अख़बारनामा: एक साथ इतनी ख़बरें ताकि आप मूल मुद्दे से भटक जायें !

संजय कुमार सिंह संजय कुमार सिंह
ओप-एड Published On :


550 पर लॉक डाउन, संक्रमितों की संख्या 40,000 होने को हुई तो ट्रेन चली-ठीक है?

 

अखबारों में शनिवार को दो खबरें महत्वपूर्ण थीं. लॉक डाउन के कारण फंसे मजदूरों, छात्रों, पर्यटकों, तीर्थयात्रियों के लिए विशेष ट्रेन चली और लॉक डाउन 17 मई तक बढ़ा. इसके साथ खबर यह भी है कि अब बंदिशें कम होंगी और ऐसा इसलिए भी है कि आप यह समझें कि बंदिशें कम हुईं, इसीलिए ट्रेन चली और आपको विशेष ट्रेन चलना सामान्य लगे इसीलिए लॉक डाउन बढ़ाए जाने की खबर आज ही है. सारी खबरें एक साथ होने से लग रहा है कि सरकार काम कर रही है.

इंडियन एक्सप्रेस में खबर है कि हैदराबाद से कोई 40 किलोमीटर मजदूरों की एक अस्थायी कॉलोनी में रात 11 बजे बताया गया हटिया (रांची) के लिए ट्रेन जाने वाली है. दो बसे रात में वे बसों से हैदराबाद के लिए रवाना हुए और कोई तीन घंटे बाद करीब 1200 लोगों को लेकर ट्रेन चली. क्या यह काम ऐसे करने लायक है? पर सरकार ऐसे ही कर रही है. आज ही कोरोना योद्धाओं का आभार जताने के लिए फ्लाई पास्ट की खबर है. कोरोना को लेकर एक साथ सरकार ने इतने सारे काम कर दिए कि आप, हम या अखबार किसकी चर्चा करें. कायदे से मुद्दा यह है कि देश भर में लाखों लोगों को 40 दिन से ज्यादा तकलीफ में रखकर फायदा क्या हुआ? पर ट्रेन इस अंदाज में और ऐसे मौके पर चलाने की घोषणा की गई कि मुख्य मुद्दा छूट गया.

सब लोग खुश हैं कि चलो घर तो पहुंचे. कायदे से यह काम लॉक डाउन शुरू होने के बाद ही किया जा सकता है. इसमें इतनी देर करने का कोई मतलब नहीं था और देर करने से स्थिति सुधरने की बजाय पहले के मुकाबले बिगड़ी ही है. यह अलग बात है कि बीच में खास लोगों के लिए खास व्यवस्था होती रही. अब जब लॉक डाउन से कोई फायदा नहीं हुआ. संक्रमित 550 से बढ़कर जब आप इसे पढ़ेंगे तो 40,000 के करीब होने वाले होंगे. ऐसे में ट्रेन चलाना निश्चित रूप से उन नियमों का उल्लंघन है जिनका पालन लॉक डाउन के दौरान किया जाना था. अचानक लॉकडाउन की घोषणा से पहले कुछ नहीं सोचा गया, इसे आप भूल भी जाएं तो 40 दिन से ज्यादा का कष्ट कैसे भूलेंगे. पर सरकार को उसकी परवाह नहीं है ना उसके पास कोई सफाई है. वह आपसे इस ‘योगदान’ की अपेक्षा करती है.

दूसरा लॉकडाउन खत्म होने से पहले तीसरे लॉकडाउन की घोषणा के साथ बहुत सारी घोषणाएं इसीलिए भी की गई लगती हैं कि पिछली बार की तरह बांद्रा और सूरत न हो जाए. निश्चित रूप से यह सब सरकार और इसके प्रचारकों की कामयाबी है. पर असल में यह नालायकी को छिपाने या ढंकने की कामयाबी है उसकी योग्यता नहीं है. यह काम संचार से जुड़ा कोई भी कर देता पर सरकार या राजनेताओं को जो करना चाहिए था उसमें वे बुरी तरह नाकाम रहे.

