आखिर क्यों इतिहास की उपेक्षा के शिकार हैं स्वतंत्रता संग्रामी तिलका मांझी?

विशद कुमार विशद कुमार
ओप-एड Published On :


वैसे तो इतिहास के पन्नों में दलित और आदिवासी समाज के नायकों के साथ बेइमानी तो की ही है, वर्तमान समय में इनके साथ अपने लोगों ने भी नाइंसाफी की है। जिसका जीता-जागता उदाहरण हैं अंग्रेजी शासन के खिलाफ भारत के सबसे पहला स्वतंत्रता संग्रामी बाबा तिलका मांझी।

आदिवासी नायकों की उपेक्षा आजादी के बाद से अब तक तो होती ही रही है, लेकिन झारखंड अलग राज्य के 20 वर्षों बाद भी इन नायकों को जो सम्मान व महत्व मिलना चाहिए था, वह नहीं मिल पाया है। झारखंड अलग राज्य बनने के बाद कुछ हद तक बिरसा मुंडा को सरकारी स्तर पर महत्व दिया गया है, इसका कारण राजनीतिक इस्तेमाल क्यों न हो। परंतु तिलका मांझी और सिद्धु-कान्हु की भारी उपेक्षा हुई है। जबकि झारखंड में आदिवासियों की संख्या के अनुपात में संथाल पहले नंबर पर हैं और झारखंड अलग राज्य गठन के बाद बाबूलाल मरांडी, शिबू सोरेन और हेमंत सारेन जो संथाल समाज से आते हैं, की सत्ता में एक लंबी भागीदारी रही है। तो क्या तिलका मांझी और सिद्धु-कान्हु की उपेक्षा का कारण भौगोलिक रहा है? क्योंकि झारखंड अलग राज्य गठन के बाद आदिवासी होने के बावजूद तिलका मांझी और सिद्धु-कान्हु बिहार के भागलपुर क्षेत्र के दायरे में आते हैं।

बताते चलें कि अंग्रेजों ने तिलका मांझी की बर्बरता पूर्वक हत्या की थी। भागलपुर जिला के सुल्तानगंज के समीप के जंगल आज के तिलकपुर गांव में 13 जनवरी 1785 ई. में हुए युद्ध में तिलका मांझी घायल हो गए थे। उन्हें पकड़ कर भागलपुर लाया गया। अंग्रेज अफसरों ने घोड़े के पैरों में लम्बी रस्सी से बांध कर सड़कों पर घसीटते हुए अधमरा कर तिलका मांझी को चौक पर स्थित बरगद के पेड़ पर टांग दिया और मौत की सज़ा दी थी।

बताना जरूरी होगा कि तिलका मांझी का जन्म 11 फरवरी 1750 को बिहार के सुल्तानगंज में तिलकपुर नामक गाँव में एक संथाल परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम सुंदरा मुर्मू था। तिलका मांझी ने अंग्रेजों के अन्याय और गुलामी के खिलाफ़ जंग छेड़ी। तिलका मांझी राष्ट्रीय भावना जगाने के लिए भागलपुर में स्थानीय लोगों को सभाओं में संबोधित करते थे। जाति और धर्म से ऊपर उठकर लोगों को देश के लिए एकजुट होने के लिए प्रेरित करते थे।

उन्होंने 13 जनवरी 1784 में ताड़ के पेड़ पर चढ़कर घोड़े पर सवार अंग्रेज़ कलेक्टर अगस्टस क्लीवलैंड को अपने जहरीले तीर का निशाना बनाया जिसके कारण क्लीवलैंड बीमार पड़ा और अंततः उसकी मौत हो गई। क्लीवलैंड की मौत से पूरी ब्रिटिश हुकूमत सदमे में आ गई। उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि जंगलों में रहने वाला कोई आम सा आदिवासी ऐसी हिमाकत कर सकता है।

साल 1771 से 1784 तक जंगल के इस बेटे ने ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध लंबा संघर्ष किया। उन्होंने कभी भी समर्पण नहीं किया न कभी झुके और न ही डरे। उन्होंने अंग्रेजों के साथ साथ स्थानीय सूदखोर ज़मींदारों के खिलाफ भी संघर्ष किया।

