बिहार में लॉकडाउन के बहाने थोपे गए मुक़दमे वापस हों- वाम दल

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लॉकडाउन के दौरान वाम दलों, श्रमिक संगठनों के नेताओं और नागरिक समुदाय के कई लोगों पर कोतवाली थाना प्रशासन द्वारा थोप दिए गए मुकदमे के सिलसिले में आज इन संगठनों से जुड़े नेताओं के एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने बिहार के गृहसचिव व डीजपी से मुलाकात की और मुकदमों को वापस लेने की मांग की।

प्रतिनिधिमंडल में भाकपा-माले की राज्य कमिटी के सदस्य व तरारी से विधायक सुदामा प्रसाद, सीपीआई के राज्य सचिव मंडल के सदस्य विजय नारायण मिश्र, सीपीआई(एम) के राज्य सचिव मंडल की सदस्य रामपरी, भोजन का अधिकार अभियान के समन्वयक ऋत्विज और भाकपा-माले राज्य कमिटी के सदस्य सह ऐक्टू के बिहार राज्य सह सचिव रणविजय कुमार शामिल थे।

प्रतिनिधिमंडल ने गृहसचिव और डीजीपी से कहा कि श्रम कानूनों में मजदूर विरोधी संशोधन तथा काम के घंटों को 8 से बढ़ाकर 12 कर दिए जाने के खिलाफ विगत 22 मई को देशव्यापी आह्वान पर पटना में भी प्रतिवाद हुआ था, लेकिन मसले की संवेदनशीलता को समझने की बजाए कोतवाली थाना ने माले विधायक दल के नेता महबूब आलम, ऐटक के महासचिव गजनफर नबाव, ऐक्टू के बिहार महासचिव आरएन ठाकुर, सीटू नेता गणेश शंकर सिंह, टीयूसीसी के नेता अनिल शर्मा, ऐटक के अध्यक्ष अजय कुमार सहित 100 अज्ञात लोगों पर मुकदमा थोप दिया।

उसी प्रकार 3 जून को सीएए विरोधी राष्ट्रव्यापी आंदोलन के कार्यकर्ताओं की लॉकडाउन की आड़ में अलोकतांत्रिक तरीके से हुई गिरफ्तारी के खिलाफ बुद्धा स्मृति पार्क के पास नागरिक समुदाय के लोगों ने शारीरिक दूरी व कोरोना से बचाव के उपायों का पालन करते हुए प्रदर्शन किया. उस दिन भी कोतवाली थाना ने ऐपवा की बिहार राज्य सचिव शशि यादव, वरिष्ठ माले नेता केडी यादव, सीपीआई (एम) की केंद्रीय कमिटी के सदस्य अरूण मिश्रा, सीपीआई की निवेदिता, एआईपीएफ के मो. गालिब, भोजन का अधिकार अभियान के रूपेश कुमार आदि सहित कई लोगों पर मुकदमा दर्ज कर दिया।

प्रतिनिधिमंडल ने दोनों मुकदमों की वापसी की मांग की। इस पर गृह सचिव व डीजीपी ने सकारात्मक आश्वासन दिया।

गृहसचिव व डीजपी को दिया गया ज्ञापन

कोविड-19 को समाज के सभी हिस्सों के मिले जुले प्रयासों के बलबूते पर ही हराया जा सकता है, लेकिन लॉकडाउन के पूरे पीरियड में हमने देखा कि प्रशासन का रूख असहयोगात्मक और यहां तक कि दमनात्मक बना रहा। कई प्रकार की समस्याओं से घिरे देश के विभिन्न हिस्सों से भूखे-प्यासे, थके-हारे लौट रहे प्रवासी मजदूरों को राशन व अन्य सुविधाएं प्रदान करने के लिए कई बार सड़क पर भी उतरना पड़ा। क्वारंटाइन सेंटरों के सही संचालन को लेकर हम सरकार को लगातार अवगत कराते रहे. हमारी लगातार कोशिश रही कि प्रशासन और विपक्षी राजनीतिक पार्टियों व सामाजिक संगठनों के बीच एक सामंजस्य बन सके, ताकि कोरोना व लॉकडाउन से पीड़ित जनता के लिए राहत के आवश्यक कदम उठाए जा सकें, लेकिन प्रशासन लॉकडाउन के नियमों की आड़ में ऐसे अभियानों को संगठित करने वाले राजनीतिक- सामाजिक कार्यकर्ताओं को मुकदमे में फंसाने की ही नीति पर चलता रहा। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है।

