भगत सिंह की विचार यात्रा!


‘मनुष्य को दैवी शक्तियों में विश्वास करने वाला बना दो और उसके पास धन-संपत्ति आदि जो कुछ भी सब लूट लो। वह उफ् नहीं करेगा, यहां तक कि अपने आप के लूटने में खुद आपकी मदद करेगा। धार्मिक उपदेशों और सत्ताधारियों की मिलीभगत से ही जेलों, फांसियों, कोड़ों तथा शोषणकारी सिद्धांतों का निर्माण हुआ है।’


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ओमप्रकाश कश्यप

देशभक्ति के लिए यह (फांसी) सर्वोच्च पुरस्कार है। मुझे गर्व है कि मैं यह पुरस्कार पाने जा रहा हूं। वे सोचते हैं कि मेरे पार्थिव शरीर को नष्ट करके वे इस देश में सुरक्षित रह जाएंगे। यह उनकी भूल है। वे मुझे मार सकते हैं, लेकिन मेरे विचारों को नहीं मार सकते। वे मेरे शरीर को कुचल सकते हैं, लेकिन मेरी भावनाओं को नहीं कुचल सकते। ब्रिटिश हुकूमत के सिर पर मेरे विचार उस समय तक एक अभिशाप की तरह मंडराते रहेंगे, जब तक वे यहां से भागने के लिए मजबूर न हो जाएं।’─ भगतसिंह, 27 जुलाई 1930।

‘भारतीय स्वतंत्रता लंबे संघर्ष का परिणाम है। उसके लिए लाखों बलिदानियों ने मौत को खुशी-खुशी गले लगाया था तो उससे कहीं ज्यादा ने कठोर यातनाएं सही थीं। देश उन सबका ऋणी है। उनमें से किसी के भी बलिदान को छोटा या बड़ा कहना स्वतंत्रता की अवमानना करने जैसा है। किंतु आजादी की खातिर जान कुर्बान कर देने वालों में से यदि किसी एक को आदर्श बलिदानी रूप में चुनने को कहा जाए, तो निस्संदेह वे भगत सिंह होंगे। इसलिए नहीं कि मात्र 23 वर्ष की अवस्था में उन्होंने खुशी-खुशी फांसी के फंदे को चूम लिया था। न इसलिए कि उन्होंने असंबेली में बम फेंका था, और न ही इसलिए कि उन्होंने ‘इन्कलाब जिंदाबाद’ जैसा नारा बुलंद किया था- जिसे लगाते हुए हजारों-लाखों स्वतंत्रता प्रेमी औपनिवेशिक सत्ता के समक्ष छाती तानकर खड़े हो गए थे। अपितु इसलिए कि उन्हें न केवल भारतीय समाज की विकृतियों तथा अंग्रेजों के साम्राज्यवादी चरित्र की सही-सही पहचान थी, बल्कि भविष्य के भारत की सम्यक रूपरेखा भी उनके पास थी। लोकहित के लिए क्रांति को सही-सही परिभाषित करने में जितना योगदान भगतसिंह का है, उतना किसी और का नहीं है।

कहावत है कि जीवन लंबा नहीं, महत्वपूर्ण होना चाहिए- भगतसिंह ने इसे चरितार्थ कर दिया था। मात्र 23 वर्ष की उम्र में उन्होंने जो प्राप्त किया, उतना इतनी कम वयस् में शायद ही कोई प्राप्त कर सका। यही कारण है कि उनके बलिदान ने जहां गांधी को संपादकीय लिखने के लिए विवश कर दिया था, वहीं डॉ. आंबेडकर तथा सुदूर दक्षिण में आंदोलनरत रामासामी पेरियार ने भी, अपनी-अपनी तरह से उनके योगदान की सराहना की थी। भगतसिंह की जीवनयात्रा, एक स्वप्न-दृष्टा युवक के महान क्रांतिकारी बनने की कथा है। ऐसा युवक जो अपने देश और समाज के लिए सोचता है। उनके मान-सम्मान, आजादी तथा अस्मिता की सुरक्षा हेतु संघर्ष करता है। ऐसा व्यक्ति जो समाज से जितना ग्रहण करता है, उससे कहीं ज्यादा परिमाण में वापस लौटा देता है।

