नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू के समाजवादी पाठ का मतलब !

प्रेमकुमार मणि प्रेमकुमार मणि
ओप-एड Published On :


विचारों के मौजूदा अकाल के बीच यदि कोई समाजवादी भजन गुनगुनाता है, तब उस पर नजर रखना जरूरी हो जाता है। बिहार का सत्ताधारी दल जनतादल युनाइटेड आजकल अपने कार्यकर्ताओं को समाजवादी पाठ पढ़ाने में जुटा है। पिछले दिनों इस के लिए पटना में एक शिविर का आयोजन हुआ और कुछ महानुभावों ने कार्यकर्ताओं को शिक्षित-दीक्षित किया। नीतीश कुमार उस शिविर में नहीं गए। लेकिन पूरा तामझाम उनके व्यक्तित्व को महिमामंडित करने के लिए ही किया गया था। शिविर से कुछ खास निकल कर नहीं आया, सिवा एक शब्द के। वह था व्यावहारिक समाजवाद। नीतीश कुमार को इसका प्रणेता बतलाने की कोशिश की गई।

जनतादल युनाइटेड को समाजवाद की याद तब आई जब उसे पिछले विधानसभा चुनाव में जोर का झटका लगा। चुनावी नतीजों में वह न केवल तीसरे स्थान की पार्टी बनी, बल्कि उसे उम्मीद से बहुत कम सीटें हासिल हुईं। भाजपा की अपनी मजबूरियां थीं, इसलिए मुख्यमंत्री पद हासिल करने में नीतीश सफल जरूर हो गए, लेकिन उनकी साख राजनीतिक चर्चाओं के बीच बेहद कमजोर हो गई। वह वाकई परिस्थितियों के मुख्यमंत्री साबित हुए। आम तौर पर यह कहा जाने लगा कि परिस्थितिवश वह भाजपा की कृपा पर बने हुए हैं, अपनी ताकत के बूते नहीं। राजनीति में दया की ऐसी स्थिति बहुत चिंताजनक होती है। शासन रुतबे से चलता है। जब रुतबा ही नहीं, तो शासन बेजान नजर आता है। इन स्थितियों में समाज की दुष्ट ताकतें और प्रवृत्तियां हावी होने लगती हैं। इन स्थितियों को दक्ष राजनेता नीतीश खूब अच्छी तरह समझते हैं।

संभवतः उपरोक्त अपमानजनक स्थितियों से उबरने के लिए ही नीतीश कुमार की पार्टी ने अपनी राजनीतिक गतिविधियों में कुछ सक्रियता दिखलाई है। बसपा और एक निर्दलीय को अपने साथ करके दल ने एक संकेत दिया कि वह विस्तार की इच्छुक है। इस बीच कुछ दूसरे नेताओं को भी जोड़ने की चर्चा शुरू हुई। इसी क्रम में कुछ-कुछ मृत्युंजय-जाप की तरह यह समाजवादी राग भी छेड़ा गया जान पड़ता है।

समाजवाद का राग-अलाप भारतीय जनता पार्टी ने भी अपनी स्थापना के समय किया था। जनता पार्टी के बिखराव के बाद संघ से जुड़े लोगों ने स्वयं को जनसंघ के नाम पर पुनः संघटित करने के बजाय भारतीय जनता पार्टी के नाम पर किया। 6 अप्रैल 1980  को उनलोगों ने इसी नाम से पार्टी बनाई। तब अटल बिहारी वाजपेयी पार्टी के दिग्गज नेता हुआ करते थे। उन्होंने गांधीवादी समाजवाद को इस नई पार्टी का लक्ष्य बताया। लेकिन जैसा कि सब जानते हैं, बहुत जल्दी ही पार्टी का लक्ष्य बदल गया, समाजवाद को किनारे कर भाजपा ने रामजन्मभूमि और हिंदुत्व की राजनीति को तेज किया और जल्दी ही यह उसकी विचारधारा बन गई। उसके बाद से आज तक की उसकी वैचारिक यात्रा सब के सामने है।

जनतादल युनाइटेड अपने पूर्व रूप में समता पार्टी थी, जिसे एक समय लोहिया के वैचारिक शिष्य रहे जार्ज फर्नांडिस पाल-पोस रहे थे। 1995 के आखिर में समता पार्टी और भाजपा में चुनावी राजनीतिक समझौता हुआ और तय किया गया कि भारतीय संविधान के धारा 370, सिविल कोड और रामजन्मभूमि के सवाल पर समता पार्टी की भाजपा से अलग राय है और इस पर वह दृढ़ है। इसलिए इन मुद्दों को नहीं उठाने की शर्त पर ही यह समझौता हुआ था। अटल जी ने अपने रहते इस समझौते का पालन किया। हालांकि कई अवसरों पर स्वयं जार्ज वैचारिक तौर पर भाजपा के समक्ष भूलुंठित नजर आए।

लेकिन जैसा कि स्पष्ट है आज सब कुछ बदल गया है। आज की भाजपा अटलबिहारी के ज़माने की भाजपा नहीं है। जनतादल युनाइटेड से कुछ भी पूछे बगैर भाजपा ने उपरोक्त तीनों मुद्दों का अपने मन से कार्यान्वयन कर दिया। नीतीश कुमार प्रतिरोध करने की ताकत खो चुके थे। जनतादल युनाइटेड की स्थिति यह है कि राज्यसभा और लोकसभा में उसके नुमाइंदे सरकार की हाँ में हाँ करने के लिए विवश होते हैं। वह जान गए हैं कि हमारी स्थिति राजनीतिक तौर पर अपेंडिक्स जैसी हो गई है। हमारे बिना भी भाजपा का काम चल सकता है। बिहार की राजनीति में भाजपा का इतना ही चाहना है कि किसी भी स्थिति में लालू और नीतीश के बीच कोई राजनीतिक समझौता नहीं हो।

