नेताओं का ढिंढोरची बन गए हैं अख़बार-डॉ.अंबेडकर

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पिछले कुछ सालों से भारत में मीडिया की निष्पक्षता और कॉर्पोरेटपरस्ती को लेकर बहस अब तेज़ हो चुकी है। उत्तर प्रदेश में बीजेपी के प्रचण्ड बहुमत मिलने और योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद मीडिया द्वारा ‘नायक पूजा’ की जो होड़ प्रारम्भ उससे आम लोग भी सशंकित हैं।पहले मोदी फिर योगी को जिस तरह से ब्रांडिंग की गई और मीडिया ने जिस तरह सरकार के ढिंढोरची की भूमिका निभाई है उसपर सवाल उठने लगे हैं। सरकार और सत्ताधारी पार्टी द्वारा किसी व्यपारिक घराने के जरिये मीडिया की स्वतंत्रता का अपहरण कर लिया जाना हमारे दौर की त्रासदियों में से एक है।लंबे अरसे के बाद संसद में विपक्ष के नेताओं ने प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर चिंता जाहिर की है।
इन आशंकाओं,दुश्चिंताओं के बीच यह सवाल उठना लाजिमी है कि जिसे हम स्वतन्त्र और निष्पक्ष मीडिया कहते हैं क्या उसका अस्तित्व वास्तव में कभी रहा है ? क्या सचमुच पत्रकारिता अपने मौलिक रूप में कभी निष्पक्ष रही है? क्या व्यपारिक घरानों के प्रभाव और पूँजी के नियंत्रण से परे रहकर भारत में कोई जनपक्षधर पत्रकारिता कभी हुई है?
जब हम डॉ आंबेडकर को पढ़ते हैं तो यह पाते हैं कि आदर्शवादी पत्रकारिता जैसी कोई चीज भारत ने कभी नही रही।औपनिवेशिक भारत और आज के आज़ाद भारत की पत्रकारिता के बुनियादी चरित्र नही बदला है। हमेशा ही पूँजी के नियंत्रण में रहते हुए पत्रकारिता ने नायक पूजा को बढ़ावा दिया है इसके जरिये हमेशा से मूल मुद्दों पर से ध्यान हटाया गया है।
भारत की पत्रकारिता के बारे में डॉ अम्बेडकर के विचारों को जानने के लिए उनका लेख ‘रानाडे, गांधी और जिन्ना’ पढ़ना चाहिए। इसमें उन्होंने रानाडे की तुलना गांधी और जिन्ना से करते हुए इन दोनो नेताओं के अहम और अहंकार की बात की है और यह दिखाने का प्रयास किया है कि किस तरह इन दोनों ने भारतीय राजनीति को ‘व्यक्तिगत मल्लयुद्ध का अखाड़ा’ बना दिया है। दोनो खुद को हमेशा सही और अचूक मानते हैं।उनके अहम की चर्चा करते हुए आंबेडकर ने जो कहा है वह बहुत ही रोचक और प्रासंगिक है-” धर्मपरायण नौंवे पोप के पवित्र शासन काल में जब अचूकत्व का अहम् उफन रहा था तब उन्होंने कहा था-“पोप बनने से पूर्व मैं पोपीय अचूकत्व में विश्वास रखता था ,अब मैं उसे अनुभव करता हूँ।ठीक यही रवैया इन दोनों नेताओं का है।”
आंबेडकर लिखते हैं उन दोनों नेताओं की इस चेतना को पत्रकारिता के ज़रिये गढ़ा गया है। समाचार पत्रों ने इसे हवा दी है। उनका मानना था कि पत्रकारिता ने ‘नायक पूजा’ को बढ़ावा दिया है। तब की स्तिथियाँ हू-ब-हू आज की स्थितियों से मिलती हैं, जहाँ मीडिया के जरिये निशंक नायकत्व का मायाजाल बुना जा रहा है।यहां अम्बेडकर के विचार देखें- “समाचार पत्रों की वाह वाही का कवच धारण करके इन दोनों महानुभावो की प्रभुत्व जमाने की भावना ने तो सभी मर्यादाओं को तोड़ डाला है। अपने प्रभुत्व से उन्होंने न केवल अनुयायियों को,बल्कि भारतीय राजनीति को भी भ्रष्ट किया है। अपने प्रभुत्व से उन्होंने अपने आधे अनुयायियों को मूर्ख तथा शेष आधे अनुयायियों को को पाखंडी बना दिया है।अपनी सर्वउच्चता के दुर्ग को सुदृढ़ करने के लिए उन्होंने ‘बड़े व्यापारिक घरानों’ तथा धन-कुबेरों की सहायता ली है। हमारे देश में पहली बार पैसा संगठित शक्ति के रूप में मैदान में उतरा है। जो प्रश्न प्रेजिडेंट रूजवेल्ट ने अमरीकी जनता के सामने रखे थे, वे यहां भी उठेंगे,यदि वे पहले नही उठे हैं: शासन कौन करेगा,पैसा या मानव ?कौन नेतृत्व करेगा- पैसा या प्रतिभा ? सार्वजनिक पदों पर कौन आसीन होगा- शिक्षित,स्वतन्त्र,देशभक्त अथवा पूंजीवादी गुटों के सामंती दास!”
