मनोज मंज़िल: भोजपुर में ‘हरिजन गाथा’ को चरितार्थ करता एक विलक्षण युुवा!

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बिहार Published On :


आर.राम   

 

मनोज मंजिल, बिहार के आरा से अगियांव विधान सभा क्षेत्र से भाकपा माले के उम्मीदवार हैं। मनोज भोजपुर के रेडिकल वाम आंदोलन के नई पीढी के प्रतिनिधि नेता हैं। उन्होंने अपने साथ और अपने नेतृत्व में दलित गरीब और वंचित समुदाय के युवा क्रांतिकारियों की एक पूरी कतार खड़ी की है। मनोज मंजिल आज देश के दलित नेताओं की युवा पीढी में चंद्रशेखर रावण और जिग्नेश मेवानी के साथ लिए जाने वाले नामों में शुमार हैं। वे भाकपा माले लिबरेशन की केंद्रीय कमेटी के सदस्य और युवा संगठन इंकलाबी नौजवान सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। कम्युनिस्ट पार्टी और युवा संगठन में केंद्रीय भूमिका में रहते हुए  मनोज मंजिल ने आरा को अपनी राजनैतिक-वैचारिक सोच की प्रयोग स्थली बना रखा है। भोजपुर और अगियांव विधानसभा क्षेत्र को उन्होंने दलितों गरीबों खेत मजदूरों की जन दावेदारी के मॉडल के रूप में विकसित किया है।

मनोज भोजपुर के क्रांतिकारी वाम आंदोलन के उस क्रांतिकारी धारा के वारिस हैं जिसकी नींव सत्तर के दशक में चारु मजूमदार के वैचारिक दिशा पर मास्टर जगदीश, राम नरेश राम और रामेश्वर यादव जैसे दलित-पिछड़े बागी कम्युनिस्ट नेताओं ने डाली थी। तब से लेकर आज तक भोजपुर के इस क्रांतिकारी आंदोलन ने  भूमिहीन दलित खेत मजदूरों के बीच से अनेकों जन नेताओं और साहसी योद्धाओं को तैयार किया है जिन्होंने गंगा और सोन नदी के दोआब में फैले उर्वरा जमीन पर सदियों से जड़ जमाये सामंती, जातिवादी, सामाजिक सत्ता के हौसले को पस्त कर दिया। इस आंदोलन के बल बूते दलित गरीबों को इस इलाके में इज्जत की जिंदगी नसीब हुई। वह इज्जत जो यहाँ के जमीदाँरों और सामंती गुंडों को कभी भी रास नहीं आई। यही कारण है कि गरीबों के इस संगठित आंदोलन के खिलाफ सामंती सेनाएं बनाकर जघन्य सामूहिक हत्याकांड रचाए गए। रणवीर सेना उन सामंती सेनाओं का सबसे घृणित रूप रही है।

सन् 1977 में पटना जिले के बेलछी गाँव में सवर्ण सामंती सेना द्वारा पहला नरसंहार रचाया गया था। उसके बाद से  मध्य बिहार के बाथे, बथानी टोला शंकर बिगहा जैसे जगहों पर अनेक नरमेध रचाए गए जिसमें भूमिहीन दलितों को लाल झंडे के नीचे गोलबंद होने की सजा के बतौर जिंदा जलाया गया, बच्चों, बूढ़ों और महिलाओं तक की नृशंस हत्या की गई। इन हत्याओं और नरसंहरों से जूझते हुए बिहार के तमाम जिलों में दलित नौजवानों की एक पूरी कतार आज लाल झंडे के साथ मजबूती से खड़ी है।

बाबा नागार्जुन ने बेलछी नरसंहार के बाद अपनी मशहूर कविता ‘हरिजन गाथा’ लिखी थी। इसमे रैदासी कुटिया के संत नरसंहार के कुछ दिनों बाद पैदा एक दलित नवजात शिशु का भाग्य बताते हुए कहते हैं कि –

दलित माओं के सब बच्चे अब बागी होंगे

भूमिपुत्र होंगे वे अंतिम युद्ध मे सहभागी होंगे

अछूत शिशु का भाविष्य बांचते हुए कविता के रैदासी संत ने यह स्पष्ट कहते हैं कि इसका अपना एक दल होगा। अपनी एक पार्टी होगी –