1923 में विद्यार्थी जीवन में ही घर छोड़कर, खुद को ‘मकसदे आला… आजादी-ए-हिंद के असल के लिए वक्फ’ कर देने के साथ उनका क्रांतिकारी जीवन आरंभ होता है। उनके लेखन के उत्तरोत्तर विकास से उनके क्रांतिकारी जीवन की यात्रा को समझा जा सकता है। देशभक्ति और क्रांति का पाठ उन्हें परिवार से ही मिला था। दादा सरदार अर्जुन सिंह बड़े जमींदार थे। 80 वर्ष से ज्यादा की उम्र में भी वे राष्ट्रवादी गतिविधियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। सरदार अर्जुन सिंह के भाई सरदार बहादुर दिलबाग सिंह सरकारी कर्मचारी थे; और सरकार की ओर से कई पुरस्कार ले चुके थे। भगतसिंह की दादी श्रीमती जय कौर घरेलू होने के साथ-साथ बहादुर महिला थीं। परिवार में राष्ट्रवादी नेताओं तथा क्रांतिकारियों का नियमित आना-जाना था। एक बार पुलिस प्रसिद्ध क्रांतिकारी सूफी अंबाप्रसाद को गिरफ्तार करने उनके घर पहुंची। तब श्रीमती जय कौर ने बुद्धिमानी और साहस के साथ हालात को संभालकर पुलिस को बैंरग लौटने को मजबूर कर दिया था।

भगत सिंह के चाचा अजीत सिंह पंजाब के बड़े किसान नेता थे। वे ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ आंदोलन के मुख्य सूत्रधारों में से थे। परिणामस्वरूप सरकार ने उन्हें गिरफ्तार करके बर्मा की मांडले जेल भेज दिया था। लाला लाजपतराय भी वहीं थे। लेकिन अजीत सिंह की लोकप्रियता ऐसी थी कि गिरफ्तारी के बाद जनता भड़क उठी। जनाक्रोश ऐसा उमड़ा कि सजा पूरी होने से पहले ही, सरकार को उन्हें रिहा कर देने का आदेश देना पड़ा। बाद में वे विदेश जाकर आजादी के आंदोलन को मजबूत करने के लिए काम करने लगे। वे गदर पार्टी से जुड़े, 1946 में सुभाषचंद बोष के संपर्क में भी आए तथा उनके संघर्ष को आगे बढ़ाने में योगदान दिया। भगतसिंह के पिता सरदार किशन सिंह तथा एक और चाचा सरदार स्वर्ण सिंह भी, भड़काऊ भाषण देने के आरोप में जेल की सजा प्राप्त कर चुके थे। इस तरह क्रांति का पहला सबक भगतसिंह को अपने परिवार से ही प्राप्त हुआ था।

यह प्रभाव इतना गहरा था कि 1924 में भगत सिंह ने ‘पंजाब की भाषा और लिपि की समस्या’ शीर्षक भाषण लिखा तो वह केवल भाषा, लिपि और अनुवाद की समस्या तक सीमित नहीं था। उस पर शुरू से अंत तक, भगतसिंह को विरासत में मिले संस्कार हावी थे। भाषण उन्होंने ‘पंजाब हिंदी साहित्य सम्मेलन’ के आमंत्रण पर लिखा था। सम्मेलन द्वारा आयोजित भाषण प्रतियोगिता में प्रथम आने पर उन्हें 50 रुपये का पुरस्कार भी मिला था। उस भाषण में वे दक्ष भाषाविद की तरह तर्क देते हुए पंजाबी को ‘हिंदी-लिपि’ में लिखने की सलाह देते हैं। हालांकि अंतिम फैसला विद्वानों पर छोड़ देते हैं। लेख में वे जगह-जगह सामाजिक क्रांति के संदर्भ में साहित्य की भूमिका को रेखांकित करते हैं। एक जगह उन्होंने स्वामी रामतीर्थ द्वारा गाए जाने वाले प्रयाण गीत को उद्धृत किया है, जो बूढ़े दिलों में भी जोश भर देने का सामर्थ्य रखता है─

