कैदख़ाने का आईना : समाज की सड़ांध को दर्ज करती एक पत्रकार की जेल डायरी!


इस डायरी की एक और खास बात यह है कि यह जेल के निचले दर्जे के सिपाहियों विशेषकर महिला सिपाहियों की तकलीफों के बारे में भी सहानुभूति के साथ विचार करती है। एक महिला सिपाही अपनी गर्भावस्था संबंधी दिक्कतों के कारण जब जेलर से छुट्टी मांगने जाती है तो जेलर कहता है कि क्या मुझसे पूछ कर गर्भवती हुई थी। सरकारी पद पर बैठे व्यक्ति में किसी महिला के साथ ऐसे अश्लील व्यवहार की हिम्मत कहाँ से आती है? एक सिपाही तो रूपेश से साफ बोलता है- ‘मैं भी आपकी तरह ही बंदी हूँ, बस मुझे कुछ समय बाहर रहने और अपने परिजनों से बात करने की आज़ादी है , आपको नहीं है।’ यहीं पर पाश की वह मशहूर पंक्ति याद आती है- ‘मैं सींखचों के भीतर भी आज़ाद हूँ और तू मेरी रखवाली करता हुआ भी गुलाम है।’ सच ऐसी जेल डायरी एक ‘आज़ाद’ व्यक्ति ही लिख सकता है।


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मनीष आज़ाद

1969 में आयी और ग्रीस में प्रतिबंधित कर दी गयी बहुचर्चित फ़िल्म ‘Z’  इस डिस्क्लेमर से शुरू होती है- ‘इस फ़िल्म में दिखायी गयी घटनाओं का किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति के साथ समानता संयोग नही है, बल्कि यह जानबूझ कर है।’ इस डिस्क्लेमर से फ़िल्म का टोन और डायरेक्टर ‘कोस्टा गवरास’ के साहस का पता चलता है। पत्रकार रूपेश कुमार सिंह की जेल डायरी ‘कैदखाने का आईना’ भी इसी तरह इस साहसिक ‘डिस्क्लेमर’ के साथ शुरू होती है- ‘…..पाठक भी भली भाँति जेल के अंदर के हालातों से परिचित हो सकें, ताकि जेल जाने पर आपको जेल अनजाना न लगे।’ इससे स्पष्ट है कि रुपेश मुख्यतः उन पाठकों को संबोधित कर रहे हैं जो दुनिया बदलने की लड़ाई में जी जान से लगे हैं और आज अगर वे जेल में नहीं हैं, तो यह महज संयोग है।

रूपेश की यह साहसिक डायरी उपरोक्त फ़िल्म ‘Z’ की ही भाँति एक पोलिटिकल थ्रिलर की तरह शुरू होती है। कार से अपने दो दोस्तों के साथ अपनी एक रिश्तेदारी में जाते हुए रास्ते मे पेशाब करने के दौरान IB (इंटेलीजेंस ब्यूरो) के लोगो द्वारा सादे ड्रेस में  गुंडों की तरह इनका अपहरण करना। एन्टी-नक्सल फ़ोर्स ‘कोबरा’ के कैम्प में दो दिन अवैध हिरासत में रखना, मानसिक-शारीरिक यंत्रणा देना और फिर दर्जनों झूठे केस बनाकर जेल में फेंक देना। यह एक ऐसा टेम्पलेट है जिसे दुनिया की सभी तानाशाह सरकार हूबहू इसी तरह इस्तेमाल करती है। नाम और स्थान बदल दीजिये तो यह दृश्य लैटिन अमेरिका, अफ्रीका, एशिया, रूस कहीं का भी हो सकता है।

जेल में जातिवाद और भ्रष्टाचार का जितना ग्राफिक विवरण इस किताब में है वह किसी भी जेल सुधार के लिए एक बुनियादी दस्तावेज का काम कर सकता है। याद कीजिये अप्टन सिंक्लेयर का प्रसिद्ध उपन्यास ‘जंगल’। इस किताब को आधार बनाकर ही वहाँ मीट उद्योग में व्याप्त दमन व भ्रष्टाचार के खिलाफ कानून बने थे। लेकिन भारत मे यह सम्भव नहीं, क्योकि यहाँ जनता और शासक वर्ग के बीच  का ट्रस्ट-डिफिसिट (trust-deficit) इतना ज्यादा है कि किसी संवाद की अब गुंजाइश  नही बची है।

