पहला पन्ना: प्रचार करती ख़बरों के बीच परेशान करने वाली कुछ छिट-पुट ख़बरें

संजय कुमार सिंह संजय कुमार सिंह
राजनीति Published On :


आज कई दिनों बाद अखबारों के पहले पन्ने पर विज्ञापन कम हैं और कुछ खबरें छपी हैं। इतनी कि इन खबरों की चर्चा की जाए। उदाहरण के लिए इंडियन एक्सप्रेस की आज की छह कॉलम की लीड हिन्दुस्तान टाइम्स में दो कॉलम में और टाइम्स ऑफ इंडिया में सिंगल कॉलम में है। द हिन्दू में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है जबकि द टेलीग्राफ में यह एक सामान्य सरकारी खबर की तरह है। आप जानते हैं कि 5 ट्रिलियन की होने वाली देश की अर्थव्यवस्था किस हालत में है। इसे ठीक करने के लिए सरकार की कई योजनाएं आई हैं पर उनकी समीक्षा न अखबारों में होती है और ना सरकार खुद करती है। सिर्फ घोषणाओं का क्या असर होता है या घोषणाएं क्या होती है इनका पता आज टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर से लगता है। मुफ्तटीकों के लिए धन्यवाद मोदी जी कहने वाले विज्ञापनों और होर्डिंग्स के बाद आज टाइम्स ऑफ इंडिया ने छापा है कि देश भर में अभी तक 1.6 करोड़ लोग ऐसे हैं जिन्होंने टीकों की दूसरी खुराक नहीं ली है। बढ़ाया हुआ समय निकल जाने के बावजूद।  

टाइम्स ऑफ इंडिया ने लिखा है कि यह सूचना सरकारी विज्ञप्तियों से ही ली गई है और एक टीके की दो खुराक के बीच 16 सप्ताह की अधिकतम सीमा पार कर चुके लोगों की संख्या ज्यादा हो सकती है। इनमें 60 साल से ऊपर के लोग और स्वास्थ्यकर्मी हैं जिन्हें हम ज्यादा जोखिम वाला मानते हैं। अखबार ने लिखा है, सरकार ने 13 मई को एक टीके, कोवीशील्ड की दो खुराक के बीच अंतराल 12-16 हफ्ते करने की मंजूरी दी थी। देश में सभी टीकों में इसका हिस्सा 85 प्रतिशत है। कोवैक्सीन के लिए यह बहुत कम 4-6 हफ्ता है। ऐसे में जिन लोगों ने दूसरी खराक नहीं लगवाई है उनकी संख्या ज्यादा हो सकती है क्योंकि गणना कोवीशील्ड के लिए 16 हफ्ते के अंतराल पर आधारित है न कि कोवैक्सीन के लिए छह हफ्ते पर। इसलिए अभी तक दोनों खुराक लगवा चुके लोगों में बहुत सारे ऐसे लोग हैं जिन्होंने पहली खुराक दो मई से पहले लगवा ली थी। 

ऐसी हालत में सरकार की वित्तीय योजनाओं के खुलासे का कितना मतलब है, आप समझ सकते हैं। खासकर तब जब पिछली योजनाओं और नोटबंदी जैसे वीरतापूर्ण कदम पर बोलती बंद है। ऐसी सरकार की योजना का प्रचार इंडियन एक्सप्रेस ने खूब अच्छे से किया है। शीर्षक है, सड़क से रेलवे, 6 लाख करोड़ रुपए की परिसंपत्तियों का मौद्रीकरण किया जाएगा, स्वामित्व सरकार के पास रहेगा। कहने की जरूरत नहीं है कि मौद्रीकरण बेचने का विकल्प है और देश बेचते हुए मैं देश नहीं बिकने दूंगा के प्रचार पर बने रहने की फूहड़ कोशिश। ऐसे में परिसंपत्तियों की मुद्रा में बदल देने के बाद भी स्वामित्व सरकार के पास रहेगा, दावा तकनीकी ही है पर इंडियन एक्सप्रेस सरकार के प्रचार का मौका कहां चूकता हैइसी खबर को द टेलीग्राफ ने रेल और सड़क (क्षेत्र में) निजी (क्षेत्र की) भूमिका शीर्षक से छापा है। कहने की जरूरत नहीं है कि बेचने की मजबूरी न बताकर उसे मौद्रीकरण कहना और रेल व सड़क क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भूमिका बढ़ना यानी टॉल नाके बढ़ेंगे कहने और बताने के अलग मायने हैं। 

