एक महान क्रांतिकारी को याद करते हुए…


South African President Nelson Mandela makes his way to Parliament in Cape Town, South Africa, in this May 9, 1994, file photo. Mandela died on Thursday, Dec. 5, 2013. (Anacleto Rapping/Los Angeles Times/MCT)


नेल्सन मंडेला की जन्मशती

तकरीबन साढ़े तीन सौ साल की अल्पमत गोराशाही के बाद अप्रैल 1994 में दक्षिण अफ्रीका के प्रथम जनतांत्रिक चुनाव के समय वरिष्ठ पत्रकार आनंद स्वरूप वर्मा ने जोहानसबर्ग और प्रिटोरिया से ‘जनसत्ता’ के लिए रिपोर्टिंग की थी. इस ऐतिहासिक चुनाव को कवर करने वाले वह हिन्दी के अकेले पत्रकार थे. वहाँ उन्होंने नेल्सन मंडेला सहित अनेक राजनेताओं और साहित्यकारों से भी भेंट की. आज मंडेला के सौवें जन्मदिवस पर उनका एक लेख – (संपादक)    

आनंद स्वरूप वर्मा

दक्षिण अफ्रीका की नोबेल पुस्कार विजेता नेदिन गार्डिमर ने 1979 में ‘बर्गर्स डॉटर्स’ नामक उपन्यास लिखा था जो क्रांतिकारियों के बच्चों की पारिवारिक जिंदगी पर था जिन्हें हमेशा गिरफ्तारी का डर बना रहता था। यह उपन्यास प्रकाशित होने के बाद दक्षिण अफ्रीका में प्रतिबंधित कर दिया गया था। नेदिन ने अपने एक लेख में बताया है कि वह उपन्यास न जाने किस तरह रोबेन द्वीप समूह में कैद नेल्सन मंडेला तक पहुंच गया और उसे पढ़ने के बाद मंडेला ने एक बहुत भावपूर्ण पत्र नेदिन को भेजा।

नेदिन गार्डिमर दक्षिण अफ्रीका के उन गोरों में से थीं जो रंगभेद नीति का विरोध करते थे और एक जनतांत्रिक व्यवस्था के पक्षधर थे। 1994 के अप्रैल के तीसरे हफ्ते में मैं नेदिन से जोहॉनसबर्ग के उनके निवास पर मिला था। उनसे एक लंबा इंटरव्यू करने के बाद बातचीत के क्रम में पता चला कि कैसे उनके निवास में ‘अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस’ के समर्थकों की समय-समय पर गुप्त रूप से बैठक हुआ करती थी और कैसे उन्होंने उन गोरों को भी रंगभेद के खिलाफ प्रेरित किया जो इसके अमानवीय पक्ष को नहीं देख पाते थे।

नेल्सन मंडेला ने 1943 में अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस के यूथ लीग की जिम्मेदारी संभालने के साथ अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी। 1948 में दक्षिण अफ्रीका में नेशनल पार्टी की सरकार सत्ता में आयी और उसने रंगभेद को सरकारी नीति का रूप दे दिया। अब 12 प्रतिशत गोरों के मुकाबले 88 प्रतिशत लोग गुलामी की जिंदगी जीने के लिए मजबूर कर दिये गये थे। रंगभेद की नीति के तहत पार्कों, होटलों, रेल के डिब्बों और यहां तक कि शौचालयों आदि को भी गोरों के लिए अलग और शेष आबादी के लिए अलग निर्धारित कर दिया गया। युवा मंडेला शरीर से बलिष्ठ थे, प्रशिक्षण प्राप्त मुक्केबाज थे और बात-बात में कम्युनिस्टों से भिड़ जाते थे क्योंकि उन्हें कम्युनिस्टों से चिढ़ थी। अपने काम के दौरान उन्हें बड़ी शिद्दत से महसूस हुआ कि रंगभेद के खिलाफ संघर्ष में उनके सच्चे मित्र कम्युनिस्ट ही हो सकते हैं और फिर एएनसी तथा साउथ अफ्रीकन कम्युनिस्ट पार्टी (एसएसीपी) के बीच ऐसा तालमेल बना जो आज तक किसी न किसी रूप में कायम है।

