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काँग्रेस: तपे कार्यकर्ताओं पर ‘मृतकाश्रित कोटे’ को तरजीह देने का नुकसान

कांग्रेस एक पार्टी नहीं आयडिया का नाम है जिसके तहत भारत को एक समावेशी, धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र बनाने की जद्दोजह हुई। इस विचार को आज़ादी के पहले से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ चुनौती देता रहा है। पहले जनसंघ और फिर बीजेपी बनाकर उसने इसी राह को उलटने की कोशिश की। यह बात पुराने कांग्रेसी अच्छी तरह समझते रहे हैं, इसलिए पार्टी में तमाम उठापटक के बावजूद आरएसएस से परहेज़ करते रहे हैं। यहाँ तक कि शरद पवार और ममता बनर्जी जैसों ने अलग पार्टी तो बनायी लेकिन वैचारिक रूप से कांग्रेस के सिद्धांतों का झंडा ही बुलंद करते रहे। लेकिन रियासतों की समाप्ति के बावजूद 'श्रीमंत' कहलाने को आतुर रहने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया या बिना ट्रेनिंग के 'पायलट' बने सचिन के लिए इन बातों का मतलब नहीं रहा। जब तक सत्ता रही वे कांग्रेस की भाषा बोलते रहे, लेकिन पार्टी के कमज़ोर होते ही उनकी महात्वाकांक्षाओं के पर निकल आये। उन्होंने कांग्रेस की सरकारें ही नहीं तोड़ीं या तोड़ने की कोशिश की, समावेशी भारत के विचार को मिटाने वालों की कुल्हाड़ी में धार दे दी।

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बीजेपी के दिग्गज राजनाथ सिंह के सामने हैदरगढ़ से कांग्रेस प्रत्याशी बतौर विधानसभा चुनाव लड़ चुके विश्वनाथ चतुर्वेदी उर्फ ‘मोहन’ ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट जैसे नेताओं को ‘मृतकाश्रित’ कोटे का कांग्रेसी मानते हैं जिनके लिए पार्टी और विचारधारा या संघर्ष का कोई मतलब नहीं रहा। इसलिए ऐसे कठिन वक्त में उस बीजेपी से हाथ मिलाने में भी उन्होंने कोताही नहीं की जिसने देश को ‘कांग्रेस-मुक्त’ बनाने का लक्ष्य घोषित कर रखा है।

हो सकता है कि ‘मृतकाश्रित’ जैसा शब्द संवेदना की कसौटी पर खरा नहीं उतरे, लेकिन इस बात में दम तो है। ज्योतिरादित्य सिंधिया तो राहुल गाँधी के सहपाठी रहे। माधवराव सिंधिया की मृत्यु के बाद उन्हें गाँधी परिवार से अतिशय स्नेह मिला। उनकी बग़ावत के बाद राहुल गाँधी ने कहा भी था कि वे ऐसे नेता थे जिन्हें उनसे मिलने के लिए टाइम नहीं लेना पड़ता था। वे कभी भी उनके आवास पर आ सकते थे। ज्योतिरादित्य सिंधिया को कांग्रेस ने 31 की उम्र में सांसद और 41 की उम्र में केंद्र में मंत्री बनाया। उन्हें कांग्रेस संगठन में भी महत्वपूर्ण पदों पर रखा गया। लेकिन ‘महाराज’ को मध्यप्रदेश चाहिए था जो आलाकमान ने कमलनाथ के सिपुर्द किया।

1977 में जन्मे सचिन पायलट को 26 साल की उम्र में सांसद (चुनाव लड़ने लायक होते ही) और 34 साल की उम्र में केंद्रीय मंत्री बनाया गया। 37 साल की उम्र में पार्टी की राजस्थान इकाई का अध्यक्ष बनाया गया। राजस्थान में 2018 में सरकार बनी तो डिप्टी सीएम बनाया गया। ज़ाहिर है, उन्हें महत्व न देने की बात हास्यास्पद है। लेकिन जल्द सीएम बनने की उनकी महात्वाकांक्षा ने पायलट के प्लेन को दुर्घटनाग्रस्त कर दिया।

कांग्रेस की इस बात के लिए निश्चित ही आलोचना होनी चाहिए कि उसने इन्हें बिना किसी संघर्ष के वह सब दिया जो आम कांग्रेस कार्यकर्ता लंबे संघर्ष के बाद भी नहीं पाता। सामान्य अर्थों में इसकी ज़रूरत भी नहीं थी। यह नहीं भूलना चाहिए कि सचिन के पिता राजेश पायलट ने सोनिया गाँधी का ज़बरदस्त विरोध किया था। उन्होंने सीताराम केसरी के ख़िलाफ़ कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा था तब सोनिया गाँधी राजनीति में नहीं थीं। लेकिन जब सोनिया गाँधी ने राजनीति में प्रवेश किया और कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा तो राजेश पायलट ने कुंवर जितेंद्र प्रसाद (जिनके बेटे जितिन प्रसाद को भी सांसद और मंत्री बना चुकी है कांग्रेस) के पक्ष में खुलकर प्रचार किया। इसके बावजूद, जब राजेश पायलट नहीं रहे तो उनकी पत्नी रमा पायलट और बेटे सचिन पायलट को गाँधी परिवार को पूरा सहयोग और समर्थन मिला। वर्ष 2000 में राजेश पायलट की सीट पर हुए उपचुनाव में रमा पायलट को पार्टी ने टिकट दिया और वे लोकसभा पहुँचीं।

