मी लॉर्ड, गुरुद्वारे न अस्पताल हैं और न सुधार गृह!


क्या गुरुद्वारे में सेवा करने से गुस्से को नियंत्रित करने में मदद मिलती है? यह कार्य क्या एक महीने में हो जाता है? हमारे विचार से जो गुस्सा आदमी को अपराध की सीमा तक ले जाए। उसे अस्पताल में, तर्क संगत इलाज की आवश्यकता है। न की गुरुद्वारे में सेवा की जरूरत है।


अशोक उपाध्याय अशोक उपाध्याय
ओप-एड Published On :


दिल्ली उच्च न्यायालय की एकल बैंच के न्यायाधीश ने भारतीय दंड संहिता की धारा 307 ( हत्या का प्रयास ) के अंतर्गत दर्ज की गई एफआईआर को निरस्त करते हुए आरोपी पर एक लाख रूपये का आर्थिक दंड लगाया है और उसे एक महीने 16/03/2021 से 16/04/2021 तक गुरुद्वारा बंगला साहिब दिल्ली में सेवा का आदेश दिया है। (CRL.MC 674/2021 फैसले की तारीख 12/03/2021)

संक्षेप में मामला इस प्रकार है। शिकायत कर्ता 26/03/2020 को, एक घर के सामने से गुजर रहा था। जिन्हें वह जानता था। वहां उसने देखा कि एक नौजवान लड़का अपनी मां के साथ झगड़ा कर रहा था। शिकायतकर्ता ने उसे ऐसा न करने के लिए कहा और उसे चांटा  मार दिया।

चांटे मार से अपमानित हो कर आरोपी शिकायतकर्ता को देख लेने की धमकी देकर चला गया और कुछ देर बाद वह वापस आया और उसने जान से मार देने के इरादे से शिकायत कर्ता के पेट में चाकू घोंप दिया। इसकी शिकायत चांदनी महल थाने में एफआईआर संख्या 50/2020 में दर्ज की गई। मेडिकल रिपोर्ट में चाक़ू के जख्म को “घातक” की श्रेणी में रखा गया। लगभग एक महीने में आरोपी को बेल मिल गई।

केस आगे बढ़ने से पहले ही, आरोपी और शिकायतकर्ता के बीच लिखित समझौता हो गया। जिसे लेकर वे न्यायालय पहुंचे और कोर्ट से अनुरोध किया कि अपनी शिकायत पर कार्रवाई नहीं चाहते हैं।

कानून के अनुसार दंड संहिता 307 के अंतर्गत मुकदमे आपसी समझौतों से वापस नहीं लिए जाते हैं। इन मामलों में सरकार पक्षकार होती है। ये मुकदमे सरकार की ओर से पेश किए जाते हैं।

इस मामले में न्यायालय ने दंड संहिता की धारा 482 का उपयोग करते हुए, एफआईआर को रद्द कर दिया और आरोपी को एक लाख रुपये का आर्थिक दंड दिया। यह राशि लायर्स सोशल सिक्योरिटी एंड वेलफेयर फंड, निर्मल छाया फाउंडेशन, दिल्ली पुलिस वेलफेयर फंड और आर्मी वेलफेयर फंड बेटल केजुयेलटी को दी जानी है। प्रत्येक को 25,000 रूपये दिए जाने हैं।

न्यायालय ने इस फैसले में आरोपी की कम आयु (21 वर्ष को) देखते हुए यह माना है कि उसे अभी लम्बा जीवन जीना है। शिकायतकर्ता और आरोपी आसपास ही रहते हैं। आरोपी का कोई आपराधिक रिकार्ड भी नहीं है और अब दोनों में समझौता भी हो चुका है।

हमें न्यायालय के एफआईआर रद्द करने के फैसले पर पर कुछ नहीं कहना है। हमें आदेश के उस अंश पर अपनी राय रखनी हैं जिस में वे लिखते हैं कि नवयुवक को अपने गुस्से पर काबू करना सीखना चाहिए और उसे ध्यान रखना चाहिए कि वह कानून अपने हाथ में नहीं ले सकता है। इसके अगले खंड में न्यायालय उसे एक महीने तक गुरुद्वारा बंगला साहिब में सेवा का आदेश देते हैं।