विदित है कि इसी लॉकडाउन के दौरान केंद्र व कई सरकारों ने घोर जनविरोधी श्रम कानूनों को लागू करने का काम किया है। साथ ही, लॉकडाउन के पहले सीएए-एनआरसी-एनपीआर के खिलाफ चल रहे आंदोलनों के नेताओं को चुन-चुनकर कोरोना काल में जेलों में बंद किया जा रहा है। एक तरफ पूरी दुनिया से आवाज उठ रही है कि यदि कोरोना के प्रसारण को कम करना है, तो जेलों को खाली करना होगा। लेकिन हमारे यहां गर्भवती सफूरा जरगर को उठाकर जेल में डाल दिया गया। ऐसी अलोकतांत्रिक व मानवद्रोही कार्रवाइयों पर नागरिक समाज का रिएक्शन स्वभाविक रूप से होगा।

श्रम कानूनों में संशोधन, जो श्रमिकों को दास बना देने का नया कानून है, के खिलाफ विगत 22 मई को ट्रेड यूनियनों के राष्ट्रव्यापी आह्वान पर पटना में भी शारीरिक दूरी का ख्याल रखते हुए श्रमिक संगठनों के नेताओं ने प्रतिवाद दर्ज किया था। लेकिन पटना जिलान्तर्गत कोतवाली थाना में इस मामले में माले विधायक दल के नेता महबूब आलम, ऐटक के महासचिव गजनफर नबाव, ऐक्टू के नेता आरएन ठाकुर, सीटू नेता गणेश शंकर सिंह, टीयूसीसी के नेता अनिल शर्मा, ऐटक के अध्यक्ष अजय कुमार सहित 100 अज्ञात लोगों पर मुकदमा थोप दिया गया। इसका केस नंबर 229/20, दिनांक 22.05.2020 है।

उसी प्रकार, 3 जून को सीएए विरोधी राष्ट्रव्यापी आंदोलन के कार्यकर्ताओं की लॉकडाउन की आड़ में अलोकतांत्रिक तरीके से हुई गिरफ्तारी के खिलाफ बुद्धा स्मष्ति पार्क के पास नागरिक समुदाय के लोगों ने शारीरिक दूरी व कोरोना से बचाव के उपायों का पालन करते हुए प्रदर्शन किया। लेकिन उस दिन भी कोतवाली थाना ने ( केस संख्या 247/20, दिनांक 03.06.20) प्रदर्शनकारियों पर मुकदमा कर दिया। इसमें मुख्य रूप से ऐपवा की राज्य सचिव शशि यादव, सचिव अनिता सिन्हा, एआईपीएफ के मो. गालिब, माले नेता केडी यादव, इनौस नेता विनय कुमार, रीना प्रसाद, अनुराधा देवी, दिव्या गौतम, संजय कुमार, सीपीआई की निवेदिता, सिस्टर लीमा, पंकज कुमार, राहुल कुमार, अरूण मिश्रा, गणेश शंकर, मोना झा, रूपेश कुमार, देवेन्द्र चैरसिया सहित कई लोगों को अभियुक्त बनाया गया है।

अत: आपसे अपील है कि इन मामलों में अपने स्तर से हस्तक्षेप करते हुए नागरिक समुदाय पर थोपे गए इन अनावश्यक मुकदमों के संबंध में संज्ञान लें और इन्हें खारिज करवाने का प्रयास करें।

सामंतों द्वारा दलित महिला की हत्या के खिलाफ भोजपुर में माले का विरोध

 भाकपा माले ने भोजपुर के सेवगार हत्याकांड के मुख्य अभियुक्त सूरज सिंह की गिरफ्तारी और मृतक परिजन को 20 लाख मुआवजे व घायलों के समुचित इलाज की मांग पर आज पूरे भोजपुर में प्रतिवाद दर्ज कराया। दरअसल भोजपुर के उदवंतनगर थाना के सेवागार में सामंती-दबंगों ने 9 जून को दलित महिला देववंती देवी की गोली मारकर हत्या कर दी। और कई लोगों की बुरी तरह से पिटाई की।

सेवगार में राजपूत जाति से आने वाले दबंगों ने दलित टोले के रास्ते को जटई के कांटे से 8 जून की रात में घेर दिया था। लेकिन रात में ही उन कांटों को हटा दिया गया। इसी से आगबबूला होकर दबंगों ने दलित-गरीबों पर हमला कर दिया। हमले में मीना देवी, पति-बाबूलाल पासवान, उम्र- 40 वर्ष; प्रेभभूषण पासवान, पिता -बाबूलाल पासभावन और जमुना पासवान, पिता- स्व. बिहारी पासवान को बुरी तरह से पीटकर घायल कर दिया गया। मारपीट की घटना को दबंगों ने बीच रास्ते में अंजाम दिया। इस बीच, मुहल्ले में आकर अपराधियों ने देववंती देवी (40 वर्ष) को पीछे से गोली मार दी, जिसके कारण घटना स्थल पर ही उनकी मौत हो गई। उनके परिवार में चार छोटे-छोटे बच्चे हैं।


विज्ञप्ति पर आधारित


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