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नरेंद्र मोहन ने कहा था-दैनिक जागरण हिंदू पत्रकारिता करेगा,जिसे न करना हो,नौकरी छोड़े!

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दैनिक जागरण ने कठुआ रेप केस के बारे में झूठी ख़बर यूँ ही नहीं छापी. उसने राममंदिर आंदोलन के दौर में ही तय कर लिया था कि नंबर वन बनने के लिए वह पत्रकारिता के बुनियादी उसूलों को त्याग देगा। बहुसंख्यक राजनीति और उन्माद को हर हाल में समर्थन देना उसका सुचिंतित फ़ैसला है। राममंदिर आंदोलन के दौरान ‘सरयू ख़ून से लाल हुई ‘ टाइप उसके महाझूठों का इतिहास प्रेस काउंसिल की रिपोर्ट में आज भी दबा पड़ा है। इस क़िस्से  को दर्ज करते हुए  मीडिया विजिल के सलाहकार मंडल के सम्मानित सदस्य जितेन्द्र कुमार ने हिंदी पत्रकारिता के ‘हिंदू पत्रकारिता ‘में बदलने को रेखांकित करते हुए पिछले साल यह लेख  लिखा था जो न्यूज़ लॉंड्री में छपा था – संपादक

 

न्यूज़रूम की जातिवादी संरचना पाठकों के खिलाफ साज़िश

जितेन्द्र कुमार

 

आज से लगभग 15 साल पहले महात्मा गांधी हिन्दी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा की पत्रिका ‘पुस्तक वार्ता’ में 2002 में वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया ने एक लेख लिखकर सवाल उठाया था कि क्या हिन्दी पत्रकारिता हिन्दू पत्रकारिता है? अपने इस सवाल को जांचने-परखने के लिए उन्होंने कई घटनाओं का जिक्र किया था जिसमें एक घटना उनकी आंखों के सामने घटी थी.

दैनिक जागरण के मालिक नरेन्द्र मोहन अखबार के प्रधान संपादक कथाकार कमलेश्वर और दिल्ली के वरिष्ठ सहयोगियों के साथ नोएडा स्थित कार्यालय में मीटिंग कर रहे थे. उस मीटिंग में नरेन्द्र मोहन ने कहा था “जिस तरह उर्दू अखबार मुसलमानों की पत्रकारिता करता है उसी तरह मेरा अखबार हिन्दू पत्रकारिता करेगा. अगर मेरी बातों से किसी को कोई असहमति है तो वे अखबार छोड़कर जा सकते हैं.”

यह वह दौर था जब देश में मंडल कमीशन लागू हो गया था और सवर्ण सदमे में थे. घोषित तौर पर सभी राजनीतिक दलों ने ‘अगर-मगर व किन्तु परंतु’ के साथ मंडल आयोग का समर्थन किया था लेकिन बीजेपी और कांग्रेस के नेता पर्दे के पीछे से मंडल विरोधियों को हर तरह से इसके खिलाफ भड़का रहे थे. कांग्रेस की तरफ से छात्र-छात्राओं के बीच यह काम राजीव गांधी के तब के सबसे बड़े भक्त एसएस आहलुवालिया कर रहे थे, जो अभी बीजेपी सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं. बीजेपी की तरफ से वही काम वर्तमान वित्त मंत्री अरूण जेटली भी कर रहे थे.

मंडल आयोग की आंशिक अनुशंसा होने के खिलाफ दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र राजीव गोस्वामी ने घोषित रूप से पहली बार शरीर में आग लगाकर आत्मदाह करने की कोशिश की थी. पूरे देश में मंडल के खिलाफ माहौल बनाया जा रहा था. मंडल के खिलाफ सवर्णों में भयानक छटपटाहट थी लेकिन अभी तक किसी राजनीतिक पार्टी में सीधे तौर पर इसका विरोध करने का साहस नहीं था.

मंडल को खारिज करने की सबसे अधिक बेचैनी भाजपा में थी क्योंकि बीजेपी सबसे अधिक सवर्णवादी पार्टी थी और आज भी है (तब तक भाजपा में कल्याण सिंह को छोड़कर एक भी बड़ा लीडर पिछड़ी जाति का नहीं था). उसे डर था कि अगर इसका कोई समाधान नहीं खोजा गया तो सवर्ण मतदाता भी उससे एक बार फिर विमुख हो जाएगा (सवर्णों का प्रतिनिधित्व तब तक कांग्रेस पार्टी के हाथ में था).