‘हम रूखे टुकड़े खाएंगे, भारत पर वारे जाएंगे।

हम सूखे चने चबाएंगे, भारत की बात बनाएंगे

हम नंगे उमर बिताएंगे, भारत पर जान मिटाएंगे।

मात्र 17 वर्ष की अवस्था में वे जिस तरह दुनिया-भर के क्रांतिकारी आंदोलनों को याद करते हैं, उससे उनके विशद् अध्ययन का अनुमान लगाया जा सकता है─

‘शायद गैरीबाल्डी को इतनी जल्दी सेनाएं न मिल पातीं, यदि मैजिनी ने 30 वर्ष देश में साहित्य तथा साहित्यिक जागृति पैदा करने में ही न लगा दिए होते… रूसो, वाल्तेयर के साहित्य के बिना फ्रांस की राज्य-क्रांति घटित न हो पाती। यदि टाल्सटाय, कार्ल मार्क्स तथा मैक्सिम गौर्की आदि ने प्रगतिशील साहित्य रचने में वर्षों न लगाए होते, तो रूस की क्रांति सफल न हो पाती, साम्यवाद का प्रचार तो दूर रहा।’

वस्तुतः वे भगत सिंह के लिए ‘भगत सिंह’ बनने के दिन थे। उनकी पढ़ने में रुचि तो बचपन से ही थी। कॉलेज में दाखिला लेने के बाद किताबों की भूख और ज्यादा भड़क चुकी थी। लाहौर के अनारकली बाजार में स्थित ‘रामकृष्ण एंड संस’ नामक किताबों की दुकान, भगतसिंह तथा उनके साथियों का पसंदीदा ठिकाना थी। दुकान पर जब्तशुदा पुस्तकें भी मिल जाया करती थीं। अच्छी पुस्तकें मिलने का एक और ठिकाना थी- लाला लाजपतराय की ‘द्वारकादास लाइब्रेरी’। उसमें रूसी साहित्य और राजनीति पर पुस्तकों का खासा भंडार था। जिस नेशनल कॉलेज में भगतसिंह पढ़ते थे, उसका पुस्तकालय भी समृद्ध था। वहां वैचारिक पुस्तकों का बहुमूल्य खजाना था। इटली, रूस, आयरलेंड की क्रांतियों से संबंधित अनेक पुस्तकें लाइब्रेरी में उपलब्ध  थीं। उनमें से बहुत-सी पुस्तकें भगतसिंह के आग्रह पर ही मंगवाई गई थीं। भगत सिंह के पुस्तक प्रेम के बारे में ‘द्वारकादास लाइब्रेरी’ के संचालक राजाराम शास्त्री का कहना था─

‘भगत सिंह वस्तुतः पुस्तकों को पढ़ता नहीं निगलता था। फिर भी उसकी ज्ञान-पिपासा सदा अनबुझी ही रहती थी। वह पुस्तकों के नोट्स बनाता, अपने साथियों के साथ विचार-विचार करता, अपनी समझ को नए ज्ञान की कसौटी पर आत्मालोचनात्मक ढंग से परखने का प्रयास करता था।’

महान क्रांतिकारी अपने लक्ष्य को देश-प्रदेश की सीमाओं में बांधकर नहीं रखता। उसके सरोकार मानवीय होते हैं, इसलिए उसके दायरे में संपूर्ण मनुष्यता आ जाती है। भगत सिंह का भी एक आदर्शलोक (यूटोपिया) था। एक लक्ष्य जिसे वे क्रांति के माध्यम से प्राप्त करना चाहते थे। उनका आदर्शलोक किसी एक देश की सीमा तक सीमित नहीं था। पूरी दुनिया उसमें शामिल थी─