प्रसंगवश, 1956 में जब मंडेला को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया तो उनके खिलाफ जो धाराएं लगायी गयीं उनमें ‘सप्रेशन ऑफ कम्युनिज्म ऐक्ट’ भी था। उन दिनों हिंसा और अहिंसा के सवाल को लेकर मंडेला के मन में एक द्वंद्व चलता रहता था। उनके जन्म से चार वर्ष पूर्व ही 1914 में महात्मा गांधी वापस भारत आ चुके थे लेकिन इससे पहले उन्होंने 21 वर्ष दक्षिण अफ्रीका में बिताया था और वहां बसे भारतीय मूल के लोगों की समस्याओं को लेकर किये गये आंदोलनों की वजह से उनकी चर्चा भी थी। मंडेला, गांधी की अहिंसा के कभी समर्थक नहीं रहे तो भी 1952 में एएनसी के अवज्ञा आंदोलन (डिफायंस कैंपेन) जैसे कार्यक्रमों में उन्होंने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया लेकिन 1960 तक उनकी यह दुविधा समाप्त हो गयी। 1960 में दक्षिण अफ्रीका के शार्पविले नामक स्थान में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर गोरी सरकार ने गोलियां चलायीं जिसमें 69 लोग मारे गये और सैकड़ों की तादाद में घायल हुए। इस घटना ने हिंसा और अहिंसा के सवाल पर चल रहे द्वंद्व को पूरी तरह समाप्त कर दिया और मंडेला के इस कथन को स्थापित कर दिया कि ‘राज्य की हिंसा का मुकाबला क्रांतिकारी हिंसा से ही संभव है।’

इस घटना के दो वर्ष बाद ‘रिवोनिया ट्रॉयल’ के दौरान नेल्सन मंडेला ने अदालत में अपने बयान में कहा- ‘सरकारी हिंसा की एक ही परिणति है- वह जवाबी हिंसा को जन्म देती है। हमने सरकार को बार-बार चेतावनी दी है कि हिंसा का सहारा लेने से जनता की ओर से जवाबी हिंसा ही सामने आयेगी और यह सिलसिला तब तक जारी रहेगा जब तक सरकार के होश ठिकाने नहीं आ जाते और जब तक जनता और सरकार के बीच हिंसा के जरिए विवादों का अंतिम तौर पर निपटारा नहीं हो जाता।’ शार्पविले का प्रदर्शन दक्षिण अफ्रीका के इतिहास में अंतिम शांतिपूर्ण प्रदर्शन था। इसके बाद ही अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस के सशस्त्र संगठन ‘उम्खोन्तो वी सिज्वे’ (स्पीयर आफ दि नेशन या राष्ट्र का भाला) का जन्म हुआ और नेल्सन मंडेला इसके कमांडर इन चीफ बनाये गये।

मंडेला के चुनाव का दृश्य

25 अप्रैल 1994 को जोहॉनसबर्ग के कार्ल्टन होटल में वोट देने के अधिकार से वंचित एक नागरिक के तौर पर मंडेला का अंतिम संवाददाता सम्मेलन था जिसमें सैकड़ों की संख्या में देशी-विदेशी पत्रकार मौजूद थे। उस संवाददाता सम्मेलन में मैंने मंडेला से जानना चाहा कि अब अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस तथा दक्षिण अफ्रीका की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच कैसे संबंध् रहेंगे? इसके जवाब में मंडेला ने हूबहू वही बातें कहीं जो उन्होंने तकरीबन 30 साल पहले रिवोनिया मुकदमे के समय अदालत में कही थीं। रिवोनिया ट्रायल के समय उन्होंने कहा था: ‘‘यह सही है कि अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी के बीच प्रायः घनिष्ठ सहयोग रहा है लेकिन सहयोग महज इस बात का सबूत है कि हमारे लक्ष्य समान हैं। मौजूदा संदर्भ में यह लक्ष्य है गोरे प्रभुत्ववाद की समाप्ति। यह इस बात का सबूत नहीं है कि हमारे दोनों के हित पूरी तरह समान हैं… दुनिया का इतिहास इस तरह की मिसालों से भरा है। शायद सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण हमें हिटलर के खिलाफ ग्रेट ब्रिटेन, अमेरिका और सोवियत संघ के बीच सहयोग में दिखायी देता है। किसी ने यह नहीं कहा कि ब्रिटेन और अमेरिका दुनिया में साम्यवाद लाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं… मैं समझता हूं कि कम्युनिस्टों ने उपनिवेशों में आजादी के संघर्ष में हमेशा सक्रिय भूमिका निभायी है। ऐसा इसलिए क्योंकि साम्यवाद के अल्पकालीन लक्ष्य हमेशा स्वाधीनता आंदोलन के दीर्घकालीन लक्ष्यों के अनुरूप होते हैं… आदि आदि।’’