इसी बैचैनी को भांपकर भाजपा के शीर्षस्थ पुरुष लाल कृष्ण आडवाणी रथयात्रा पर निकलने की तैयारी कर रहे थे. प्रमोद महाजन के साथ-साथ वर्तमान प्रधानमंत्री भी अघोषित रूप से मंडल विरोधी अभियान और घोषित रूप से ‘हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के लिए’ के लिए निकली उस रथयात्रा के सारथी थे. लंबी कहानी को थोड़ा छोटा किया जाय तो इसका परिणाम यह हुआ कि हिन्दू राष्ट्र के निर्माण की दिशा में बड़ा कदम उठा और बाबरी मस्जिद तोड़ दी गई.

‘हिन्दू पत्रकारिता’ कर रहे दैनिक जागरण को ‘प्रेस कांसिल ऑफ इंडिया’ ने मुसलमानों के खिलाफ तथ्यात्मक रूप से गलत व भड़काने वाली ख़बरें छापने का दोषी माना. नरेन्द्र मोहन ने इसके जवाब में कुछ ऐसा कहा- ‘प्रेस काउंसिल को जो करना हो करे, हमारी भावना प्रकट करने पर कैसे रोक लगा सकता है.’ (नरेन्द्र मोहन जी का यह अबोध उद्गार उस मासूम की तरह था जो भूख लगने पर अपनी भावना प्रकट करता है!) इसके बदले में बीजेपी ने नरेन्द्र मोहन को राज्यसभा भेजकर उपकृत किया. बीजेपी का यह कदम अप्रत्याशित नहीं था. बीजेपी को यह पता था कि भविष्य में जीत के लिए हिन्दी मीडिया की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होने वाली है.

नरेन्द्र मोहन की हिन्दू पत्रकारिता करने की सोच सामान्य सोच थी. वह इस बात को बखूबी जानते थे कि उनके अखबार में नौकरी कौन कर रहा है, नौकरशाही में कौन है और कौन उन्हें विज्ञापन देता या दिलवाता है?

हालांकि नरेन्द्र मोहन सामान्य नैतिकता को भूल गए कि उनकी जवाबदेही पाठकों के प्रति है. देश के राजनैतिक और सामाजिक परिदृश्य पर गौर करें तो यह बात बिल्कुल स्पष्ट है कि अब उत्तर भारत में हिन्दी पढ़ने वाले मूलतः दलित, आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्क समुदाय से आते हैं. उन समुदायों की बहुसंख्य आबादी के पास आज भी संसाधन नहीं है जिससे कि वे अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में भेजकर अंग्रेजी मीडियम में पढ़ा सकें.

यहां अपवादों की बात छोड़ देते हैं क्योंकि गांवों में रहने वाले सवर्ण भी अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में भेजने और हिन्दी अखबार पढ़ने को अभिशप्त हैं.

उत्तर भारतीय राजनीति को अगर दो कालखंडों में बांटकर देखें तो परिस्थितियों को समझने में सुविधा होती हैः मंडल से पहले का दौर और मंडल से बाद का दौर. मंडल से पहले भी न्यूज़ रूम में कोई खास विविधता नहीं थी. उस समय भी हिंदी पत्रकारिता में सवर्णों का ही बोलवाला था. लेकिन न्यूज़ रूम में विभाजन जातीय आधार पर नहीं बल्कि वैचारिक आधार पर होता था. सवर्णों में ज्यादातर संघी होते थे. कुछ कम्युनिस्ट या फिर समाजवादी विचारधारा के भी होते थे. अंबेडकरवादी उस समय तो बिल्कुल नहीं होते थे. लेकिन मंडल लागू होने के बाद विचारधारात्मक ‘भटकाव’ खत्म हो गया और सारे के सारे पत्रकार बातचीत और काम के स्तर पर पूरी तरह सवर्ण हो गए. न्यूज रूम में मौजूद सवर्णों को लगा कि पिछड़ों के लिए आरक्षण लागू किए जाने के बाद उनके बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो गया है. और वही सामाजिक गोलबंदी राजनीति में परिलक्षित होने लगी. पूरा का पूरा सवर्ण बीजेपी का समर्थक हो गया. चूंकि लालू, मुलायम और मायावती जैसे नेता न सिर्फ उस समुदाय से आते थे बल्कि उस समुदाय की राजनीति भी करते थे. इसलिए हिन्दी मीडिया उनकी छोटी-छोटी कमियों को बड़ा बताकर खलनायक बनाकर पेश करने लगा.

