भगत सिंह को छूकर हाथ जला चुके संघ ने अब राजगुरु पर दावा ठोंका जो फ़र्ज़ी है!

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पंकज श्रीवास्तव

 

केंद्र में पहली बार बीजेपी की बहुमत वाली सरकार बनने के बाद आरएसएस इस दाग़ को धो देना चाहता है कि उसने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग नहीं लिया। देशप्रेम पर अपना ‘कॉपीराइट’ समझने वाले संघ को यह बरदाश्त नहीं होता कि तमाम क्रांतिकारी उसके वैचारिक परिसर से न सिर्फ़ बाहर हैं, बल्कि विरोधी भी है। कभी उसने भगतसिंह का झंडा उठाया था लेकिन भगत सिंह जैसे ‘कम्युनिस्ट’ और ‘नास्तिक’ के विचारों और लेखों को छूते ही उसके हाथ जल गए।

बहरहाल, प्रयास जारी है। ताज़ा मामला भगत सिंह के साथी शहीद राजगुरु को संघ का स्वयंसेवक बताने का है। नवभारत टाइम्स में आज पूनम पांडेय की बाइलाइन से छपी ख़बर में बताया गया है कि संघ प्रचारक और हरियाणा के संगठन मंत्री रहे नरेंद्र सहगल की किताब में दावा किया गया है कि राजगुरु संघ की मोहित बाड़े शाखा के स्वयंसेवक थे। नागपुर के हाईस्कूल भोंसले वेदशाला के छात्र रहते हुए राजगुरु का संघ संस्थापक हेडगेवार से घनिष्ठ परिचय था। सहगल की इस किताब “भारतवर्ष की सर्वांग स्वतंत्रता” की भूमिका संघप्रमुख मोहन भागवत ने लिखी है। उनका दावा है कि ‘यह किताब उन लोगों को जवाब देगी जो स्वतंत्रता संग्राम में संघ की भूमिका पर सवाल उठाते हैं।’

यूँ तो संघ की सदस्यता का न कोई रजिस्टर होता था और न कोई अन्य रिकार्ड, फिर भी राजगुरु को लेकर यह दावा मान लिया जाए तो क्या निष्कर्ष निकलता है? क्या बचपन में शाखा जाने या हेडगवार से परिचय राजगुरु की पहचान है? राजगुरु की पहचान भगत सिंह के वैचारिक नेतृत्व में  गठित हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सेनानी की है जिसका मकसद भारत में एक ‘धर्मनिरपेक्ष’ और मज़दूरों-किसानों का ‘समाजवादी’ राज की स्थापना करना था, न कि संघ की तरह हिंदूराष्ट्र बनाना। क्या इस तर्क से हेडगेवार को काँग्रेसी नहीं ठहराया जाना चाहिए जिन्होंने 1928 के कांग्रेस अधिवेशन में भाग लिया था और 1930 तक बतौर कांग्रेसी सक्रिय थे। अगर बचपन में राजगुरु शाखा गए भी थो बड़े होकर वह उन आदर्शों के ख़िलाफ़ हो गए जो संघ युवकों के सामने रखता था। यह आदर्श था- अंग्रेज़ी राज की भक्ति। भगत सिंह और सुखदेव के साथ शहीद होने वाले राजगुरु का देश के नाम अंतिम संदेश था- इंकलाब ज़िंदाबाद और साम्राज्यवाद मुर्दाबाद।

यह संयोग नहीं कि 1925 में बने आरएसएस के किसी कार्यकर्ता ने 1947 तक किसी अंग्रेज़ को एक कंकड़ी भी फेंककर नहीं मारी। संघ दीक्षितनाथूराम गोडसे ने हथियार उठाया भी तो आज़ादी के बाद निहत्थे गाँधी के प्राण लेने के लिए जबकि वह पिस्तौल चलाना जानता था। बात सिर्फ इतनी नहीं कि आरएसएस स्वतंत्रता आंदोलन में निष्क्रिय था। उसने स्वतंत्रता आंदोलन का विरोध किया था। भगत सिंह और उनके साथियों का बलिदान उसकी नज़र में कोई ‘आदर्श’ भी नहीं था-

क्रांतिकारियों के बलिदान के संदर्भ  गुरु गोलवरकर लिखते हैं–

‘ हमारी भारतीय संस्कृति को छोड़कर अन्य सब संस्कृतियों ने ऐसे बलिदान की उपासना की है तथा उसे आदर्श माना है और ऐसे सब बलिदानियों को राष्ट्रनायक के रूप में स्वीकार किया है…परंतु हमने भारतीय परम्परा में इस प्रकार के बलिदान को सर्वोच्च आदर्श नहीं माना है। ‘

