वाराणसीः महात्मा गांधी की शहादत दिवस पर CAA-NRC के खिलाफ सत्याग्रह मार्च

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उत्तर प्रदेश Published On :


राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के शहादत दिवस पर बृहस्पतिवार को वाराणसी के मलदहिया से अंबेडकर पार्क, कचहरी तक जूलूस निकाला गया। लोग हाथों में तिरंगा झंडा और गले में संविधान की प्रस्तावना की तख्तियाँ लटकाए हुए थे। इन तख्त्यों में नो एनआरसी, नो सीएए लिखा हुआ था। जुलूस में विभिन्न संगठनों के लोग शामिल थे। मार्च की शुरुआत आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने वाले भारत के प्रथम गृहमंत्री लौह-पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा पर माल्यापर्ण कर हुई। आखिर में संविधान की प्रस्तावना पढ़ी गई और संविधान बचाने की शपथ दिलाई गई।

वाराणसी के पूर्व सांसद राजेश मिश्रा ने नागरिकता संशोधन अधिनियम, एनपीआर व एनसीआर का विरोध करते हुए बताया कि गाँधी के हत्यारों के खिलाफ मेरी लड़ाई जिंदगी के आखिरी समय तक चलती रहेगी। उन्होंने गाँधी को उद्धृत करते हुए कहा कि राष्ट्रपिता ने बताया है कि मैं हिंसा की शिक्षा नहीं दे सकता क्योंकि मुझे इस पर विश्वास नहीं है, मैं केवल तुम्हें यह सिखा सकता हूँ कि अपना सिर अपने जीवन की शर्त पर भी किसी के सामने झुकने मत देना।

मार्च में आए हुए लोगों को देखकर यह बात आइने की तरह साफ थी कि समाज का हर तबका बेचैन, उद्वेलित होने के साथ-साथ खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है। सामाजिक कार्यकर्ता श्रुति नागवंशी ने बताया कि ऐसी विषम व चिंताजनक परिस्थितियों में महात्मा गाँधी का बताया रास्ता यानि सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आंदोलन ही एकमात्र विकल्प है। जूलूस में शामिल सुप्रसिद्ध समाजवादी व पूर्व विधान परिषद सदस्य अरविंद सिंह कहते हैं कि आज की रैली का असर सर्व-समाज पर जाएगा और खासकर हिंदुओं के उस ऊँचे तबके तक भी पहुँचेगा, जो एनआरसी और सीएए से बेफिक्र हैं। वहीं, दूसरी तरफ गाँव की दलित और पिछड़ी जातियों की महिलाओं ने शिरकत कर यह दर्शा दिया है कि वे भी चिंतित हैं।

इतिहासकार डॉ. मोहम्मद आरिफ बताते हैं कि जिस तरह से 1939 में हिंदू महासभा के परोक्ष समर्थन से मुस्लिम लीग ने सिंध की असेम्बली में पाकिस्तान बनाने का प्रस्ताव संयुक्त रूप से पारित किया था- जिसके बाद से भारत में हिंदू फासीवाद व पाकिस्तान में मुस्लिम फासीवाद व आतंकवाद सिरदर्द बना हुआ है- एक बार पुनः आरएसएस ने भारत में विभाजन की राजनीति उसी तर्ज पर शुरू कर दी है जिससे कार्पोरेट फासीवाद लोगों को लूटता रहे और दूसरी तरफ लोग सांप्रदायिक मुद्दों पर बँटे रहें।

जिससे मंहगाई बेरोजगारी और कार्पोरेट की लूट के खिलाफ कोई जन-आंदोलन न चल सके। अंग्रेजी उपनिवेशवाद से माफी मांगने वाले व गँठजोड़ करने वाले लोग अब नव-उदारवादी व साम्राज्यवादी ताकतों से गँठजोड़ कर रहे हैं। यह इत्तिफाक़ ही नहीं है कि ऑक्सफोर्ड यूनियन द्वारा मोदी के ऊपर आयोजित बैठक में मोदी के समर्थन में एक पाकिस्तानी महिला ने अपना तर्क रखा।

आज भी राजे-रजवाड़े व नवाबों के परस्त लोग पाकिस्तान व भारत में हिंदू व मुस्लिम सांप्रदायिकता का ज़हर घोल रहे हैं, जो एक बेहतर दुनिया के लिए खतरा है। जो लोग संविधान को नहीं मानते थे, 52 सालों तक अपने मुख्यालय पर राष्ट्रीय ध्वज नहीं फहराया आज वे राष्ट्रवादी होने का प्रमाणपत्र बाँट रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ अपने मित्रतापूर्ण अंतरविरोधों को दरकिनार कर अंबेडकरवादी व गाँधीवादी साथ आ रहे हैं और एक नया नारा गढ़ रहे हैं। संविधान के वास्ते गाँधी व अंबेडकर के रास्ते।

