इरफ़ान की ‘असफलताओं’ में फ़िल्मी दुनिया के सामाजिक सरोकार देखिये

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मशहूर फ़िल्म अभिनेता इरफान खान ने 53 वर्ष की उम्र मे 29 अप्रैल को दुनिया को अलविदा कह दिया। थियेटर से शुरुआत करने वाले इरफान ने बज़रिये रुपहले पर्दा एक बेहतरीन अभिनेता होने की अंतर्राष्ट्रीय ख्याति अर्जित कर ली थी। संघर्ष के आरंभिक दौर मे उन्होंने जिस तरह से फिल्मों में छोटी भूमिकाएँ कीं वे अधिकतर भुला दी गयीं और उनके जरिए इरफान के अभिनय को वह सम्मान नहीं मिल सका जो उन्हे लगभग दो दशक बाद मिला। चंद्र प्रकाश द्विवेदी के ‘चाणक्य’ धारावाहिक (1991), नीरजा गुलेरी के ‘चंद्रकांता’ (1994) सहित उन्होंने कई अन्य टीवी सीरियलों मे अभिनय किया लेकिन उनकी कला को वैसा सम्मान नहीं मिल सका जिसके वे हक़दार थे।

मीरा नायर की सर्वाधिक चर्चित फिल्मों मे से एक ‘सलाम बॉम्बे’(1998) मे एक छोटी सी भूमिका से शुरुआत करने वाले इरफान का बॉलीवुड और हॉलीवुड की फिल्मों मे इतनी बुलंदियों तक पहुँचना अपने आप मे एक मिसाल है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उन्हे पहला मौका आसिफ कपाड़िया के जरिए मिला जिन्होंने उन्हे ‘द वारियार’ (2001) मे एक भूमिका के लिए चुना था। इस अंतर्राष्ट्रीय चयन के बाद इरफान को भारतीय फिल्म इंडस्ट्री मे भी सराहा जाने लगा और उन्हे अच्छी भूमिकाएं मिलने लगीं। बाद के वर्षों मे ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ (2008) और ‘लाइफ ऑफ पाई’ (2012) मे उन्होंने यादगार भूमिकाएं कीं। साथ ही ‘मकबूल’ (2003) ‘दार्जिलिंग लिमिटेड’ (2007), ‘पान सिंह तोमर’ (2012), ‘लंचबॉक्स’ (2013) और ‘हैदर’ (2014) मे भी उनकी भूमिकायें बहुत सशक्त मानी गयीं। उनकी अंतिम फिल्मे ‘हिन्दी मीडियम’ (2017) और ‘इंग्लिश मीडियम’ (2020) रहीं। 

जयपुर के पास टोंक शहर मे जन्मे ‘साहबज़ादे इरफान अली खान’ की माँ सईदा बेगम एक ‘शाही हकीम’ परिवार की महिला थीं और पिताजी एक सम्पन्न टायर व्यापारी। इरफान आरंभ से ही सरल स्वभाव के और शानो-शौकत के प्रदर्शन के खिलाफ थे। उन्होंने अपना नाम सिर्फ ‘इरफान खान’ बताना शुरू किया। अपने स्वाभाविक अभिनय  से गरीब और वंचित समाज के सामाजिक सरोकारों की बात करने वाले इरफान आरंभ मे मुंबई फिल्म इंडस्ट्री या फिर छोटे परदे की भूमिकाओं के लिए फिट नहीं माने गए। यह स्वाभाविक भी लगता है। इरफान के मन मे बहुजन समाज से जुड़े लगाव और संवेदनशीलता की झलक हमें स्पष्ट रूप से तक मिलती है जब वे जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल मे ओमप्रकाश वाल्मीकि की प्रसिद्ध कविता ‘ठाकुर का कुँआ’ का पाठ करते हैं। 

किसी अन्य फिल्म अभिनेता की तुलना मे इरफान के फिल्मी सफर से हम भारत के समाज और कला जगत मे फैली विसंगतियों को ज्यादा आसानी से समझ सकते हैं। एक सामान्य से चेहरे और बेहद सामान्य सी जीवन शैली और एकदम स्वाभाविक अभिनय वाले इरफान की कला की उपेक्षा से भारत के सामाजिक सांस्कृतिक चरित्र के कई पहलू उजागर होते हैं। विशेष रूप से भारत मे 1991 मे आर्थिक उदारीकरण के बाद समाज मे जिस तरह के बदलाव आने शुरू हुए, उन बदलावों को मुंबइया फिल्मों के आईने मे आसानी से देखा जा सकता है। सुप्रसिद्ध फिल्मी गीतकार और बुद्धिजीवी जावेद अख्तर ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि हिन्दी फिल्मे तत्कालीन समय के लोकगीत की तरह होती हैं जिनका सफल नायक उस दशक के नैतिक मूल्यों का एक व्यक्तिकरण होता है; वह नायक उस समय की सामूहिक कल्पनाओं को दर्शाता है”।[1] यह टिप्पणी भारत की फिल्मों को ही नहीं बल्कि भारत के समाज को भी समझने का एक महत्वपूर्ण सूत्र देती है। 