‘सभी अपने हों, कोई भी पराया न हो। कैसा सुखमय होगा वह समय जब संसार से परायापन सर्वथा नष्ट हो जाएगा। जिस दिन यह सिद्धांत समस्त संसार में व्यावहारिक रूप में परिणित होगा, उस दिन संसार को उन्नति के शिखर पर कह सकेंगे… उस दिन इतनी शक्ति होगी कि ‘शांति-शांति’ की पुकार भी शांति भंग नहीं कर सकेगी। भूख लगने पर रोटी के लिए किसी को भी चिल्ल-पौं मचाने की आवश्यकता नहीं हुआ करेगी। व्यापार उस दिन उन्नति के शिखर पर होगा। परंतु फ्रांस और जर्मनी में व्यापार के नाम पर घोर युद्ध न हुआ करेंगे। उस दिन अमेरिका और जापान दोनों होंगे, परंतु उनमें पूर्वीपन और पश्चिमीपन न होगा… शांति होगी, किंतु पीनलकोड की आवश्यकता न होगी। अंग्रेज भी होंगे और भारतवासी भी, मगर उनमें गुलाम और शासक का भाव न होगा… उस समय होगी पूर्ण स्वतंत्रता।’

ऐसा था उस 17 वर्ष के युवा का दर्शन। ऐसी उम्र में जब अधिकांश युवती-युवक तरुणाई के सपने देखते हैं, विपरीत लिंगी के साथ प्यार और मनुहार की पींगें बढ़ाते हैं, भगतसिंह के युवा सपनों में पूरी मनुष्यता समाहित थी। लेखन-पत्रकारिता के आरंभिक दौर में वे भूले-बिसरे क्रांतिकारियों और जनविद्रोहों को याद करते है। निहिलिज्म, अनार्किज्म, समाजवाद, साम्यवाद जैसे राजनीतिक दर्शनों पर अपनी समझ को न केवल पुख्ता करते हैं, अपितु लोगों को उनके बारे में समझाते भी हैं। जिन राजनीतिक दर्शनों पर उन दिनों बहस छिड़ी हुई थी, उनमें ‘अराजकतावाद’ भी था।

विगत शताब्दियों में जिन शब्दों का सर्वाधिक अर्थ-विरूपण किया गया है, उनमें से एक ‘अराजकता’ भी है। ‘अराजकतावाद’ के उत्स की खोज हमें यूनानी दार्शनिक जीनो और चीनी विचारक लाओत्जे तक ले जाती है। आधुनिक विद्वानों में प्रूंधों को इसका पितामह माना जाता है। कार्ल मार्क्स का साथी रूसी दार्शनिक मिखाइल बकुनिन भी अराजकतावादी था। मार्क्स जहां वर्ग संघर्ष में विश्वास रखता था और बुर्जुआ शासन को हटाकर, सर्वहाराओं के शासन का सपना देखता था, वहीं बकुनिन किसी भी प्रकार के राज्य को मनुष्य की स्वतंत्रता के लिए बाधक मानता था। आरंभ में भगतसिंह का रुझान भी अराजकतावादी था। 1928 में उन्होंने ‘किरती’ में ‘अराजकतावाद’ पर एक लेखमाला आरंभ की थी, जिसमें उन्होंने साम्यवाद और समाजवाद की तुलना में ‘अराजकतावाद’ को ‘सबसे ऊंचा और आदर्श’ बताया था। भगतसिंह की उक्त लेखमाला में तीन लेख शामिल थे। उन्होंने लिखा था─

‘जिस आदर्श स्वतंत्रता की कल्पना की जाती है, वह पूर्ण स्वतंत्रता है।’ उसमें न ईश्वर, धर्म, निजी संपत्ति, धर्म और जाति संबंधी विशेषाधिकारों तथा शासन-प्रशासन के प्रतिबंधों के लिए कोई स्थान नहीं है। मानव मात्र की अधिकतम स्वतंत्रता के लिए अराजकतावाद मोटे तौर पर जिन शक्तियों को पूरी तरह खत्म कर देना चाहता है, उनमें पहली है─चर्च, भगवान और धर्म। दूसरी स्टेट (राज्य और सरकार) तथा तीसरी निजी संपत्ति।’

