जरी-गोटा लगाती है. बहुत महीन काम है. दिन भर में औसत 40 रु कमा लेती है. ये काम पिछले काफी समय से बन्द है. अब आगे भी बोल रहे हैं कि मांग नहीं है तो काम भी नहीं है। बेलदारी का काम भी बन्द पड़ा है.

लाड़ो ओर उसके टोले की अन्य कंजर महिलाएं अपना पारम्परिक लोक नृत्य ‘चकरी’ भी करती हैं. मेलों के समय, होली के समय या अपने जजमानों के शादी-विवाहों में जाकर वो चकरी नृत्य करती हैं। लोग खुश होकर उनको ईनाम देते हैं.

 

लॉक डाउन तक ये कहा कि जब खुल जायेगा तब आपको रोजगार मिलेगा. अब लॉक डाउन खुलने के बाद भी क्या करें? शादी में 50 लोग से ज्यादा एकत्रित नहीं हो सकते. इतने लोग तो उनके घर परिवार और रिश्तेदारों में पूरे हो जाते हैं. हमारी टीम में 8/12 लोगों का नाम पहले कटता है.

हमारे पास रहने को ये कच्चे झोपडे हैं. राजस्थान सरकार ने कहा कि गांव वाले लोक कलाकारों को मुख्यमंत्री लोक कलाकार प्रोत्साहन योजना के तहत ग्रामीण लोक कलाकार को 2500 रु की मदद देंगे. हम शहर में रहते हैं तो हमें इससे भी बाहर कर दिया। ग्रामीण क्षेत्र में मनरेगा में काम मिल जाता है. हम शहर में हैं तो हमें तो वो भी नहीं मिल रहा.

हम राशन लेने जाते हैं तो हमें भगा देते हैं. कहते हैं कि जाति प्रमाण पत्र लाओ। जब प्रमाण पत्र बनाने जाते हैं तो स्थाई पते का प्रूफ मांगते हैं. हमारे पास जमीन ही होती तो ऐसे थोड़े न भटकते. न हमें राशन मिलता है और न ही हमारे पास कोई आंगनवाड़ी की सुविधा है.”

हमें कोठे पर बिठाने वाली सरकार है कोई और नहीं. क्या कोई सरकार पर कार्यवाही करेगा? हमारे परम्परा के सारे रोजगार छीन लिए और बदले में कुछ देना तो दूर रहा. जो हमारे कानूनी अधिकार थे वे भी सब ले लिए.

हमारे घर की औरतें क्यों धंधा करने लगीं? क्या किसी ने ये जाना? क्यों हमारे समुदाय की औरतें मुम्बई में नाचती हैं. (बार डांसर) हमें ये सब पसंद नहीं हैं. इस काम में कोई इज्जत भी नहीं हैं. लेकिन अब हमारे पास कोई चारा भी नहीं है। अब हारकर हमें इस धंधे में उतरना पड़ा.

लाड़ो कहती है, जब हम धंधा करने जा रहे हैं। तब सरकार के पास कोई उपाय नहीं है। बाद में ये सरकार और संस्थाएं आकर हमें सिलाई मशीन देकर फ़ोटो खिंचवाएँगे। सरकार से पूछिये क्या उन्होंने आज तक हमें एक रु की भी मदद की है? आप लोग सरकारों से ये सब क्यों नहीं पूछते?

जयपुर, विधानसभा के बगल में ढेर सारे तम्बू लगे हैं. ऐसे ही एक तम्बू में एक अधेड़ उम्र की महिला बैठी है. जो उस प्लास्टिक की सीट को ऊनी धागे से सिल रही है. बारिश का मौसम है तो पानी अंदर गिर रहा है.

महिला का नाम गुड्डी है. उसकी उम्र करीब 35 वर्ष होगी. वो कठपुतली बनाती है. उसके तीन छोटे-छोटे बच्चे हैं. पति को गुजरे 3 साल हो चुके हैं. न विधवा पेंशन मिलती है और न ही उसके पास बीपीएल राशन कार्ड है. वो जिस तम्बू में रहती उसका भी 250 रुपये महीने का किराया है.

गुड्डी कहती है कि “लॉक डाउन में कोई सहायता नहीं मिली और न ही लोक डाउन खुलने के बाद कुछ हो रहा है. मैं तो कठपुतली बनाती हूँ, एक कठपुतली का जोड़ा 30 रु में बिकता है, जिसके बनाने का खर्चा 25 रु आ जाता है. दिन भर में ऐसे 8-10 जोड़े बन जाते हैं. जिससे हमें 40- 50 रुपये मिल जाते हैं.

