छत्तीसगढ़: कानून वापस नहीं हुए तो सरकार वापसी का आंदोलन- बादल सरोज

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मोदी सरकार के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ और एमएसपी की गारंटी का कानून बनाने की मांग को लेकर देशभर में किसान महापंचायतों का दौर जारी रही है। इसी क्रम में छत्तीसगढ़ में भी किसान पंचायतें शुरू हो गई हैं। ऐसी ही एक किसान पंचायत कोरबा जिले के बांकीमोंगरा क्षेत्र के मड़वाढोढ़ी गांव में आयोजित की गई। इस पंचायत में लगभग 50 गांवों के सैकड़ों किसानों ने हिस्सा लिया।

किसान पंचायत को संबोधित करते हुए अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव बादल सरोज ने कहा कि किसान विरोधी काले कानून अमेरिका और अडानी-अंबानी के इशारे पर बनाए गए हैं। जितने भी देशों ने इन कानूनों को लागू किया है, वहां के किसान बर्बाद हो गए हैं और उनकी भूमि पर कॉरपोरेटो ने कब्जा कर लिया है। भारत में भी यही होगा। आज तक मोदी सरकार किसानों को यह समझा नहीं पाई है कि इन कानूनों में अच्छा क्या है, इसलिए यदि ये सरकार कृषि विरोधी कानून वापस नहीं लेगी, तो इस सरकार की वापसी के लिए ही पूरे देश में आंदोलन किया जाएगा।

बादल सरोज ने कहा कि जो सरकार आज तक अपनी मंडियों में ही किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलना सुनिश्चित नहीं कर पाई है, वह किसानों को अपनी फसल कहीं भी अच्छे भाव में बेचने की आज़ादी देने का झूठा दावा कर रही है। वास्तव में उन्हें अडानी-अंबानी और कॉर्पोरेट कंपनियों की गुलामी की जंजीरों में बांधा जा रहा है। इन कृषि कानूनों का दुष्परिणाम यह होने वाला है कि उनकी जमीन अंबानी की कॉर्पोरेट कंपनियों के हाथों चली जायेगी और फसल अडानी की निजी मंडियों में कैद हो जाएगी।

इस किसान पंचायत को छत्तीसगढ़ किसान सभा के राज्य अध्यक्ष संजय पराते, छत्तीसगढ़ किसान आंदोलन के सुदेश टीकम और छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के आलोक शुक्ला सहित प्रशांत झा, सूरती कुलदीप, दीपक साहू, जवाहर सिंह कंवर, नंदलाल कंवर, राजकुमारी कंवर, प्रताप दास, राजू श्रीवास, शत्रुहन दास, देव कुंवर, संजय यादव, मोहपाल कंवर और जगदीश सिदार समेत कई किसान नेताओं ने भी संबोधित किया।

छत्तीसगढ़ किसान सभा के नेता संजय पराते ने पंचायत को संबोधित करते हुए कहा कि सी-2 लागत का डेढ़ गुना समर्थन मूल्य देने और किसानों की आय दुगनी करने का वादा मोदी सरकार का था। सात साल बाद भी वह लाभकारी समर्थन मूल्य देने के लिए तैयार नहीं है और किसानों की आय में दो रुपये की भी वृद्धि नहीं हुई है, लेकिन किसानों की आत्महत्याएं डेढ़ गुनी बढ़ गई है। इसलिए समर्थन मूल्य की घोषणा ही काफी नहीं है, समर्थन मूल्य पर फसल की खरीदी भी जरूरी है और उसके लिए कानून बनाना जरूरी है।

संजय पराते ने कहा कि ऐसा नहीं होने पर कम कीमत में इसी फसल को किसानों से खरीदकर कॉर्पोरेट गरीब जनता को मनमाने भाव पर बेचकर अकूत मुनाफा कमाएंगे, क्योंकि अनाज की सरकारी खरीदी न होने से राशन प्रणाली भी खत्म हो जाएगी। इस प्रकार, कुल मिलाकर ये कानून देश की खाद्यान्न सुरक्षा और आत्मनिर्भरता को खत्म करेंगे।

छत्तीसगढ़ किसान आंदोलन के सुदेश टीकम ने तीनों किसान विरोधी काले कानूनों के दुष्प्रभावों के बारे में विस्तार से किसानों को बताया और कहा कि यदि इस आंदोलन में अगर हम लोग शामिल नहीं हुए, तो आने वाली पीढ़ी हमे माफ नहीं करेगी। छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के आलोक शुक्ला ने विस्थापन और पुनर्वास की समस्या पर अपनी बात रखते हुए बताया कि किस तरह सरकार उद्योगों के नाम पर जंगलों को समाप्त करते जा रही है और जिनकी जमीन उद्योगों के लिए हड़पी जा रही है, उन्हें विस्थान के बाद रोजगार, मुआवजा और पुनर्वास के लिए घुमाया जाता है।

किसान सभा के कोरबा जिला सचिव प्रशांत झा ने कहा कि किसान आंदोलन को मजबूत बनाने के साथ ही जिले में वन भूमि में कबिजों को वनाधिकार पट्टा दिलाने, पेसा कानून का कड़ाई से पालन करने, विस्थापितों को मुआवजा और बेहतर पुनर्वास की व्यवस्था, विस्थापित परिवारों के लिये रोजगार, मुआवजा व बसाहट के प्रकरणों का निराकरण करने, जिला खनिज न्यास का प्रभावित ग्रामों में खर्च करने, भू-विस्थापन और खनन से जुड़े मुद्दों और उद्योगों के नाम पर ली गई जमीनों को मूल खातेदार किसानों को वापस करने, किसानों को राजस्व के मामले में फौती नामांतरण, बटांकन त्रुटि सुधार पर  संघर्ष तेज करना होगा।

इस पंचायत में बडी संख्या में महिलाएं, किसान, नौजवान शामिल हुए। सभी ने इन काले कानूनों की वापसी तक आंदोलन जारी रखने का संकल्प लिया है।


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