सवाल पूछना और चुनौती देना तो विपक्ष का काम है सरकार, आपको जवाब देने चाहिए!


तथ्य गवाह है कि सरकार के उन्हें पप्पू साबित करने में लगी रहने के बजाय उन्होंने नोटबन्दी जीएसटी और लॉकडाउन जैसे कदमों के खराब नतीजों की चेतावनी दी थी। गत वर्ष उन्होंने 12 फरवरी को कोरोना को लेकर चेताया तो सरकार ने उसकी उपेक्षाकर 24 फरवरी को ‘नमस्ते ट्रम्प’ का आयोजन किया था और प्रधानमंत्री कहते रहे थे कि घबराने की कोई जरूरत नहीं है। प्रवासी मजदूरों के संकट को भी राहुल ने लॉकडाउन के कुछ ही दिन में महसूस कर लिया था। दि टेलीग्राफ की मानें तो राहुल ने किसानों की गहरी नाराजगी भी सबसे पहले समझ ली थी और सरकार ने उस पर समय रहते ध्यान दिया होता तो उनके आन्दोलन का मामला इतना बड़ा होता ही नहीं कि सरकार जाड़ों में पसीना-पसीना होकर भी उसका सामना न कर पाये।


कृष्ण प्रताप सिंह कृष्ण प्रताप सिंह
ओप-एड Published On :


विपक्षी दलों, असहमतों और आलोचकों के अनादर, अपमान व उत्पीड़न की नरेन्द्र मोदी सरकार की ‘परम्परा’ गत शनिवार को नई मंजिल तय करती दिखी, जब कांग्रेस सांसद राहुल गांधी द्वारा लोकसभा में इस सरकार को ‘हम दो, हमारे दो’ की बताने व उसके कृषि कानूनों की आलोचना करने से नाराज वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण उन्हें ‘डूम्स डे मैन’ {जबरदस्त बरबादी और मौत के दिन वाला आदमी} बताने पर उतर आईं। फिर उन्होंने उनसे दस सवाल भी पूछ डाले। यहां यह नहीं कह सकते कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थान से शिक्षा ग्रहण करने के बावजूद उन्हें इतना भी पता नहीं कि मंत्री के रूप में उनका काम सवाल पूछना नहीं, जवाब देना है और राहुल के किये गये उनके प्रतिप्रश्न देश के वित्तमंत्री से किये गये असुविधाजनक सवालों का जवाब नहीं हो सकते। लेकिन जैसे इतना ही पर्याप्त न हो, गुजरात की यात्रा पर गई एक अन्य केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने राहुल को गुजरात से चुनाव लड़ने की चुनौती दी तो भाजपा की केरल इकाई ने उन्हें प्रवासी नेता करार दे डाला।

इससे समझा जा सकता है कि अनादर व अपमान की इस श्रृंखला में यह सरकार किस तरह अपनी कोई सीमा मानने को तैयार नहीं और कहां तक जाने को तैयार है। किसी भी लोकतंत्र में सवाल पूछना, चुनौती देना और कठघरे में खड़ा करना आमतौर पर विपक्ष का ही काम माना जाता है। लेकिन वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने राहुल की अवमानकारी आलोचना से न सिर्फ इस मान्यता को सिर के बल खड़ाकर दिया बल्कि ‘उलटे चोर कोतवाल को डांटे’ वाली कहावत को भी चरितार्थ कर डाला। अपने द्वारा पेश किये गये बजट की तारीफ करती हुई वे बार-बार यही जताने की कोशिश करती रहीं कि राहुल ने सरकार या उसके कृषि कानूनों पर उंगली उठाकर कयामत तो ला ही दी है, भारत को नीचा भी दिखाया है। संसदीय राजनीति में राहुल के विश्वास को चुनौती देती हुई वे यह भी कह गईं कि राहुल प्रायः संवैधानिक पदों पर विराजमान व्यक्तियों और व्यवस्थाओं को अपमानित करने में लगे रहते हैं। जहां तक दूसरी केन्द्रीय मंत्री समृति ईरानी की बात है, वे राहुल को यह चुनौती देतीं कि वे फिर से अमेठी में ही उनके मुकाबले में उतरें, जहां से वे 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्हें हरा चुकी हैं तो भी कोई बात होती। हां, वह तब भी होती, यदि केरल भाजपा राहुल को केरल में प्रवासी बताते हुए यह भी बता देती कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उत्तर प्रदेश में क्या हैं?

