बिहार की दलित राजनीति के आईने में लोजपा और चिराग़


चिराग के लिए कौन-सा ठिकाना होगा? लोजपा की राजनीति दलितों के एक हिस्से भर की राजनीति थी। चमारों पर बहुजन समाज पार्टी, राजद और सीपीआई माले का प्रभाव है, वहीं अन्य दलित कई तरफ बँटे हुए हैं । लोजपा का मुख्य प्रभाव दुसाध लोगों के बीच है । यह एक ऐसी जाति है जो अपने लड़ाकू तेवर के लिए जानी जाती है। आग पर चलना दूसरों के लिए मुहावरा हो सकता है। दुसाधों के बीच गाँव -गाँव में होने वाला एक धार्मिक रस्म है, जिससे हर दुसाध का वास्ता रहा है। उनके देवता राह बाबा की पूजा में हर किसी को आग के दह -दह शोलों बीच कुछ कदम चलने होते हैं। यह विकट अग्निपरीक्षा है। इस परीक्षा से हो कर गुजरने वालों को फिर किसका डर हो सकता है।


प्रेमकुमार मणि प्रेमकुमार मणि
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बिहार में दलितों की आबादी कुल आबादी का लगभग 16 फीसद ( ठीक संख्या 15.7 %)है । सरकारी तौर पर दलितों को अनुसूचित जाति कहा जाता है । बिहार में यह कुल 22 जातियों का समूह या वर्ग है । जब बिहार एक था ,यानि छोटानागपुर (झारखण्ड ) इसी में था ,तब 9 फीसद आबादी जनजातियों की भी थी । अब वह मुश्किल से एक फीसद हैं।

दलितों में शामिल बाइस जातियों में सबसे अधिक चमार ( कुल दलित आबादी के 31.34 फीसद ) और उसके बाद दुसाध अथवा पासवान (30 .88 ) हैं । तीसरे स्थान पर मुसहर (16.9 फीसद ) हैं । ( आबादी के स्तर पर चमार और दुसाध कुल दलित आबादी के लगभग दो तिहाई हैं । शेष में सब हैं ।) साक्षरता के मामले में पासवान सब से आगे (48 .62 %) है । इसके बाद बाउरी ,दबगर, हलालखोर जैसी जातियां हैं । धोबी और पासी पढाई -लिखाई में चमार और दुसाध से आगे हैं । मुसहरों में साक्षरता बहुत कम (लगभग 7 फीसद ) है।

राजनीति में जो चार दलित जातियां आगे हैं ; वे हैं – चमार ,दुसाध, पासी और धोबी । चमारों के बीच से जगजीवन राम और दुसाधों के बीच से भोला पासवान शास्त्री और रामविलास पासवान जैसे लोग चर्चित हुए। बिहार में अब तक तीन मुख्यमंत्री दलित तबके से हुए – भोला पासवान शास्त्री , रामसुंदर दास और जीतनराम मांझी । एक का सम्बन्ध दुसाध ,दूसरे का चमार और तीसरे का मुसहर परिवार से रहा है । लेकिन प्रभावी नेता दो ही हुए- जगजीवन राम और रामविलास पासवान।

जगजीवन राम (1908 -1986 ) ने कांग्रेस की छतरी तले राजनीति की ।उनका संसदीय जीवन 1937 से आरम्भ हुआ । जवाहरलाल नेहरू की अंतरिम सरकार में वह मंत्री बने । बीच और आखिर में छोटे से अवकाश के सिवा वह लगभग आजीवन मंत्री बने रहे । कांग्रेस अध्यक्ष और उपप्रधानमंत्री भी बने।

रामविलास पासवान (1946 – 2020 ) का संसदीय जीवन 1969 में आरम्भ हुआ । वह भी लम्बे समय तक केंद्रीय मंत्री रहे। आरम्भ समाजवादी राजनीति से हुआ और आख़िरी बीस साल अपने ही ढुल-मुल विचारों की एक पार्टी , लोकजनशक्ति, जिसके संस्थापक वही थे, के बैनर तले उन्होंने काम किया। 1983 में उन्होंने दलित सेना की स्थापना की थी। इसी के आसपास उत्तरप्रदेश में कांसी राम के नेतृत्व में बहुजनसमाज पार्टी का गठन हुआ था ।

