जयंती पर विशेष: अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ चुहाड़ विद्रोह के नायक रघुनाथ महतो!

विशद कुमार विशद कुमार
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जब झारखंड के नायकों की अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ बगावत की चर्चा होती है, तो इस सूची में 1771 का तिलका मांझी से शुरू हुआ ‘हूल’, 1769 का रघुनाथ महतो के नेतृत्व में ‘चुहाड़ विद्रोह’, 1820-21 का पोटो हो के नेतृत्व में ‘हो विद्रोह’, 1831-32 में बुधु भगत, जोआ भगत और मदारा महतो के नेतृत्व में ‘कोल विद्रोह’, 1855 में सिदो-कान्हू के नेतृत्व में ‘संताल विद्रोह’ और 1895 में बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हुए ‘उलगुलान’ ने अंग्रजों को ‘नाको चने चबवा’ दिये थे।

21 मार्च को चुहाड़ विद्रोह के नायक रघुनाथ महतो का आज जन्मदिन है, ऐसे में उन्हें याद करना प्रासंगिक हो जाता है।

रघुनाथ महतो का जन्म 21 मार्च 1738 को तत्कालीन बंगाल के छोटानागपुर के जंगलमहल (मानभूम) जिला अंतर्गत नीमडीह प्रखंड के एक छोटे से गाव घुंटियाडीह में हुआ था।

बता दें कि 1769 में रघुनाथ महतो के नेतृत्व में आदिवासियों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ जंगल, जमीन के बचाव एवं नाना प्रकार के शोषण से मुक्ति के लिए विद्रोह किया, जिसे चुहाड़ विद्रोह कहा गया। चुहाड़ का शाब्दिक अर्थ लुटेरा अथवा उत्पाती होता है। यह विद्रोह 1769 से 1805 तक चला।

स्थानीय आदिवासी लोगों को उत्पाती या लुटेरा के अर्थ में सामूहिक रूप से ब्रिटिशों द्वारा चुआड़ कह कर बुलाया गया। हाल के कुछ आंदोलनों में इसे आपत्तिजनक मानते हुए इस घटना को चुआड़ विद्रोह के बजाय ‘जंगल महाल स्वतंत्रता आन्दोलन’ के नाम से बुलाये जाने का प्रस्ताव भी किया गया है। चुहाड़ का शाब्दिक अर्थ लुटेरा अथवा उत्पाती होता है।

1765 ई. में जब ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा तत्कालीन बंगाल के छोटानागपुर के जंगलमहल जिले में सर्वप्रथम मालगुजारी वसूलना शुरू किया, तब अंग्रेजों के इस शोषण का विरोध शुरू हुआ। क्योंकि लोगों को लगा कि अंग्रेजों द्वारा यह उनकी स्वतंत्रता और उनके जल, जंगल, जमीन को हड़पने तैयारी है। अत: 1769 ई. में कुड़मी समाज के लोगों द्वारा रघुनाथ महतो के नेतृत्व में सबसे पहला विरोध किया गया और ब्रिटिश शासकों के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंका गया। अंग्रेजों को इसकी कतई आशा नहीं थी। उन्होंने अपने करिंदों (उनके पिट्ठू जमींदारों) से पूछा- ये लोग कौन हैं? तो पिट्ठू जमींदारों ने इन विद्रोहियों को नीचा दिखाने के लिए उन्हें ‘चुहाड़’ (लुटेरा, नीच व उत्पाती) कहकर संबोधित किया। ऐसे में यह विद्रोह ‘चुहाड़ विद्रोह’ हो गया। यह विद्रोह कोई जाति विशेष पर केंद्रित नहीं था। इसमें मांझी, कुड़मी, संथाल, भुमिज, मुंडा, भुंईया आदि सभी समुदाय के लोग शामिल थे।