शरुआत मे हम देखते हैं कि दादा साहब फाल्के के साथ भारतीय फिल्मों की शुरुआत यूरोपीय फिल्मों की ही तरह मिथकों और धर्मग्रंथों की कथाओं के जरिए होती है।[2] हालांकि भारतीय फिल्मों पर धर्म और मिथकों का सम्मोहन यूरोप की तुलना मे कहीं अधिक हावी रहा है। आज भी हम फिल्मों और विशेष रूप से टेलीविजन मे इसे अधिक आसानी से देख सकते हैं। हालांकि उस समय मे आजादी के लिए संघर्षरत भारतीय समाज मे मार्क्सवादी प्रस्तावनाएं भी एक सशक्त रूप ले चुकी थीं। 

फिल्मों से पहले हिन्दी साहित्य को मार्क्सवादी दृष्टिकोण ने एक नया और प्रगतिशील आयाम दे दिया था। 1930 के दशक मे जिस तरह की कहानी और उपन्यास लिखे जाने लगे उनमे नायिका विमर्श और नख शिख वर्णन सहित भक्ति आदि से बाहर निकलते हुए गरीब किसानों और मजदूरों की बात की जाने लगी। विशेष रूप से प्रेमचंद के साहित्य मे जिस तरह की शैली शिल्प और कथानक उभरते हैं वे हिन्दू धर्म की मिथकीय कथाओं और जाति-वर्ण एवं पितृसत्ता के आधिपत्य को तोड़ने लगते हैं।[3] प्रगतिशील विचारों का प्रभाव भारतीय फिल्मों पर भी पड़ता है और बाद के वर्षों मे विशेष रूप से आजादी के बाद भारतीय विश्वविद्यालयों मे वामपंथ के प्रगतिशील विचारों की लहर से जन्में विमर्श तत्कालीन फिल्मों मे झलकने लगते हैं। 

इस लहर का पहला प्रभाव हम बंगाली फ़िल्मकारों मे देखते हैं जिनमे ऋतुपर्णों घोष की फिल्मों मे न सिर्फ कला और शिल्प के नए प्रयोग नजर आते हैं बल्कि वे सामाज मे फैले शोषण और भेदभाव को उजागर करने का साहस भी करते हैं।[4] इनके बाद ऋत्विक घटक और सत्यजीत रे की फिल्मे सृजन और सामाजिक सरोकारों की जुगलबंदी एक नया मानक बनाती हैं। आजादी के बाद के दशकों मे मुख्यधारा की हिन्दी फिल्मों मे भी जाति आधारित शोषण और पितृसत्ता को आधार बनाकर कई सुधारवादी फिल्में आती हैं। आजादी के पहले और बाद के कुछ दशकों मे न सिर्फ फिल्मों ने जातिवाद, सामंतवाद और पितृसत्ता को चुनौती देने का निर्णय किया था बल्कि यह निर्णय उस समय की फिल्मी पत्रिकाओं की इबारत मे भी नजर आता है। 

प्रारम्भिक फिल्म पत्रिकाओं मे से एक सर्वाधिक चर्चित पत्रिका फिल्म इंडिया (1935-1961) के एक विशेष अंक मे सामाजिक सरोकार और राजनीतिक चेतना का स्तर देखने लायक है। इसके नवंबर 1951 के अंक मे नेहरू केबिनेट द्वारा हिन्दू कोड बिल के विरोध और डॉ अंबेडकर के इस्तीफे के विषय को दो कार्टून के द्वारा दर्शाया गया था जिसका शीर्षक “रिटायर्ड हर्ट” रखा गया था।[5] बाद के दशकों मे बहुजन समाज से जुड़े सामाजिक सरोकारों से भरी फिल्मों को मुख्यधारा की फिल्मों के साथ न सिर्फ स्थान मिला बल्कि कई अवसरों पर उस समय के सर्वाधिक लोकप्रिय और महंगे कलाकारों ने भी उन फिल्मों मे काम किया। इन फिल्मों को आम जनता द्वारा बहुत सराहा गया था। 