लोकजनशक्ति पार्टी की स्थापना 28 नवंबर 2000 को हुई । ढांचा भले ही अखिल भारतीय हो ,लेकिन यह बिहार स्तर की पार्टी बनी रही । कुछ बिहार की स्थितियां थी और कुछ रामविलास जी का स्वभाव , जिसके कारण यह पार्टी दलित आंकाक्षाओं को प्रतिबिम्बित करने वाली पार्टी कभी नहीं बन सकी। हालांकि 1977 से 1990 तक वह दलित प्रश्नों के मुखर प्रवक्ता अवश्य बने रहे। डॉ आम्बेडकर के जन्मदिन को राष्ट्रीय अवकाश घोषित करवाने और उन्हें भारतरत्न से नवाजे जाने में उनकी केंद्रीय भूमिका रही। अपने दफ्तर या घर पर उन्होंने गाँधी के फोटो कभी नहीं लगाया। बातचीत में वे विद्रोही विचार दर्शाते थे। हिन्दू देवी -देवताओं और धर्मग्रंथों पर उनकी कोई आस्था नहीं थी। उनके पिता संभवतः कबीरपंथ से प्रभावित थे। उनपर भी कबीर का प्रभाव दिखता था।

लेकिन उनके विद्रोही विचार धीरे -धीरे सुस्त पड़ने लगे। उन्हें हाजीपुर संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ना पड़ता था । ( केवल एक बार 1991 में वह रोसड़ा गए ) यह क्षेत्र ऊँची जातियों के दबदबे वाला था।  उनसे भिड़ कर वह देख चुके थे। 1986 के राज्यसभा चुनाव के वक़्त पिछड़े तबके के नेताओं से भी उन्हें निराशा हुई थी । इसलिए धीरे -धीरे उनमें एक ग्रंथि विकसित होने लगी। सन 2000 में जब एक प्रवासी बिहारी शरद यादव ने भी उन्हें अपमानित किया, तब वह इस निर्णय पर आए कि अपनी एक पार्टी होनी चाहिए । लोकजनशक्ति पार्टी की यही पृष्ठभूमि थी । लेकिन इस पार्टी को उन्होंने वैचारिक आधार देने की कभी कोशिश नहीं की। नतीजन तथाकथित ऊँची जातियों के लम्पट और तलछट तत्वों का जमघट यहाँ बढता गया। रामविलास जी में एक और बड़ा अवगुण था परिवार -मोह। जिन भाई -भतीजों ने आज उनकी पार्टी को हाईजैक किया, उन्हें रामविलास जी ने ही पाला -पोसा और विकसित किया था।

गुजरात में नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्रित्व काल में जब गोधरा प्रकरण हुआ ,तब रामविलास का सोशलिस्ट मन एकबार फिर जाग्रत हुआ । उन्होंने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा कर दिया । उनके इस निर्णय की सेकुलर – समाजवादी खेमे में काफी प्रसंशा हुई । कुछ समय के लिए इस खेमे के वह हीरो बन गए थे । 2004 में उन्होंने बिहार में लालू प्रसाद और कांग्रेस के साथ मिल कर भाजपा – जदयू गठबंधन को धूल चटा दी । चालीस लोकसभा सीटों में से उन्तीस सीटें लालू -रामविलास -कांग्रेस के पास आ गईं । लेकिन जब केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग ) की सरकार बनी, तो लालू और रामविलास में विभाग को लेकर अनबन हुई। दोनों रेल मंत्रालय चाहते थे। इस बात ने ऐसी अनबन पैदा की जिससे 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव में दोनों एक दूसरे के विरूद्ध लड़े। नतीजा एक त्रिशंकु विधानसभा के रूप में आया । लोजपा को 29 सीटें आई थीं । यह ऐसी संख्या थी कि इसके बिना न राजद -कांग्रेस सरकार बना सकती थी , न ही जदयू -भाजपा । कहा जाने लगा कि सरकार बनाने की चाबी रामविलास पासवान के हाथ में है। चुनाव नतीजे फ़रवरी आखिर में आए थे। जून महीने में अचानक लोजपा टूट गई। उसके इक्कीस विधायक नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले जनतादलयू में शामिल हो गए। तदुपरांत एक नाटकीय घटनाक्रम में बिहार विधानसभा को भंग कर दिया गया और नवंबर में फिर चुनाव हुए । इस बार एनडीए की सरकार बन गई । इस दफा भी राजद और लोजपा अलग -अलग लड़े थे। उस वक़्त भी 2020 जैसी ही स्थिति थी । दिल्ली में लालू प्रसाद और रामविलास पासवान संप्रग के हिस्सा थे और बिहार में एक दूजे के विरुद्ध लड़ रहे थे। चिराग ने इसे पिछले साल केवल दुहराया।

