देह से उठता मुक्ति का धुआं: रमणिका गुप्‍ता का जीवन और लेखन



रमणिका गुप्‍ता नहीं रहीं। आज से कोई दसेक साल पहले की बात है जब उन्‍होंने मुझसे अपनी समग्र कविताओं पर एक समीक्षा लिखने को कहा था। शायद कई लोगों से कहा था। योजना थी एक संकलन प्रकाशित करने की जिसमें उनके रचनाकर्म का समग्र मूल्‍यांकन हो सके। पता नहीं वह संकलन छपा या नहीं, लेकिन मैंने उन्‍हें जो लिखकर भेजा वह आज तक मेल में संजो कर रखे हुए था। अगर छपा होता तो बेशक ख़बर मिलती। मैं मानकर चल रहा हूं कि यह समीक्षा अप्रकाशित है और यहां पहली बार शाया हो रही है। रमणिका गुप्‍ता को मीडियाविजिल की ओर से भावभीनी श्रद्धांजलि के साथ…

रमणिका गुप्ता के बारे में यह बात दावे के साथ कही जा सकती है कि उन्होंने जो जिया वही लिखा। अमूमन, यह बात सभी रचनाकारों के बारे में सच नहीं होती। हालांकि, जिए हुए को ही कागज पर उतार देना किसी महान साहित्य का मानदंड नहीं हो सकता, जैसा कि इलियट कहते थे, ‘भोक्ता और लेखक के बीच जितना बड़ा अंतर होता है लेखक उतना ही बड़ा होता है।’ अनुभवों का अतिक्रमण और कल्पना की उड़ान अच्छे साहित्य के लिए कैटेलिस्ट का काम करती है और इससे इनकार नहीं किया जा सकता। इसके बरअक्स जीवन से उपजे लेखन की एक विशेषता यह होती है कि उसकी प्रामाणिकता के विषय में कोई भी संदेह व्यक्त करना इतना आसान नहीं रह जाता। यहां हम लेखक की ईमानदारी के संदर्भ में ही बात कर रहे होते हैं- व्यक्तिगत भी और रचनागत भी। रमणिका जी का सार्वजनिक जीवन बहुत लंबा रहा है और उनकी रचनाओं पर कोई भी टिप्पणी करना, समीक्षा करना दरअसल उस पूरे जीवन की समीक्षा बन जाता है जहां से रचना छन कर आई है। साथ ही यह कार्य लेखकीय ईमानदारी की पड़ताल भी है और भोक्ता व लेखक के अंतर्सम्बंधों का परीक्षण भी है। यानी रचनाकार की कसौटी और इससे बचा नहीं जा सकता। यह एक आपद्धर्म है। इसके लिए आवश्यक है कि जितनी घनिष्ठता रचनाओं के साथ हो उतनी ही रचनाकार के साथ भी होनी चाहिए। रमणिका गुप्ता के बारे में यह काम इसलिए और आसान हो जाता है क्योंकि सार्वजनिक जीवन में उनके साथ हुए हादसे और दूसरों के साथ उनके द्वारा किए गए सुलूक आप तक उनके व्यक्तिगत संपर्क में रहे बगैर भी पहुंचते रहते हैं। वास्तव में, इसमें रमणिका जी का भी उतना ही अवदान है जितना उनको चाहने और न चाहने वालों का- बल्कि उनसे कहीं ज्यादा। इसलिए, कविता सिर्फ कविता ही नहीं रह जाती, कहानी सिर्फ कहानी नहीं, बल्कि उस जीवनानुभव का एक दस्तावेज बन जाते हैं जिसमें बतौर रचनाकार हिपोक्रेसी के लिए लेशमात्र भी स्थान ही नहीं बचता। इसी गैर-मौजूद हिपोक्रेसी और खुली किताब सरीखे जीवन के छूटे-दबे पन्नों की पड़ताल की कोशिश हम उनकी कविताओं के माध्यम से कर सकते हैं।