भारत मे बहुजन समाज के सामाजिक सरोकारों से न्याय करने वाली फिल्मों का सृजन 70 के दशक तक चलता है और उसके बाद 1980 के दशक से पतन का दौर शुरू होता है। यह वो समय है जब शहरीकरण की रफ्तार बढ़ती है और नए उद्योग धंधों द्वारा सृजित रोजगार के अवसरों का पीछा करते हुए शहरों की तरफ मजदूरों का पलायन जोर पकड़ता है।[6] इस गरीब आबादी मे एक बड़े मजदूर वर्ग का जन्म होता है जो लगभग दो दशकों तक वर्ग संघर्ष की नयी इबारत के आधार पर फिल्मों और फिल्मी गीतों की रचना करता है। इस समय को गौर से देखें तो 1950-70 के बीच जाति और लिंग आधारित शोषण की समस्या से हटते हुए फिल्मों के सामाजिक सरोकार मजदूर के आर्थिक शोषण पर टिकने लगते है। 

इसके बाद शहरीकरण की लहर 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद एक सुनामी बन जाती है। 1990 के दशक मे न सिर्फ फिल्मों और फिल्मी गीतों से सामाजिक सरोकार गायब हो जाते हैं बल्कि अपने गाँव शहर और देश के प्रति भी एक उपेक्षा आ जाति है। ठीक इसी समय मिथकीय कथानकों पर आधारित रामायण और महाभारत जैसे टीवी सीरियल प्रगट होते हैं।  इनके माध्यम से पुराने सामंती, वर्णाश्रमवादी और पितृसत्तात्मक मूल्यों की एक बड़ी खुराक भी इस गरीब तबके सहित शहरी माध्यम वर्ग तक पहुँचने लगती  है। इसी के साथ हिन्दू राष्ट्र का सपना दिखाने वाली शक्तियों को एक शक्तिशाली माध्यम मिल जाता है। 

इस पूरी पतन की यात्रा मे जो बात गौर करने लायक है वह ये है कि शहरीकरण और उदारीकरण के बाद धर्म और बाजार का जो समीकरण बन रहा है, वह भारत की फिल्मों और टीवी के कलात्मक पक्ष को दबा रहा है। इसी के साथ राजनीति की रुचि धर्म मे अचानक बढ़ जाती है और इन सबका मिला जुला असर यह होता है कि फिल्म और टेलीविजन अब शहरों की चकाचौंध और ऐश का जीवन जीने का साधन बनने लगते हैं। यह एक अंतहीन सिलसिला है जिसमे सफल और असफल सभी लोग सामाजिक सरोकारों और व्यक्तिगत जीवन मे सार्थकता के शून्य को एक ही ढंग से अनुभव करते हैं। इस दौर के सबसे प्रसिद्ध स्टार शाहरूख खान ने कहा  है कि “मैं इस शहर पर राज करने आया था आज यह शहर मुझ पर राज करता है”।[7]

शहरी गरीबों और मध्यम वर्ग की शहरीकरण और आधुनिकता जन्मी तकलीफों और असुरक्षाओं को उत्तर देने के लिए एक भारतीय सिनेमा और टेलीविजन ने एक खास रास्ता चुना है। 1980 के दौर मे धार्मिक मिथकों का जादू सर चढ़कर बोलने लगता है। इस दौर की फिल्में न सिर्फ नइ धार्मिकता की लहर लाती हैं बल्कि नए देवी देवताओं को भी स्थापित करती हैं, संतोषी माता ऐसी ही एक देवी हैं जिन्हे करोड़ों भारतीय पहली बार फिल्मों के माध्यम से जान पाए थे। इसके बाद बहुत तरह की मिथकीय कहानियों से भारी फिल्में आती हैं। इसी की नकल करते हुए छोटे परदे पर भी बाजार और धर्म की साजिशों का तूफान फैलना शुरू होता है। इसी दौर मे राम मंदिर आंदोलन अपनी ऊंचाई पर पहुँच रहा होता है। 

