Home ओप-एड कोरोना के क़हर के बीच ‘राजा’ का बाजा बजाते अख़बार !

कोरोना के क़हर के बीच ‘राजा’ का बाजा बजाते अख़बार !

अभी तक मैं आपको बताता रहा हूं कि अखबारों के पहले पन्ने से कौन सी खबरें गायब रहती हैं। अब मैंने महसूस किया है कि खेल सिर्फ खबरें गायब करने का नहीं है। हेडलाइन मैनेजमेंट बड़ा व्यापक है और उसमें कुछ का कुछ छप रहा है। पहले पन्ने पर भी। अब मैं पहले पन्ने पर कुछ अटपटा दिखा तो उसे भी बताने की कोशिश करूंगा। यह चटपटा तो नहीं होगा पर खरा सत्य जरूर होगा।

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पीएम के ‘मन की बात’ का प्रचार करते अखबार

आज के कई अखबारों में रेडियो कार्यक्रम, ‘मन की बात’ के कुछ अंश प्रमुखता से खबर के रूप में छपे हैं। मेरा मानना है कि ‘मन की बात’ जैसे कार्यक्रम की बातें अगले दिन अखबारों में इतनी प्रमुखता से छापने का कोई मतलब नहीं है। यह रेडियो सुनने वालों के लिए है और जो पाठक जानना-सुनना चाहते हैं वे रेडियो पर सुन लेते हैं। लगभग मुफ्त में। फिर इसे कोई 20 घंटे बाद महंगे बिकने वाले अखबारों के पाठकों पर दोबारा क्यों थोपना? वह भी तब जब सरकार ने इस संकट काल में अखबारों और चैनलों की सेवा को आवश्यक मानने की मेहरबानी की है और वे खुद भी कोरोना के संकट से नहीं बच पाए हैं। ना अपने कर्मचारियों को बचा पाए ना मेहमानों को। फिर भी बासी खबर पहले पन्ने पर।

अभी तक मैं आपको बताता रहा हूं कि अखबारों के पहले पन्ने से कौन सी खबरें गायब रहती हैं। अब मैंने महसूस किया है कि खेल सिर्फ खबरें गायब करने का नहीं है। हेडलाइन मैनेजमेंट बड़ा व्यापक है और उसमें कुछ का कुछ छप रहा है। पहले पन्ने पर भी। अब मैं पहले पन्ने पर कुछ अटपटा दिखा तो उसे भी बताने की कोशिश करूंगा। यह चटपटा तो नहीं होगा पर खरा सत्य जरूर होगा।

आज इस खबर का अंश हिन्दू में लीड है और शीर्षक, “कोविड-19 के खतरों से पहले के मुकाबले ज्यादा सतर्क रहें: मोदी”। हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक है, “आगे लंबी लड़ाई है, हम संतुष्ट न हों: मोदी”। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर लीड नहीं है लेकिन पहले पन्ने पर तीन लाइन के शीर्षक के साथ दो कॉलम में है। शीर्षक हिन्दी में लिखा जाता तो कुछ इस तरह होता, “पाबंदियां हटाई जा रही हैं पर सतर्कता कम करने का विकल्प नहीं है: मोदी”। अखबार ने इसके साथ मोदी जी की फोटो और उनका कोट लाल इनवर्टेड कॉमा में छापा है। कहने की जरूरत नहीं है कि आज कई अखबार देखने के बाद टाइम्स ऑफ इंडिया देखते हुए मेरी नजर इस खबर पर गई। निश्चित रूप से लाल कोट के कारण और तब आदतन मैंने ढूंढ़ना शुरू किया कि राजा का बाजा बजाने वाली यह खबर किस अखबार में कहां कैसे है। इंडियन एक्सप्रेस और द टेलीग्राफ में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। सुनिए पूरा हाल।

कहने की जरूरत नहीं है कि देश में जब 500 लोग संक्रमित थे तो अचानक चार घंटे की सूचना पर लॉकडाउन और जब हजारों लोग बीमार हो गए, अस्पतालों में भीड़ लग गई, टेस्ट नहीं हो पाए, पीपीई किट जैसे जो जरूरी सामान खरीदे गए वो घटिया निकले, तैयारियों के नाम पर कुछ ठोस नजर नहीं आया तो लॉक डाउन में ढील की घोषणा कर दी गई। ट्रेन चलने लगी (भले ही वह मौत का कुंआ साबित हुई) और विदेश से फंसे हुए लोगों को लाने का अभियान चलाया जाने लगा। निश्चित रूप से इनमें कुछ जरूरी होगा पर यह पैदल चल रहे लोगों को राहत देने से ज्यादा जरूरी नहीं था। सरकार ने उस ओर नहीं के बराबर ध्यान दिया और अब मॉल के साथ मंदिर भी खोलने की तैयारी है। मॉल और अन्य कारोबार खोलने का कारण अगर अर्थव्यवस्था की खराब होती स्थिति को बताया जा रहा है तो धार्मिक स्थल खोलने का क्या कारण हो सकता है, मैं नहीं जानता।