रमणिका गुप्ता की कविताओं में, दरअसल शुरू से लेकर अंत तक मुक्ति की एक ज़िद है। यह मुक्ति तमाम रूपों में उनकी रचनाओं में व्यक्त होती है। इसके कई अध्याय हैं। मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि रमणिका गुप्ता का सारा काव्य-कर्म वंचितों की आवाज को असर्ट करने का एक वृहत् आंदोलन है। इनमें महिलाएं, आदिवासी, दलित और वे तमाम वर्ग हैं जिनके अधिकारों के लिए कवियित्री आजीवन युद्धरत रहीं। यह संघर्ष कहां से शुरू हुआ, किन रास्तों से होता हुआ कहां तक पहुंचा-यह एक भिन्न सवाल है, लेकिन रमणिका जी की कविताओं को पढ़ते हुए इतना अवश्य आभासित होता है कि इन सभी संघर्षों के मूल में उनकी व्यक्तिगत मुक्ति की आकांक्षा ही रही है। वे खुद इस बात को स्वीकार भी करती हैं, हालांकि दबे-छिपे स्वर में ही, ‘…मैं/प्रतिबंधों की चैखट पर खड़ी/समय की दहलीज लांघकर/परंपरा के किवाड़ों से/निषेध की/कीलें उखाड़ रही थी..।’ निषेध की ये कीलें देह की मुक्ति पर कसी बेड़ियों को संकेतित करती हैं। देह से शुरू होकर गेह तक पहुंचने वाले इस मुक्ति के विमर्श में बाधाएं तब आती हैं जब, बकौल कवियित्री, ‘…कि दरवाजा/बेबसी की चरमराहट से/टूटने लगा…।’ दरवाजे का यह टूटना, चरमराना यदि एक मुक्ति के नए युग की शुरुआत है तो गुलामी का नया अध्याय भी-‘…दरारें पड़ गईं-समय की/झांका तो वह हाथ फैलाए खड़े थे…।’

इन फैले हुए हाथों को रमणिका जी की कई कविताओं में लक्षित किया जा सकता है। कहीं यह ‘कफन’ है, कहीं ‘जंजीर’ तो कहीं ‘घेर’ ओर ‘दीवार’, तो कहीं ‘खूंटे’ के रूप में पुरुष वर्चस्व का प्रतिनिधि है। रमणिका गुप्ता की कविताओं में प्रमुखता से व्यक्त स्त्री विमर्श की अपनी अंतर्निहित सीमाएं हैं। कविताओं में स्त्री-मुक्ति का स्वर, अपनी देह पर स्वायत्तता के अधिकार की गूंज इतनी लाउड है कि कहीं न कहीं असली सवाल गुम सा हो जाता है। ‘नारीपन’ से ‘इंसान’ बनने तक की जिस यात्रा की बात तमाम स्त्री-विषयक कविताओं में दिखाई देती है, वह दरअसल स्त्री द्वारा उसकी ही देह पर स्वाधिकार की मांग से आगे नहीं बढ़ पाती। बार-बार कविताओं में ‘वक्ष’ का आना एक ऐसी कुंठित मुक्ति का द्योतक है जो प्रच्छन्न स्तर पर सीमोन के उस वाक्य की पुष्टि करता है कि ‘स्त्रियां चाहती हैं कि पुरुष उनके ऊपर अपना अधिकार जताएं।’ यही वजह है कि रमणिका गुप्ता का स्त्री-विमर्श एक ऐसे दुष्चक्र में फंस जाता है जहां से निकलना या आगे बढ़ना असंभव सा प्रतीत होता है-‘…और जल्दी-जल्दी/कीलें बटोरकर/फिर जोड़ने लगी/पर सदियों से लगी कीलें-/जो उखड़ी थीं-/अब अंटती न थीं-/दरवाजों में/समय गुज़र गया था न बीच में/रूढ़ि टूटी थी न।’

इसकी अनिवार्य परिणति क्या होती है, उसे समझना ज्यादा कठिन नहीं। रमणिका जी तमाम घेरने वाले, बांधने वाले, गुलाम बनाने वाले खूंटों को अपनी संप्रति स्थिति समर्पित करती हैं, लेकिन अंततः, ‘…समर्पित उस रमणिका को/जिसने मुझे रमणिका बना दिया।’ यह आत्ममुग्धता का अतिरेक है। जिस लेखकीय ईमानदारी की बात हमने आरंभ में की थी, वह यहां चुकती हुई दिखाई देती है क्योंकि आत्मगत अनुभवों का अतिक्रमण नहीं किया गया। अपनी पूंछ का पीछा करना है यह। यहां हम एक ऐसे कलाकार से रूबरू होते हैं, जिसकी अज्ञेय के शब्दों में कहें तो-