अब इस पूरे विस्तार को भारत के बहुजन समाज की समस्याओं और उनके कला जगत मे प्रतिनिधित्व के साथ रखकर देखिए। आप देख सकेंगे कि न सिर्फ इस घमासान मे बहुजन समाज के सामाजिक सरोकार सिनेमा और टेलीविजन से गायब हो रहे हैं बल्कि उन सरोकारों को मूल्य देने वाले नायक भी स्वीकार नहीं किए जा रहे हैं। इस सबको एकसाथ देखकर अब आप समझने की कोशिश करें कि भारतीय समाज मे एक सार्थक और सामाजिक सरोकार से भरे सिनेमा की जगह क्यों नहीं बन पा रही है। इरफान खान की सादगीपूर्ण अदाकारी का तिरस्कार क्यों हो रहा है। असल मे यहाँ बाजार, धर्म और राजनीति की सत्ता के गठजोड़ का असर देखा जाना चाहिए। समाज मे सृजन और सामाजिक सरोकारों की मौजूदगी के लिए यह गठजोड़ आरंभ से ही एक खतरा रहा है। 

आज नव-उदारवाद के दौर मे जिस तरह से धर्म और राजनीति ने शक्ति के और सृजन के सभी स्त्रोतों पर कब्जा कर लिया है उसमे आम आदमी से संबंध रखने वाले साहित्य, कविता, टीवी सीरियल या फिल्मों के लिए स्थान बहुत सिकुड़ गया है। विचारवान लोगों ने पूंजीवाद और धर्म की बढ़ती शक्ति को आजादी के ठीक बाद बहुत आसानी से देख लिया गया था। इसी दौर मे डॉ अंबेडकर ने एक अन्य संदर्भ मे कहा था कि ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद भारत मे दमितों पिछड़ों के दो सबसे बड़े शत्रु साबित होंगे। उनकी इस बात को आप न सिर्फ सामाजिक पतन मे बल्कि फिल्मों के पतन मे भी देख सकते हैं। 


संजय श्रमण जोठे एक स्वतन्त्र लेखक एवं शोधकर्ता हैं। मूलतः ये मध्यप्रदेश के रहने वाले हैं। इंग्लैंड की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन मे स्नातकोत्तर करने के बाद ये भारत के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस से पीएचडी कर रहे हैं। बीते 15 वर्षों मे विभिन्न शासकीयगैर शासकीय संस्थाओंविश्वविद्यालयों एवं कंसल्टेंसी एजेंसियों के माध्यम से सामाजिक विकास के मुद्दों पर कार्य करते रहे हैं। इसी के साथ भारत मे ओबीसीअनुसूचित जाति और जनजातियों के धार्मिकसामाजिक और राजनीतिक अधिकार के मुद्दों पर रिसर्च आधारित लेखन मे सक्रिय हैं। ज्योतिबा फुले पर इनकी एक किताब वर्ष 2015 मे प्रकाशित हुई है और आजकल विभिन्न पत्र पत्रिकाओं मे नवयान बौद्ध धर्म सहित बहुजन समाज की मुक्ति से जुड़े अन्य मुद्दों पर निरंतर लिख रहे हैं। बहुजन दृष्टि उनके कॉलम का नाम है जो हर शनिवार मीडिया विजिल में प्रकाशित हो रहा है। यह इस स्तम्भ की तीसरी कड़ी है।

 

बहुजन दृष्टि-2हिंदू-मुस्लिम समस्या बहुजनों को छद्म-युद्ध में उलझाने की साज़िश!

बहुजन दृष्टि-1— ‘सामाजिक दूरी’ पर आधारित समाज में सोशल डिस्टेंसिंग !


 

BIBLIOGRAPHY 

[1] J. Ak̲h̲tar, M. Michel, J. Akhtar, and N. M. Kabir, Talking Films: Conversations on Hindi Cinema with Javed Akhtar. New Delhi: Oxford University Press, 1999.

[2] B. Vāṭave and N. B. Trust, Dadasaheb Phalke, the Father of Indian Cinema. New Delhi: National Book Trust, 2004.

[3] S. K. Das, History of Indian Literature: 1911-1956, struggle for freedom: triumph and tragedy. New Delhi: Sahitya Akademi, 2005.

[4] ‘Springs of Silence: Silence as a narrative and text in Rituparno Ghosh’s films – Filmbuff’. http://www.filmbuff.co.in/sony-jalarajan-raj/springs-of-silence-silence-as-a-narrative-and-text-in-rituparno-ghoshs-films/ (accessed May 01, 2020).

[5] R. B. Mehta and R. Pandharipande, Bollywood and Globalization: Indian Popular Cinema, Nation, and Diaspora. London: Anthem Press, 2011.

[6] D. K. Mishra, Ed., Internal Migration in Contemporary India. New Delhi: SAGE Publications, 2016.

[7] J. R. Sony, R. Sreekumar, and F. Jermadi, Salaam Bollywood: Representations and interpretations. New York: Taylor & Francis, 2016.


 

 


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