जो भी हो, यह समझना मुश्किल नहीं है कि लॉकडाउन बगैर तैयारी के किया गया और लोगों को कुछ समय देकर दो तीन दिन बाद, मध्य प्रदेश में मंत्रिमंडल को शपथ दिलवाकर भी लॉक डाउन किया जाता तो पहाड़ नहीं टूट पड़ता। मध्यप्रदेश में सरकार कुछ मजबूत रहती, मामाजी अकेले नहीं पड़ते। लेकिन सरकार की आलोचना से बचने वाले अखबार प्रशंसा और प्रचार का कोई मौका नहीं चूकते हैं। आज की खबर, बेशक खबर है लेकिन पहले पन्ने पर इतनी प्रमुखता से छापने का क्या मतलब? अखबारों का काम खबर देना है प्रचार करना नहीं। आलोचना करना नहीं भी हो तो हर बयान को जरूरी मानकर लीड बना देना भी नहीं है।

हिन्दू की खबर के अनुसार अब क्लस्टर के लिए खास प्रतिबंधों की आवश्यकता है। अगर वाकई ऐसा है तब जब महामारी फैली ही नहीं थी तो लॉकडाउन करने की जल्दबाजी क्यों थी। और क्या अब कम तेजी से फैल रही है या हमने तैयारियां ज्यादा कर ली है? क्या तब क्लस्टर बनाकर बाहर जाने वाले तय नहीं किए जाने चाहिए थे? तब किसी ने ऐसा नहीं कहा। किसी अखबार ने नहीं छापा। द हिन्दू ने आज अपनी लीड खबर के साथ इंडियन पब्लिक हेल्थ एसोसिएशन के हवाले से यह भी बताया है कि अनिश्चित लॉक डाउन ज्यादा नुकसानदेह है। पर क्या यह अब पहले पन्ने पर बताने वाली बात है। जब सब जान गए हैं। महसूस कर रहे हैं। इसे लीड के साथ छापकर क्या प्रधानमंत्री के निर्णय को मजबूती नहीं दी जा रही है।

मैं नहीं कह रहा कि यह इरादतन है। पर आज अखबार देखकर तो यही लग रहा है। और अगर अखबार को स्वतंत्र मान लिया जाए तो इंडियन पब्लिक हेल्थ सिस्टम को यह खबर उस दिन नहीं देनी चाहिए थी जब पता नहीं था कि बेरोजगार हुए मजदूरों को खाना कैसे मिलेगा, मिलेगा कि नहीं? यही खबर लॉकडाउन शुरू होने पर छपती तो सरकार के निर्णय के खिलाफ लगती और अब सरकार के निर्णय के समर्थन में लग रही है। ऐसा क्यों हो रहा है, मैं नहीं जानता पर हो रहा है। इसी को मैं हेडलाइन मैनेजमेंट कह रहा हूं। खबरें ही नहीं, खंडन का भी खेल ऐसा ही है और इसीलिए पीआईबी को फैक्ट चेक में लगा दिया गया है। एक तरफ सरकारी वकील सुप्रीम कोर्ट में व्हाट्सऐप्प फॉर्वार्ड की कहानी सुनाते हैं दूसरी तरफ सरकार जो करती है उसके समर्थन में खबरें आने लगती हैं। और खिलाफ खबरों का पीआईबी फैक्ट चेक कर हेडलाइन देता है।

