सरकार कोरोना से लड़े, न कि किसान-मज़दूरों से, माँगें माने जाने तक न उठेंगे-SKM

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सयुंक्त किसान मोर्चा प्रेस नोट

 

कोरोना के साये मे लाये गए तीन खेती कानून पर केंद्र सरकार व भाजपा को बड़े पैमाने पर विरोध का सामना करना पड़ा है। सरकार यह बताने से हमेशा भागती रही है कि कोरोना महामारी में जब लोग अपने घरों में बंद थे, उस समय ही ऑर्डिनेंस के माध्यम से ये कानून क्यों लाये गए? सरकार यह भी बताने में असफल है कि किसानों व विपक्ष के भारी विरोध के बीच ससंद में इन कानूनों को जबर्दस्ती पास क्यों किया गया? अब जब सरकार मान रही है कि यह कानून गलत है व इनमें कोई भी संशोधन करवाया जा सकता है पर बताने में असक्षम है कि क़ानून रद्द क्यों नहीँ करना चाहती?

कोरोना महामारी के कारण देश-दुनिया मे लॉकडाउन लगाया गया था। उस स्थिति के बाद आये आकंड़ों से साफ स्पष्ट हुआ था कि सभी सेक्टर में जीडीपी का खराब प्रदर्शन रहा था पर कृषि सेक्टर में सकारात्मक वृद्धि थी। भोजन, किसान व खेती जीवन की न्यूनतम एवं अधिकतम जरूरत है। इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि भारत जैसे देश में, जहां पर आज भी जनसंख्या का बहुत बड़ा तबका खेती पर निर्भर करता है, किसानों पर जबर्दस्ती शोषणकारी नीति थोपी जा रही है।

वर्तमान समय मे जब कोरोना महामारी एक बार फिर से उठ रही है, केंद्र सरकार को किसानों मजदूरों की फिक्र करते हुए तुरंत प्रभाव से मांगें मान लेनी चाहिए। दिल्ली की सीमाओं से लेकर देश के अन्य हिस्सों से किसानों के धरने तभी खत्म होंगे जब किसानों की मांगे मानी जायेगी। सरकार साथ ही प्रवासी मजदूरों के स्वास्थ्य व उनकी सामाजिक सुरक्षा के लिए हर प्रयास करें जिससे उन्हें कोई समस्या का सामना न करना पड़े। अगर सरकार को किसानों-मजदूरों व आम जनता की इतनी ही फिकर है तो किसानों की मांगें मान ले। किसान पहले भी सरकार की नीतियों से तंग आकर आत्महत्या कर रहे है। इस आंदोलन में भी 375 से ज्यादा किसानों की मौत हो गयी है। मानवता के आधार पर सरकार किसानों के धरनास्थलों पर वेक्सीनेशन सेंटर बनाये, कोरोना से बचाव के लिए जरूरी सामान व निर्देश मुहैया करवाये।

यह बहुत निंदनीय है कि कोरोना के पिछले अनुभव से सरकार ने कुछ नहीं सीखा व देश मे स्वास्थ्य सेवाओं व सामाजिक सुरक्षा की आज भी हालात वहीं है जो पिछले साल थी। प्रवासी मजदूरों को पैदल चलना पड़ सकता है व किसानों की फसलें भी बर्बाद हो सकती है परंतु इस बार किसान मजदूर सरकार के दमन व शोषणकारी निर्देश सहन करने की बजाय संघर्ष करेंगे। किसानों मजदूरों ने सरकार को एक मौका दिया था परंतु भाजपा अपने ही प्रोपगेंडा फैलाने में व्यस्त रही है। अभी सरकार को किसानों की मांगें माननी चाहिए व किसानों-मजदूरों से लड़ने की बजाय कोरोना महामारी से लड़ना चाहिए।

आज सिंघू बॉर्डर पर सयुंक्त किसान मोर्चा द्वारा मंच के माध्यम से आसपास के लोगों का सम्मान किया गया। पिछले करीब 5 महीनों से आसपास के लोगो ने निस्वार्थ भाव से किसानों के आंदोलन का समर्थन किया है। आसपास के किसानों, मजदूरों समेत आम लोगों ने प्यार सत्कार के साथ हमदर्दी दिखाई। सयुंक्त किसान मोर्चा ने आज 18 अप्रैल को सिंघू के आसपास के गावों, फैक्ट्रियों, बस्तियों व बाजारों के लोगों का मंच पर स्वागत व सम्मान किया। स्थानीय लोगों ने भविष्य में भी किसानों का समर्थन करने का वादा किया। मुख्य रूप से जयभगवान अंतिल, शमशेर दहिया, रणधीर अंतिल, अमित तुषिर एवम बलवान (नांगल गाँव), संजय खरेटा (रसोई गाँव), दीप खत्री (नरेला) आदि मौजूद रहे।

– डॉ दर्शन पाल
सयुंक्त किसान मोर्चा

(143 वां दिन, 18 अप्रैल 2021)


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