‘क्या करें’ का अनवरत जवाब: प्रो. लालबहादुर वर्मा


अम्बेडकर के बारे में आनंद तेलतुम्बडे का खयाल है कि वे ताज़िंदगी जाति के सवाल को भिन्न-भिन्न तरीक़ों से हल करने की कोशिश में लगे रहे। हमारे सर भी ऐसे ही थे। वे शोषणमुक्त दुनिया और बेहतर मनुष्य बनाने का सवाल हल करने की कोशिश में ताज़िंदगी पूरी शिद्दत के साथ जुटे रहे। यही उनका करियर था, यही विचारधारा, यही उनकी उदासी और ख़ुशी का उत्स भी था। आप उनसे असहमत हो सकते थे, हो सकते हैं, पर उनके गहरे नैतिक आवेग और सपने भरी आँखों से मुँह नहीं चुरा सकते थे/हैं।


मृत्युंजय मृत्युंजय
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उन दिनों भूख बहुत लगती थी। खाने की भी और बतरस की भी। शहर-ए-इलाहाबाद में ख़ुशक़िस्मती से ऐसे कई घर थे, जहाँ इस भूख-प्यास को समझने और मिटा देने वाले लोग रहा करते थे। सर का घर इन्हीं कुछेक ठिकानों में से एक था। तेलियरगंज से रसूलाबाद जाते हुए मेहदौरी कॉलोनी के भीतर कदम खुद ब खुद मुड़ जाया करते। वहाँ सब कुछ मिलता। कई बार तो ऑटो के लिए किराया भी। तब तक यह समझ नहीं आया था कि सर व आंटी के जीवन की कठिनाइयों के बारे में सोचा जाए। पर उन्होंने कभी इस बारे में सोचने भी तो नहीं दिया। दुनिया की जाने कितनी वस्तुएँ, व्यक्ति, स्थान, विचार, साहित्य, संस्कृति, जीवन वग़ैरह बहस के दायरे में अपनी गति से आते-जाते पर उनके व्यक्तिगत जीवन की कठिनाइयाँ सिरे से इन बहसों से नदारद हुआ करती थीं।

चमकती मुस्कराहटों वाले साँवले, धवलकेशी सर का चश्मा अक्सर खो जाया करता। रजनी आंटी अपनी चमकती आँखों और तिरछी निगाहों से उन्हें देखतीं और चश्मा मिल जाता। अक्सर वह उनकी आँखों से सरक कर उनके सर पर चला गया होता। यों सर को अपने पर मुस्कुराने का एक मौक़ा और मिल जाता। उनकी हँसी से कई-कई गुना सुंदर उनकी मुस्कुराहट थी, यह तो उनको जानने वाले सब मानेंगे।

बोलने खड़े होते हुए वे कलाई पर बंधी घड़ी को देखते और कहते कि इतिहास का विद्यार्थी होने के नाते…। फिर संक्षिप्त, समयबद्ध और आत्मीय लहजे से विषय-प्रवेश होता। कोई हड़बड़ी नहीं, वे विषय को संगत व क्रमबद्ध ढंग से पेश करने की कोशिश करते। इत्मीनान से बहस करते। ‘क्या करें’ के सवाल का जवाब खोजते-देते कलाई घड़ी की तरफ नज़र डालते और बात ख़त्म करते। अगर आपने उन्हें देखा है तो आप जानते ही होंगे कि वे बोलते और कविता सुनते वक़्त तक़रीबन एक जैसे ध्यानमग्न होते थे, सुंदर दीखते थे।

उनके जीवन में मुश्किलें थीं, कई थीं पर उनके सपनों की नदी की तेज धार उन्हें कहीं किनारे लगा देती। निश्चित ही रजनी आंटी के सहारे ही वे ऐसा कर पाते होंगे। सपनों की इस दुनिया में ‘मैं’ का कोई खास मोल नहीं था। उसकी जगह ‘हम’ थे। वे अपने को ‘सर’ कहलाना बिलकुल पसंद न करते थे। वे अपने को ‘वर्मा जी’ भी नहीं कहलवाना चाहते थे। उनका बस चलता तो वे अपने आपको हम सबसे लालबहादुर कहलाना पसंद करते। हम सब इलाहाबादी ‘सरसराहट’ के मारे हुए लोग थे। हमारी ही नालायकी थी कि हम उन्हें कभी भी पहले नाम से नहीं पुकार सके। एकाध दोस्तों ने कोशिश की भी पर वह कोशिश संस्कारों के बोझ से दब गयी। पर जब कोई ऐसा करने की कोशिश करता, वे बेइंतहा खुश होते। बड़े-छोटे सब तरह के प्रयोगों से वे कभी नहीं चूकते थे।