अंग्रेज़ी सेना ने एड़ी चोटी का जोर लगा लिया, लेकिन वे तिलका को नहीं पकड़ पाए। ऐसे में उन्होंने अपनी सबसे पुरानी नीति फूट डालो और राज करो से काम लिया। ब्रिटिश हुक्मरानों ने उनके अपने समुदाय के लोगों को भड़काना और ललचाना शुरू कर दिया। उनका यह फ़रेब रंग लाया और तिलका के समुदाय से ही एक गद्दार ने उनके बारे में सूचना अंग्रेज़ों तक पहुंचाई।

सूचना मिलते ही रात के अँधेरे में अंग्रेज़ सेनापति आयरकूट ने तिलका के ठिकाने पर हमला कर दिया। लेकिन किसी तरह वे बच निकले और उन्होंने पहाड़ियों में शरण लेकर अंग्रेज़ों के खिलाफ़ छापेमारी जारी रखी। ऐसे में अंग्रेज़ों ने पहाड़ों की घेराबंदी करके उन तक पहुंचने वाली तमाम सहायता रोक दी। इसकी वजह से तिलका मांझी को अन्न और पानी के अभाव में पहाड़ों से निकल कर लड़ना पड़ा और एक दिन वह पकड़े गए। कहा जाता है कि तिलका मांझी को चार घोड़ों से घसीट कर भागलपुर ले जाया गया। 13 जनवरी 1785 को उन्हें एक बरगद के पेड़ से लटकाकर फांसी दे दी गई।

बता दें कि जिस समय तिलका मांझी ने अपने प्राणों की आहुति दी, उस समय मंगल पांडे का जन्म भी नहीं हुआ था। ब्रिटिश सरकार को लगा कि तिलका का ऐसा हाल देखकर कोई भी भारतीय फिर से उनके खिलाफ़ आवाज़ उठाने की कोशिश भी नहीं करेगा। पर उन्हें यह कहाँ पता था कि बिहार झारखंड के पहाड़ों और जंगलों से शुरू हुआ यह संग्राम ब्रिटिश राज को देश से उखाड़ कर ही थमेगा।

इन घटनाओं में सबसे दुखद बात यह हुई कि तिलका मांझी को जबरा पहाड़िया से जोड़ दिया गया। तिलका मांझी की पहचान को जबरा पहाड़िया से जोड़ कर इतिहास ने तिलका के साथ बड़ी नाइंसाफी की है, जो ऐसे शहीदों को लेकर इतिहास के पुनर्लेखन की जरूरत पर बल देता है।

इस बावत झारखंड कैडर के अवकाश प्राप्त प्रशासनिक पदाधिकारी एवं बिहार के जमुई जिला अंतर्गत झाझा के रहने वाले संग्राम बेसरा कहते हैं कि इसमें कोई दो मत नहीं कि तिलका मांझी और सिद्धु-कान्हु की उपेक्षा का कारण भौगोलिक है। वे कहते हैं, इसका छोटा सा उदाहरण यह है कि ‘अबुआ दिशुम, अबुआ राज’का नारा सर्वप्रथम तिलका मांझी ने दिया था, जिसका सेहरा बिरसा मुंडा को दे दिया गया। जबकि हमसब जानते हैं कि ‘अबुआ दिशुम, अबुआ राज’संथाली भाषा के शब्द हैं।