दिन का खाना नजदीक मंदिर के लंगर में खा लेते हैं और शाम को हम इस पैसे से खाना बना लेते हैं. गुड्डी से बीपीएल राशन कार्ड और विधवा पेंशन के बारे में पूछने पर वो बिखर पड़ती है. वो कहती है कि जब अधिकारी के पास जाते हैं तो वे कहते हैं कि अपना जाति प्रमाण पत्र लाओ, जब जाति प्रमाण पत्र बनवाने जाते हैं, तो कहते हैं की जमीन का पट्टा दिखाओ. अब जमीन का पट्टा तो हमारे पास है ही नहीं. हमारे बड़े बुजुर्ग और हम तो ऐसे ही घूमते रहते थे. हम जमीन का पट्टा कहाँ से लायें? हमारे यहां पर आंगनवाड़ी तक नहीं है.

गुड्डी “भाट” घुमंतु समुदाय से सम्बन्धित है जो सदियों से कठपुतली बनाने व उनको नचाने का काम करते आ रहे हैं. भारत में कठपुतली कला के जनक राजस्थान के नागौर जिले के भाट समुदाय को ही माना जाता है. जो अपनी इस कठपुतली कला के जरिए राजस्थान के राज दरबारों के इतिहास को बताते हैं.

जिनको आज हम करतब दिखाने वाले, नाच गाना करने वाले, मिट्टी और घास फूस के खिलौने बनाने वाले, सांप पकड़ने वाले, ऊँट-सारंगी रखने वाले तथा कठपुतली नचाने वाले के रूप जानते हैं. दरअसल ये समाज को चलाने वाले ऊंचे लोग हैं. इनके पास सृजित ज्ञान की अथाह पूंजी है, जिसे विकास की आंख से नहीं समझा जा सकता.

घुमन्तू समुदाय कौन हैं, इनको जन्मजात अपराधी क्यों बनाया?

ये समुदाय जीवन के अलग-अलग नजरिये हैं. ज्ञान के ख़ास प्रकार हैं और दुनियाँ को देखने के विभिन्न दृष्टिकोण हैं. ये समुदाय सदियों से यायावरी से घूमते हुए इतिहास को दिशा प्रदान की है. विभिन्न संस्कृतियों के मध्य सम्बन्ध विकसित किये, एक स्थान से विचार, वस्तुओं और इंसानों को दूसरे स्थान तक पहुँचाया. ये लोग हमारे मौखिक इतिहास और समृद्ध परम्पराओं को चलाने वाले रहे हैं.

ये लोग राजाओं की सेना में सिपाही की भूमिका में रहे हैं. इन्होंने राजाओं व उनके सैनिकों को तलवार- बाजी, युद्ध नीति सीखाई, उनके हथियार तैयार किये, उनके खुफिया विभाग का दायित्व संभाला, उस समय के परिवहन, व्यापार और सन्देश वाहक की भूमिका को निभाने का काम किया और खेती किसानी के उपकरण तैयार किये.

चूंकि अंग्रेज व्यापारिक कम्पनी थी, जिनका लक्ष्य अधिक से अधिक मुनाफा कमाना था. इसी दौरान 1853 में रेल सेवा शुरू हो गई. 1829 में जंगलों पर भी अधिकार कर लिया, जिसका ये जतियाँ विरोध कर रही थीं. ये सब लक्ष्य तभी सम्भव हो सकते थे जब परिवहन एवं व्यापार के पारम्परिक तरीकों पर रोक लगाई जाये. जंगल से उनके अधिकार छीन लिए जाएं.

ब्रिटिश सरकार ने 1871 में जन्मजात अपराधिक अधिनियम बनाकर इन घुमन्तू समुदायों को अपराधी घोषित कर दिया. उनके कहीं भी स्वतंत्र आने जाने पर रोक लगा दी. अब उनको नजदीक थाने में हाजिरी लगानी पड़ती थी। कंजर, पेरना, गिलारा, कुचबन्दा, नट, भाट भी उन्ही घुमंतु समुदायों से सम्बंधित हैं.

भारत सरकार ने 31 अगस्त 1952 को इस कानून को तो हटाया, किन्तु इसके स्थान पर एक अन्य कानून बना दिया “अभ्यस्त अपराधिक कानून” जो पहले वाले कानून से कुछ नरम है, किंतु ये कानून भी इन समुदायों को आदतन अपराधी मानता है.

ये कितने शर्म की बात है कि 2007 में सयुंक्त राष्ट्र की एन्टी रेसियल कमेटी के कहने और मानवाधिकार आयोग के निरन्तर आदेश देने के बावजूद आज 2020 में भी इन समुदायों के ऊपर ये “अभ्यस्त आपराधिक कानून” बंधा हुआ है. जबकि हमारा संविधान तो कहता है कि किसी भी व्यक्ति को तब तक दोषी नहीं माना जायेगा तब तक उसका दोष सिद्ध नहीं हो जाएगा जबकि घुमन्तू तो बिना कुछ किये ही अपराधी हैं.