जेल में 8 माह रहने के दौरान मैंने भी जेल प्रशासन के भ्रष्टाचार को प्रत्यक्ष देखा है। लेकिन गया सेंट्रल जेल में बन्दियों के खरीदने बेचे जाने की प्रथा का विवरण पढ़ कर मैं भी चकित रह गया।

जेल में व्याप्त जातिवाद समाज मे मौजूद जातिवाद से भी ज्यादा क्रूर है। रूपेश लिखते है-‘जेलर ने मुझसे एक बार कहा कि रूपेश जी जेल “भला” आदमी के लिए नही है। भला आदमी उनकी नज़र में उच्च जाति के हिन्दू थे।’ इसके उदाहरण में रूपेश आगे लिखते है- ‘शेरघाटी जेल में उस समय लगभग 200 बंदियों में हिन्दू उच्च जाति के मात्र 6 बंदी ही थे। बाकी सब दलित, आदिवासी, पिछड़ी जाति और मुस्लिम समुदाय से थे।’

रूपेश की यह डायरी एक अर्थ में खास इसलिए भी हो जाती है, क्योंकि इसमें उन्होंने जेल के दमन का ही नहीं बल्कि प्रतिरोध का भी बहुत ही प्रामाणिक चित्र खींचा है। रूपेश के ही नेतृत्व में शेरघाटी उपकारा में किये गए भूख हड़ताल का वर्णन किसी रोचक उपन्यास का सुख देता है। शेरघाटी और गया के आसपास दशकों से गरीबों दलितों का नक्सलवादी-माओवादी आंदोलन चल रहा है और उस आंदोलन के दमन के परिणामस्वरूप सैकड़ों नक्सल-माओवाद समर्थक लोग वहां की जेलों में है। इन्होंने जेलों को नक्सल-आंदोलन के विस्तारित क्षेत्र (extension point) के रूप में बदल दिया। इसका संक्षिप्त विवरण इस किताब में है, जिसे पढ़कर और जानने की इच्छा प्रबल हो जाती है। दरअसल रूपेश ने अपनी जेल डायरी के माध्यम से जेल में जो खिड़की खोली है, उससे न सिर्फ पाठक झाँक कर जेल का मुआयना कर सकता है, बल्कि इसी खिड़की से खुद रूपेश जेल से बाहर झाँक कर बाहर की उन चीजों से भी हमारा परिचय कराते है, जिसे हम बाहर रहकर भी प्रायः नही देख पाते। रूपेश जेल में पिछले 27 साल से बंद नन्हेलाल मोची के माध्यम से 90 के दशक में नक्सलियों के नेतृत्व में गरीबों-दलितों और रणवीर सेना जैसी प्रतिक्रियावादी सेनाओं के बीच चले खूनी संघर्ष के असली राजनीतिक-सामाजिक कारणों से पाठकों का परिचय कराते है।

खुद रूपेश के शब्दों में इसे महसूस कीजिये- ‘जब वीर कुँवर पासवान जी 1990 के दशक के पहले के जमींदारों का शोषण-जुल्म सुना रहे थे, तो लगता था कि अब उनके आंखों से खून उतरने लगेगा, लेकिन जब एमसीसी के आने के बाद पिछड़ों-दलितों में आयी चेतना की बात बता रहे थे, तो उनकी आंखों में गजब की चमक दिखाई दे रही थी।’ ‘ पहचान’ की राजनीति के इर्द-गिर्द सिमटे दलित आंदोलन ने अभी तक दलित आंदोलन में नक्सलियों-माओवादियों की भूमिका को नजरअंदाज किया है, जिसका खामियाजा आज दलित आंदोलन को उठाना पड़ रहा है। इस किताब में इसकी एक संक्षिप्त मगर महत्वपूर्ण झलक मिलती है। इसी कड़ी में राज्य सत्ता का जातिवाद के दुर्गन्ध से बजबजाता चेहरा भी सामने आता है, जब पता चलता है कि रणवीर सेना द्वारा दलितों के कत्लेआम (लक्ष्मणपुर बाथे, बथानी टोला आदि) के केसों में कोर्ट ने सभी को बरी कर दिया, लेकिन अपने इज्जत-सम्मान की रक्षा के लिए जब दलितों ने पलटवार किया और रणवीर सेना के गुंडों को उन्हीं की भाषा मे जवाब दिया (बारा, सेनारी आदि) तो उन्हें पहले फांसी और फिर आजीवन कैद की सजा सुना दी। आश्चर्य की बात यह है कि आजीवन सजा पाए और पिछले 27 साल से कैद वीर कुँवर पासवान और नन्हेलाल मोची उन हत्याकांड में सीधे शामिल नहीं थे, उन्हें फर्जी फंसाया गया था,  इसके बावजूद उनके मन मे नक्सलियों के लिए जो प्यार और सम्मान है, वह चकित करता है। अल्पा शाह ने भी अपनी 2018 में आयी अपनी किताब ‘Nightmarch: Among India’s Revolutionary Guerrillas’ में नक्सलियों के साथ गरीब-दलित जनता के इसी आवयविक (organic) जुड़ाव का वर्णन किया है।

