आज़ाद भारत की सरकार का रुख सभी धर्मों के प्रति तटस्थ होगा-सुभाषचंद्र बोस


“हमारा राजनीतिक दर्शन नेशनल सोशलिज़्म और कम्युनिज़्म का समन्वय होगा। स्थापना और प्रतिस्थापना के बीच के द्वंद्व का समाधान एक उच्चतर संश्लेषण के रूप में होना चाहिए। द्वंद्ववाद के नियम की यही माँग है। यदि ऐसा नहीं किया गया तो मानव जाति का विकास रुक जायेगा।”


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नेता जी सुभाष चंद्र बोस ने नवंबर 1944 में टोक्यो विश्वविद्यालय के शिक्षकों और विद्यार्थियों के सामने एक महत्वपूर्ण भाषण दिया था। इस भाषण में उन्होंने भारत के भविष्य को लेकर अपनी योजनाएँ बतायी थीं तथा कई अहम सवालों पर अपनी राय रखी थी। भारत सरकार के प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित नेताजी संपूर्ण वाङ्मय में यह भाषण  ‘भारत की मूलभूत समस्याएँ’ शीर्षक से संकलित है। प्रस्तुत है इस लेख के कुछ चुनिंदा अंश-


भारत

“पिछले तीन हज़ार वर्षों में नये विचारों और कभी-कभी नई संस्कृतियों के साथ लोग बाहर से भारत आये। ये सारे प्रभाव, विचार, संस्कृतियाँ धीरे-धीरे भारत के राष्ट्रीय जीवन में समाहित हो गयीं, इसलिए बाजूद इसके कि हमारी संस्कृति और सभ्यता मूलत: वही है, जो कई हज़ार साल पहले थी, हम बदलते रहे हैं और समय के साथ चलते रहे हैं। आज प्राचीन पृष्ठभूमि के बावजूद हम लोग इस आधुनिक दुनिया में रह रहे हैं और इसके हिसाब से बदल भी रहे हैं।”

 

राजनीतिक एकता

“यह बिल्कुल ग़लत धारणा है कि अंग्रेजों ने भारत को राजनीतिक रूप से एक किया। सच्चाई यह है कि भारत राजनीतिक रूप से 2500 साल पहले बौद्ध सम्राट अशोक के काल में एक हुआ था। दरअसल अशोक महान के समय का भारत आज के भारत से भी बड़ा था। अशोक के भारत में न केवल आधुनिक भारत था बल्कि अफगानिस्तान और ईरान का कुछ हिस्सा भी था। …अशोक के करीब एक हज़ार साल बाद भारत एक बार फिर गुप्त सम्राटों के राज्य में उत्कर्ष के चरम पर पहुँच गया। इसके नौ सौ साल बाद फिर भारतीय इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय मुग़ल काल में आरंभ हुआ। इसलिए यह याद रखना चाहिए कि अंग्रेजों की यह अवधारणा पूरी तरह से गलत है कि हम राजनीतिक रूप से उनके शासनकाल में ही एक हुए हैं। अपने शासन काल में अंग्रेज़ों ने केवल यही किया है कि उन्होंने भारत के लोगों को बाँटा है, कमज़ोर और निहत्था किया है।”

 

समस्याएँ

“मैंने आज़ाद भारत की तीन प्रमुख समस्याओ की चर्चा की है, राष्ट्रीय सुरक्षा, गरीबी उन्मूलन और लोगों को शिक्षित करना। यदि हम इन समस्याओं को समाधान करना चाहें तो किस प्रकार कर पायेंगे? क्या हम यह काम ग़ैर-सरकारी संस्थाओं और ग़ैर -सरकारी पहल पर छोड़ देंगे या क्या राज्य इन समस्याओं के समाधान की ज़िम्मेदारी उठायेगा?”

 

लोकतंत्र नहीं अधिनायकवाद 

“यदि हम एक ऐसी आर्थिक व्यवस्था बनाना चाहते हैं जिसका स्वरूप समाजवादी हो तो यह भी सच है कि हमारी राजनीतिक व्यवस्था ऐसी हो कि वह हमारे आर्थिक कार्यक्रम को सबसे अच्छी तरह चला सके। यदि राजनीतिक व्यवस्था को समाजवादी आधार पर आर्थिक सुधार कार्यक्रम चलाने हैं तो फिर आपका काम एक तथाकथित लोकतांत्रिक व्यवस्था से नहीं चल सकता। अत: हमारी राजनीतिक व्यवस्था, हमारे राज्य का स्वरूप अधिनायकवादी होगा। हमें भारत में लोकतांत्रिक संस्थाओं का कुछ अनुभव है और हमने फ्रांस, इंग्लैंड और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देशों की लोकतांत्रिक व्यवस्था के काम का भी अध्ययन किया है। हम इस निष्कर्ष पर पहुँच चुके हैं कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था के माध्यम से हम आज़ाद भारत की समस्याओं का समधान नहीं कर सकते। इसलिए भारत में आधुनिक प्रगतिशील विचारधारा एक ऐसे राज्य के पक्ष में है जिसका स्वरूप अधिनायकवादी हो, जो आम जनता का सेवक हो, जो आम जनता के लिए काम करे और चंद अमीर व्यक्तियों का गुट न हो।”