आज़ादी या धोखा?

आज़ादी के 5 वर्ष बाद इन समुदायों को सुना गया. नेहरू ने 31 अगस्त 1952 को जन्मजात आपराधिक कानून को हटाया और इन्हें विमुक्त जातियाँ कहाँ गया, लेकिन इसके साथ एक अन्य कानून को बनाया गया अभ्यस्त अपराधिक कानून. ये कानून भी इन समुदायों को आदतन अपराधी मानता है जबकि पहले वाला जन्म से अपराधी मानता था.

विकास यात्रा में इनके जीवन को थामा

हमने अपनी इस 70 वर्ष की यात्रा में घुमन्तू समुदायों के जीवन को रोक दिया. उनके कार्यों को बिना जाने समझे बैन कर दिया. वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, जंगल की बाड़ाबंदी, टैक्स कलेक्टर, रस्सी पर चलने पर रोक, नमक बेचने पर रोक, जड़ी बूटी लाने पर रोक, सड़क किनारे मजमा लगाने को भीख की कोटि में रखना. यहां तक इनके हुनर को भारत सरकार के स्किल इंडिया के अंतर्गत आने वाली 129 कार्यों में भी स्थान नहीं मिला.

सरकारी योजनाओं और आयोगों के मजाक

आज़ादी के बाद से लेकर अब तक 6 आयोग बने हैं. इनका काम घुमन्तू समुदायों के स्थिति का पता लगाना व उनके उत्थान की रूपरेखा प्रस्तुत करना था. किन्तु सब आयोग कूड़ा- करकट साबित हुए. हालात ये है कि यूपीए सरकार के समय बने रैनके आयोग की रिपोर्ट (2008) तथा एनडीए सरकार के समय बने इदाते आयोग की रिपोर्ट (2018) को संसद की पटल पर तक नहीं रखा गया.

अकेले राजस्थान में 52 घुमन्तू समुदाय हैं जिनकी आबादी 60 लाख से ज्यादा है. इनके 10 लाख से ज्यादा बच्चे स्कूल से बाहर हैं, जो कूड़ा बिनने, बाल मजदूरी या भीख मांगने का काम करते हैं. लॉक डाउन के दौरान पहचान के दस्तावेज न होने के कारण राजस्थान सरकार ने इनको 5 किलो राशन तक नहीं दिया. पिछले 2 महीने में हज़ारों महिलाएं देह व्यापार में उतरी हैं.

लॉक डाउन में एकमात्र उदयपुर ऐसा जिला था जहां घुमन्तू लोगों को राशन मिला अन्यथा कहीं कोई राशन नहीं दिया गया.

महिला एवं बाल विकास विभाग की असलियत

आईसीडीएस (ICDS) समेकित बाल विकास सेवाएं के अंतर्गत माता व नवजात शिशु हेतू विभिन्न योजनाएं चलती हैं जैसे गर्भवती महिला को आयरन व फोलिक एसिड की गोलीयां मिलती हैं. प्रसव को अस्पताल में कराने पर बल दिया जाता है. पहली डिलीवरी होने पर तीन किस्तों में 5 हज़ार रुपये दिये जाते है. 11 से 14 वर्ष की किशोरियों को अतिरिक्त पोषण दिया जाता है. बच्चों के लिए आंगनवाड़ी केंद्र खोले जाते हैं. किन्तु ये सब योजनाएं इन घुमन्तू महिलाओं, बच्चों और किशोरियों के लिए कतई नहीं हैं. देश मे ऑनलाइन पढ़ाई की बात हो रही है और घुमन्तू समुदाय के बच्चों के पास स्कूल तो छोड़िए आंगनवाड़ी तक नहीं हैं.

पशुओं से बदतर जीवन जीने को मजबूर

हमने अपने शोध के दौरान ये पाया कि पूरे राजस्थान भर में 93 फ़ीसदी महिलाओं व बच्चों को आईसीडीएस का कोई लाभ नहीं मिला. 98 फीसदी घुमन्तू टोले में शिक्षा का कोई कार्यक्रम नहीं है. 95 फीसदी डिलीवरी टोले में ही बुजर्ग महिला द्वारा करवाई जाती है. 90 फीसदी घुमन्तू महिलाओं के पास टॉयलेट की कोई सुविधा नहीं है. 96 फीसदी महिलाओं के पास स्वास्थ्य जांच की कोई सुविधा नहीं है. 85 फीसदी लोगों के पास बीपीएल राशन कार्ड नहीं है.  68 फीसदी घुमन्तू लोगों को लॉक डाउन के दौरान कोई राशन की मदद नहीं मिली, यदि इसमें एक बार मिले 5 किलो राशन को भी शामिल कर लें तो ये सूची 84 फीसदी हो जाती है. 73 फीसदी बुजर्ग व महिलाएं पेंशन सूची से बाहर हैं.