अराजकतावादियों के अनुसार राज्य संकेन्द्रित और संगठित रूप में हिंसा का प्रतिनिधित्व करता है। उसका अस्तित्व हिंसा पर टिका होता है। व्यक्ति के पास आत्मा होती है, चूंकि राज्य आत्मा-विहीन तंत्र होता है, इसलिए उसे हिंसा से विरत कभी नहीं किया जा सकता। शांति-व्यवस्था के नाम पर ज्यों-ज्यों कानून सख्त होते हैं त्यों-त्यों भ्रष्टाचार बढ़ता है। अराजकतावादी मानवमात्र की अधिकतम स्वतन्त्रता हेतु राज्य के विलोपन को जरूरी मानते हैं। कहने को तो गांधी ने भी जब-तब खुद को अराजकतावादी घोषित किया था। वे सरकार को अनिवार्य बुराई मानते थे। मगर गांधी द्वारा खुद को ‘अराजकतावादी’ कहना, उनका अपने ही मुंह खुद को दलितों का सबसे बड़ा हितैषी होने का दावा करने जैसा था। बहरहाल, भगतसिंह द्वारा अराजकतावाद पर लिखे तीसरे लेख के दो संदर्भ विशेष उल्लेखनीय हैं। उनके बाद के अभियानों पर उन दोनों का प्रभाव स्पष्ट नजर आता है। लेख में उन्होंने अराजकतावादी पीटर क्रोप्टोकिन को उद्धृत किया है, जिसमें क्रांति का पूरा दर्शन समाहित है। मिखाइल बकुनिन के अनुयायी क्रोप्टोकिन ने कहा था─

‘कोई एक व्यावहारिक कार्य हजारों पर्चों से अधिक प्रचार कर सकता है। सरकार अपना बचाव करती है। वह बुरी तरह जलती और गुस्साती है। अवसर देख कुछ और लोग प्रतिरोध के लिए आगे आ जाते हैं। सरकार फिर दमन करती है, जो नागरिकों को विद्रोह के लिए उकसाता है। सरकार क्षुब्ध होती है। धीरे-धीरे उसमें अंतर्विरोध उभरने लगते हैं। सरकार अलग-अलग खानों में बंट जाती है। उनमें आपस में ही नोंक-झोंक होने लगती है। इससे जनता की मांगों को स्वीकारने में विलंब होता है। फलस्वरूप इन्कलाब की जंग शुरू हो जाती है।’

आगे वे फ्रांसिसी क्रांतिकारी आगस्ट वैलेंट (27 दिसंबर 1861─5 फरवरी, 1894) का उल्लेख करते हैं। वैलेंट ने 9 दिसंबर, 1893 को फ्रांसिसी संसद के निचले सदन में बम फैंका था। बम बहुत हल्का था, इसलिए कुछ ‘डिप्टियों’ के घायल होने के अलावा उससे कोई और नुकसान न हुआ। बाद में अदालत में सुनवाई के दौरान वैलेंट ने अपना जुर्म स्वीकारते हुए कहा कि ‘बहरों को सुनाने के लिए धमाके की जरूरत पड़ती है।’ ठीक यही शब्द 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली स्थित केंद्रीय विधानसभा में बम धमाके के बाद भगत सिंह ने भी कहे थे। अदालत ने वैलेंट को गिलोटीन पर चढ़ा दिया था। भगतसिंह को भी फांसी की सजा मिली थी।

भगत सिंह की वैचारिक-यात्रा उनके दो लेखों, ‘अछूत का सवाल’ (जून 1928); तथा ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ (अक्टूबर 1931) के उल्लेख के बिना अधूरी मानी जाएगी। उस समय तक भारतीय समाज और राजनीति में अस्पृश्यों से जुड़े प्रश्न महत्वपूर्ण हो चुके थे। हजारों वर्षों से शोषण और दमन का शिकार रहे शूद्र एवं दलित अपने अधिकारों के लिए एकजुट होने लगे थे। कुल जनसंख्या का पांचवा हिस्सा होने के कारण वे बड़ी राजनीतिक शक्ति भी थे। इसलिए उन्हें लुभाने के लिए इस्लाम, ईसाई आदि धर्मावलंबियों में होड़ मची हुई थी। ऐसे में भगतसिंह ने ‘विद्रोही’ उपनाम से ‘अछूत का सवाल’ शीर्षक से लेख लिखा था, जो ‘किरती’ के जून 1928 अंक में प्रकाशित हुआ था। वे अछूतों की समस्याओं को वर्गीय समस्या के रूप में देख रहे थे। लेख में उन्होंने मदनमोहन मालवीय जैसे कांग्रेसी नेताओं के दोगले चरित्र पर कटाक्ष किया था─

‘इस समय मालवीय जैसे बड़े समाज सुधारक, अछूतों के बड़े प्रेमी और न जाने क्या-क्या पहले एक मेहतर के हाथों गले में हार डलवा लेते हैं, लेकिन कपड़ों सहित स्नान किए बिना स्वयं को अशुद्ध समझते हैं!’