‘अपने हृदय की अनुभूति इतनी तीव्र थी कि मैंने कभी यह नहीं समझा कि उसे भी हृदय हो सकता है। मैं समझा वह एक सुंदर चीज है, साकार सौन्दर्य, किंतु कठोर, अलभ्य; जिसका ऊपरी आवरण मात्र स्पृश्य है…शायद-निश्चय-इसीलिए मेरे प्रेम में अवास्तविकता रहती थी, क्योंकि सुंदर पत्थर से प्रेम नहीं किया जा सकता।’

अज्ञेय की छाया-कथा का यह अंत था- लेकिन आखिरकार यह स्वीकारोक्ति कि ‘..मैं असभ्य हूं, जंगली हूं, दिगम्बर हूं, पर देखो, मेरे हृदय में विश्वास है…।’ रमणिका अपनी कविताओं में इस जांगल भाव, दिगम्बरत्व, असभ्यता और तमाम किस्म के बनैलेपन को रखते हुए भी विश्वास की उस सीमारेखा को नहीं छू पातीं- पाठक के तईं भी और लेखकीय ईमानदारी के संदर्भ में भी- जहां अभिमान का लोप हो जाता है; कलाकार अपनी ही प्रस्तर प्रतिमा को दूसरे के ताप में गला कर नई प्रतिमा का निर्माण करता है। वह अपनी रचनाओं के संदर्भ में आत्मकेंद्रितता और आत्ममुग्धता के मायने में अज्ञेय जी से चार कदम आगे हैं- इसीलिए चाह कर भी अपनी कविताओं में वह ऐसी संवेदनशीलता और मानवीयता नहीं ला पातीं जो किसी भी किस्म की क्रांति की बुनियादी मांग है।  वह नारे लगाती हैं और दम्भी उद्घोषणाएं करती हैं, कि-‘…संस्कृति की हर डगर/मेरे पास से होकर गुजरी है/पर मुझे छुआ नहीं/मैं अछूती ही रही/व्यवस्था की गिरती मुंडेर/बदलाव की जकड़ती नींव/सब मेरे ही रूप हैं/पर मैं सरकती नहीं…।’ इसका आभास रमणिका जी को खुद है। तभी वह लिखती हैं-‘…लेकिन मेरा पानी कभी खून से/सना नहीं/पर आज/मेरी आंखों का पानी/कहीं बचा नहीं।’ अंत में वह आत्मप्रेम के उस स्तर तक जा गिरती हैं जहां कविता की सामाजिक जिम्मेदारी का ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो जाता है-‘…मैंने जिंदगी भर/अपने को ही प्यार किया है/इसलिए लिख रही हूं यह प्रेम-पत्र/अपने को संबोधित कर/‘मेरी प्रिय जिंदगी’/तू अकेली नहीं/‘तू’ अपने साथ है/तू-/अपने बूते है…।’

रमणिका जी की कविताओं की यह बुनियादी प्रवृत्ति जिसे ऊपर रेखांकित किया गया है, उसकी छाप अगर उनके जीवन पर है तो पूरे आंदोलन पर भी जिसका उन्होंने नेतृत्व किया, उन्होंने चलाया। इसीलिए और सिर्फ इसीलिए इतने लंबे जीवनकाल के संघर्ष की परिणति उस मोहभंग में होती है जो अन्यथा कलाकार की ईमानदारी के सांचे में ढल कर और प्रतिबद्ध हो सकती थी। ‘व्यवस्था’ में यह भाव बड़ी शिद्दत से गूंजता है-‘…तब/व्यवस्था छोड़ देती मुझे/भीड़ में लाकर खड़ा कर देती/पर तब तक/या तो भीड़ बिखर गई होती है/या मैं भीड़ से निकल जाने का रास्ता/खोजता/गुम हो जाता हूं।’