मुझे इतने लंबे जवाब की अपेक्षा नहीं थी। पिछले हफ्ते भर से दक्षिण अफ्रीका के अखबारों में लगातार इस आशय की खबरें प्रकाशित हो रही थीं कि ‘कम्युनिस्ट मंडेला’ के नेतृत्व वाली अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस के सत्ता में आ जाने के बाद लोगों की संपत्ति पर कब्जा कर लिया जाएगा, बूढ़ों को जेल में डाल दिया जाएगा, आदि आदि। मेरे सवाल ने मंडेला को वह अवसर दे दिया कि वह दुनिया के सामने स्पष्ट कर सकें कि उन्हें कम्युनिस्ट समझने की ‘भूल’ न की जाए।

नाइजीरिया के प्रसिद्ध उपन्यासकार चीनुआ एचेबे ने 2012 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘देयर वाज ए कंट्री, ए पर्सनल हिस्ट्री ऑफ बिआफ्रा’ में नेल्सन मंडेला को इस बात के लिए याद किया है कि कैसे वर्षों की जेल यातना के बाद उन्होंने राष्ट्रपति पद का पहला कार्यकाल समाप्त होते ही खुद को सत्ता की दौड़ से अलग कर लिया और अपने बाद की पीढ़ी को देश चलाने का मौका दिया। उन्होंने लिखा- ‘क्या यह याद दिलाने की जरूरत है कि मंडेला नाम का एक व्यक्ति है जिसने 27 साल दक्षिण अफ्रीका की जेल में बिताये और महज चार साल राष्ट्रपति पद पर रहने के बाद उसने खुद ही इस पद को छोड़ दिया ताकि युवा पीढ़ी अब आगे के काम को संभाले? जो लोग नहीं जानते उन्हें जानना चाहिए कि मंडेला की जिंदगी कोई आसान जिंदगी नहीं थी। अधिकांश लोग जिंदगी की कटुताओं से टूट जाते हैं लेकिन मंडेला के साथ ऐसा नहीं हुआ। वह महान व्यक्ति 11 फरवरी 1990 को जब लगभग तीन दशकों के बाद जेल से छूटा तो तनी हुई मुट्ठियों के साथ अपने हाथों को हवा में लहरा रहा था। उसकी रिहाई ने सारी पृथ्वी के लोगों को एक रोशनी दी। सारी दुनिया प्रफुल्लित हो गयी जिन्होंने मंडेला के रूप में अपनी अदम्य आकांक्षाओं को मूर्तिमान होते हुए देखा।’

1990 में जेल से रिहा होने के बाद मंडेला ने विभिन्न देशों- खास तौर पर पश्चिमी देशों की अनेक यात्राएं कीं और इन देशों के शीर्ष नेताओं ने, जिन्होंने कभी मंडेला को आतंकवादी और हत्यारा विशेषणों से नवाजा था, दिल खोलकर उनका स्वागत किया। 1994 में बहुजातीय सरकार के प्रथम राष्ट्रपति बनने तक मंडेला की पश्चिमी देशों में एक साख बन चुकी थी और पश्चिमी देशों ने भी एक रणनीति तैयार कर ली थी कि इस नयी परिस्थिति का कैसे सामना किया जाए। जिस समय मंडेला के हाथ में सत्ता की बागडोर आयी, आबादी का तकरीबन 90 प्रतिशत हिस्सा बदहाली का शिकार था और उसके सामने जमीन के वितरण से लेकर आवास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि की समस्याएं मुंह बाये खड़ी थीं। उसे अपेक्षा थी कि मंडेला के आते ही उसकी समस्याएं हल हो जायेंगी या हल होने की दिशा में आगे बढ़ेंगी। मंडेला उसकी अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरे। उल्टे पश्चिमी देशों के धनकुबेरों की जकड़ दक्षिण अफ्रीका पर बढ़ती चली गयी और आवास तथा भूमि सुधार का कार्यक्रम आधा-अधूरा पड़ा रहा। इन सबके बावजूद गोराशाही के समाप्त होने से जो सम्मान कालों को हासिल हुआ उसके लिए मंडेला अंतिम समय तक अभूतपूर्व प्यार पाते रहे।

