संसदीय लोकतंत्र, सूचना का दुश्चक्र और जनमत!

सलमान अरशद सलमान अरशद
ओप-एड Published On :


इस देश में हर पांच साल में दो बार चुनाव होता है, एक बार आप अपने प्रदेश में सरकार बनाने के लिए वोट देते हैं और एक बार केंद्र की सरकार चुनते हैं. ये काम आप लगातार कर रहे हैं. इसकी वजह से आपको लगता है कि देश या प्रान्त की सरकार आपके वोट से बनती है और आपकी मर्जी से भी. ये सही है कि सरकारें आपके वोट से बनती हैं लेकिन ये सही नहीं है कि सरकारें आपकी मर्जी से बनती हैं. उत्तर प्रदेश में चुनाव है, इसलिए कुछ सवाल जो हर ऐसे मौके पर आपके बीच रखे जाने चाहिए, जिन पर आपके साथ बार बार, हर बार चर्चा किया जाना चाहिए, आपके बीच रखना चाहता हूँ.

• जनमत कौन और कैसे बनाता है?
• क्या आज के दौर में जनमत बनाना जनता के बस की बात है ?
• क्या आप खुद एक लोकतान्त्रिक व्यवस्था के अनुकूल ख़ुद को बना पाए हैं?
• क्या आप अपनी मर्जी से किसी सियासी दल को वोट करते हैं या आपसे सियासी दल अपने अनुसार आपका वोट ले लेते हैं?
• वोट या जनमत के आधार पर बनने वाली सरकारें क्या सच में लोकतान्त्रिक सरकारें हैं?

वोट लेने के लिए सभी सियासी पार्टियाँ आपके बीच अपने प्रोग्राम लेकर आती हैं और आप इनके आधार पर उन्हें अपना वोट देने या न देने का फैसला करते हैं. आपके इस सामूहिक फैसले को जनमत कहा जाता है. जनमत बनता कैसे है, अगर आप इसकी पड़ताल करें तो आपसे कैसे आपका वोट सियासी दल अपनी मर्जी के मुताबिक हासिल करते हैं, ये पूरा खेल समझ में आएगा.

जनमत बनने को दो महत्वपूर्ण कारक होते हैं, पहला आपके अनुभव और दूसरा आपको मिलने वाली सूचनाएँ. सही मायने में तो आपके अनुभव के आधार पर ही जनमत बनना चाहिए था, लेकिन हो इसका उलटा रहा है. आज की तारीख़ में जनमत आपको मिलने वाली सूचनाओं के आधार पर बनता है. इसे थोड़ा विस्तार से समझते हैं. आपने किसी पार्टी को वोट देकर उसको पांच साल सरकार चलाने का मौका दिया. अब इन पांच साल में उसने आपके लिए क्या किया, इस आधार पर आपको दुबारा उसे वोट देना चाहिए, पर क्या आप ऐसा करते हैं?

केंद्र में भाजपा की सरकार है. 2014 में इस पार्टी ने आपसे जो वादे किये थे, उनमें से अधिकांश को छुआ तक नहीं बल्कि उसका उलटा किया, फिर भी आपने उसे पहले से ज़्यादा वोट दिए. अब अपना मन टटोलिये और खुद से पूछिए कि अपने ऐसा क्यूँ किया? याद कीजिये, उन्होंने हर साल दो करोड़ नोकरी पैदा करने का वादा किया था, लेकिन किया इसका उल्टा, जिनके पास नोकरी थी, उनकी भी नोकरी चली गयी. लेकिन फिर भी आपने उन्हें अपना वोट दिया. दरअसल चुनाव से पहले पुलवामा में आतंकवादी हमला हुआ और आपसे कहा गया कि मोदी सरकार ही देश की रक्षा कर सकती इसलिए आपको मोदी जी को वोट देना चाहिए.

जबकि मोदी जी के रहते ही ये हमला हुआ था, यानि मोदी जी देश की हिफाज़त करने में फेल हुए थे, जो देश की हिफाज़त करने में फेल हुआ था उसे ही देश के हिफाज़त की जिम्मेदारी देना कौन सी समझदारी वाली बात है? लेकिन आपने ऐसा किया. आप जरा अपनी यादाश्त पर जोर डालिए और देखिये कि पुलवामा हमले के मामले में सरकार ने अब तक क्या किया? किसने हमला किया, क्यूँ किया, हमले के लिए विस्फोटक कहाँ से लाये आदि सवाल आज भी अनुत्तरित हैं. ऊपर से आतंकवादियों को लेकर घूम रहे देवेन्द्र सिंह पर कोई ढंग की कार्यवाही भी नहीं की जिसके तार कई आतंकवादी हमलों से जुड़े हुए हैं. तो क्या हमारी सरकार नहीं चाहती कि ऐसे हमलों की सच्चाई सबके सामने आये ? इस सवाल पर दम लगाकर सोचिये !

मोदी जी के पूरे राजनीतिक कैरियर में ये नरेटिव बार बार बनाया गया कि उन्हें वोट दीजिये क्यूंकि उनकी जान को ख़तरा है या उन्हें वोट दीजिये क्यूंकि देश को खतरा है. लेकिन नागरिक के तौर पर आपने इन पर कितना सोचा, ये आपके सोचने का विषय है.