रमणिका गुप्ता ने सबाल्टर्न विषयों पर ढेरों कविताएं लिखी हैं। ये विषय दरअसल उनके जिए हुए का ही हिस्सा रहे हैं। चाहे वह झारखंड अंदोलन हो या कच्छ का, उन्होंने कविता के नाम पर दरअसल वह पूरी दास्तान लिखी है जो इन आंदोलनों के नायकों और नेतृत्व से लेकर इनकी सफलता और असफलता तक जाती है। इसीलिए झारखंड, कच्छ और विस्थापन पर लिखी कविताएं कविता नहीं रह जातीं। ये उस संघर्षकामी इतिहास का एक जीवंत हिस्सा बन जाती हैं जिसे गद्य में लिखा जाए तो कई पन्ने रंगने पड़ेंगे। हालांकि, शिल्प के स्तर पर देखें तो ये सपाटबयानियां ही हैं जिसमें दरअसल खुद को इन आंदोलनों की मार्फत प्रक्षेपित करने की कोशिश की गई है। इनमें एक भाव है कि देखो, हमने कितनी लड़ाइयां लड़ी हैं। कर्पूरी ठाकुर से लेकर जार्ज फर्नांडीज जैसे नेताओं के क्रांतिकारी किस्सों से भरी ये कविताएं अपने आप में कोई उद्देश्य पूरा नहीं कर पातीं। सिर्फ एक सूचना भर, कि ऐसा भी हुआ था। इस किस्म की रचनाओं के साथ एक सबसे बड़ा खतरा यह होता है कि शुरुआत तो रचना से होती है, लेकिन अंततः पूरा लेखन एक ठोस संरचना में ढल जाता है जहां उड़ने की न्यूनतम गुंजाइश होती है। आपको जो बताया जा रहा है आप उसे सुन भर लेते हैं। इन्हें कविता तो कम से कम नहीं कहा जा सकता। इनमें कई हैं। दरअसल, यह उस जिद से उपजी हैं कि मुक्ति के जितने भी अध्याय हैं उन सब पर रचना खड़ी की जा सकती है। यह कविता के साथ तो अन्याय है ही, उन मुक्ति आंदोलनों के साथ और उससे जुड़ी जनता के साथ भी है जो अमूमन इस किस्म की रचनाओं में परिधि पर ही रहती है। यही अंतर भुगते हुए और लिखे हुए के बीच होता है जो रमणिका जी के यहां सिरे से नदारद है। वे इलियट के ढांचे में फिट नहीं बैठतीं। इसीलिए रमणिका गुप्ता को अच्छा रचनाकार, कम से कम कविता के मामले में नहीं कहा जा सकता। यह कहने का खतरा उठाना होगा, ताकि कविता अपने तमाम उपादानों के साथ बची रह सके।

किसी भी रचना के कविता होने की एक बुनियादी शर्त यह है कि उसमें जितना कहा गया है उससे ज्यादा अव्यक्त रह जाए, छूट गया हो। वह धीरे-धीरे अपने पाठक पर खुले, ठीक प्याज की परतों की भांति। एक मायने में ठीक भी है कि रमणिका गुप्ता अपनी कलम को कविता बनाने के लिए बाध्य नहीं करतीं, लेकिन दिक्कत यह है कि उनकी कलम से कविता फिर गाहे-बगाहे ही निकलती भी है। एक कविता का जिक्र जरूर किया जाना चाहिए जो वाकई उनकी तमाम रचनाओं में अपील करती है। ‘रीता की बेटियां’ एक अच्छी कविता इस मायने में कही जा सकती है कि इसमें आत्मानुभव का अतिक्रमण किया गया है। रीता की बेटियां ब्रूनो की बेटियां नहीं हैं- ऐसा कह कर एक वर्गांतर को दिखाया गया है जहां चीजें अपने आप खुलती जाती हैं। फिर और कुछ कहने की खास आवश्यकता नहीं रह जाती। यह सादृश्य निरूपण है, दो जीवन स्थितियों के बीच जहां कल्पनाओं की सीमा घर की छत तक ही है। उससे आगे जाने का विकल्प ही नहीं है। तमाम चिंताओं के साथ जी जाने की इतनी छोटी सी ख्वाहिश अपने आप में दर्दनाक है-‘…न सपनों में जीती हैं/न कल्पना में उड़ती हैं/वे चिंता जरूर करती हैं/बस/जीना चाहती हैं।’ ऐसी कविताएं शायद बहुत कम ही रमणिका जी ने लिखी हैं। वह वृत्तांतों में जाने से खुद को रोक नहीं पातीं। उनकी कविताएं उनके जीवन का वृत्तांत हैं।