शुक्रवार, एक मई को नवोदय टाइम्स में लीड थी, 11 दिन में हो रहे केस दोगुने. मुझे याद आया कि राजस्थान पत्रिका ने 23 अप्रैल को खबर छापी थी कि देश में कोरोना संक्रमितों की संख्या 10 हजार से 20 हजार होने में सिर्फ आठ दिन लगे. अखबार के अनुसार इससे पहले 10,000 संक्रमित होने में 75 दिन लगे थे. पूरे देश के लिहाज से यह एक महत्वपूर्ण जानकारी है और मैंने उस दिन लिखा था कि अखबारों ने यह जानकारी प्रमुखता से नहीं दी. 22 अप्रैल की संख्या 23 अप्रैल को छपने के बाद एक मई को फिर आठ दिन हो चुके थे और यह बताया जाना चाहिए था कि आठ दिन में दूने होने का क्या हुआ. कुल मरीजों की संख्या इतवार को 40,000 हो जाने का अनुमान है. इस हिसाब से कहा जा सकता है कि पिछली बार आठ दिन में मरीजों की संख्या दूनी हो गई थी. इस बार स्थिति उससे अच्छी है. 10-11 दिन में दूनी हुई. पर वह खबर शुक्रवार को किसी अखबार की लीड नहीं थी, जबकि स्थिति सुधरी थी- ऐसा दावा किया जा सकता है. ऐसे में, नवोदय टाइम्स की लीड ने आकर्षित किया. पढ़ने पर पता चला कि इसमें आठ दिन में दोगुना होने का कोई जिक्र नहीं था और यह लॉक डाउन से पहले की बात कर रहा था और स्वास्थ्य मंत्रालय के सचिव लव अग्रवाल की प्रेस कांफ्रेंस पर आधारित था.

गुरुवार, 30 अप्रैल 2020 के अखबारों से यह तय था कि तीन मई को दूसरे लॉक डाउन की मियाद खत्म होने के बाद आम आदमी को कुछ छूट मिलेगी. द हिन्दू का शीर्षक था, गृह मंत्रालय ने फंसे हुए लोगों को एक राज्य से दूसरे राज्य में जाने से संबंधित दिशा निर्देश जारी कर दिए हैं. यह अजीब स्थिति थी. गौर करने वाली बात है कि जब पूर्ण लॉक डाउन की घोषणा की गई थी तो देश भर में 552 या साढ़े पांच सौ के आस-पास संक्रमित लोग थे. उस समय तर्क यही दिया गया था कि लॉक डाउन नहीं किया गया तो यह बीमारी और फैलेगी. लॉकडाउन लगभग सफल रहा पर संक्रमितों की संख्या उस दिन 31,000 पार कर चुकी थी.

दैनिक भास्कर में प्रकाशित कोरोना से संबंधित आकड़े इस प्रकार रहे- 24 घंटे में सबसे ज्यादा, 2585 मरीज एक दिन में मिले. मरने वाले 1074 हो गए और एक दिन में मरने वालों की संख्या पहली बार 107 रही. 10 दिन से हर दो दिन में 100 मौतें हो रही थीं, उससे पहले 3-4 दिन में 100 मौतें हो रही थीं और बुधवार, 29 अप्रैल को 107 मौतें हो गईं. किसी भी अखबार ने पहले पन्ने पर नहीं बताया है कि संक्रमितों की संख्या इतना बढ़ने और जांच की व्यवस्था पर्याप्त नहीं होने के बावजूद लोगों को घर जाने देने का क्या मतलब लगाया जाए. ज्यादातर अखबार इसपर शांत थे.

बुधवार को दो बड़ी खबरें थीं. पहली तो यह कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा कि कोविड 19 के इलाज के लिए प्लाज्मा थेरापी मान्य उपचार नहीं है और दूसरा यह कि अस्पताल मरीजों को कोविड टेस्ट कराने के लिए बाध्य नहीं कर सकते हैं और सभी जगह अहम सेवाएं जारी रहनी चाहिए. इसके अलावा संक्रमितों की संख्या 31,000 हो गई तथा मरने वाले 1000 हो गए यह तो है ही. पर कई एक अखबार लॉक डाउन में ढील देने या उसकी सफलता साबित करने का माहौल बनाने में लगे रहे. इस लिहाज से इंडियन एक्सप्रेस की लीड खबर दिलचस्प रही, “लॉकडाउन का अंतिम सप्ताह, आगे की चुनौती: हॉट स्पॉट जिले अब कम हैं पर जोन बदल रहे हैं”. इसके साथ एक सरकारी खबर भी है, 21632 सक्रिय मामलों में सिर्फ 80 को वेंटीलेटर की आवश्यकता होती है. कांग्रेस ने कर्ज बट्टेखाते में डालने पर जो आरोप लगाए सवाल पूछे वह अपनी जगह हैं.