आज के हिन्दी अखबारों में यह खबर लगभग सबमें है। मैं जो सात अखबार देखता हूं उनमें दैनिक जागरण ने इसे दो हिस्से में छापा है। पहले ही पन्ने पर। एक हिस्सा जो लीड भी है, का शीर्षक है, “शब्दों में बयां नहीं हो सकती श्रमिकों की तकलीफ: मोदी” और “कामगारों की पीड़ा में झलका विकास से अछूते पूर्वी भारत का दर्द”। दैनिक जागरण ने प्रधानमंत्री के बयान का राजनीतिक अंश शीर्षक बना दिया है, पर यह नहीं बताया कि प्रधानमंत्री ने बिहार चुनाव के समय पिछली बार जो एक लाख 25 हजार करोड़ रुपए देने की सार्वजनिक घोषणा की थी, उसे दिया होता तो पूर्वी भारत का पिछड़ापन शायद कुछ कम हुआ होता और राजनीति भी थोड़ी अलग होती। पर वह अलग मुद्दा है। और अभी उसका मौका भी नहीं है भले ही प्रधानमंत्री अपने छह साल के कार्यकाल को भूल कर राजनीति करें।

अमर उजाला में आज की चर्चित खबर तो नहीं है पर पैदल चलने वालों के पैर में प्रधानमंत्री ने जो मलहम लगाने की कोशिश की है उसे फैलाने में अमर उजाला ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। सिंगल कॉलम की एक खबर फोटो के साथ पहले पन्ने पर है, “कोरोना की सबसे ज्यादा चोट गरीब मजदूरों पर: मोदी”। कहने की जरूरत नहीं है कि यह बात लोग पहले दिन से समझ रहे हैं और कह भी रहे हैं। राहुल गांधी ने तो बगैर कोरोना गरीब परिवारों के खातों में 7500 रुपए महीने डालने की जरूरत बताई थी और इसे न्याय योजना का नाम दिया था। पर जनता ने इसे ठुकरा दिया और वे अब फिर हर परिवार को इतना पैसा देने की मांग कर रहे हैं। पर प्रधानमंत्री ने उसपर शायद कुछ नहीं कहा है और जो कहा है वह पहले पन्ने की खबर तो है ही।

हिन्दुस्तान ने इस खबर को लीड बनाया है। शीर्षक है, “देश अब खुल गया है ज्यादा सतर्क रहें: मोदी”। नवभारत टाइम्स ने इस खबर को इसी शीर्षक से सिंगल कॉलम में छापा है। राजस्थान पत्रिका ने बताया है कि यह पीएम मोदी के ‘मन की बात’ का हिस्सा है और दो कॉलम की उसकी खबर का शीर्षक है, “पूर्वी भारत को ग्रोथ इंजन बनाने के लिए हो रहा है काम”। यह इस तथ्य के बावजूद है कि डबल इंजन की एक सरकार ने हाल में मजदूरों को पहुंचाने के लिए 848 बसें नहीं लीं क्योंकि देने वाले ने 1000 बसों की जो सूची दी उनमें बाकी बसें नहीं, एम्बुलेंस और स्कूल बसें थीं। अब ऐसे इंजन आगे क्या करेंगे यह भविष्य की बात है लेकिन खबर तो खबर है।

नवोदय टाइम्स ने भी इस खबर को पहले पन्ने पर टॉप के दो कॉलम में छापा है। शब्दों में बयां नहीं हो सकती गरीब पर पड़ी मार: मोदी। दैनिक भास्कर में भी यह खबर लीड है। फ्लैग शीर्षक है, मोदी के मन की बात-कोरोना से सबसे बड़ी चोट गरीब मजदूर पर, दर्द बयां नहीं कर सकता। मुख्य शीर्षक है, देश खुल गया है,अब एहतियात ही सबसे बड़ा हथियार : मोदी। स्पष्ट है कि मन की बात अखबारों में बासी खबरों की तरह है फिर भी अखबार राजा का बाजा बजा रहे हैं।


लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

1 COMMENT

  1. अभी तक जो परेशानी श्रमिक वर्ग झेल रहा था वो शायद आने वाले समय में मध्यम वर्ग झेलेगा। जिस तरह से सब कुछ खोला गया है उस तरह से लगता है कि आने वाले कुछ दिनों में स्कूल भी खोल देंगे। अभी तक जो मध्यम वर्ग घर में बैठा था अब उसके संक्रमित होने की बारी है। सबसे भयावह स्थिति तब होगी अगर बड़ी संख्या में बच्चे संक्रमित हुए। शायद तब भ्रम टूटे और वो सरकार से सवाल करे कि उसका प्लान क्या है। अगर सरकार को लगता है हर्ड इम्यूनिटी ही उपाय है एकमात्र तो जनता से संवाद क्यों नहीं इसका। वैसे धार्मिक स्थल खोलने की वजह ये भी है कि जनता अब भगवान भरोसे है।

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