2009 लोकसभा चुनाव में रामविलास और लालू फिर एक साथ हुए। लेकिन प्रभाव नहीं दिखा सके। 2010 का बिहार विधानसभा चुनाव भी साथ लड़ा। लोजपा को 75 सीटें लड़ कर केवल तीन सीटें मिलीं । लालू प्रसाद के समर्थन से रामविलास पासवान राज्यसभा पंहुचे क्योंकि उनकी पार्टी के सदस्य नगण्य थे।  इस बीच दिल्ली का संप्रग भी प्रभावहीन हो रहा था। नरेंद्र मोदी धीरे -धीरे मीडिया में छाये जा रहे थे। बिहार में नीतीश कुमार एनडीए से अलग होकर स्वतंत्र पहचान बनाने की कोशिश में थे। भाजपा को बिहार में राजनीतिक मित्रों की तलाश थी । कोई सोच भी नहीं सकता था कि रामविलास भाजपा के साथ होंगे वह भी तब, जब नरेंद्र मोदी वहाँ प्रधानमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार थे। उन्ही के सवाल पर उन्होंने अटलबिहारी सरकार से इस्तीफा किया था।

लेकिन अब वह एनडीए के हिस्सा थे । 2014 लोकसभा चुनाव में उन्हें सात सीटें लड़ने को मिलीं और छह पर उन्हें सफलता हासिल हुई । वह मोदी सरकार में मंत्री बने । तब से लोजपा एनडीए का हिस्सा बनी रही। अक्टूबर 2020 में बिहार विधानसभा चुनाव के बीच ही रामविलास पासवान ने दुनिया से विदा ले ली ।

पार्टी की बागडोर अब उनके बेटे चिराग के पास थी । उनके अनुसार नीतीश ने उन्हें कोई तवज्जो नहीं दी । चिराग उनके मुकाबिल उम्र से भले बच्चे थे ,लेकिन एक पार्टी के सदर थे। उनकी पार्टी को जब किनारे करने की कोशिश हुई, तब उनका बिफरना स्वाभाविक था। चुनाव में उन्होंने भाजपा का तो विरोध नहीं किया, लेकिन जेडीयू के सभी उम्मीदवारों के विरुद्ध अपनी पार्टी के उम्मीदवार उतार दिए । कहा जाता है इससे नीतीश को नुकसान उठाना पड़ा। हालांकि लोजपा को कोई सफलता नहीं मिली। उसके बस एक उम्मीदवार जीत सके ।

चुनाव बाद नीतीश और चिराग की दूरी बढ़नी स्वाभाविक थी । फिर आया रामविलास पासवान के घर में ही विद्रोह। आज स्थिति यह है कि चिराग के साथ कोई दूसरा सांसद नहीं है। पहले संसदीय दल के नेता और फिर पार्टी अध्यक्ष पद से भी, चिराग को हटा दिया गया है। उनकी जगह रामविलास के भाई पशुपति पारस ने ले ली है  चिराग क़ानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं और फिलवक्त अलग -थलग हैं। अधिक से अधिक स्थिति यही होगी कि रामविलास पासवान की विरासत का बैनर लगा कर अब दो दल राजनीति में रहेंगे । चिराग किसी न किसी रूप में राजनीति में तो रहेंगे ही।

चिराग अब क्या करेंगे? जो स्थितियां उभर कर आई है, उसमे ऐसा लग रहा है कि नीतीश कुमार के भय या अन्य कारणों से भाजपा भी चिराग को कोई संरक्षण नहीं देने जा रही है। बिहार में भाजपा ,कांग्रेस ,राजद और जदयू जब एकला राजनीति करने का साहस नहीं करते ,तो चिराग कैसे करेंगे। पिछले चुनाव में अलग -थलग पड़ने का नतीजा वह देख चुके हैं ।आज तो वह और भी अकेले हो गए हैं।

मेरा अनुमान है कि पशुपति पारस के नेतृत्व वाली लोजपा नीतीश कुमार की राजनीति का हिस्सा बन कर रह जाएगी। वह जदयू में समाहित हो न हो, रहेगी उसी के रहमो- करम पर उसका राजनीतिक उपनिवेश बन कर। नीतीश को छोड़ने का साहस अभी भाजपा में शायद नहीं होगा । नीतीश उसे छोड़ दें, इसकी संभावना चाहे जितनी कम हो ,इससे इंकार भी नहीं किया जा सकता।