इन स्थितियों में नीतीश कुमार की पार्टी के इस समाजवादी मंत्र-जाप का क्या मतलब है ? समाजवादी चर्चा के बीच ही उसके एक प्रकार व्यावहारिक समाजवाद की व्याख्या का कोई निहितार्थ है क्या? या यूँ ही कोई तुक्का है; बैठे-ठाले का एक खेल या एक राजनीतिक पिकनिक। होली के मौसम में मूर्ख बनाने के बहुत से खेल-तमाशे होते हैं। क्या यह उसी सिलसिले का कोई खेल तो नहीं है? इसे समझना मुश्किल है कि नीतीश या उनकी पार्टी को आज ऐसे कामों के लिए फुर्सत हो सकती है। इसलिए इसके गहरे निहितार्थों को ही समझना होगा।

पुराने ज़माने से समाजवाद की मनमानी व्याख्याएं होती रही हैं। मार्क्स के ज़माने के पहले भी किस्म-किस्म के समाजवाद थे। 1848 के अपने ख्यात कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र में स्वयं मार्क्स ने इन समाजवादों की व्याख्या की है। प्रतिक्रियावादी समाजवाद और वैज्ञानिक समाजवाद इसके दो मुख्य विभेद हैं। सामंती समाजवाद, धार्मिक समाजवाद, जर्मन समाजवाद, राष्ट्रीय समाजवाद, दकियानूसी समाजवाद, पूंजीवादी समाजवाद जैसे कितने ही तरह के समाजवादी ख़याल हैं, जो प्रतिक्रियावादी समाजवाद के तहत आते हैं। कार्ल मार्क्स ने इन सब को किनारे करते हुए वैज्ञानिक समाजवाद की प्रस्तावना की, जिसका वैचारिक आधार द्वंद्वात्मक भौतिकवाद सुनिश्चित किया। चूकि समाजवाद उत्पादन के आर्थिक संसाधनों का समाजीकरण और निजी पूँजी का खात्मा चाहता है; इसलिए इसे हासिल करने के लिए एक पुष्ट और पूर्ण दार्शनिक पृष्ठभूमि चाहिए। दुनिया भर के समाजवादियों ने मार्क्स के पहले के सभी समाजवादी व्याख्याओं को ख़ारिज किया और वैज्ञानिक समाजवाद को रेखांकित किया। भारत में आचार्य नरेन्द्रदेव और जयप्रकाश नारायण समाजवाद के आदिप्रस्तावक रहे, जिन्होंने 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की। दोनों मार्क्सवादी थे। बाद में जयप्रकाश नारायण सघन आस्तिकता में खोते हुए सर्वोदयी हो गए थे, लेकिन समाजवाद के आर्थिक सिद्धांतों के प्रति उनका समर्थन बना रहा था।

भारतीय राजनीति में समाजवाद की अनर्गल व्याख्याएं हुईं। लेकिन मानी हुई बात है कि कर्पूरी ठाकुर ही भारतीय राजनीति में समाजवाद के अंतिम प्रतिनिधि थे। उसके बाद समाजवादी जातिवादी बनते चले गए और कोटा पॉलिटिक्स ही उनकी मूल विचारधारा रह गई। निजी पूँजी का खात्मा और उत्पादन के साधनों पर सामाजिक मिलकियत के ख्वाब से लोग दूर होते गए। ऐसे में व्यावहारिक समाजवाद की यह कसरत किसका हाथ मजबूत करने जा रही है, कोई भी समझ सकता है। यह तथाकथित ‘व्यावहारिक समाजवाद’ हिटलर के राष्ट्रीय समाजवाद और मार्क्स वर्णित दकियानूसी समाजवाद के बीच की कोई अवधारणा प्रतीत होती है। हिटलर कहता था- कम्युनिस्ट बात करते हैं और हम काम। दरअसल वह पहला व्यावहारिक समाजवादी था।

लेकिन बिहार में इसका अर्थ कुछ अधिक गंभीर और गहरा है। ऐसा प्रतीत होता है कि जनतादल युनाइटेड अपने अस्तित्व बचाने की आखिरी लड़ाई लड़ रहा है। इस व्यावहारिक समाजवाद की पगडंडियों के सहारे यह पार्टी भाजपा के राजघराने तक पहुँचने और अंततः वहीं विलय होने वाली जान पड़ती है। यूँ भी फिलहाल वह भाजपा के राजनीतिक उपनिवेश से अलग नहीं दिखती।


प्रेम कुमार मणि वरिष्‍ठ लेखक और पत्रकार हैं। सत्‍तर के दशक में कम्‍युनिस्‍ट पार्टी के सदस्‍य रहे। मनुस्‍मृति पर लिखी इनकी किताब बहुत प्रसिद्ध है। कई पुरस्‍कारों से सम्‍मानित हैं। बिहार विधान परिषद में मनोनीत सदस्‍य रहे हैं। यह लेख उनके फेसबुक से साभार लिया गया है। 


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