1997 में रमणिका जी के प्रकाशित संग्रह ‘आदिम से आदमी तक’ की सारी कविताओं को पढ़ें तो यह बात साफ हो जाती है। ‘सोलहवीं शती के प्रेतों का षडयंत्र’, ‘गुलाम आदमीः रोम के गुलाम’, ‘आम आदमी का चेहरा इतिहास के वरक पर उभरा’, ‘बुद्ध की यात्रा’ आदि कविताएं वृत्तात्मक हैं और संग्रह के शीर्षक को चरितार्थ करती हैं। आदिम से आदमी होने तक के नृतत्ववादी सफर को कविताओं के माध्यम से रमणिका जी ने बड़े अनगढ़ तरीके से व्यक्त किया है। वह साम्राज्यवादी साजिशों की बात करती हैं, किसी प्रमथ्यू का आवाहन करती हैं, धर्म के पाखण्ड का खुलासा करती हैं तो अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस की निंदा करती हैं- ऐसा कुछ भी नहीं है जिसमें उनकी सक्रियता एक राजनैतिक कार्यकर्ता होने के नाते न रही हो और वह कागज पर न उतरा हो, लेकिन वही बात कि एक चीज जो हरेक रचना में अखरती है वह है उसकी सोद्देश्यता और शिल्प का अभाव। हम जब रचना की सोद्देश्यता की बात करते हैं तो इसका अर्थ उसके सामाजिक सरोकार से उतना नहीं होता है जितना रचना में उसका प्रतिबिंबित होना होता है- भाषा और शिल्प के माध्यम से। रमणिका जी एक कुशल पत्रकार की भांति तथ्यों को परोस कर रख तो देती हैं, लेकिन उनमें एक कारीगर की भांति संयोजन नहीं बिठा पातीं और इस कारण से जो भी कुछ कहने की मंशा है वह शब्दों के जंगलात में दब कर रह जाती है। दूसरे, वे अपनी कविताओं में बार-बार बदलाव और मुक्ति के संदर्भों को रेखांकित करती हैं, लेकिन दीगर बात यह कि मुक्ति के संदर्भ में ही उनकी कुछ कविताएं मसलन ‘पुतले’ भ्रम पैदा करती है। यह इसी दौर की कविता है और अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है। आप देखेंगे कि किस तरीके से आंदोलन को एकांगी बनाने का आभास जीवन के अंतिम क्षणों में खुद नेतृत्व को भी होता ही है-‘…आजादी बन जाती है ग्रंथि/हम एक खोल से दूसरे खोल में चले जाते हैं/फिर नारे लगाते हैं/हम आजाद होकर रह नहीं पाते/पूजते रहते हैं/पुतले।’ यह एक आत्मस्वीकार है और लेखक की ईमानदारी का सबसे ज्वलंत उदाहरण, जो अमूमन आंदोलनों से जुड़े लेखकों की किन्हीं विशिष्ट ग्रंथियों के कारण उनमें नदारद होता है।

इसी दौर की एक कविता है जो सफदर हाशमी पर लिखी गई है। ‘तुम्हारी शहादत रंग लाएगी’ भी अप्रकाशित ही है। पांच दशक लंबे राजनैतिक जीवन के बाद यह स्वीकार करना कि आजादी के सही मायने दरअसल खोल बदल देने से ज्यादा कुछ नहीं हैं और हर आजादी के बाद पुतलों की पूजा ही नियति है- इसी की अनिवार्य परिणति सफदर पर लिखी कविता में होती है कि, ‘…एक रोशनी बुझ गई/पर कितने ही मन कर गई रौशन/एक चिराग गुल हो गया/पर जल उठी हैं कितनी शमाएं…।’ यहां पूरे पांच दशक की कविता और कवियित्री की सोच में पैराडाइम शिफ्ट आता है। 1962 में प्रकाशित ‘गीत-अगीत’ में ‘जिंदगी’ नामक कविता में रमणिका जहां लिखती हैं-‘…जिंदगी/सिगरेट के अधजले टुकड़े-सी/बुझा-बुझा धुआं फेंकती…।’ यह नरेश मेहता का आत्मगत मनोविश्लेषणवादी मुहावरा है जो आज की तारीख में ‘कितनी शमाओं’ में तब्दील हो चुका है। अब लाखों-करोड़ों जिंदगियों की नियति को बदल डालने का उपादान समाज से ही आएगा न कि किसी नेतृत्व के सिगरेट के धुएं से। कहा जा सकता है कि पहले जहां रमणिका गुप्ता अपनी कविताओं में अपनी ही चेतना की ओर यू-टर्न लेती रहीं, अब वे चेतना को सार्वजनिक कर वहीं से प्रेरणाएं समेट रही हैं। यह खुद के चुक जाने के बाद का एक व्यापक आशावाद है जो ‘गीत-अगीत कौन सुंदर है’ जैसे सवाल नहीं उठाता; वह जानता है कि इस सवाल के जवाब में सिर्फ खोल ही मिले हैं और नचिकेता खुद पुतले में तब्दील हो गया है। वह सीधे जन-कविता की बात करता है, बगैर किसी लाग लपेट के, पहले से ज्यादा मानवीय, संवेदनशील और सुंदर मुहावरों में।