“इसकी अपनी पार्टी होगी

इसका अपना ही दल होगा

अजी देखना, इसके लेखे

जंगल में ही मंगल होगा

‘श्याम सलोना यह अछूत शिशु

हम सब का उद्धार करेगा

आज यह सम्पूर्ण क्रान्ति का

बेड़ा सचमुच पार करेगा”

मनोज और उनके साथी दलित नौजवानों को देख कर ऐसा लगता है मानो हरिजन गाथा का वह श्याम सलोना अछूत शिशु अब वयस्क होकर सामाजिक परिवर्तन की लडाई में खुद को झोंके हुए हैं।

अगर आप आरा में मनोज और उनके साथियों की सक्रियता देखें तो आप समझ पाएंगे कि ‘हरिजन गाथा ‘ के ‘अछूत शिशु ‘ से इनकी समानता एक हकीकत है, महज इनकी प्रशस्ति में किया जा रहा काव्यात्मक बयान नहीं है।

भोजपुर जिले के कपूरडिहरा गाँव में 1983 में एक भूमिहीन दलित परिवार मे जन्मे मनोज मंजिल की शुरुआती मंजिल सिविल सेवा की नौकरी थी। पर स्कूली शिक्षा के बाद आरा शहर आने, जैन कॉलेज विज्ञान की पढाई करने के दौरान अंबेडकर कल्याण छात्रावास में रहते हुए वे ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोशिएसन (आइसा) के संपर्क में आए। इस दौरान दलित छात्रों के लिए बने हुए समाज कल्याण विभाग के छात्रावासों की दुर्दशा के खिलाफ उन्होंने आवाज उठाई। दलित छात्रावासों की बदहाल स्थिति दलितों की शिक्षा के प्रति सरकारों के नजरिये का सबसे बड़ा प्रतीक है। मनोज ने आइसा के मंच से पूरे बिहार के दलित हॉस्टलों की बदहाली का सवाल उठाया, जो बिहार के छात्र आंदोलन का एक बड़ा सवाल बना। इसी आंदोलन से बनी पहचान के दम पर मनोज आइसा के राष्ट्रीय टीम के महत्वपूर्ण सदस्य के रूप में उभरे।

आइसा में रहते हुए, छात्र आंदोलन का नेतृत्व करते हुए मनोज ने खुद को दलित, गरीब-भूमिहीन जनता को संगठित करने व उनकी राजनैतिक दावेदारी को आवाज देने के लिए समर्पित कर देने का निर्णय लिया। जल्दी ही वे कैंपस छोड़ कर गाँव के गरीबों के साथ संघर्ष में शामिल हो गए। एक बार इस संघर्ष में उतरने के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। पिछले लगभग दस बरस से वे रात-दिन संगठन के काम में और जन आंदोलन विकसित करने में लगे हुए हैं। भोजपुर जिले में दलित गरीब के उत्पीड़न, सामंती गुंडई के खिलाफ, सरकारी योजनाओं में लूट के विरुद्ध, नहर का पानी खुलवाना हो, स्कूल की जमीन को दबंगों से मुक्त कराना हो, सोन नदी में बालू खनन में मशीनीकरण का विरोध कर बालू मजदूरों को बेरोजगार होने से बचाना हो, यानि  हारी-बीमारी-दुर्घटना हर मौके पर जनता के बीच मनोज की उपस्थिति एक सामान्य परिघटना है।

मनोज मंजिल पूरे भोजपुर में दलित गरीबों की हत्या, दुर्घटना या प्राकृतिक आपदा की घटना होने पर उस जगह पर अनिवार्य रूप से दिखते हैं और मुआवजे के लिए संघर्ष करते नजर आते हैं। मनोज ने ऐसे ही संघर्षों के बदौलत पिछले कुछ वर्षों में लगभग 80 लाख रुपये मुआवजे के रूप में गरीबों को दिलाया है। इन आंदोलनों से प्रशासन को जनता का प्रबल आक्रोश झेलना पड़ा। कभी रात के दो बजे डीएम-एसपी जनता के बीच खड़े होकर मुआवजा घोषित करने को मजबूर हुए तो कभी रविवार के दिन अधिकारियों को दफ्तर में बैठकर काम करना पड़ा। जन दबाव में प्रशासन हर बार झुकने को मजबूर हुआ पर चुपके से मनोज के ऊपर मुकदमा दर्ज कर लिया। परिणाम यह है कि आंदोलनों मे गरीबों के पक्ष से लड़ने के कारण आज की तारीख में उनपर 28 मुकदमे हैं।