पत्रकारिता की चेतना उस समाज की राजनैतिक चेतना से अलग नही होती। पत्रकारिता का रवैया ही लोकतंत्र की रवैये को निर्धारित करता है। इस संदर्भ से डॉ अम्बेडकर की तल्खी को समझा जा सकता है।कम से कम आज के समय में हम पत्रकारिता के चारणयुग में रहते हुए इसे समझ ही सकते हैं। गांधी और जिन्ना का जो मूल्यांकन अम्बेडकर ने किया उसपर सहमत असहमत हुआ जा सकता है लेकिन भारतीय राजनीति में नायक पूजा की प्रवृत्ति को शुरू करने और आगे बढ़ाने में पत्रकारिता ने जो भूमिका निभाई है इस पर आंबेडकर के विचारों को पढ़ते हुए लगता है जैसे वो आज की बात कर रहे हों। डॉ आंबेडकर लिखते हैं-” कभी भारत में पत्रकारिता एक व्यवसाय था,अब वह व्यापार बन गया है। वह तो साबुन बनाने जैसा है, उससे अधिक कुछ नही। उसमे कोई नैतिक दायित्व नही है। वह स्वयं को जनता का जिम्मेदार सलाहकार नही मानता। भारत की पत्रकारिता इस बात को अपना सर्वप्रथम तथा सर्वोपरि कर्तव्य नही मानती की वह तटस्थ भाव से निष्पक्ष समाचार दे,वह सार्वजनिक नीति के उस पक्ष को प्रस्तुत करे जिसे वह समाज के लिए हितकारी समझे। चाहे कोई कितने भी उच्च पद पर हो, उसकी परवाह किये बिना, बिना किसी भी के उन सभी को सीधा करे और लताड़े जिन्होंने गलत अथवा उजाड़ पथ का अनुसरण किया है। उसका तो प्रमुख कर्तव्य यह हो गया है कि नायकत्व को स्वीकार करे और उसकी पूजा करे। उसकी छत्र छाया में समाचार पत्रों का स्थान सनसनी ने, विवेक सम्मत मत का विवेकहीन भावावेश ने ,उत्तरदायी लोगों के मानस के लिए अपील ने,दायित्वहीनो की भावनाओ के लिए अपील ने ले लिया है। लार्ड सेलिसबरी ने नार्थक्लिफ़ पत्रकारिता के बारे में कहा है कि वह तो कार्यालय कर्मचारियों के लिए कार्यालय कर्मचारियों का लेखन है। भारतीय पत्रकारिता उससे भी दी कदम आगे है।वह तो ऐसा लेखन है ,जैसे ढिंढोरचियों ने अपने नायकों का ढिंढोरा पीटा हो। नायक पूजा के प्रचार-प्रसार के लिए कभी भी इतनी नासमझी से देशहित की बलि नही चढ़ाई गई है।नायकों के प्रति ऐसी अंधभक्ति तो कभी देखने में नही आयी,जैसी आज चल रही है। मुझे प्रसन्नता है कि आदर योग्य कुछ अपवाद भी हैं।लेकिन वे ऊँट के मुँह में जीरे के समान हैं और उनकी बातों को सदा ही अनसुना कर दिया जाता है।”
डॉ अम्बेडकर के इस विश्लेषण में हम आज के मीडिया की तस्वीर देख सकते हैं और आश्वस्त हो सकते हैं कि यह परिघटना नयी नही है।और हमेशा ही इस परिदृश्य में कुछ अलग और नया करने की संभावना बनी रहती है।डॉ आंबेडकर ने भी अपवादों की बात कही है और हम यह जानते हैं कि ढिंढोरची पत्रकारों के बीच से हमेशा ही कुछ स्वन्त्रचेता पत्रकार भी सामने आते रहे हैं जिन्होंने नाउम्मीद नही होने दिया है। मीडिया की स्वन्त्रता और निष्पक्षता की लड़ाई वास्तविक लोकतंत्र को प्राप्त करने की लड़ाई है। जो जनवाद की लड़ाई के साथ ही लड़ी जा सकती है।इसके लिए अम्बेडकर के विचारों की आज बहुत जरुरत है।

(लेखक ललितपुर के एक कॉलेज में शिक्षक हैं )

 

 


 


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