दलितों को गंदा और अपवित्र मानने वाली मानसिकता पर प्रहार करते हुए उन्होंने कहा था─

‘वे गरीब हैं। गरीबी का इलाज करो। ऊंचे-ऊंचे कुलों के गरीब लोग भी कम गंदे नहीं रहते। गंदे काम करने का बहाना भी नहीं चल सकता, क्योंकि माताएं बच्चों का मैला साफ करने से अछूत नहीं जातीं।’

अस्पृश्यों को उनके आत्मगौरव की याद दिलाते हुए,  वे आगे लिखते हैं─

‘हम मानते हैं कि उनके (अछूतों के) अपने जन-प्रतिनिधि हों। वे अपने लिए अधिक अधिकार मांगें। हम तो कहते हैं कि उठो! अछूत कहलाने वाले असली जनसेवको तथा भाइयो उठो! अपना इतिहास देखो। गुरु गोविंद सिंह की फौज की असली ताकत तुम्हीं थे। शिवाजी तुम्हारे भरोसे ही सब कुछ कर सके। जिस कारण उनका नाम आज भी जिंदा है। तुम्हारी कुर्बानियां स्वर्णाक्षरों में लिखी हुई हैं…लेंड एलिएनेशन एक्ट के अनुसार तुम धन एकत्र कर भी जमीन नहीं खरीद सकते… अपनी शक्ति को पहचानो और संगठनबद्ध हो जाओ। असल में स्वयं कोशिश किए बिना कुछ भी न मिल सकेगा… स्वतंत्रता की चाहत रखने वालों को गुलामी के विरुद्ध खुद विद्रोह करना पड़ना पड़ेगा… लातों के भूत बातों से नहीं मानते। संगठनबद्ध हो अपने पैरों पर खड़े होकर पूरे समाज को चुनौती दे दो। तब देखना कोई भी तुम्हें तुम्हारे अधिकार देने से इन्कार करने की जुर्रत न कर सकेगा। तुम दूसरों की खुराक मत बनो। दूसरों के मुंह की ओर न ताको… तुम असली सर्वहारा हो। संगठनबद्ध हो जाओ। तुम्हारी कुछ हानि न होगी। बस गुलामी की जंजीरें कट कट जाएंगी। उठो और वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध बगावत खड़ी कर दो। धीरे-धीरे होने वाले सुधारों से कुछ नहीं बन सकेगा। सामाजिक आंदोलन से क्रांति पैदा कर दो तथा राजनीतिक और आर्थिक क्रांति के लिए कमर कस लो। तुम ही तो देश का मुख्य आधार हो, वास्तविक शक्ति हो। सोये हुए शेरो, उठो! और बगावत खड़ी कर दो।’

मुझे नहीं पता भारत के इतिहास में किसी गैर-बहुजन नेता ने इतना आवाह्नपरक भाषण दिया हो─ मैं नास्तिक क्यों बना’ शीर्षक से एक और लेख है, जिससे भगत सिंह की विवेचनात्मक क्षमता का पता चलता है। 1930 में जिन दिनों भगत सिंह ने यह लेख लिखा, खुद को नास्तिक कहना आसान नहीं था। धर्म का भूत जनसाधारण के दिलो-दिमाग पर इस कदर सवार था कि धर्म-विहीन जीवन की संकल्पना ही उसके लिए असह् थी। हालांकि माधवाचार्य ने छह हिंदू दर्शनों में चार्वाक दर्शन को पहले स्थान पर रखा है; और चार्वाक दर्शन भारत का अकेला भौतिकवादी संप्रदाय नहीं था। इसके अलावा 62 भौतिकवादी दर्शनों का उल्लेख ‘दीघनिकाय’ में है, जो दर्शन बुद्ध के पहले से ही भारत में प्रचलित थे। बावजूद इसके इस देश में खुद को नास्तिक कहना सरल न था।