जनांदोलन विकसित करने के सिलसिले को बढ़ाते हुए दो साल पहले मनोज ने एक विलक्षण आंदोलन को आकार दिया- सड़क पर स्कूल। बिहार की प्राथमिक शिक्षा की दुर्दशा को बेनकाब करते हुए स्कूलों की जर्जर इमारत, स्कूल की जमीन पर दबंगो के कब्ज़े व शिक्षकों के खाली पड़े पदों का सवाल उठाते हुए पूरे भोजपुर में स्कूल के बच्चों को लेकर सड़क पर ही पाठशाला शुरू कर दी। मुख्य सड़कों और राजमार्गों पर स्कूली बच्चों का हुजूम बैठ कर पढाई करने लगा। इन्हें पढ़ाने वाले शिक्षक मनोज के साथी ही होते थे। यह आंदोलन भी पूरे बिहार का मुद्दा बना। और नितीश सरकार को स्कूली शिक्षा को लेकर कई घोषणाएं करनी पड़ी। कई जगह सरकारी स्कूलों की जमीन दबंगों के अवैध कब्जे से मुक्त कराया गया। मनोज की जीवन संगिनी शीला भी इस आंदोलन में उनकी कॉमरेड व साथी के रूप में रही हैं।

सड़क पर स्कूल आंदोलन हाल के वर्षों में बिहार का सबसे अधिक चर्चित और सबसे अधिक जन भागीदारी का आंदोलन रहा है।

मनोज की पहचान एक प्रखर वक्ता और निडर नेता की है। सामान्य व्यवहार में बेहद सरल, मृदुभाषी और हमेशा मुस्कुराते रहने वाले मनोज आंदोलनों के दौरान बेहद संजीदा और आक्रामक नजर आते हैं।

2015 के विधानसभा चुनाव में मनोज पहली बार चुनावी मैदान में थे, आंदोलन के दौरान इनपर कई  झूठे  मुकदमे दर्ज कर लिए गए थे। नामांकन के दौरान ही पुलिस से इन्हें गिरफ्तार  कर लिया था। पूरे चुनाव के दौरान वे जेल में रहे, बावजूद इसके इन्हें लगभग 32 हजार वोट हासिल हुए थे। इसके बाद से वे अगियांव विधानसभा की जनता की जिंदगी का अनिवार्य हिस्सा बन चुके हैं।

आज जब उत्तर भारत का दलित आंदोलन अपना ताप खो रहा है। बहुजन राजनीति की सीमाएं उजागर हो चुकी हैं, ऐसे में रेडिकल वाम आंदोलन के बीच से एक नये दलित आंदोलन का उभार होने की संभावना भोजपुर से बन रही है। नब्बे के दशक में भी भोजपुर का आंदोलन दलित राजनीति का एक वैकल्पिक रास्ता सुझा रहा था पर वह दौर बसपा और कांशीराम- मायावती के अगवानी की तैयारी कर रहा था, आज उस राजनीति का पराभव  हो चुका है। अब एक बार फिर नजर भोजपुर पर टिकी है। कॉमरेड राम नरेश राम, जगदीश मास्टर, रामेश्वर यादव, बूटन मुशहर की विरासत एक बार फिर सामने आ रही है। मनोज मंजिल इस विरासत को नये दौर में नई सामाजिक और राजनैतिक चुनौतियों के बीच संबोधित कर रहे हैं। आइये, इस इस उम्मीदे सहर की बात सुनें!


लेखक आर. राम, स्वतंत्र टिप्पणीकार, लेखक व संस्कृतिकर्मी हैं।


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