वे आगे कहते हैं कि इसका यह अर्थ न लगाया जाय कि हम बिरसा मुंडा के उलगुलान को नकार रहे हैं, सच तो यह हैं कि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बिरसा मुंडा ने एक निर्णायक लड़ाई लड़ी, उन्होंने अंग्रेजों को यह बता दिया कि हमारा जल, जंगल, जमीन को कोई भी ताकत नहीं छीन सकती। लेकिन पता नहीं उन्होंने ऐसा बोला भी था या नहीं! वे शंका जाहिर करते हुए कहते हैं कि इतिहासकारों द्वारा इस नारा को बिरसा मुंडा के संदर्भ में कोड करना आदिवासियों के बीच फूट की लकीर खींचने का षडयंत्र हो सकता है। बेसरा का संदेह इस मायने में मजबूत दिखता है कि, आदिवासियों के हूल व उलगुलान के इतिहास को पहले अंग्रेजों ने लिखा, जिसकी नकल करके  कुछ समय बाद थोड़े विस्तार के साथ अन्य लोगों द्वारा लिखा गया। बता दें कि ‘हूल’जहां संथाली भाषा का शब्द है, वहीं उलगुलान मुंडारी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ क्रान्ति होता है।

बेसरा इतिहास पर सवाल खड़ा करते हुए कहते हैं कि ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का नारा सिद्धु-कान्हु ने दिया था। इस बावत उन्होंने तत्कालीन कलकत्ता के वायसराय को एक पत्र लिखा था। जो कलकत्ता के विक्टोरिया मेमोरियल में राष्ट्रीय संग्रहालय में है। वे तिलका मांझी को जबरा पहाड़िया बताए जाने पर कहते हैं कि यह संथालों के हूल को खारिज करने की साजिश के तहत किए गए प्रोपेगंडा का एक हिस्सा है। सच यह है कि तिलका मांझी और जबरा पहाड़िया अलग अलग व्यक्ति हैं। इसका सबूत यह है कि पहाड़िया जनजाति आज भी पहाड़ों की चोटी पर रहना पसंद करते हैं। वे आज भी राजमहल के पहाड़ों में बसे हुए हैं। जबकि संथाल शुरू से ही समतली क्षेत्रों में ही रहना पसंद किया है। तिलका मांझी तत्कालीन चंपानगर जो आज भागलपुर कहलाता है के साहेबगंज के थे। दूसरी बात, संथाल को छोड़कर किसी भी आदिवासी समुदाय में किसी का मांझी उपनाम नहीं होता है, न ही आजतक किसी संथाल का उपनाम पहाड़िया हुआ है। यह अंग्रेज और उनके दलाल यह बताते रहे हैं कि संथाल बीरभूमि और मानभूमि से आकर पहाड़िया लोगों को भगाकर यहां बस गए, जबकि सच यह है कि संथाल शुरू से ही चंपानगर स्थित गंगा के मैदानी इलाकों में रहते थे।

तिलका मांझी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर, अंबेदकर विचार विभाग के विभागाध्यक्ष एवं तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय द्वारा शहीद तिलका मांझी पर गठित शोध कमिटी से जुड़े रहे डॉ. विलक्षण रविदास कहते हैं कि संथाल तत्कालीन बंग प्रदेश के चंपानगर में प्रारंभ से ही रहते आए हैं। विलक्षण रविदास कहते हैं  कि यह काफी दुखद है कि बिहार और भारत के कुछ इतिहासकारों ने उन्हें ऐतिहासिक पुरुष नहीं मानते हुए इतिहास के पन्नों में ही जगह देने से ही इंकार कर दिया, तो कुछ तथाकथित विद्वानों ने अंग्रेजों के वफादार एवं हिल कार्पस पहाड़िया सैनिक बल के सेनापति जबड़ा पहाड़िया को ही तिलका मांझी घोषित कर दिया है और उनके गौरवशाली इतिहास को विवादास्पद बना दिया है। वे बताते हैं कि भागलपुर में भी एक ऐसे इतिहासकार हैं जो इस पर विवाद पैदा करते रहते हैं। संभवतः इतिहास दृष्टि के अभाव में वे ऐसा करते रहते हैं या अपना नाम सुर्खियों में लाने के लिए विवाद पैदा करते हैं।