लेकिन सत्ता पक्ष की ओर से राहुल पर किये जा रहे हमलों से जुड़े सवाल इससे कहीं बड़े हैं। पहला और सबसे बड़ा तो यही कि किसी विपक्षी सांसद द्वारा संसद में सरकार या संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों की आलोचना करना या उनका निकम्मापन याद दिलाना अपने दायित्व का निर्वहन करना है या उन्हें अथवा देश को अपमानित करना? सरकार इसे अपमानित करने से जोड़ती है तो यकीनन, यह देश के लोकतंत्र के लिए डूम्स डे {बरबादी का दिन} है। लेकिन यह बात समझ से परे है कि इस बरबादी को लाने में राहुल की कोई भूमिका क्यों कर हो सकती है? न वे सरकार में हैं, न किसी सार्वजनिक पद पर और जो लोग सरकार चला रहे हैं, वे देश में जो कुछ भी हो रहा है, उसकी जिम्मेदारी राहुल पर डालकर अपने बचाव का रास्ता नहीं बना सकते। क्योंकि उनके दुर्भाग्य से सांसद तो सांसद इस देश के आम लोग भी लोकतंत्र की खुला हवा में सात दशक से ज्यादा गुजार चुकने के बाद नागरिक से फिर प्रजा या रियाया नहीं बनना चाहते और असहमति व आलोचना के अपने अधिकार को समझते हैं। इस बात को भी कि सरकारें उनसे बनती हैं, न कि वे सरकार से।

अंग्रेजी के अखबार ‘दि टेलीग्राफ’ ने ठीक ही लिखा है कि लोकतंत्र में सवाल पूछने वाला डूम्स डे मैन नहीं होता-वह होता है जो सवालों से भागता है और विपक्ष को अपना काम नहीं करने देता। विपक्ष के नेता तो कभी इस स्थिति में हो ही नहीं सकते कि वे बरबादी को सामने ला हाजिर कर दें। कोई सरकार या उसके प्रचारक ऐसा साबित करने की कोशिश करते हैं तो उस नेता को ही नहीं, लोकतंत्र को भी लांछित करते हैं। बरबादी तो सच पूछिये तो आलोचकों व असहमतों को दुश्मन मानकर उसकी चेतावनियों की अनसुनी करने और देश की समस्याओं के विरुद्ध आमसहमति न बनने देकर उन्हें उलझाने की सरकारी कवायदों से पास आती है और मोदी सरकार के समर्थक भी बेहिचक दावा नहीं कर सकते कि उसने अपने अब तक के कार्यकाल में जो कुछ किया है, उसका बड़ा हिस्सा ऐसी कवायदों की श्रेणी में नहीं आता। वे यह दावा करें भी तो जो हो रहा है, वह सबके सामने है-दुनिया की नजर में भी। वह जानती है कि बरबादी का कारण आमतौर पर अविवेकी व अदूरदर्शी सरकारी निर्णय ही होते हैं-कई बार ऐन मौके यानी फैसले की घड़ी में फैसले नहीं किये जाते तो भी बरबादी को नजदीक ही लाते हैं। नोटबन्दी, जीएसटी और लॉकडाउन जैसे बेसोचे समझे और बेवक्त किये गये फैसलों की बात करें, जिनके कारण देश की अर्थव्यवस्था बरबाद होकर रह गई है, तो वे भी सरकारी ही थे। प्राकृतिक आपदाएं भी तभी कहर बरपा पाती हैं, जब सरकार उनके पूर्वानुमानों से सचेत नहीं होती और बचाव व सुरक्षा के जरूरी उपाय नहीं कर पाती।