इनको सामाजिक सुरक्षा की कोई सुविधा नहीं मिलती इसका एक बड़ा कारण है. सामाजिक सुरक्षा सेवाएं, जाति प्रमाण पत्र से जुड़ी हुई हैं और जाति प्रणाम पत्र तब बनता है जब जमीन का पट्टा हो. अब इनके पास जमीन का पट्टा तो हैं नहीं तो ये लोग इन बेसिक सुविधाओं पेंशन, बीपीएल राशन कार्ड और आंगनवाड़ी जैसी सुविधाओं से वंचित हैं.

सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग की मुख्य सचिव गायत्री एस राठौड़ से मिलकर उनको इस स्थिति से अवगत करवाया. उनको ये सुझाव दिया कि इन विधवा महिलाओं को पेंशन, बच्चों को आंगनवाड़ी और कम से कम बीपीएल श्रेणी में इनका नाम जोड़ दें. किन्तु आश्वासन मिलने के एक महीने बाद भी कोई कार्यवाही नहीं हुई. सवाल ये है कि क्या ये लोग इतने के भी हकदार नहीं हैं?

जलाने/दफनाने का स्थान तक नहीं

यहां तक कि शमशान भूमि न होने के कारण ये लोग मृत देह को लेकर 3-3 दिन इधर से उधर भटकते रहते हैं. केरल को छोड़कर एक भी ऐसा राजय नहीं है जहां इनको शमशान भूमि दी गई हो. सभी राज्यों की यही स्थिति है.

आदिवासी की सूची में नहीं आते

राजस्थान में इन घुमन्तू समुदायों को ट्राइब्स भी नहीं माना जाता, जिससे इनको आदिवासी समुदाय के जितने अधिकार भी नहीं मिलते. इनके जंगल में जड़ी -बूटी लाने पर भी रोक है क्योंकि ये आदिवासी की श्रेणी में नहीं हैं.

इन समुदायों के पास अंबेडकर जैसा नेता भी नहीं है, जिससे ये भी दलितों की तरह से संगठित हो सके. इनके पास गांधी भी नहीं है. यदि गांधी होता तो जवाहर कला केंद्र, जयपुर में कठपुतली नचाने का काम कम्पनी को नहीं मिलता. मेलों व कला केंद्रों पर इवेंट कंपनीयों का कब्जा नहीं होता.

बजट में ठन-ठन गोपाल

मध्य प्रेदश व राजस्थान में घुमन्तू समुदायों के लिए बजट में एक रुपये तक का प्रावधान नहीं किया गया. यहां तक मध्य प्रेदेश सरकार ने लॉक डाउन में मजदूरों को 1 हज़ार रुपये दिए राजस्थान सरकार ने रेहड़ी पटरी वालों को 2500/ रुपये दिए किन्तु घुमन्तू लोगों को एक रुपये की भी मदद नहीं की.

कला केंद्रों पर माफियाओं का कब्जा

राजस्थान में घुमन्तू समुदायों के जीवन और आजीविका का बड़ा पक्ष उनके लोक कला व हस्तशिल्प से जुड़ा है. आज यदि राजस्थान की पहचान भी है तो इसी लॉक कला व रंग बिरंगी संस्कृति के जरिये. किन्तु राजस्थान में लॉक कला अधिकारियों और माफियाओं की मिली भगत की बली चढ़ रही है.

कला केंद्रों, मेलों व प्रदर्शनियों पर माफियाओं के कब्जे हैं. इसकी अगली रिपोर्ट में विस्तृत चर्चा करेंगे कि कैसे लॉक डाउन और उसके बाद के समय मे कला एवं संस्कृति विभाग, विभिन्न बोर्डों व कला केंद्रों ने रेगिस्तान की मिट्टी पर तमाशा और लॉक कलाकारों के साथ कितना बड़ा धोखा किया है. कला एवं संस्कृति विभाग की प्रिंसिपल सेक्रेटरी मुग्दा सिन्हा को सुझाव दिए हैं किंतु अभी तक कुछ नहीं हुआ है. अब तो भगवान राम भी अयोध्या लौट आये हैं, लेकिन पता नहीं घुमन्तूओं का कोप भवन कब समाप्त होगा?


अश्वनी कबीर  घुमन्तू समुदायों के लिए काम करने वाली संस्था “नई दिशाएँ” के संयोजक और यूनिवर्सिटी ऑफ हाइडलबर्ग में पीएचडी हेतु राम गुहा व शेखऱ पाठक के रेफेरल स्टूडेंट है। यह लेख स्कॉलर एवं एक्टिविस्ट दीक्षा नारंग के साथ मिलकर लिखा गया  जो साउथ आसियान यूनिवर्सिटी में घुमन्तू समुदायों पर पीएचडी कर रही हैं।

 


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