एक ही खबर की दो प्रस्तुतियां आज के अखबारों में दिलचस्प हैं। खबरें नहीं होती हैं या कम होती हैं तो ऐसे खेल भी कम होते हैं और मेरे पास बताने के लिए कुछ खास रह नहीं जाता है। पर खेल खुल्मल-खुल्ला है, जब होता है तो साफ दिखाई देता है। भले ही आम पाठक नहीं समझे। सरकारी विज्ञप्ति या प्रेस कां, फ्रेंस में ऐसे उलझाने वाले नए शब्दों को गढ़ा जाना तो छोड़िए पुराने शब्दों के प्रयोग पर भी अखबारों को खुलकर बताना चाहिए। लेकिन इंडियन एक्सप्रेस ने नए शब्दों को ही प्रचारित किया है। जैसे, मूल्यों को अनलॉक करने के लिए कदम को इंडियन एक्सप्रेस ने लाल स्याही में फ्लैग शीर्षक बनाया है। हालांकि इंडियन एक्सप्रेस ने एमपी गजब हैका नमूना भी पहले पन्ने पर छापा है जो सोशल मीडिया में तो छाया हुआ था लेकिन पहले पन्ने से हमेशा की तरह गायब है। इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक ही स्पष्ट है, मध्य प्रदेश में चूड़ी विक्रेता को पीटा गया और फिर उत्पीड़नका मामला दर्ज हुआ।  

खबर के अनुसार, पीटने के आरोपियों में से एक की अवयस्क बेटी की शिकायत पर तसलीम अली के खिलाफ भिन्न धारओं और पॉस्को के तहत मामला दर्ज किया गया है। मामला यह भी है कि उसपर पहचान छिपाकर चूड़ियां बेचने का आरोप है और उसे पीटने वालों ने उसे हिन्दू क्षेत्र में फिर कदम नहीं रखने की चेतावनी दी थी। मुझे यह नहीं समझ में आया कि चूड़ी बेचने के लिए पहचान छिपाने की जरूरत क्यों पड़ी होगी और अगर छिपा ही ली गई तो उसमें अपराध क्या है। पर दिलचस्प यह है कि खबर पहले पन्ने पर नहीं है। वह भी तब जब यह उसी प्रदेश की कहानी है जहां एक महिला पर गलत जाति बता कर सांसद बनने का आरोप था और कोई जांच नहीं होने पर फिर टिकट दिए जाने और 10 साल कोई जांच या कार्रवाई नहीं होना का मामला सर्वविदित है। कार्रवाई के नाम पर इस बार इतना ही किया गया कि उन्हें टिकट नहीं दिया गया। लेकिन पहचान छिपाकर चूड़ी बेचने वाले की पिटाई होने पर भी उसके खिलाफ पॉस्को ऐक्ट में मामला दर्ज हो गया। मुझे लगता है कि यह पहले पन्ने की खबर है लेकिन ….।  द टेलीग्राफ में बिहार के एक दलित को 10 किलो चावल की बकाया मजदूरी मांगने पर पीट कर मार दिए जाने का मामला पहले पन्ने पर है। यह भी दूसरे अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। 

आज टाइम्स ऑफ इंडिया में अधपन्ने पर एक खबर है, “सरकार गुरुवार को अफगानिस्तान की स्थिति के बारे में सभी दलों को बताएगी।”  द टेलीग्राफ में इसी खबर का शीर्षक है, “अफगानिस्तान पर चौंकाने वाली बैठक। अखबार ने लिखा है कि अफगानिस्तान की स्थिति अभी तक स्थिर नहीं है और अमेरिका के साथ नाटो के सदस्य भी इससे जूझ रहे हैं। ऐसे में विपक्ष के नेताओं ने ऐसी बैठक की उम्मीद नहीं की थी। वैसे भी, सोमवार को कहना कि गुरुवार को बैठक होगी, कितनी बड़ी खबर है कि टाइम्स ऑफ इंडिया ने तीन कॉलम में फैला दिया है। हालांकि, टाइम्स ऑफ इंडिया और द हिन्दू ने आज अन्य अखबारों से अलग, जातिगत गणना की मांग की खबर को लीड बनाया है। जातिगत जनगणना की मांग पुरानी है और नए सिरे से क्यों उभरी वह आप समझ सकते हैं। ऐसे में बिहार की खासियत है कि वहां पक्ष-विपक्ष दोनों इसकी मांग कर रहे हैं और मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के साथ विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने भी प्रधानमंत्री से मुलाकात की। यह खबर अपने आप में कितनी महत्वपूर्ण है आप समझ सकते हैं। इसीलिए सभी अखबारों में प्रमुखता से छपी है। पर खेल शीर्षक में है। 

 