वर्ष 2006 में इस लेख के लेखक ने अनिल चमड़िया और योगेन्द्र यादव के साथ मिलकर राजधानी दिल्ली के लगभग सभी प्रमुख समाचार पत्रों और टीवी चैनलों के शीर्ष पर बैठे 10 प्रमुख नीति निर्धारकों का सर्वे किया था. उस सर्वे से पता चला कि शीर्ष पर बैठे 86 फीसदी लोग सवर्ण हैं. इसी तरह हिन्दी अखबारों में 86 फीसदी पुरूष काम करते हैं और मात्र 14 फीसदी महिलाएं काम करती हैं. जबकि हिन्दी टी वी चैनलों में महिलाओं की संख्या घटकर मात्र 11 फीसदी हो गई है. इतना ही नहीं ‘राष्ट्रीय मीडिया’ के 315 कर्णधारों में एक भी दलित और आदिवासी नहीं था, जबकि 52 फीसदी की आबादी वाली पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व 4 फीसदी और 13 फीसदी से अधिक आबादी वाले मुसलमानों की संख्या 3 फीसदी थी.

उस सर्वे को हुए ग्यारह साल हो गए हैं. लेकिन न्यूज रूम का समीकरण बदलने का कोई आसार नहीं दिखाई पड़ रहा है. जिन पांच अखबारों का जिक्र न्यूज़लॉन्ड्री ने अपने सर्वे में किया है उन पांचों अखबारों के संपादकों और संपादकीय पेज के प्रभारियों का प्रोफाइल चेक करें. बड़ी आसानी से पता चल जाएगा कि उन अखबारों के पन्नों से दलित, आदिवासी, महिलाएं और पिछड़े गायब क्यों हैं? क्योंकि उस समुदाय का एक भी व्यक्ति वहां मौजूद नहीं हैं. हांलाकि इसका कोई तथ्यात्मक शोध नहीं है फिर भी अगर सामाजिक और आर्थिक कारणों को आधार माना जाए तो मैं जोर देकर कहना चाहता हूं कि हिन्दी अखबारों के अधिकांश- मतलब 95 फीसदी से अधिक पाठक इन्हीं समुदाय से आते हैं. हां, पांच फीसदी पाठक सवर्ण भी होगें क्योंकि आर्थिक रूप से वे पीछे छूट गए हैं.

इससे ज्यादा और क्या अनैतिक हो सकता है कि 90 फीसदी से ज्यादा आबादी को 20 फीसदी से कम प्रतिनिधित्व दिया जाता है. और अपवादों को छोड़ दिया जाए तो हर अखबार उन्हीं दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, पिछड़ों और महिलाओं के खिलाफ अभियान चला रहा है जो उसके मूल पाठक हैं.


यह लेख 21 नवंबर को न्‍यूज़लॉन्‍ड्री हिंदी पर प्रकाशित हुआ है। वहां से साभार मीडियाविजिल पर प्रकाशित। आज यानी 21 अप्रैल 2018    को यह मीडिया विजिल पर  पुनर्प्रकाशित का जा रहा है। 

2 COMMENTS

  1. Mr Narendra Mohan in Pakistan minority Politics is essential to combat Muslim identity Politics. But in India Muslim identity politics is made as a defensive. Please refer to imkrwc.org / sahitya/MULAYAM MAYAVATI pARIGHATANA…In last few pages it raises the question that if non Dalits are not in leadership of CPI ETC it is because they were not educated. Can you tell me why Marxism is not a called a bourgeois ideology inspite of the fact that Engels was a bourgeoisie and Marx and Lenin were from pretty bourgeois SECTION. Do not you support that education gives you certain advantage to form , analyse ideas systematically.

    • In Pakistan,in China ,in Bangladesh why you are comparing with these countries when you see journalism, why you don’t compare with USA,BRITAIN,JAPAN,FRANCE , GERMANY etc

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