काम करते रहना उनके लिए प्राणवायु जैसा था। हर तरह का काम। रसोई का काम। अनुवाद का काम। पढ़ाने का काम। आदमी गढ़ने का काम। हर तरह के श्रम के प्रति सम्मान की नज़र गाँव के ठेठ सामंती ठसक की दुनिया से आए किसी नौजवान के लिए अचरज भरी खिड़की थी। सर उस खिड़की से हमें बुलाते, उस पार के अचरज-लोक के क़िस्से सुनाते। हममें से बहुतों के कान उस क़िस्से के लिए तैयार न होते पर सर कभी धीरज नहीं खोते।

‘सम्प्रेषण की जान लोकतंत्र में रहती है’ इस वाक्य को अगर इंसानी जिस्म दिया जा सके तो उसकी अक़्ल-शक्ल बहुत कुछ सर की तरह होगी। सामान्यत: हमारी बहसों की गति ब्राउनियन होती है, कौन तर्क कब किस दिशा में भाग पड़ेगा, हमें भी मालूम नहीं होता। सर का मुआमला इस मामले में बहुत साफ था। उन्हें बहस की दिशा का हमेशा खयाल रहता था। जल्पना, वितंडा, छल और हेत्वाभास जैसी निरर्थकताओं का जाल वे लोकतंत्र के आधुनिक हथियार से काट देते थे। मन में चौहत्तर तरह के विभ्रम लिए हम उनसे बहस करते। उन्हें ध्यान से सुनता देख कई बार तो लगता कि हम सही हैं। पर वे फिर बहुत आराम से, आहिस्तगी से और सामने वाले को सहारा देते हुए बहस को सही जगह पर ले जाते। लोकतांत्रिक तर्क प्रणाली से कोई वाक़िफ़ियत न रखने वाले हम जैसे जाने कितने लोगों ने सर से बहस के लोकतंत्र का ककहरा सीखा होगा।

अम्बेडकर के बारे में आनंद तेलतुम्बडे का खयाल है कि वे ताज़िंदगी जाति के सवाल को भिन्न-भिन्न तरीक़ों से हल करने की कोशिश में लगे रहे। हमारे सर भी ऐसे ही थे। वे शोषणमुक्त दुनिया और बेहतर मनुष्य बनाने का सवाल हल करने की कोशिश में ताज़िंदगी पूरी शिद्दत के साथ जुटे रहे। यही उनका करियर था, यही विचारधारा, यही उनकी उदासी और ख़ुशी का उत्स भी था। आप उनसे असहमत हो सकते थे, हो सकते हैं, पर उनके गहरे नैतिक आवेग और सपने भरी आँखों से मुँह नहीं चुरा सकते थे/हैं।

रम में टमाटर और मिर्च कौन डालता है! छलकती हुई आवाज़ में सबको खुश रहने को कौन कहता है! पेरिस की किसी शाम की महफ़िल में अजनबी भाषा में गाए गए गीत की याद करते हुए किसकी आँखों में बराबरी के ख़ुशगवार झरने फूटते हैं! उत्तर-पूर्व की कविताओं के गद्यानुवाद कौन सुनाता है! पढ़ी-अनपढ़ी किताबों के बेतरतीब ढेर के बीच आरामकुर्सी पर बैठा नौजवान साथियों को ज़िंदा-धड़कती हुई किताबें-सलाहें कौन देता है! यह सब करते हुए भी किसी तरह की सत्ता वा बड़प्पन से सौ गज दूरी कौन साध रखता है!

चलते-चलते एक बहस और करें सर?
जिसे आप दोस्ती कहते थे उसे प्यार कहें तो!

 

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र रहे मृत्युंजय प्रसिद्ध युवा कवि और दिल्ली के डॉ.आंबेडकर विश्वविद्यालय में शिक्षक हैं।


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