आप अख़बारों और टीवी के समाचारों पर ध्यान दें, क्या इनमें आपके रोज़ी, रोटी और सुख दुःख की बातें होती हैं? रात दिन हिन्दू मुसलमान और पाकिस्तान की बहस, क्या यही हमारी परेशानी है? रोज़ देश का कोई न कोई हिस्सा किसी सेठ को बेचा जा रहा है, पेट्रोल पर आप लगभग 35 रूपये टैक्स दे रहे हैं, शिक्षा और चिकित्सा आपकी पहुच से लगातार दूर होती जा रही है, क्या कभी मीडिया की बहसों में इनको जगह मिलती है ? और कमाल देखिये इसी मीडिया के आधार पर जनमत बनता है.

जनमत के लिए जो सूचनाएँ आपको दी जाती हैं, उन्हें ख़ास तरह तैयार किया जाता है और आपके ऊपर उनके असर को लगातार चेक किया जाता है. यानि की आपकी राय या जनमत वैसे ही बनाया जा रहा है जैसे लैब में कोई रसायन तैयार किया जाता है या फैक्ट्री में कोई उत्पाद. आप को एक इंसान मानकर नहीं बल्कि मशीन मानकर व्यवहार किया जा रहा है. ये जनमत जो झूठी सूचनाओं के आधार पर बनवाई जाती और फिर इस जनमत के आधार पर कोई आपका वोट लेकर सरकार बना लेता है, क्या इसे लोकतान्त्रिक कहा जा सकता है ?

अब इस पर भी सोच लिया जाये कि क्या आज के दौर में सही जनमत संभव भी है या नहीं? तरह तरह के आंदोलनों या लोकतान्त्रिक तरीके से बनने वाली सरकारों के लिए किये जाने वाले प्रयासों को अगर देखें तो जनमत हमेशा ही अनुभवों के आधार पर कम, मिलने वाली सूचनाओं के आधार पर ज़्यादा बनते रहे हैं. यानि सूचनाओं की पवित्रता बहुत मायने रखती हैं, पर क्या सूचनाओं की पवित्रता संभव भी है? अख़बार हों या टेलिविज़न सभी के मालिक देश के पूंजीपति हैं. इस वक़्त से देश के अधिकांश चैनलों के मालिक अदानी व अम्बानी ग्रुप हैं. इन दोनों समूहों की देश के ज़्यादा से ज़्यादा संसाधन हथियाने की कोशिश है. इसलिए इनकी ये भी कोशिश है कि देश की सरकार ऐसी हो जो इनके हितों को प्राथमिकता दे. कल को कोई और पूंजीपति समूह यह सोच सकता है. दुनिया के लगभग हर देश में पूजीपति सूचनाओं के स्रोत पर कब्ज़ा करके लोगों की राय को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है. साथ ही सूचना एक उत्पाद है जिसे ख़रीदा और बेचा भी जा सकता है, यानि मुनाफ़ा कमाने का भी ये एक ज़रिया है. ऐसे में सूचना वही आप तक पहुँचती है जिससे सेठ लोगों का फ़ायदा हो, यही नहीं ऐसी कोई सूचना न भी हो तो उसे गढ़ा भी जा सकता है. यानि कि आज के दौर में सूचना के आधार पर कम से कम सही जनमत बनने की उम्मीद तो नहीं ही की जा सकती.

ऐसे में किया क्या जाये, हमारे पास दूसरा जरिया है हमारा अनुभव, फ़िलहाल दुनिया का कोई भी सेठ अभी तक इस पर कब्ज़ा नहीं जमा पाया है. इस देश में जो स्कूल है, अस्पताल है, सड़कें हैं, कारखाने हैं, और भी बहुत कुछ, इन्हें किसने बनवाए और इनसे देश को क्या हासिल हुआ ? पिछले 10 या 15 सालों में जिन लोगों को आपने सरकार चलाने का मौका दिया उन्होंने ऐसा क्या किया जिससे आपका जीवन बेहतर हुआ? शिक्षा, चिकित्सा और सुरक्षा तो किसी भी सरकार के लिए बेहद बुनियादी काम है. क्या ये आपको बिना खर्च के या कम से कम खर्च से हासिल हो पा रहा है? अगर नहीं तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? पूँजीपतियों का लाखों करोड़ माफ़ कर देने वाली सरकारें आम आदमी के जीवनस्तर को बेहतर क्यूँ नहीं कर पा रही हैं? भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य हर आदमी की ज़रूरत है लेकिन आज़ादी के इतने सालों बाद भी तमाम सरकारें इस दिशा में क्या कर रही हैं? अरबो रूपये हमारी सरकारें क़र्ज़ लेती हैं जिसे चुकाने के लिए हमसे टैक्स लिया जाता है. क्या होता है इन रूपयों का, किस पर और कहाँ पर इनको खर्च किया जाता है?

याद रहे, आप सड़क पर चलने के पैसे देते हैं, इलाज के पैसे देते हैं, बच्चों के पढाई के पैसे देते हैं, आपको मिलने वाली हर सुविधा की आपको कीमत चुकानी पड़ती है, ऐसे में आपसे लिए जाने वाले टैक्स और आपके लिए लिया जाने वाला क़र्ज़ कहाँ और किस पर खर्च होता है? ये वो सवाल हैं जिन पर सोचते हुए आप सही जनमत निर्मित करेंगे, फिर या तो मौजूदा पार्टियों में से कोई आपके मापदंडों के अनुसार खुद को ढालेगा या आपके मापदंडों पर आधारित कोई पार्टी बनेगी. लेकिन इन सवालों पर आप सोच ही तब पाएंगे जब हिंसा और नफ़रत की बेहोशी से बाहर निकलेंगे.

– डॉ. सलमान अरशद स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।