असुर, राक्षस जैसे गालीनुमा विशेषण पुरोहित वर्ग में नास्तिक लोगों के लिए ही रचे थे। सार्वजनिक जीवन में तो खुद को नास्तिक घोषित करना, अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा था। खुद को नास्तिक घोषित करने के बावजूद जिन दो नेताओं ने भरपूर लोकप्रियता बटोरी, और समाज को प्रभावित करने में सफल रहे, उनमें पहले भगतसिंह, दूसरे दक्षिण के रामासामी पेरियार थे। हालांकि भगतसिंह के लिए ‘नास्तिकता इतनी नई चीज नहीं थी।’ भगतसिंह के अनुसार उन्होंने ‘ईश्वर को मानना तभी बंद कर दिया था’ जब वे अज्ञात नौजवान थे। आस्था और विश्वास ने मनुष्य और मनुष्यता का कितना नुकसान किया है, इसे वे अप्टन सिंक्लेयर के उद्धृण द्वारा समझाते हैं─

‘मनुष्य को दैवी शक्तियों में विश्वास करने वाला बना दो और उसके पास धन-संपत्ति आदि जो कुछ भी सब लूट लो। वह उफ् नहीं करेगा, यहां तक कि अपने आप के लूटने में खुद आपकी मदद करेगा। धार्मिक उपदेशों और सत्ताधारियों की मिलीभगत से ही जेलों, फांसियों, कोड़ों तथा शोषणकारी सिद्धांतों का निर्माण हुआ है।’

भगत सिंह को पढ़ते हुए प्रायः मैं अपने स्कूली दिनों में पहुंच जाता हूं। उन दिनों एक कहानी पढ़ी थी, जिसमें बालक भगतसिंह अपने पिता को खेतों में काम करते समय पूछता है कि ‘हम इन खेतों में बंदूकें क्यों नहीं बोते?’ उन दिनों बंदूक को ही क्रांति का अनिवार्य अस्त्र माना जाता था। स्कूल में एक अध्यापक महोदय हारमोनियम में रागनियां सुनाते थे। उक्त कहानी पर उन्होंने एक रागिनी तैयार की थी, जिसे वे तन्मय होकर सुनाते थे। आवाज इतनी ओजमय होती कि श्रोताओं के रोंगटे खड़े हो जाते। हर विद्यार्थी खुद को भगत सिंह समझने लगता था। लेकिन गांव के सामंती परिवेश में आपसी हिंसा को ही क्रांति समझ लिया जाता था। आज भी ऐसे बहुत से लोग हैं जो हिंसा और क्रांति के बीच फर्क नहीं कर पाते और क्रांति को बंदूक के नजरिये से देखते हैं। जबकि भगत सिंह ने अपनी प्रतिष्ठा वैचारिक क्रांति के दम पर हासिल की थी। उनके विचारों में मौलिकता भले ही न हो, मगर जिन विचारों और मूल्यों पर उनका विश्वास था, उनके साथ वे न केवल ईमानदारी से जिए, बल्कि दिखा दिया कि कोई भी विचार ऐसा नहीं है जिसे मनुष्य द्वारा अपने आचरण में उतार पाना असंभव हो।

‘थीसिस ऑन फायरबाख’ में मार्क्स ने लिखा है─‘दार्शनिकों ने इस संसार की तरह-तरह से व्याख्या की है। मुख्य समस्या है कि इसे बदला कैसे जाए?’ क्रांति के दर्शन को अपने जीवन में उतारकर भगत सिंह सिद्ध कर देते हैं कि विशाल पृथ्वी; तथा अनंत आसमान के नीचे ऐसा कुछ नहीं जो असंभव हो। चलते-चलते उनके लेख ‘युवक’ (मई 1925) की कुछ पंक्तियां, जो आज भी उतनी ही प्रेरणास्पद हैं, जितनी 95 वर्ष पहले थीं─

‘अलविदा, अलविदा मेरे सच्चे प्यार

सेनाएं आगे बढ़ चुकी हैं

प्रिय, यदि तुम्हारे पास और रुका

तो कायर कहलाऊंगा मैं।

 


ओमप्रकाश कश्यप, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।


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