‘यह स्पष्ट है कि  जीवन में असफल रहे हैं, उनमें अवश्य कोई बहुत बड़ी कमी रही होगी। जो पराजित हो चुका है, वह दूसरों को प्रकाश कैसे दे सकता है और उन्हें सफलता की ओर कैसे ले जा सकता है ? हवा के प्रत्येक झोंके में कंपित ज्योति हमारा पथ कैसे प्रकाशित कर सकती है ? ‘

‘ नि:संदेह ऐसे व्यक्ति जो अपने आप को बलिदान कर देते हैं श्रेष्ठ व्यक्ति हैं और उनका जीवन दर्शन प्रमुखतया पौरुषपूर्ण है। वे सर्वसाधारण व्यक्तियों से, जो चुपचाप भाग्य के आगे समर्पण कर देते हैं और भयभीत एवं अकर्मण्य बने रहते हैं, बहुत ऊँचे हैं। फिर भी हमने ऐसे व्यक्तियों को समाज के सामने आदर्श रूप में नहीं रखा है। हमने ऐसे बलिदान को महानका सर्वोच्च बिंदु, जिसकी मनुष्य आकांक्षा करे, नहीं माना है। क्योंकि अंतत: वे अपना उद्देश्य प्राप्त करने में असफल रहे और असफलता का अर्थ है कि उनमें कोई गंभीर त्रुटि थी। ‘

(गुरु गोलवलकर, विचार नवनीत पृष्ठ 280-281)

 

यही नहीं, गुरु गोलवलकर शहादत को अविवेकी कदम भी बताते हैं–

‘अंग्रेज़ों के प्रति क्रोध के कारण अनेकों ने अद्भुत कारनामे किए। हमारे मन में भी एक-आध बार विचार आ सकता है कि हम भी वैसा करें…परंतु सोचना चाहिए कि उससे संपूर्ण राष्ट्र-हित साध्य होता है क्या ? बलिदान के कारण पूरे समाज में राष्ट्रहितार्थ सर्वस्वार्पण करने की तेजस्वी सोच नहीं बढ़ती। अब तक का अनुभव है कि वह हृदय की अंगार सर्वसाधारण को असहनीय होती है। एक संस्कृत सुभाषित में कहा गया है कि – सहसा विद्धीत न क्रियां। अविवेक:परमपदां पदं।’

(श्री गुरुजी समग्र दर्शन, पृष्ठ 61-62)

 

समझा जा सकता है कि संघ अपने लक्ष्य को किस तरह प्राप्त करना चाहता है। उसे हर हाल में विजेता होना है। पराजय का उसके लिए कोई मोल नहीं (हाँलाकि शिवाजी और राणा प्रताप भी पराजित थे, लेकिन मुस्लिमों से लड़ने वाले नायक के रूप में प्रचारित करना उसकी रणनीति है।) इसीलिए संघ से जुड़े तमाम नेता माफ़ी माँगने में देर नहीं करते। चाहे वे अंग्रेज़ रहे हों या फिर इमरजेंसी की इंदिरागाँधी। ख़ुद को सुरक्षित रखते हुए साम-दाम-दंड-भेद के ज़रिए क़ामयाबी पाना उसका मंत्र 1942 में भी था और 2018 में भी।

8 जून 1942 को गुरु गोलवरकर ने संघ कार्यकर्ताओंके अखिल भारतीय प्रशिक्षण कार्यक्रम की समाप्ति पर दिए गए भाषण में अंग्रेज़ी राज को स्वाभाविक बताते हुए कहा-

“समाज की पतित अवस्था के लिए संघ दूसरों को दोष देना नहीं चाहता। जब लोग दूसरों के सिर पर दोष मढ़ने लगते हैं तब उके मूल में उनकी दुर्बलता रहती है। दुर्बलों पर अन्याय का दोष बलवानों के माथे मढ़ना  व्यर्थ है…दूसरों को गाली देने या उनकी आलोचना करने में अपना अमूल्य समय नष्ट करने की संघ की इच्छा नहीं है। यदि यह हम जानते हैं कि बड़ी मछली छोटी मछली निगलती है तो उस बड़ी मछली को दोष देना सरासर पागलपन है। यह निसर्ग-नियम भला हो, बुरा हो, वह सब समय सत्य ही है। यह नियम यह कहने से कि वह अन्यायपूर्ण है, बदलता नहीं।”

(श्री गुरुजी समग्र दर्शन, खंड-1 पृष्ठ 11-12, भारतीय विचार साधना,नागपुर, 1981)

 

आज संघ बड़ी मछली बन चुका है। छोटी मछलियों को निगलना अपना अधिकार समझता है। लेकिन क्रांतिकारियों को निगलने की कोशिश उसे भारी पड़ेगी क्योंकि उनके ‘विचारों का काँटा’ संघ के गले में अटकेगा ज़रूर।

 

डॉ.पंकज श्रीवास्तव, मीडिया विजिल के संस्थापक संपादक हैं।

 

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