इन खबरों के बीच हिन्दी अखबारों की लीड के शीर्षक जान लेना दिलचस्प है. 1. दैनिक भास्कर – चीन से हर्जाना वसूलेंगे ट्रंप 2. नवोदय टाइम्स – यूपी में साधुओं की हत्या से तनाव 3. राजस्थान पत्रिका – प्लाज्मा थैरेपी गैरकानूनी, मरीज को नुकसान मुमकिन : स्वास्थ्य मंत्रालय 4. नवभारत टाइम्स – केंद्र ने कहा, अभी सिर्फ ट्रायल है प्लाज्मा थेरापी 5. चिन्ताजनक : दिल्ली में सौ हॉट स्पॉट बने 6. उमर उजाला – प्लाज्मा थेरैपी इलाज नहीं, सिर्फ शोध 7. दैनिक जागरण – प्लाज्मा थेरैपी अभी प्रयोग के चरण में केंद्र सरकार ने इलाज पर लगाया ब्रेक. अंग्रेजी अखबार, द हिन्दू ने इसे टॉप पर लगाया है, शीर्षक है, प्लाज्मा थेरापी पर मंत्रालय का यू टर्न.

मंगलवार, 28 अप्रैल की सबसे बड़ी खबर थी कोरोना की जांच के लिए चीन से किट खरीदने में गड़बड़ी. सबसे कम कीमत के परंपरागत तरीके से इस गंभीर मामले में हुई खरीदारी में कमीशन और घोटाले की पूरी आशंका तो है ही लॉकडाउन की यह महत्वपूर्ण अवधि भी इस लिहाज से लगभग बेकार चली गई. आईसीएमआर ने इसे खरीदा और उसी ने कह दिया कि यह फील्ड टेस्ट में नाकाम है. फिर भी यह खबर इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर ऐसे शीर्षक से नहीं थी. हिन्दुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया में किट का उपयोग नहीं करने की खबर है. शीर्षक में देरी और घपले की कोई बात नहीं. कांग्रेस ने कोविड से संबंधित सभी खरीदारी को सार्वजनिक करने की मांग की है तो भी नहीं और यह मांग भी नहीं.

हिन्दी अखबारों में यह खबर नहीं के बराबर थी या अंग्रेजी वाले दूसरे शीर्षक से थी. अकेले अमर उजाला ने इसे पहले पन्ने पर छापा और शीर्षक था, चीनी किट घटिया ही नहीं, दाम भी दोगुने… अब ऑर्डर रद्द. इस खबर को कायदे से द टेलीग्राफ ने ही छापा जो पहले पन्ने पर लीड थी. इस खबर से पता चलता है कि भ्रष्टाचार खत्म करने और ईमानदारी के सरकारी दावे तो धरे ही रह गए हैं सरकार की दूरदर्शिता और प्रशासनिक क्षमता भी शून्य के आस-पास ही कहीं होगी.

सोमवार, 27 अप्रैल को को टाइम्स ऑफ इंडिया (मुंबई) में खबर थी कि महीने भर के लॉकडाउन के बाद महाराष्ट्र के छह और जिले कोरोना प्रभावित हो गए हैं. इंडियन एक्सप्रेस में खबर थी कि पीपीई पहना एक व्यक्ति आगरा के क्वारंटाइन सेंटर में लोगों को खाना और पीने का पानी फेंक कर दे रहा था. द हिन्दू की लीड का शीर्षक था, देश भर में (कोरोना के) मामले 27,000 के निशान के करीब पहुंचे, 24 घंटे में 1975 मामले बढ़े. यह संख्या अपने आप में खास है पर किसी और अखबार में पहले पन्ने पर खबर नहीं दिखी. पूरा देश जब यह जानने के लिए परेशान है कि कोरोना से लड़ने की सरकार की रणनीति क्या है, 3 मई के बाद क्या होगा,कारखाने कब, कैसे खुलेंगे तो इतवार को मन की बात में भी इसपर कुछ नहीं बताया गया. हिन्दुस्तान टाइम्स में केंद्रीय स्वास्थ्यमंत्री हर्षवर्धन के हवाले से यह जरूर कहा गया है कि सरकार की नीति टेस्ट करने, आइसोलेट करने और उपचार करने की जारी रहेगी.

द टेलीग्राफ ने मन की बात में नरेन्द्र मोदी की अपील का हवाला देते हुए शीर्षक लगाया था, खाड़ी के नाराज देशों को प्रधानमंत्री का ईद का संदेश और इसके साथ इतनी ही बड़ी, पटना की एक खबर छापी जिसका शीर्षक था, “…. पर संघ के लड़के तो संघ के ही रहेंगे”.

हिन्दी अखबारों में कुछ खास नहीं था. अमर उजाला में पहले पन्ने पर एक खबर थी, “भारतीय मरीजों में 17 से ज्यादा देशों के वायरस. चीन से निकला वायरस हर देश में ले चुका है अपना अलग रूप”. अखबार ने यह नहीं लिखा था कि ये सब भारत में हैं. समय पर जांच शुरू कर दिए जाने का दावा करने के बावजूद. दैनिक जागरण में मन की बात टॉप बॉक्स है, महीने भर में कोरोना से मुक्त हो जाएगी दुनिया: मोदी.


लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।


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