राजनीतिक कार्यकर्ता हरीश मिश्रा ने कहा कि असम में एनआरसी की प्रक्रिया ने 19 लाख लोगों को राज्य-विहीन कर दिया। आश्चर्य की बात यह है कि हिंदू और मुसलमान की राजनीति करने वाले हिंदू फासीवादी लोग 19 लाख राज्य-विहीन लोगों में 13 लाख हिंदुओं को पाकर हतप्रभ हैं और इसी हताशा में नागरिकता संशोधन कानून जनता में बिना बहस के पारित कर दिया गया, जिसे संयुक्त राष्ट्र संघ ने भेदभावपूर्ण कहा है और यूरोपीय संघ में इसके खिलाफ प्रस्ताव आया है।

वर्तमान सरकार द्वारा चलाई जा रही पूरी प्रक्रिया सावरकर व जिन्ना के द्वि-राष्ट्रवाद के सपने को पूरा करने का एक प्रयास है और साथ ही पिछड़ी जातियों व दलितों से मुसलमान बने लोगों, असंतुष्ट प्रगतिशील नागरिकों, दलितों, आदिवासियों व पिछड़ों को पुनः शूद्र बनाने की और नए संदर्भों में मनुस्मृति को लागू करने की परिकल्पना है। ऐसे में विभिन्न जातियों, धर्मों, लिंगों के लोगों को एकजुट होकर सांप्रदायिक फासीवाद को व नव-उदारवादी लूट को पूर्ण रूप से समाप्त कर भारत के संविधान की प्रस्तावना को जमीन पर लागू करने वाली सरकार बनाना होगा और उसके लिए मित्रतापूर्ण राजनीतिक अंतरविरोधों को खत्म करना होगा और यही नव-जनवादी-पूँजीवादी बदलाव होगा।

पीवीसीएचआर के संयोजक लेनिन रघुवंशी का मानना है कि हिन्दू-मुस्लिम बाइनरी हो या संघी हिन्दू राष्ट्र का कांसेप्ट हो इन दोनों को केंद्रबिंदु बनाकर डिबेट चलाना मूर्खता है। हिन्दू धर्म कोई संगठित धर्म है भी नहीं कि हिटलर की तरह मराठी ब्राह्मण अपने उत्तर भारतीय ब्राह्मणों के साथ उत्पात मचा सकते हैं। न तो विज्ञान पीछे की तरफ मुड़ा है और न ही समाज, हालांकि लोगों ने कोशिश बहुत की है।

कुछ मार काट हो जाएगी लेकिन समाज पीछे की तरफ जाने से रहा। लोगों द्वारा चितपावन ब्राह्मणों को ज्यादा समझदार समझना भी एक कामयाबी है ब्राह्मण-सवर्ण साम्राज्य की।
सत्ता आ जाती है तो दुनियाभर के सिद्धांत घूमने लगते हैं। संघ की कामयाबी कुछ दशकों की नहीं है, न ही 1925 से है जैसा कि क्लेम करते हैं कुछ लोग। संघी वर्गों/वर्णों की संख्या इतनी नहीं है कि ये अपने बलबूते कुछ कर सकते थे।
संघ की कामयाबी का राज है ब्राह्मण-सवर्ण वर्चस्व की जो नींव कांग्रेस ने डाली है अपने शासन के दौरान।

एक प्रगतिशील की तरह विश्लेषण कीजिये कि इतने मजदूरों किसानों की लड़ाई लड़ने के बाद भी कम्युनिज्म भी अखिल भारतीय स्तर पर कामयाब नहीं, तो ये मुट्ठीभर संघी गिरोह कैसे हो जाएगा बिना राष्ट्र-राज्य की मदद से।
जुलूस में पूर्व विधायक अजय राय, अनिल श्रीवास्तव, कुँवर सुरेश सिंह, राजेश्वर पटेल, प्रजानाथ शर्मा, राघवेंद्र चौबे, विनय राय, सतीश चौबे, प्रवीण सिंह बबलू, लोक मंच के संजीव सिंह, फादर प्रकाश लुइस, फादर अनिल अलमीरा, हाजी इश्तियाक अंसारी, इदरीश अंसारी, अनूप श्रमिक, सरिता पटेल, डॉ. नूर फातमा, प्रतिमा पांडेय, सर्व सेवा संघ की सीलम झा, वरिष्ठ पत्रकार ए. के. लारी, फजलुर्रहमान अंसारी, आबिद शेख, जावेद, बाबू अली साबरी समेत हजारों लोग शामिल थे।


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