राजबली यादव: एक स्वतंत्रता सेनानी विधायक, जिन्होंने संस्कृतिकर्म को क्रांति के मोर्चे में बदला!

अवधेश सिंह अवधेश सिंह
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पुण्यतिथि पर विशेष:

 

तत्कालीन फैजाबाद जिले में, पहले जिसे विभाजित कर अम्बेडकरनगर जिले का सृजन किया गया, फिर बचे हिस्से का नाम बदलकर अयोध्या कर दिया गया, अरई नामक ग्राम में सात नवंबर 1906 को जन्मे राजबली यादव, जिन्होंने बाद में अपने अंचल की जनसंस्कृति के उन्नायक की पहचान अर्जित की, किशोरावस्था से ही गांधीवादी राजनीति में सक्रिय हो गए थे। 1919 में पंजाब में घटित हुए जलियांवाला बाग के नरसंहार के बाद तो उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फेंकने की कसम ही खा ली थी।

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और राजेसुलतानपुर थाने पर फहरा रहे अंग्रेजों के झंडे यूनियन जैक को फाड़कर वहां तिरंगा लहरा दिया था। 1930 से लेकर 1942 तक के स्वतंत्रता संघर्ष में वे कई बार जेल गए और सजा काटी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी अपने मुखर व जनप्रतिबद्ध रंगकर्म के कारण उन्हें अनेक बार डकैती व आगजनी तक के मुकदमों में फंसाया गया और तत्कालीन कांग्रेसी सरकारों के साथ सामंतों के हमले व यातनाएं भी झेलनी पड़ीं।

लेकिन कोई भी यातना या हमला उन्हें तोड़ नहीं सका और पुराने फैजाबाद जिले के किसी भी गांव में जाकर उनके बारे में पूछिये तो पायेंगे कि निर्भीक संस्कृतिकर्मी की उनकी पहचान अभी भी धुंधली नहीं पड़ी है। उनके वक्त में तो उनके नाटकों से जनता इतनी जागृत व आक्रोशित होती थी कि वह सामंतों और जमींदारों के खिलाफ संघर्ष करने को उठ खड़ी होती थी।

उनके ड्रामे का नाम था ‘धरती हमारी है हम धरती के लाल।’ उसकी शुरुआत के समय गाए जाने वाले गीत की इन चार पंक्तियों पर गौर कीजिए जो सामंतों और जमींदारों के सामने चुनौती पेश करती हैं:

जीवन में बंदे तेरा धरती से नाता
इसीलिए दुनिया में धरती है माता
धरती हमारी आज धरती हमारी है
धरती हमारी हमें प्राणों से प्यारी है
धरती में देश का चमन लहराता
इसीलिए दुनिया में धरती है माता।

ड्रामा मंचित होता तो इसके बाद लाल झंडा लेकर अनेक पात्र दूसरा गीत गाते। पूरे ड्रामे में तत्कालीन कांग्रेसी सरकार, उसकी नीतियों व नेताओं के भ्रष्टाचार व विलासितापूर्ण जीवन का पर्दाफाश किया जाता। साथ ही साथ स्वयं उनका विकल्प निर्मित करने की बात कही जाती।

इस दूसरे गीत (जिसे क्रांतिकारी कवि शील जी ने लिखा था) की चार पंक्तियां इस प्रकार हैं:

देश हमारा धरती अपनी हम धरती के लाल
नया संसार बसाएंगे नया संसार बनाएंगे
सौ-सौ स्वर्ग उतर आएंगे धरती पर सोना बरसाएंगे
एक करेंगे हम जनता को, सीचेंगे जनकी ममता को
नई सभ्यता समता रच के करके उन्नत भाल
मनुज को मुक्ति दिलाएंगे, नया इंसान बनाएंगे
नया इंसान बनायेंगे!