1.हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर अंदर होने की सूचना सिंगल कॉलम में है और शीर्षक है, बिहार के नेताओं ने मोदी से मुलाकात की, जातीय गणना का आधार बताया। 

2.इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर तीन कॉलम में है। यहां शीर्षक है, “जातीय जनगणना:  बिहार की सर्वदलीय टीम ने कहा प्रधानमंत्री पर है; कोरस में और जुड़े।”  

 

3.टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर तीन कॉलम की लीड है। शीर्षक है, “नीतीश: जातीय जनगणना पर मोदी को फैसला करना चाहिए।” 

 

4.द टेलीग्राफ में यह खबर अंदर होने की सूचना है। पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम की खबर का शीर्षक है, जातीय जनगणना की अपील।  

 

5.द हिन्दू में भी यह खबर लीड है, “जातीय जनगणना की बिहार टीम की मांग पर मोदी ने कोई वादा नहीं किया”। मुझे लगता है कि इस पुरानी मांग पर यह शीर्षक सबसे सटीक और जरूरी है। वैसे तो आम आदमी को आज के समय में जाति की बात करना फिजूल लग सकता है। लेकिन राजनीति जो न कराए। अखबारों का काम है इसे बताना पर वे भी राजनीति में लग जाएं तो क्या हो

 

इन और ऐसी खबरों के बीच हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड है, हवाई अड्डे पर गोलियां चलीं, तालिबान की नजर पंजसीर के कब्जे पर जबकि द टेलीग्राफ की लीड है, कोविड की मंदी का नुकसान शिशुओं और छोटे बच्चों पर। इसमें बताया गया है कि मंदी के कारण दुनिया भर में नवजात शिशुओं की मौत के 2,67,000 से ज्यादा मामले हुए हैं। इनमें एक तिहाई से ज्यादा भारत में हुई है। यह जानकारी एक अध्ययन से सामने आई है। इनके अलावा, आज हिन्दुस्तान टाइम्स में एक महत्वपूर्ण खबर है, अंतरधार्मिक दंपत्तियों की निजता में नहीं झांक सकते। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी एक अंतरधार्मिक मामले की जांच की मांग पर है और आज के समय में पर्याप्त महत्वपूर्ण भी। लेकिन दूसरे अखबारों ने इसे महत्व नहीं दिया है। ऐसी ही एक खबर टाइम्स ऑफ इंडिया में है। इसका शीर्षक है, ‘हम तालिबान राज्य नहीं हैं‘:अदालत ने पिंकी की अपील खारिज की। पिंकी हिन्दू रक्षा दल की प्रेसिडेंट हैं और उन पर सांप्रदायिक नारे लगाने का आरोप है।  

केरल की एक और धार्मिक खबर द टेलीग्राफ में है। इसके अनुसार, 1921 के मपिल्ला विद्रोह में भाग लेने वाले केरल के मुसलमानों के नाम डिक्सनरी ऑफ मार्टियर्स ऑफ इंडियाज फ्रीडम स्ट्रगल में से हटाए जा सकते हैं। विद्वानों और रानीतिज्ञों ने इसकी निन्दा की है। मपिल्ला का मतलब उत्तरी केरल के मालाबार के मुसलमान हैं। इस डिक्सनरी को केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय और इंडियन कौंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च संयुक्त रूप से प्रकाशित करता है और इसमें से नाम हटाने की सिफारिश की गई है। अखबार ने लिखा है कि संघ परिवार का नजरिया है कि मपिल्ला विद्रोह कभी भी स्वतंत्रता आंदोलन का भाग नहीं था। इस मामले में फैसला चाहे जो आए संघ परिवार के राज में विवाद खड़ा किया गया है, यही खबर है पर सिर्फ टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर है। 

ऐसी ही धार्मिक खबरों में एक और खबर आज दि हिन्दू में है। इसके अनुसार दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस से कहा है कि निजामुद्दीन सेंटर या मरकज के आवासीय क्षेत्र की चाभी दो दिन के अंदर जमात नेता मौलाना साद की मां को सौंपा जाए। आपको यह मामला याद होगा और उसके बाद जो हुआ वह भी आप जानते ही हैं। पर एक साथ से भी ज्यादा समय से पुलिस ने चाबी नहीं दी और पीड़ित को अदालत की शरण लेनी पड़ी। यह स्थिति राजधानी दिल्ली की है तो बाकी का अंदाजा आप लगा सकते हैं। फिर भी खबर सिर्फ हिन्दू में पहले पन्ने पर इतनी प्रमुखता से दी गई है। 

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और वरिष्ठ अनुवादक हैं।

 

 

 

 

   

 

   


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