Home ओप-एड कानून-व्यवस्था में बड़ा रोड़ा रहेगी नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति- पूर्व डीजीपी

कानून-व्यवस्था में बड़ा रोड़ा रहेगी नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति- पूर्व डीजीपी

पुलिसकर्मी की अपेक्षा कॉलेज-विश्वविद्यालय स्तर पर होगी कि शिक्षा समाप्ति के बाद जल्द से जल्द हर युवा को अपने कौशल और क्षमता के अनुसार रोजगार मिल जाए ताकि वह जीवन में किसी बड़े भटकाव में पड़ने से बचे। किसी से छिपा नहीं है कि अपराध, अतिवाद और साइबर षड्यंत्रों के मायाजाल में लिप्त मिलने वालों में प्रायः बेरोजगार या अनिश्चित रोजगार वाले युवा ही बहुतायत में होते हैं, जो आसानी से प्रलोभन या निराशा के भंवर में फंस जाते हैं। दरअसल, एनईपी व्यवस्था में कौशल विकास पर तो जोर है पर इस कौशल-संपन्न भीड़ की समाज में खपत को बाजार के उतार-चढ़ाव के रहमों-करम पर छोड़ दिया गया है। यानी एनईपी मोटा मुनाफा कमाने वाली कौशल निर्माण की शिक्षा-दुकानों को तो बढ़ावा देगी लेकिन उस कौशल को समाज में पूर्ण रूप से खपाने की गारंटी नहीं बन पाएगी।

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फाइल फोटो

 

पुलिसिंग के नजरिये से मोदी सरकार की नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के प्रारंभिक स्कूल चरण और अंतिम कॉलेज चरण दोनों चिंता के स्रोत के रूप में सामने नजर आते हैं। बेशक, शिक्षा नीति में क्रिटिकल (चहुंमुखी) सोच और स्किल (कौशल) विकास पर सही ही जोर दिया गया है पर कानून-व्यवस्था का अनुभव बताता है कि सामाजिक-आर्थिक शांति के लिए ये आयाम अपने आप में काफी नहीं होंगे। जबकि पुलिस को स्कूल और कॉलेज से एक स्व-अनुशासित समाज की निर्मिति का भरोसा चाहिए।

मत भूलिए कि पुलिसवाला एक घरेलू अभिभावक भी होता है और इस भूमिका में उसे अपने बच्चों में क्रिटिकल समझ और उनके स्किल विकास की घोषणाओं का स्वागत करना चाहिए। वह करेगा भी, बिलकुल किसी अन्य जागरूक अभिभावक की तरह। लेकिन वह एक और भूमिका में भी होता है- और वह है कानून-व्यवस्था के अभिभावक की। इस भूमिका में वह सिर्फ शिक्षा की गुणवत्ता के पहलू से ही संतुष्ट नहीं हो सकता। आइये इस महत्वपूर्ण पेशेवर पहलू को भी समझें।

मुख्य रूप से, एक कानून-व्यवस्था से जुड़ा कर्मी, किसी भी शिक्षा नीति से दो स्तर पर अपेक्षा रखेगा। पहली अपेक्षा स्कूल स्तर पर होगी कि तमाम बच्चे स्कूल शिक्षण के ढाँचे से जुड़े मिलें न कि उससे बाहर दिखें। जब बच्चे, विभिन्न कारणों से, स्कूली शिक्षा के ढाँचे से बाहर निकल जाते हैं तो उन्हें आसानी से मानव तस्करी, नशा और बाल अपराधों में फंसाया जा सकता है। आज भी, राइट टु एजुकेशन और मिड-डे मील के बावजूद, इसे रोज होते देखना मुश्किल नहीं। यह कटु यथार्थ, पुलिस की तमाम ऊर्जा और समय की बरबादी का ऐसा विवरण है जो उसकी उपलब्धि में कहीं दर्ज नहीं होता। बल्कि अपराध की रोकथाम और छानबीन जैसे जरूरी आयामों पर भी व्यापक असर डालता है।