राजबली अपने गीतों, गानों व आल्हा के माध्यम से भी एक नया संसार, नई व्यवस्था, नया समाज निर्मित करने की बात करते, मनुष्य की मुक्ति की बात करते, नई सभ्यता समता और ममता की बात करते, सौ-सौ स्वर्ग उतारने की बात करते और सर्वोपरि देश का माथा ऊंचा करने की बात करते। दूसरे शब्दों में कहें तो वे तत्कालीन सड़ी गली राजनीतिक, सामाजिक व सांस्कृतिक व्यवस्था को ध्वस्त करने व नवनिर्माण की बात करते।

अपने ड्रामे में वे व्यवस्था व उनके नेताओं की करतूतों का भंडाफोड़ तो करते ही, जनता की दरिद्रता व बदहाली का भी सजीव चित्रण पेश करते। ड्रामे में पात्रों नाम भी बड़े व्यंगात्मक हैं जैसे नरकपुर के बाबू यमराज सिंह।

भारत को लूटने वाली अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी कंपनी के खिलाफ आल्हा प्रस्तुत करते तो भी ओज से भर जाते:

खुली कंपनी कोलकाता में ईस्ट इंडिया लिया बनाय
दफ्तर रोजगार खुलवाया आपन दिया जाल बिछवाय
मन मां आन बगल में छूरी औ छल-कपट किहेसि ठगहार
फूट के बीजा आइसन बोइस भाई-भाई कां दिहेसि लड़ाय

उनका यह आल्हा काफी लंबा है। इसी आल्हा में वह 1857 के विद्रोह का भी वर्णन करते हैं परंतु अंत में भारतीयों की हार को ऐसे मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करते हैं कि जनता में अंग्रेजों के खिलाफ गुस्सा बना रहता है: माता बहिनन का पकरि घसीटैं नंगी कई-कई देय घुमाय। खून कै होली अइसन खेलै, धरती लाल बरन होइ जाय।

इसी क्रम में वे अंग्रेजों के खिलाफ भारतीयों के संघर्ष का वर्णन करते हैं:
हेरि-हेरि चंद्रशेखर मारे गोरा जहां कहूं मिल जाय
कबहुंक जोगी कबहुंक साधू धइकै भेष फकीरन क्यार!
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बम्ब मारि कै भगत सिंह ने अंग्रेजन को दिया बताय
जल्दी भागो बिल्लाइत को नाहीं तो देबा प्राण गंवाय।

इसी सिलसिले में किसान विद्रोह का यह शानदार चित्रण देखिये:

यही समइया देशवा भर मा हलचल मची बरोबर जाय
भौं बिद्रोहो किसान वाला सूबा अवध उठा थर्राय
फैजाबाद व रायबरेली जेतना जिला पूर्वी आयं
नाश करो तालुकेदारी कै डंका-बिगुल बजाया जाय।

उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध, द्वितीय विश्व युद्ध, उस समय की विश्व राजनीतिक परिस्थिति, कांग्रेस की नीतियों और अंग्रेजों द्वारा किए गए विश्वासघात का भी बेहद सांगोपांग वर्णन किया है। अपनी रचनाओं में वे प्रचलित लोकोक्तियों और मुहावरों का बड़ी खूबसूरती से प्रयोग करते रहे हैं:

वहर लड़ाई जर्मन वाली बढ़िगै बड़ी दूर हुई जाय।
कम्युनिस्ट और रूस देश पर हिटलर हमला दिहेसि कराय।
पखना जाम गयेनि चिंउटी के ओकर काल गयेनि नगिचाय
नाता जोड़िस जापानी से रूस का दुश्मन देहिस बनाय।

प्रसंगवश, उनकी हर रचना में देश और उसके युवाओं के प्रति प्रेम की भावना है, साथ ही सत्ता परिवर्तन का आवाहन व चुनौती भी। तत्कालीन कांगे्रसी सरकार के खिलाफ उनका यह गीत देखिए:

कांग्रेसी नेता दिल के कठोर निकले
मोरे देशवा को लूट्या बड़े चोर निकले
यह कैसी तेरी आजादी रे जो लाई है तबाही बर्बादी
बाबा गांधी के पुजारी घूसखोर निकले
मोरे देशवा को लूट्या बड़े चोर निकले
कांग्रेसी नेता दिल के कठोर निकले।
जनता इनका राज बदल लेगी बदला इसका
निश्चित लेगी यादव लड़ने घनघोर निकले।