बता दें कि 1764 में बक्सर युद्ध की जीत के बाद अंग्रेजों का मनोबल बढ़ गया। अंग्रेज कारीगरों के साथ किसानों को भी लूटने लगे। 12 अगस्त 1765 को शाह आलम द्वितीय से अंगरेजों को बंगाल, बिहार, उड़िसा व छोटानागपुर की दीवानी मिल गयी। उसके बाद अंगरेजों ने किसानों से लगान वसूलना शुरू कर दिया।

1766 में अंग्रेजों ने राजस्व के लिए जमींदारों पर दबाव बनाया, लेकिन कुछ जमींदारों ने उनकी अधीनता स्वीकार नहीं की, तो कुछ अपनी शर्तों पर उनसे जा मिले। नतीजा यह हुआ कि किसान अंग्रेजी जुल्म के शिकार होने लगे। स्थिति अनियंत्रित होने लगी, तब चुहाड़ आंदोलन की स्थिति बनी।

रघुनाथ महतो बचपन से ही देशभक्त व क्रांतिकारी स्वभाव के थे।

उन्होंने 1769 में फाल्गुन पूर्णिमा के दिन उन्होंने नीमडीह गांव के एक मैदान में सभा की। यही स्थान रघुनाथपुर के नाम से जाना गया। रघुनाथ महतो के समर्थक 1773 तक सभी इलाके में फैल चुके थे। चुहाड़ आंदोलन का फैलाव नीमडीह, पातकुम, बड़ाभूम, धालभूम, मेदनीपुर, किंचुग परगना (वर्तमान सरायकेला खरसांवा) राजनगर, गम्हरिया आदि तक हो गया। उन्होंने अंगरेजों के नाक में दम कर रखा था।

चुहाड़ आंदोलन की अक्रामकता को देखते हुए अंग्रेजों ने छोटानागपुर को पटना से हटा कर बंगाल प्रेसीडेंसी के अधीन कर दिया। 1774 में विद्रोहियों ने किंचुग परगना के मुख्यालय में पुलिस फोर्स को घेर कर मार डाला।

इस घटना के बाद अंगरेजों ने किंचुग परगना पर अधिकार करने का विचार छोड़ दिया। 10 अप्रैल 1774 को सिडनी स्मिथ ने बंगाल के रेजीमेंट को विद्रोहियों के खिलाफ फौजी कार्रवाई करने का आदेश दे दिया।

सन 1776 में आंदोलन का केंद्र रांची जिले का सिल्ली बना। पांच अप्रैल 1778 को जब रघुनाथ महतो जंगलों में अपने साथियों के साथ सभा कर रहे थे। सिल्ली प्रखंड के लोटा पहाड़ किनारे अंग्रेजों की रामगढ़ छावनी से हथियार लूटने की योजना को लेकर बैठक चल रही थी। इसी बीच गुप्त सूचना पर अंग्रेजी सेना ने रघुनाथ महतो एवं उनके सहयोगियों को चारों ओर से घेर लिया। दोनों ओर से काफी देर तक घमासान युद्ध हुआ। रघुनाथ महतो को भी गोली लगी। यहां सैकड़ों विद्रोहियों को गिरफ्तार कर लिया गया, रघुनाथ महतो और उनके कई साथी मारे गये।

बता दें कि चुआड़ विद्रोह का प्रथम इतिहास जे॰ सी॰ प्राइस ने लिखा, “दि चुआड़ रेबेलियन ऑफ़ 1799” के नाम से। जबकि परवर्ती इतिहासकारों में ए॰ गुहा और उनके हवाले से एडवर्ड सईद का नाम आता है।

यह बताना लजिमी होगा कि वर्तमान सरायकेला खरसावां जिले का चांडिल इलाका अंतर्गत नीमडीह प्रखंड का रघुनाथ महतो का गाव घुंटियाडीह आज भी है, लेकिन रघुनाथ महतो के वंशज का कोई पता नहीं है। शायद रघुनाथ महतो पर जितना काम होना चाहिए था, नहीं हो पाया है।


विशद कुमार, स्वतंत्र पत्रकार हैं।


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