‘ए.म.यू को बख़्श दो’- टीवी ऐंकर की मीडिया से अपील

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संस्मरण Published On :



फ़राह ख़ान न्यूज़ 18 इंडिया में ऐंकर हैं, लेकिन पत्रकारिता की मौजूदा गिरावट पर मुखर रहती हैं। हाल में अलीगढ़ मुस्लिम विश्विविद्यालय के आंदोलन को लेकर जिस तरह की रिपोर्टिंग हुई उससे फ़राह काफ़ी आहत हैं। पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी पर हमला या  छात्रों पर गुंडों के साथ मिलकर पुलिस का लाठी चार्ज की जगह “जिन्ना प्रेमी गैंग” को मुद्दा बनाना हैरान करने वाला है। फ़राह पिछले साल  ख़ुद एएमयू  गई थीं। अपने अनुभव बताते हुए उन्होंने मीडिया से इस शानदार विश्वविद्यालय को बख्श देने की अपील की है–   

 

मीडिया के बंधुओं से एक विनम्र निवेदन

 

फ़राह ख़ान

 

बीते साल अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय जाना हुआ तो पता चला कि हमारा मीडिया ख़बर दिखाए जाने के नाम पर एक शानदार और ऐतिहासिक युनिवर्सिटी के साथ कितना अन्याय करता है।

शुरू में माइक पकड़कर कैंपस में घूमते हुए महसूस हुआ कि स्टूडेंट्स में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकारों से बात करने में हिचकिचाहट है. स्टूडेंट्स खुलकर बात नहीं कर रहे थे। फिर युनिवर्सिटी के एक स्टूडेंट को बुलाया जो पहले से जानता था। उसने छात्रों को भरोसा दिलाया कि मैं कोई “खेल” नहीं करूँगी,तब मैं अपना काम कर पाई।

काम ख़त्म होने के बाद स्टूडेंट्स ने कहा कि देखिए हम किसी भी मुद्दे पर अपनी राय बेबाक़ी से रखते हैं और मीडिया के सामने भी रख सकते हैं लेकिन ऐसा करने से बचते हैं. यहां के स्टूडेंट्स और मीडिया के बीच बढ़ती दूरी के लिए ज़्यादातर पत्रकार ही ज़िम्मेदार है. मीडिया संदर्भों को काटकर ख़बरें प्रसारित/प्रकाशित करता है और उसे देखकर साफ महसूस किया जा सकता है कि  एएमयू की नेगेटिव इमेज गढ़ने के इरादे से ख़बर के नाम पर एक ख़ास अजेंडा को बढ़ाया जा रहा है. हम अपना पक्ष रखने के लिए मीडिया से बातचीत करते हैं और बार-बार महसूस होता है कि पत्रकारों से बात करके हमने मुसीबत मोल ले ली. एएमयू की लड़कियों ने कहा कि सालों से चल रहे मीडिया के इस नेगेटिव कैंपेन ने छात्रों के साथ-साथ इस युनिवर्सिटी की छवि को भी चोट पहुँचाई है। यह पत्रकारिता नहीं अपराध है।

एक स्टूडेंट ने बताया कि कैंपस में आई ‘सबसे तेज़’ चैनल की एक रिपोर्टर ये पूछने लगी कि ‘अरे AMU की लड़कियाँ जीन्स पहनती हैं, इंग्लिश भी बोलती हैं, लड़कों के साथ -साथ घूमती भी हैं? स्टूडेंट ने कहा कि जब रिपोर्टर ने ये सवाल किया तो उसकी समझ पर अफसोस हुआ। मुझे झटका लगा कि एक बड़े मीडिया हाउस में काम कर रही टीवी की पत्रकार मामूली समझदारी की कमी का शिकार है।

इससे पता चलता है कि रिपोर्टर जिस यूनिवर्सिटी में असाइनमेंट के लिए निकली थी, उसे वहां के बारे में कुछ भी पता नहीं था. जाने से पहले उसने अपना होमवर्क नहीं किया था और उसके मन में एएमयू की तरह-तरह की नकारात्मक छवियां पहले से मौजूद थीं. ऐसे में किसी रिपोर्टर से संतुलित कामकाज की उम्मीद कैसे की जा सकती है.

मैं एएमयू पहली बार गई थी और मुझे वहां जाकर सबकुछ सामान्य लगा. एक ज़िंदादिल कैंपस, लाइब्रेरी में साथ-साथ पढ़ते लड़के -लड़किया,  लड़कियाँ, कैंटीन में ग्रुप में बैठकर चाय पर हँसी-ठहाके और बहस-मुबाहिसे, क्या शानदार नज़ारा था हर जगह। लेकिन जैसे ही किसी स्टूडेंट के पास जाती तो पहला सवाल यही होता-हम जो बोल रहे हैं, आप वही दिखाओगी न? जितनी बार ये सवाल मैं सुन रही थी, मेरा सिर उतनी बार शर्म से झुका जा रहा था कि जो अपराध मैंने किया ही नहीं, उसकी सज़ा मुझे दी जा रही है।

अभी एएमयू में चल रहे हंगामे के बीच फिर उसी तरह की रिपोर्टिंग हो रही है. हर तरफ एक ख़ास अजेंडे का शोर है. हामिद अंसारी पर हमला बहस से गायब है और एएमयू में जिन्ना राष्ट्रीय फलक पर छाए हैं. लिहाज़ा, मीडियावालों से अपील है कि पत्रकारिता के नाम पर एक यूनिवर्सिटी पर इस तरह के हमले न करें. कारनामे उनके हैं और सज़ा उस रिपोर्टर को भी भुगतनी पड़ती है जो उनके जैसा नहीं है.

 

 



 


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