अपनी रचनाओं में वे देश में होने वाले प्रायः हर बड़े राजनीतिक घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया सी दिया करते थे और उसी में अपना पक्ष समाहित कर देते थे। इंदिरा गांधी की तानाशाही से लेकर आपातकाल की समाप्ति और फिर जनता पार्टी के शासन की उठापटक सबका उन्होंने बड़ा ही रोचक वर्णन उन्होंने किया है। रोचकता व मजबूत कला पक्ष के साथ-साथ इन रचनाओं में उनका वर्गीय नजरिया भी साफ नजर आता है। वह जनता की बदहाली और तबाही का वर्णन करना कभी भी नहीं भूलते। कम्युनिस्ट पार्टियों के नेतृत्व में बनी सरकारों के कार्यों का भी वर्णन करते हैं।

वामपंथी सरकार बनायन जनहित काम दिया करवाय
ज्योति बाबू भय मुख्यमंत्री पूंजीपति गयिन घबराय
भ्रष्टाचार पर अंकुश लगिगा नौकरशाही ठीक होइ जाय
आगा रुकिगै महंगाई के, कत्ल डकैती दिहा रोकवाय

वे सरकार की हर प्रकार की कमियों कमजोरियों व भ्रष्टाचार का बेबाक ढंग से खुलासा करते। स्वास्थ्य, रोडवेज, रेल, कचहरी व पूर्ति कोई भी विभाग उनकी पैनरी नजर से बच नहीं पाता। वे सब की कमियों को उजागर करते। अपनी रचनाओं के एक संग्रह में उन्होंने मेहनतकशों को ललकारते हुए लिखा:

अब से चेता मजदूर किसान नहीं तो फिर पछितइबा ना/
राजा और बाबू, हाकिम और नेता, पूंजीपति धनवान/
जनम-जनम से तुहकां लूटिन तबौ ना आवत ज्ञान/
ओ भैया कबले लुटाइबा ना?

एक बिरहा गीत में उन्होंने लिखा:

सुना मोरे कमवइया हो तोरी पड़ी भंवर में नैया अपने हाथ में संभालो पतवार।
तू चित्त दइके लड़ा लड़इया मोर मजदूर किसनवा हो,
ललकारौ मैदान-ए-जंग मां कांपि रहा दुश्मनवा हो।

काबिलेगौर यह भी कि उन्होंने शादी विवाह में गाई जाने वाली गारी, कजरी, पूर्वी, नकटा, सवैया, बिरहा आदि प्रायः सभी लोकधुनों में रचनाएं कीं। जनता ने उन्हें भरपूर प्यार दिया जिसकी बदौलत वे 1967  में विधायक भी चुने गये।

आज जन संस्कृति के नायक, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी , पूर्व विधायक राजबली यादव जी (जन्म 7.11.1906—निधन 9.8.2000 ) का स्मृति दिवस है।

राजबली जी ने आजादी के आंदोलन में अंग्रेजो के खिलाफ अनवरत संघर्ष किया अनेक बार जेल गए। अंग्रेजों ने उनका पूरा घर ध्वस्त कर दिया था परिवार के सभी सदस्यों को जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया था। उनकी माताजी अकेले एक बाग में छोटे से छप्पर में रहते हुए निमोनिया से पीड़ित हुईं और वहीं उनका निधन हो गया। सरकारी दमन की कोई भी ताकत राजबली जी को झुका नहीं सकी। आजादी के बाद भी वह जनता के हित में सामंतों व सरकार के खिलाफ लड़ते हुए अनेक बार जेल गए । ऐसे महान वीर कम्युनिस्ट योद्धा को लाल सलाम।

(लेखक वामपंथी चिन्तक हैं और हाल ही में उनकी ‘जनसंस्कृति के नायक राजबली यादव’ शीर्षक पुस्तक प्रकाशित हुई है।)

जनमोर्चा से साभार।

 

 


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