डॉ. विलक्षण रविदास ने बताते हैं कि 1779 ई. में ही भागलपुर के प्रथम कलक्टर क्लीवलैंड नियुक्त हुआ था। उसके द्वारा जनजातियों में फूट डालने की नीति के तहत पैसे, अनाज और कपड़े बांटने के कार्य किए जा रहे थे और पहाड़िया जनजाति के लोगों की 1300 सैनिकों की भर्ती 1781ई. में की गई थी। उस सैनिक बल का सेनापति जबरा पहाड़िया या जोराह पहाड़िया को जो कुख्यात लूटेरा था को बनाया गया था। जो जीवन भर अंग्रेज़ो का वफादार सेनापति बना रहा। उसके नेतृत्व में पहाड़िया सैनिक बल तिलका मांझी के जनजाति एवं किसान विद्रोह को कुचलने और दमन करने के लिए लगातार लड़ाई लड़ रहे थे। तीतापानी के समीप 1782 और 1783 में हुए दो युद्धों में अंग्रेजी सेना की बुरी तरह पराजय हुई थी। उस पराजय के बाद कलक्टर आगस्ट्स क्लीवलैंड के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना के साथ 1783 के 30 नवम्बर को पुनः उसी स्थान पर तिलकामांझी के साथ भीषण युद्ध हुआ।

इस युद्ध में क्लीवलैंड विषाक्त तीर और गुलेल के पत्थर से बुरी तरह घायल हो गया और उसे भागलपुर लाया गया। उसने अपना प्रभार अपने सहायक कलेक्टर चार्ल्स कांकरेल को सौंप दिया और वह अपनी चिकित्सा के लिए इंग्लैंड वापस लौट गया। किन्तु रास्ते में ही समुद्री जहाज पर 13 जनवरी 1784 ई. को उसकी मौत हो गई। उसके बाद सी. कैपमैन भागलपुर के कलक्टर नियुक्त हुआ। जिसने तिलका मांझी की सेना और जनजाति समाज के विरुद्ध भागलपुर राजमहल के पूरे क्षेत्र में पुलिस आतंक का राज कायम किया। दर्जनों गांवों में आग लगा दी गई। सैकड़ों निर्दोष आदिवासियों को मौत के घाट उतार दिया गया और पागलों की तरह अंग्रेजी सेना तिलका मांझी की तलाश करने लगी। तिलका मांझी राजमहल क्षेत्र से निकल कर भागलपुर क्षेत्र में आ गये और अब छापा मारकर युद्ध करने लगे। सुल्तानगंज के समीप के जंगल में 13 जनवरी 1785 ई. में हुए युद्ध में तिलका मांझी घायल हो गए और उन्हें पकड़ कर भागलपुर लाया गया। जहां उन्हें एक बरगद के पेड़ से लटकाकर फांसी दे दी गई।

तिलका मांझी की उपेक्षा को पूर्व सांसद सालखन मुर्मू भौगोलिक कारण नहीं मानते हैं। उनका कहना है कि जब बिहार से झारखंड अलग नहीं हुआ था तब भी इनकी उपेक्षा हुई है। इन शहीदों का सही मूल्यांकन अब तक नहीं हुआ है। इस काम को सरकारी संस्थान कर सकते हैं या जाने माने इतिहासकार कर सकते हैं। लेकिन दोनों ने इनपर विशेष ध्यान नहीं दिया। झारखंड में बाबूलाल मरांडी, शिबू सोरेन और हेमंत सोरेन तीनों 6 बार मुख्यमंत्री रहे, परंतु उन्होंने इन शहीदों पर कोई ध्यान नहीं दिया। ये लोग चाहते तो बहुत कुछ कर सकते थे।

वहीं बिहार सरकार नें भी इनपर ध्यान नहीं दिया, जबकि तिलका मांझी व सिद्धु-कान्हु उनके धरोहर में से एक हैं। हमने सरकार से मांग की है कि तिलका मांझी व सिद्धु-कान्हु के नाम पर एक ट्रस्ट का गठन हो और इस ट्रस्ट के नाम 100 करोड़ रूपए फिक्स डिपाजिट हो और इनके वंशज जो आज काफी खस्ताहाल स्थिति में हैं, इस पैसे के ब्याज से उनके हालात को ठीक करने के साथ साथ और भी काम हो सकते हैं, जैसे उन पर रिसर्च वगैरह किया सकता है। वे भी मानते हैं कि तिलका मांझी व जबरा पहाड़िया अलग अलग व्यक्ति रहे हैं।