 

धर्म

“भारत में कई धर्म हैं। अत: आज़ाद भारत की सरकार का रुख सभी धर्मो के प्रति पूरी तरह तटस्थ और निष्पक्ष होना चाहिए और उसे यह चुनाव प्रत्येक व्यक्ति पर छोड़ देना चाहिए कि वह किस धर्म को मानता है।”

 

जाति

“आधुनिक भारत में जाति के आधार पर किसी प्रकार का अंतर नहीं है। किसी भी जाति का व्यक्ति कोई भी पेशा अपनाने को स्वतंत्र है। तो इस अर्थ में आज हमारे यहाँ जाति व्यवस्था नहीं है। फिर सवाल विवाह का रह जाता है। पुराने समय में यह प्रथा थी कि लोग अपनी जाति में विवाह करते थे। आज अंतरजातीय विवाह आम हैं। अत: जाति का बड़ी तेज़ी से लोग हो रहा है। सच्चाई तो यह है कि राष्ट्रीय आंदोलन में हम किसी व्यक्ति की जाति कभी नहीं पूछते और अपने कुछ निकटतम सहयोगियों की तो हम जाति भी नहीं जानते, जो बताता है कि हमारी पीढ़ी में लोग जाति के बारे में सोचते भी नहीं। अत: आज़ाद भारत के लिए जाति कोई समस्या नहीं होगी।”

 

लिपि

“भारत के लिए एक और प्रश्न महत्वपूर्ण है, वह है लिपि का प्रश्न। इस समय भारत में दो लिपियों का प्रयोग होता है-संस्कृत और फ़ारसी। आज तक के हर राष्ट्रीय कार्यक्रमों और सम्मेलनों में हम दोनों लिपियों का प्रयोग करते आये हैं। लिपियों की इस समस्या के समाधान के लिए आजकल लेटिन लिपि के प्रयोग की बात की जा रही है। व्यक्तिगत रूप से मैं लेटिल लिपि के प्रयोग के पक्ष में हूँ। चूँकि हमें इस आधुनिक संसार में रहना है, हमें दूसरे देशों के संपर्क में रहना है और हम चाहें अथवा न चाहें, हमें लेटिन लिपि सीखनी ही होगी। यदि सारे देश में लेटिन लिपि का प्रयोग कर सकें तो हमारी समस्या का समाधान हो जाएगा। लेकिन यह मेरा और मेरे निकटतम सहयोगियों और साथियों का विचार है।”

 

विविधिता

“मैं आपको यह भी बताना चाहूँगा कि सोवियत रूस जैसा एक आधुनिक देश, जहाँ अलग-अलग तरह के लोग रहते हैं, नस्लों और धर्मों की विभिन्नताओं के बावजूद एक-समाज राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण कर सकता है और एक शक्तिशाली राष्ट्र बन सकता है तो भारत जहाँ सोवियत रूस से कम विभिन्नतताएँ हैं क्यों नहीं एक राष्ट्र के रूप में एक हो सकता?”

 

मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा

“राष्ट्रीय एकता के सवाल पर मैं आपको मित्रतापूर्ण तरीके से सचेत करना चाहूँगा कि अंग्रेजों द्वारा किया जा रहा प्रचार दुनिया को यह समझाना चाहता है कि भारत के मुसलमान स्वतंत्रता आंदोलन का समर्थन नहीं करते, यह ग़लत है। आप अक्सर अख़बारों में मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा जैसे संगठनों के बारे में पढ़ते होंगे। अंग्रेज़ इन संगठनों को आगे बढ़ाते हैं क्योंकि इन संगठनों की नीति अंग्रेजों का समर्थन और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का विरोध करने की है। अंग्रेज़ लोगों को यह समझाने कि कोशिश करते हैं कि मुस्लिम लीग और मिस्टर जिन्ना भारतीय मुसलमानों के एक बहुत छोटे हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं। मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा राष्ट्रवादी है और किसी अन्य भारतीय की तरह स्वतंत्रता आंदोलन का समर्थन करता है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष मुसलमान है और कांग्रेस के बहुत से नेता भी मुसलमान हैं जिनमें से कई आज जेल में हैं।”

 

हमारा रास्ता

“हमारा राजनीतिक दर्शन नेशनल सोशलिज़्म और कम्युनिज़्म का समन्वय होगा। स्थापना और प्रतिस्थापना के बीच के द्वंद्व का समाधान एक उच्चतर संश्लेषण के रूप में होना चाहिए। द्वंद्ववाद के नियम की यही माँग है। यदि ऐसा नहीं किया गया तो मानव जाति का विकास रुक जायेगा।”

 

नेताजी संपूर्ण वाङ्मय, खंड 12, प्रकाशन विभाग। पेज नंबर 272 से लेकर 289 तक। 


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