रमणिका जी ने हिंदी के अलावा मैथिली में भी कविताएं लिखी हैं। कविताओं को पढ़ने पर ऐसा लगता है कि जैसे उनका सौंदर्यबोध और बिंब वास्तव में मैथिली भाषा में ही निवास करते हैं। हिंदी की तुलना में रमणिका जी की मैथिली कविताएं ज्यादा सुंदर और अपीलिंग हैं। हालांकि, खुरदरापन और अनगढ़ता इनमें भी जस की तस है, लेकिन प्रतिमान खांटी देशज हैं जो लोगों से जाकर जुड़ते हैं। ‘रांची के बाहर करिया पहाड़’ को ‘ऊज्जर-ऊज्जर बदरी संग बतियौते’ देखना हिंदी में संभव नहीं हो सका है। शायद यह हिंदी की अपनी सीमाएं हों और मैथिली का विस्तार; या और कुछ भी कह लें, पर रमणिका जी हिंदी से बेहतर मैथिली की कवियित्री हो सकती थीं। बाबा नागार्जुन ने भी तो हिंदी और मैथिली दोनों में ही कटहल के फूल खिलाए हैं फिर रमणिका जी से उम्मीद करना ज्यादती नहीं कि वे नागार्जुन की परंपरा को आगे बढ़ाएंगी। यहां इस पर बात करना विस्तार से संभव तो नहीं है कि आखिर क्यों रमणिका गुप्ता की मैथिली में लिखी कविताओं को उतनी स्पेस नहीं मिल सकी, लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि यदि वे हिंदी को छोड़ मैथिली पर ही ध्यान केंद्रित करतीं तो शायद एकाध अच्छी कविताएं उनकी कलम से निकल सकती थीं। दूसरे, उनके जैसा बड़ा नाम जुड़े होने का फायदा इस लुप्त होती भाषा को भी मिल पाता।

कुल मिला कर रमणिका गुप्ता के काव्य-कर्म को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है। एक वह जो उनके राजनैतिक जीवन से उपजा है और दूसरा जो उनके राजनैतिक संपर्कों से निकला है या उन्हें समर्पित है। राजनैतिक संपर्कों का अर्थ मोटे तौर पर उनके अंतरंग संबंधों और हादसों से ही लगाया जाना चाहिए। प्रेम कविताओं के मामले में भी रमणिका जी कोई बहुत प्रभावशाली लेखन के संकेत नहीं छोड़ती हैं चूंकि अधिकतर में रूहानी स्तर की पहुंच नहीं है। देह से आखिर कितनी दूर तक जाया जा सकता है? यह एक ऐसा प्रतिमान है जो अंततः शुष्क हो जाता है कई बार पेरे हुए ईंख की भांति। यही बात आंदोलनों से जुड़ी राजनैतिक कविताओं में भी है। वह इससे अलग लेखन को कलावादी मानती हैं और ‘कला कला के लिए’ के फासीवादी तमगे से वे अपने पूरे लेखकीय जीवन के दौरान बचने की कोशिश में रहीं। इस रूढ़ हो चुके नारे की छाप ने उनकी कविताओं को, शुरुआती दौर की छोड़ दें तो, शुष्क बना डाला है, चाहे वह कितना भी प्रकट यथार्थ हो। यह एक संकेत है समकालीन कवियों के लिए, एक संदेश भी कि स्वाभाविक रूप से आ रही कला को वर्जित करने के अपने खतरे होते हैं और बड़े होते हैं। भौतिकवाद को उसके शाब्दिक अर्थ में क्रियान्वित करना बहुत मुश्किल है और रमणिका गुप्ता ने आजीवन इसे, कम से कम अपनी रचनाओं में घोल दिया। वह सही अर्थों में एक कम्युनिस्ट कवियित्री बन कर रह गईं। उन्हीं के शब्दों में-‘…चरैवेति-चरैवेति का मंत्र/दोहराते-दोहराते/एक दिन वह/बन गया आदम/वह बन गया आदम!’

यह लेख रमणिका जी के आग्रह पर कुछ साल पहले एक संकलन के लिए लिखा गया था।


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