खोरठा साहित्यकार व खोरठा के व्याख्याता दिनेश दिनमणी भी मानते हैं कि तिलका मांझी व सिद्धु.कान्हु के साथ सभी स्तर से उपेक्षा हुई है। अतः झारखंड के इतिहास को नये सिरे से लिखे जाने की जरूरत है। खासकर तिलका मांझी के आंदोलन पर।

बड़ी विडंबना है कि अविभाजित बिहार के समय में तो उपेक्षा की ही गई, झारखंड बनने के बाद भी झारखंड की सरकारों द्वारा तिलका मांझी द्वारा अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ किये गये संघर्ष और उनकी शहादत को अपेक्षित महत्त्व नहीं दिया गया। अब जबकि राज्य गठन के बाद 6 बार के मुख्यमंत्री खुद संथाल समुदाय से रहे हैं और झारखंड आंदोलनकारी पार्टी के नेतृत्व की सरकार भी है, तो उम्मीद लाजिमी है कि इस संदर्भ में कुछ काम जरूर हो। इसके लिए उन पर विशेष शोध कार्य करवाकर उनके स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में उनके वास्तविक स्थान को दिलाने की दिशा में ठोस पहल जरूरत है।

तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के शोध छात्र रहे डॉ.अंजनी ने बताया कि आजाद भारत में भी स्वतंत्रता संग्राम पहला योद्धा तिलकामांझी उपेक्षित ही रहा है, जिसकी वजह ब्राह्मणवादी नजरिए से लिखे गए इतिहास रहा है। इतना ही नहीं पिछले इतिहास के आधार पर आज भी लेखकों के उपेक्षा के शिकार ये अमर शहीद हो रहे हैं। आज भी वैसे इतिहासकार तिलका मांझी को लेकर विवाद खड़ा कर रहे हैं। वे कहते हैं कि शहीद तिलका मांझी पर ठोस अध्ययन व शोध की गारंटी होनी चाहिए। बिहार-झारखंड की सरकारों को शहीद तिलकामांझी को इतिहास के पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहिए।

भागलपुर के सामाजिक कार्यकर्ता अर्जुन शर्मा ने बताते हैं कि बिहार-झारखंड की सरकारों ने भी तिलका मांझी व सिद्धु-कान्हु को उचित सम्मान नहीं बख्शा है। झारखंड में किसी संस्था का नाम तक इस योद्धा के साथ नहीं जुड़ा है। बिहार में भी लंबे आंदोलन के बाद तिलका मांझी के शहादत स्थल पर उनकी प्रतिमा लगी है और भागलपुर विश्वविद्यालय का नामकरण तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय हुआ है। लेकिन जिस स्थान पर तिलका मांझी के नाम पर हाट लगता रहा है। उस पर भूमि माफिया, नौकरशाह व राजनेताओं के गठजोड़ के द्वारा कब्जा कर इमारतें खड़ी कर दी गई हैं। यह कितना शर्मनाक है, स्वतः समझा जा सकता है।

सामाजिक न्याय आंदोलन (बिहार) के रिंकु यादव ने बताते हैं कि हाशिए के समाज का संघर्ष और नायक भी इतिहास में हाशिए पर ही होता है, वर्चस्वशाली शक्तियां इतिहास के किताबों में भी वर्चस्व में रहती हैं। शहीद तिलका मांझी इसलिए इतिहास में उपेक्षित रहे हैं। लेकिन जब कोई हाशिए का समाज दावेदारी जतलाता है, तो वह अपने इतिहास और नायकों को लेकर सामने आता है। वर्तमान की दावेदारी इतिहास तक पहुंचती है। शहीद तिलका मांझी भी बहुजनों के जागरण के साथ सामने आ रहे हैं। आज बड़े पैमाने पर याद किये जा रहे हैं।


विशद कुमार, स्वतंत्र पत्रकार हैं और लगातार जन-सरोकार के मुद्दों पर मुखरता से ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रहे हैं।


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