नयी शिक्षा नीति में आर्थिक-सामाजिक रूप से कमजोर बच्चों के लिए ऐसी कोई गारंटी नहीं है, जिससे उन्हें हर हाल में स्कूल गतिविधियों के भीतर रखा जा सकता हो। सामाजिक-आर्थिक वर्ग के अभिभावकों के लिए ऐसा कोई प्रोत्साहन नहीं है कि वे अपने बच्चों को लगातार बेहतर स्कूलों से जोड़े रखें। इसके अभाव में उनके लिए अपने बच्चों को स्कूल काल के दौरान पैतृक धंधों में घसीटना या बाल श्रम में डालना आम बात है। अच्छे स्कूली वातावरण के अभाव में इन बच्चों का गलत संगति में पड़कर आवारागर्द बनना भी।

पुलिसकर्मी की दूसरी अपेक्षा कॉलेज-विश्वविद्यालय स्तर पर होगी कि शिक्षा समाप्ति के बाद जल्द से जल्द हर युवा को अपने कौशल और क्षमता के अनुसार रोजगार मिल जाए ताकि वह जीवन में किसी बड़े भटकाव में पड़ने से बचे। किसी से छिपा नहीं है कि अपराध, अतिवाद और साइबर षड्यंत्रों के मायाजाल में लिप्त मिलने वालों में प्रायः बेरोजगार या अनिश्चित रोजगार वाले युवा ही बहुतायत में होते हैं, जो आसानी से प्रलोभन या निराशा के भंवर में फंस जाते हैं। दरअसल, एनईपी व्यवस्था में कौशल विकास पर तो जोर है पर इस कौशल-संपन्न भीड़ की समाज में खपत को बाजार के उतार-चढ़ाव के रहमों-करम पर छोड़ दिया गया है। यानी एनईपी मोटा मुनाफा कमाने वाली कौशल निर्माण की शिक्षा-दुकानों को तो बढ़ावा देगी लेकिन उस कौशल को समाज में पूर्ण रूप से खपाने की गारंटी नहीं बन पाएगी।

सवाल है कि फिर किया क्या जाना चाहिए? 34 वर्ष पुरानी, राजीव गांधी के जमाने की, शिक्षा नीति की कमियों से सबक लिया जाना चाहिए था। कैसे? दो रास्ते हो सकते हैं। बच्चों को स्कूली ढाँचे से जोड़े रखने के लिए हर आर्थिक-सामाजिक रूप से पिछड़े बच्चे को इतना वजीफा दिया जाये कि वह अपनी मेरिट के अनुसार मनचाहे स्कूल में पढ़ सकें। यह स्कूल और अभिभावक दोनों के लिए बच्चे को स्कूल में उपस्थित रखने के लिए वांछित प्रोत्साहन का काम करेगा। साथ ही स्कूलों में योग्य अध्यापकों और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देने के लिए उनकी गुणवत्ता के आधार पर सरकार की ओर से आर्थिक अनुदान भी दिया जाए।

दूसरे, बिना किसी रोजगार योजना के, स्वतंत्र कौशल से युक्त युवा भीड़ पैदा करने वाली वर्तमान शिक्षा के ढाँचे को हतोत्साहित किया जाना चाहिए। पहले से ही देश महानगरों, शहरों और कस्बों में वकीलों, इंजीनियरों, आईटी, एमबीए, बीएड सहित तमाम अन्य वर्गों के बेहिसाब पेशेवर बनाने वाले शिक्षा केंद्र होने का खामियाजा भुगतता रहा है। याद रखने वाली बात है कि जैसे महज डिग्री अपने आप में रोजगार नहीं बन सकी, उसी तरह महज कुशल होना भी रोजगार की गारंटी नहीं हो सकता। सीधा समीकरण यही है कि सभी के लिए रोजगार के अवसर हों। इसके लिए स्थानीय, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय सर्वे के आधार पर, प्रत्येक कॉलेज-विश्वविद्यालय को भावी रोजगार दाताओं से परस्पर आधारित कुशलता (interdependent skill) की नेटवर्किंग से जोड़ा जाये।

प्राणी जगत में मनुष्य के अतिरिक्त कोई अन्य प्राणी बेरोजगार नहीं होता। मनुष्य भी नहीं होना चाहिए। यदि शिक्षा नीति का लक्ष्य ऐसा हो सके तो कानून-व्यवस्था के अभिभावकों के लिए यह एक सपना पूरा होने जैसा होगा। समाज ज्यादा सुरक्षित महसूस करेगा और हर पुलिसवाला अधिक चैन से सो सकेगा। 


 
विकास नारायण राय

राष्ट्रीय पुलिस अकादमी, हैदराबाद के पूर्व डायरेक्टर हैं। हरियाणा में डीजीपी भी रहे हैं।

 


 

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