वे न्यायालय इस आदेश की प्रति गुरुद्वारा बंगला साहिब को भेजने का भी आदेश देते हैं। वे गुरुद्वारे को भी आदेश देते हैं कि वे एक महीने बाद एक प्रमाण पत्र जारी करें जिसमें लिखा हो कि आरोपी ने अपनी सेवा पूरी कर ली हैं। (यदि वह सेवा पूरी नहीं करता है तब गुरुद्वारा पुलिस को सूचित करे और इसे पुलिस न्यायालय संज्ञान में लाये)

एक लाख रुपये प्राप्ति और एक माह की सेवा पूर्ण होने पर ही यह आदेश पूर्ण होगा।

हमें नहीं मालूम कि न्यायालय ने गुरुद्वारे में सेवा करने का आदेश क्यों दिया है? एक महीने का ही क्यों दिया है?

क्या गुरुद्वारे में सेवा करने से गुस्से को नियंत्रित करने में मदद मिलती है? यह कार्य क्या एक महीने में हो जाता है?

हमारे विचार से जो गुस्सा आदमी को अपराध की सीमा तक ले जाए। उसे अस्पताल में, तर्क संगत इलाज की आवश्यकता है। न की गुरुद्वारे में सेवा की जरूरत है।

हमें मालूम नहीं है कि गुरुद्वारा बंगला साहिब इस आदेश को किस तरह से स्वीकार करता है। हमारा प्रश्न है जो सामान्य जन गुरुद्वारे में सेवा कर रहे हैं क्या वे कोई अपना इलाज कर रहे हैं या करवा रहे हैं? क्या उनकी सेवा किसी दंड की भरपाई है? यह हम नहीं जानते हैं।

क्या गुरुद्वारे सरकार के आदेश के अनुपालन के लिए बाध्य हैं? क्या वे अस्पताल या जेल भी हैं। जो सरकार के आदेश का अनुपालन करवाने के लिए बाध्य हैं। इस मामले में, यदि गुरुद्वारा न्यायालय के आदेश का अनुपालन नहीं करता है तो क्या न्यायालय उसे दण्डित करेगा? यह बहुत बड़ा प्रश्न है।

विदेशों में जहां छोटे अपराधों के लिए इस तरह के सामाजिक सेवा के दंड दिए जाते हैं वहां आरोपी /अपराधी एक सरकारी अधिकारी या संस्था को रिपोर्ट करता है। वे उस आदेश का अनुपालन सुनिश्चित करते हैं। अपराधी को दंड के लिए धार्मिक संस्थाओं, चर्च इत्यादि को नहीं सौंपा जाता है।

इस मामले में यदि अपराधी को नगर निगम के किसी सेवा कार्य में या कोर्ट में ही किसी सेवा कार्य में लगा दिया जाता तो इसमें कुछ भी गलत नहीं होता।

न्याय के अनुपालन में धार्मिक संस्थाओं को शामिल करना एक गलत और खतरनाक कार्य है। यहाँ न चाहते हुए भी बतलाना पड़ रहा है कि इस मामले में शिकायतकर्ता और आरोपी दोनों मुसलमान हैं और अब आरोपी गुरुद्वारे में सेवा कर अपराध मुक्त होगा।

हमारा ऐसा भय है कि धार्मिक संस्थानों में सेवा को दंड विधान में इसी तरह शामिल किया जाता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब सैकड़ों अपराधियों को मंदिर निर्माण की सेवा में लगा दिया जाएगा।

अब इस मामले में कुछ अधिक होने की सम्भावना नहीं है। दोनों पक्षों में पहले ही समझौता हो चुका है। राज्य (पुलिस) ने इस मामले में पहले ही कुछ नहीं कहा है। सुप्रीम कोर्ट स्वत: संज्ञान लेगा इस की सम्भावना नहीं के बराबर है।

(प्रकटीकरण : लेखक का न्यायालय और उसके फैसलों के प्रति परम सम्मान है )


लेखक, स्वतंत्र पत्रकार और जामिया हमदर्द विश्वविद्यालय में विजिटिंग फैकल्टी हैं।


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