योगी से पहले मुख्यमंत्री टी.एन.सिंह को भी धूल चटा चुका है गोरखपुर !

मीडिया विजिल मीडिया विजिल
दस्तावेज़ Published On :


गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव में मिली हार से सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रतिष्ठा धूमिल हुई है। दशकों से यह सीट उनके या गोरखपीठ के असर का प्रतीक बनी हुई थी जिसे महंत के मुख्यमंत्री बीजेपी हार गई। लेकिन यह पहली बार नहीं है कि गोरखपुर ने ऐसा आश्चर्य रचा। इससे पहले एक और मुख्यमंत्री को भी गोरखपुर उपचुनाव में हार का झटका मिला है। तब सूबे का मुख्यमंत्री ख़ुद चुनाव हारा था।

वे मुख्यमंत्री थे टी.एन.सिंह या त्रिभुवन नारायण सिह। वे 18 अक्टूबर 1970 से 4 अप्रैल 1971 तक यूपी के मुख्यमंत्री रहे। कांग्रेस (ओ) के नेता थे और संयुक्त विधायक दल के नेता के रूप में यूपी के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे थे। संगठन कांग्रेस के अलावा जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी और भारतीय क्रांति दल के इस संयुक्त विधायक दल को विधानसभा में बहुमत हासिल हो गया था।

टी.एन.सिंह पहले राजनेता थे जो बिना किसी सदन का सदस्य हुए मुख्यमंत्री चुने गए थे। उनकी नियुक्ति का मसला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा था। संविधान पीठ ने संविधान सभा की बहसों और दुनिया भर में लोकतंत्र की परंपराओं और क़ानूनों के हवाले से आख़िरकार उनकी नियुक्ति को उचित माना। साथ ही, छह महीने में वे सदन का सदस्य होने की बात तय हुई। ले 1971 में वे गोरखपुर के मानीराम विधानसभा उपचुनाव में प्रत्याशी बने। जीत आसान मानी जा रही थी क्योंकि उन्हें गोरखपीठ का ज़बरदस्त समर्थन हासिल था।

उधर, कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में रामकृष्ण द्विवेदी मैदान में थे। उनके समर्थन में कांग्रेस संगठन के दिग्गजों से निपटने में जुटीं, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जनसभा करने पहुँचीं। इंदिरा की सभा में विघ्न डालने की कोशिश की गई। मैदान में ऐसे अशोभनीय प्रदर्शन किए गए गए, जिसके बारे में लिखना भी मुश्किल है। बहरहाल, इंदिरा उस समय किसी तूफ़ान की तरह थीं। उन्होंने प्रदर्शनकारियों को कोई तवज्जो नहीं दी और रामकृष्ण द्विवेदी 16 हजार से अधिक मतों से जीते।

उस हार ने भी गोरखपुर मंदिर के प्रभाव को तोड़ा था। दरअसल, मंदिर के महंत अपने चुनाव को सीधे बाबा गोरखनाथ का चुनाव बताते हैं और धर्मभीरु जनता के लिए मंदिर के विरुद्ध जाना धर्मद्रोह जैसा ही बना दिया जाता है। जब जनता ने इस बोझ को उतार फेंका है, वह इतिहास का कोई मोड़ साबित हुआ है। क्य इस बार सपा-बसपा गठबंधन की जीत से ऐसे संकेत नहीं मिल रहे हैं…?

बर्बरीक

 



 

 


मीडिया विजिल जनता के दम पर चलने वाली वेबसाइट है। आज़ाद पत्रकारिता दमदार हो सके, इसलिए दिल खोलकर मदद कीजिए। अपनी पसंद की राशि पर क्लिक करके मीडिया विजिल ट्रस्ट के अकाउंट में सीधे आर्थिक मदद भेजें।

मीडिया विजिल से जुड़ने के लिए शुक्रिया। जनता के सहयोग से जनता का मीडिया बनाने के अभियान में कृपया हमारी आर्थिक मदद करें।