राहुल गांधी के मुद्दे पर लौटें तो वे सरकार द्वारा अनसुनी व मीडिया द्वारा नहीं के बराबर रिपोर्ट किये जाने के बावजूद जिस तरह सरकार की बेहिस आलोचना के बजाय उसे आगाह करने का विपक्षी नेता का दायित्व निभाते रहे हैं, सरकार उनके आईने में आत्मावलोकन करती तो पाती कि उसको उनपर निजी हमले करने और इस क्रम में उनके नाना या जीजा तक जा पहुंचने के बजाय उनका कृतज्ञ होना चाहिए। हां, इसके लिए भी कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ‘खुश’ करने के लिए कृषि कानूनों के कंटेंट और इंटेंट भी बताये।

तथ्य गवाह है कि सरकार के उन्हें पप्पू साबित करने में लगी रहने के बजाय उन्होंने नोटबन्दी जीएसटी और लॉकडाउन जैसे कदमों के खराब नतीजों की चेतावनी दी थी। गत वर्ष उन्होंने 12 फरवरी को कोरोना को लेकर चेताया तो सरकार ने उसकी उपेक्षाकर 24 फरवरी को ‘नमस्ते ट्रम्प’ का आयोजन किया था और प्रधानमंत्री कहते रहे थे कि घबराने की कोई जरूरत नहीं है। प्रवासी मजदूरों के संकट को भी राहुल ने लॉकडाउन के कुछ ही दिन में महसूस कर लिया था। दि टेलीग्राफ की मानें तो राहुल ने किसानों की गहरी नाराजगी भी सबसे पहले समझ ली थी और सरकार ने उस पर समय रहते ध्यान दिया होता तो उनके आन्दोलन का मामला इतना बड़ा होता ही नहीं कि सरकार जाड़ों में पसीना-पसीना होकर भी उसका सामना न कर पाये।

विडम्बना यह कि इस सरकार को अपनी पहली पारी से ही विपक्ष से किसी भी तरह का तालमेल या सहयोग, वह कितना भी सर्जनात्मक क्यों न हो, गवारा नहीं रहा है। उलटे वह उस पर तोहमतें ही लगाती आई है। गत शनिवार को राहुल को घेरने के चक्कर में वित्तमंत्री यह भी भूल गईं कि वे वित्तमंत्री ही हैं-रक्षामंत्री नहीं। उन्होंने कहा कि जब सीमा पर संकट था, संभवतः वे डोकलाम विवाद की बात कर रही थीं, तो राहुल हमसे बात करने के बजाय दूतावास से बात कर रहे थे और सीमा के बारे में जानकारी ले रहे थे। काश, वे समझतीं कि उसके बाद से लद्दाख सीमा की घाटियों में काफी पानी बह चुका है और सरकार के कई नेता चीन का नाम लेने में भी डरते हैं, जबकि राहुल निडर होकर इस विषय पर बोलते रहे हैं।

दूसरे पहलू से देखें तो मोदी सरकार के लिहाज से गनीमत है कि देश की राजनीति में उसका नीतिगत और वास्तविक विपक्ष बचा ही नहीं है और सरकार के पास मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को भी यह कहकर चुप करा देने की सहूलियत हासिल है कि उसके राज में उसकी रीति-नीति भी अलग नहीं थी। सोचिये जरा कि नीतिगत विपक्ष से सामना होता तो उससे निपटने या उसे निपटाने में इस सरकार का क्या हाल होता? क्या पता, वह अपने अंतिम लज्जावसन भी अपनी देह पर रख पाती या नहीं।


कृष्ण प्रताप सिंह लेखक और वरिष्ठ पत्रकार हैं। अयोध्या से निकलने वाले अख़बार जनमोर्चा के संपादक हैं।


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