नवंबर 1995 में न्यूजीलैंड की राजधानी ऑकलैंड में 52 सदस्यों वाले राष्ट्रमंडल देशों का शिखर सम्मेलन में 35 वर्षों बाद दक्षिण अफ्रीका ने भाग लिया। राष्ट्रपति बनने के बाद किसी अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लेने का मंडेला का यह पहला मौका था। अमेरिका और यूरोपियन यूनियन के देश लगातार इस कोशिश में लगे थे कि मंडेला अब समूचे अफ्रीका को एक नया नेतृत्व दें। उस समय तक नाइजीरिया में एक के बाद एक आई सैनिक सरकारों ने अपने प्रति एक प्रतिकूल माहौल बना दिया था। उन्हीं दिनों नाइजीरिया के महत्वपूर्ण लेखक, मानव अधिकारकर्मी और पर्यावरणविद् केन सारो-वीवा को दिए गए मृत्युदंड के खिलाफ सारी दुनिया में नाइजीरिया के प्रति आक्रोश का वातावरण था। राष्ट्रमंडल देशों के सम्मेलन में भी इन देशों ने यही मांग की थी कि नाइजीरिया की भर्त्सना की जाए। मंडेला ने इस शिखर सम्मेलन में नाइजीरिया को अलग-थलग करने की मांग का विरोध किया और कहा कि ऐसा करना उचित नहीं होगा। इससे नाइजीरिया के सैनिक शासक सानी अबाचा का हौसला बुलंद हुआ और उसने अगले ही दिन केन सारो-वीवा तथा उनके आठ साथियों को फांसी पर लटका दिया। उनके प्रशंसक मानते हैं कि मंडेला को अपनी चूक का गंभीरता से एहसास हुआ।

इस घटना के बाद मंडेला की तीखी आलोचना हुई। नोबेल पुरस्कार विजेता नाइजीरियाई कवि और उपन्यासकार वोले सोयिंका ने आरोप लगाया कि मंडेला की ‘पश्चिमी देशों के तुष्टिकरण’ की नीति ने उन्हीं दिनों की याद दिला दी है जब अमेरिकी राष्ट्रपति रेगन और ब्रिटिश प्रधानमंत्री थैचर दक्षिण अफ्रीका की नस्लवादी सरकार के साथ ‘कांस्ट्रक्टिव इनगेजमेंट’ की नीति अपना रहे थे। केन सारो-वीवा के वकील ने 21 नवंबर 1995 को ‘इंडिपेंडेंट’ में एक लेख लिखा जिसमें मंडेला के प्रति गुस्सा जाहिर करते हुए मंडेला से सवाल किया कि ‘अगर दक्षिण अफ्रीका के प्रति अन्य देशों ने यही नीति अपनायी होती तो मुझे संदेह है कि आज आप जीवित बचे होते।’

मंडेला की मृत्यु के बाद केन सारो-वीवा के पुत्र और पत्रकार केन वीवा ने लंदन के ‘दि ऑब्जर्बर’ अखबार में 8 दिसंबर 2013 को एक लेख लिखा जिसमें मंडेला के गुणों की प्रशंसा करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी लेकिन नाइजीरिया के सैनिक शासन के प्रति मंडेला के नर्म रवैये को याद करते हुए अपनी निराशा भी जाहिर की।

5 दिसंबर 2013 को 95 वर्ष की आयु में नेल्सन मंडेला के निधन के साथ एक युग की समाप्ति हो गयी। मंडेला का संघर्ष, उनके जीवन मूल्य और उनके आदर्श दुनिया के संघर्षशील लोगों के लिए हमेशा प्रेरणा का काम करेंगे।

 


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