इस डायरी की एक और खास बात यह है कि यह जेल के निचले दर्जे के सिपाहियों विशेषकर महिला सिपाहियों की तकलीफों के बारे में भी सहानुभूति के साथ विचार करती है। एक महिला सिपाही अपनी गर्भावस्था संबंधी दिक्कतों के कारण जब जेलर से छुट्टी मांगने जाती है तो जेलर कहता है कि क्या मुझसे पूछ कर गर्भवती हुई थी। सरकारी पद पर बैठे व्यक्ति में किसी महिला के साथ ऐसे अश्लील व्यवहार की हिम्मत कहाँ से आती है? एक सिपाही तो रूपेश से साफ बोलता है- ‘मैं भी आपकी तरह ही बंदी हूँ, बस मुझे कुछ समय बाहर रहने और अपने परिजनों से बात करने की आज़ादी है , आपको नहीं है।’ यहीं पर पाश की वह मशहूर पंक्ति याद आती है- ‘मैं सींखचों के भीतर भी आज़ाद हूँ और तू मेरी रखवाली करता हुआ भी गुलाम है।’ सच ऐसी जेल डायरी एक ‘आज़ाद’ व्यक्ति ही लिख सकता है।

जेलों में रची जाने वाली कविताओं-गीतों का भी इसमें जिक्र है। खुद रूपेश ने भी 5 कवितायें जेल जीवन के दौरान लिखी है। रूपेश एकदम सही चिन्हित करते है कि जेलों में लेखनी भी कैद हो जाती है, नहीं तो यहां से कितनी शानदार रचनाएँ निकलती। लेकिन फिर भी बंदियों ने जेल प्रशासन की नज़र बचा कर अनेक शानदार गीत लिखे है। उनमें से कुछ गीतों को जेल डायरी में जगह दी गयी है। जेल में पढ़ना-लिखना क्यों प्रतिबंधित है, यह आज तक मेरी समझ मे नहीं आया। शायद सरकार की सैडिस्ट (परपीड़क) मानसिकता ही इसका कारण है। जेल में रचे गीतों से मुझे याद आया कि पिछले साल ही एक म्यूजिक एलबम जारी हुआ था, जिसमे उन धुनों का संग्रह था जिन्हें फासीवाद के दौरान यहूदी व राजनीतिक क़ैदियों ने जेलों में फासीवादियों की नज़र बचा कर सृजित किया था और फिर गुप्त तरीके से सुरक्षित रखा था।

इस डायरी में कई ऐसे विवरण है, जिससे आंखें नम हो जाती है। ऐसा ही एक विवरण तब आता है जब रूपेश की उनके डेढ़ साल के बेटे अग्रिम अविरल से जेल में मुलाकात होती है। जेल मुलाकात में जाली के उस पार अविरल अपने प्यारे पापा को देख मचल जाता है और पूरी ताकत के साथ जाली को झिंझोड़ने लगता है। मेरे लिए यह दृश्य एक रूपक की तरह लगता है।

वह समय अब दूर नहीं जब हम सबमें इस बच्चे का मासूस साहस होगा और हम इस अन्यायी व्यवस्था को झिंझोड़ कर रख देंगे।

किताब का नाम – कैदखाने का आईना (जेल डायरी)
लेखक – रूपेश कुमार सिंह
प्रकाशक – प्रलेक प्रकाशन, मुंबई
कीमत – 250 रूपये
यह जेल डायरी अमेज़ॉन और फ्लिपकार्ट दोनों जगह उपलब्ध है।

मनीष आज़ाद सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता हैं।

 


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