लेकिन चिराग के लिए कौन-सा ठिकाना होगा? लोजपा की राजनीति दलितों के एक हिस्से भर की राजनीति थी। चमारों पर बहुजन समाज पार्टी, राजद और सीपीआई माले का प्रभाव है, वहीं अन्य दलित कई तरफ बँटे हुए हैं । लोजपा का मुख्य प्रभाव दुसाध लोगों के बीच है । यह एक ऐसी जाति है जो अपने लड़ाकू तेवर के लिए जानी जाती है। आग पर चलना दूसरों के लिए मुहावरा हो सकता है। दुसाधों के बीच गाँव -गाँव में होने वाला एक धार्मिक रस्म है, जिससे हर दुसाध का वास्ता रहा है। उनके देवता राह बाबा की पूजा में हर किसी को आग के दह -दह शोलों बीच कुछ कदम चलने होते हैं। यह विकट अग्निपरीक्षा है। इस परीक्षा से हो कर गुजरने वालों को फिर किसका डर हो सकता है। वोट लूट के ज़माने में भी इसके वोट शायद ही लुटे जाते थे। इस बहादुर कौम का महत्व मुगलों और फिर अंग्रेजों ने समझा था। पासवान फारसी जुबान का शब्द है, जिसका अर्थ है रक्षक। अंग्रेजों ने इनकी बदौलत ही प्लासी का युद्ध जीता था। चूँकि इनके बीच अशिक्षा थी, इसलिए इन्हे पुलिस सेवा के निचले स्तर पर चौकीदार के रूप में रखा। चौकीदार के रूप में दो ही जाति के लोग होते थे -अहीर और दुसाध । हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार इन दो मजबूत जातियों के बूते ही अंग्रेजों ने उत्तरभारत में अपनी पैठ मजबूत की थी।

एक व्यक्ति के रूप में निश्चित ही रामविलास पासवान ने इस बिरादरी के बीच सबसे अधिक पैठ बनाई थी। उनका प्रभाव शहरी से अधिक ग्रामीण इलाकों और पढ़े -लिखे लोगों की अपेक्षा अनपढ़ों पर अधिक था। उनसे प्रभावित वोट बैंक का बहुलांश चिराग के प्रभाव में ही आज भी है। पिछले चुनाव में लोजपा को लगभग चौबीस लाख, यानि कुल वोटों का छह फीसद वोट (वास्तविक 5 .77 %) मिले थे। यह प्रभावी संख्या है । यह वोट बसपा को प्राप्त वोट का चार गुना, और मांझी की पार्टी को प्राप्त मतों का छह गुना है। ओबैसी और उपेन्द्र को मिले वोटों से भी यह कई गुना अधिक है। 2015 में भाजपा के साथ मिल कर लड़े होने पर मिले मतों से यह ०.77 फीसद अधिक है  इसलिए ऐसा नहीं है कि चिराग का प्रदर्शन बहुत ख़राब रहा था। 1995 चुनाव में लगभग इतना ही वोट जॉर्ज – नीतीश की पार्टी को भी मिले थे। उल्लेखनीय यह भी है कि पिछले चुनाव में उसकी पार्टी के वे लोग जो आज अलग हुए हैं पूरी तरह निष्क्रिय थे। इसका मतलब यह रामविलास पासवान के प्रति सम्मान और चिराग के बूते हासिल मत हैं। व्यावहारिक स्तर पर आज का बगावती तबका पहले ही जोर आजमाइश कर पिट चुका है।

यह बहुत स्पष्ट है कि रामविलास पासवान को अपने प्रभाव का वोट भाजपा -जदयू की तरफ मोड़ने में मुश्किल हुई थी। दुसाध लोग हिंदुत्व के चौखटे में उपयुक्त नहीं बैठते। वे गरीब , मेहनती और उदार प्रवृत्ति के होते हैं। उनपर समाजवादी और वाम आंदोलनों का अच्छा -खासा असर है। पिछले विधानसभा चुनाव में लोजपा को ०. 77 मतों की जो बढ़त मिली है, वह कुछ संकेत करती है । इन संकेतों को यदि चिराग ने समझा तब वह निश्चित ही बिहार की राजनीति को प्रभावित कर सकेंगे। उन्हें लम्बी पारी खेलनी है, इसलिए धैर्य और विवेक के साथ उन्हें राजनीति करनी चाहिए। उन्होंने अपने किसी कार्यकर्ता को मौजूदा बगावत पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि पार्टी का कचरा साफ़ हो गया। मैं समझता हूँ अभी बहुत -सा कचरा उनके इर्द -गिर्द है। मन का भाजपाई कचरा अलग है। इन सब को चिराग को ही साफ़ करना होगा। अन्यथा उनके साथ वे भी उसके हिस्सा हो जा सकते हैं।

 

प्रेम कुमार मणि वरिष्ठ लेखक और राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता हैं। बिहार विधान परिषद के सदस्य भी रह चुके हैं।


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