पर यह व्यक्तिगत रिश्ते या स्नेह उस राजनीतिक परिपक्वता का विकल्प तो नहीं हो सकता जो संघर्ष के लंबे रास्ते पर चलते हुए हासिल होती है। कांग्रेस एक पार्टी नहीं ‘आयडिया’ का नाम है जिसके तहत भारत को एक समावेशी, धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र बनाने की जद्दोजह हुई। इस विचार को आज़ादी के पहले से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ चुनौती देता रहा है। पहले जनसंघ और फिर बीजेपी बनाकर उसने इसी राह को उलटने की कोशिश की। यह बात पुराने कांग्रेसी अच्छी तरह समझते रहे हैं, इसलिए पार्टी में तमाम उठापटक के बावजूद आरएसएस से परहेज़ करते रहे हैं। यहाँ तक कि शरद पवार और ममता बनर्जी जैसों ने अलग पार्टी तो बनायी लेकिन वैचारिक रूप से कांग्रेस के सिद्धांतों का झंडा ही बुलंद करते रहे।

लेकिन रियासतों की समाप्ति के बावजूद ‘श्रीमंत’ कहलाने को आतुर रहने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया या बिना ट्रेनिंग के ‘पायलट’ बने सचिन के लिए विचारधारा का कोई मतलब नहीं रहा। जब तक सत्ता रही वे कांग्रेस की भाषा बोलते रहे, लेकिन पार्टी के कमज़ोर होते ही उनकी महात्वाकांक्षाओं के पर निकल आये। उन्होंने कांग्रेस की सरकारें ही नहीं तोड़ीं या तोड़ने की कोशिश की, समावेशी भारत के विचार को मिटाने में जुटे विचार शिविर की कुल्हाड़ी में धार दे दी।

इसलिए जो लोग इसे ‘बुजुर्ग-युवा संघर्ष’ के रूप में देखते हैं, वे ग़लती कर रहे हैं। मसला विचार का है। साबित हो गया है कि सिंधिया और सचिन को मुख्यमंत्री न बनाने का फैसला आलाकमान की दूरदर्शिता थी। सोचिये, किसी मोड़ पर वे पूरी सरकार ही बीजेपी को बेच सकते थे।

गाँधी परिवार की तमाम आलोचनाएँ अपनी जगह, लेकिन आरएसएस के सबसे बड़े दुश्मन वे यूँ ही नहीं हैं। वे दरअसल, कांग्रेस के मूल विचार के प्रतिनिधि हैं जिससे उन्हें डिगाया नहीं जा सका। मायावती से लेकर मुलायम सिंह तक की बीजेपी को लेकर चुप्पी के पीछे तमाम मुकदमों का हाथ बताया जाता है लेकिन ऐसे मुकदमे तो राबर्ड वाड्रा पर भी हैं। इसके बावजूद प्रियंका गाँधी बिना डरे मैदान में डटी हुई हैं। गाँधी परिवार से जुड़े तमाम ट्रस्ट पर जाँच बैठा दी गयी है लेकिन सोनिया गाँधी से लेकर राहुल गाँधी तक के तेवर में ज़रा भी फ़र्क़ नहीं पड़ा। गाँधी परिवार की यही प्रतिबद्धता कांग्रस की ताकत है जिस पर आम कार्यकर्ताओं को भरोसा है। लेकिन परिवार की उदारता और राजनीति को लेमनचूस समझने वाले ‘बच्चों’ को पार्टी में तरजीह देना भारी पड़ रहा है। आलाकमान को ‘गोदी मीडिया’ की परवाह न करते हुए ‘गोदी लीडरों’ की जगह संघर्ष में तपने वाले नेताओं को तरजीह देना होगा। कांग्रेस का भविष्य इसी पर निर्भर है।

पुनश्च: कहने को कोई गाँधी परिवार को भी ‘मृतकाश्रित’ कोटा का कह सकता है, लेकिन यह सही नहीं होगा। 1991 में राजीव गाँधी की मृत्यु के बाद सोनिया गाँधी ने राजनीति में आने में कोई रुचि नहीं दिखायी। कांग्रेस की सरकार नरसिम्हाराव के नेतृत्व में चली। इस बीच ‘गाँधी परिवार विहीन कांग्रेस’ बना लेने का पूरा अवसर था, दिग्गजों में उठापटक होती रही। पार्टी में विभाजन भी हो गया था। ऐसे में देश भर की कार्यकर्ताओं की भारी माँग पर सोनिया गाँधी राजनीति में सक्रिय हुईं। 1997 में उन्होंंने पार्टी की सदस्या ली और कार्यसमिति ने उन्हें अध्यक्ष बना दिया। जाहिर है, पार्टी को एक शक्तिकेंद्र चाहिए था जो उसे इस परिवार में दिखा। लेकिन चुनौतियाँ कम नहीं थीं। 1999 में विदेशी मूल का सवाल उठाते हुए शरद पवार, संगमा, तारिक अनवर जैसे दिग्गजो ने पार्टी छोड़ दी। सन 2000 में सोनिया गाँधी ने अध्यक्ष पद का बाकायदा चुनाव लड़ा और तब वंशवाद का सवाल उठाते हुए कुंवर जितेंद्र प्रसाद ने उनके ख़िलाफ़ ताल ठोंकी थी। राजेश पायलट ने तब जितेंद्र प्रसाद का समर्थन किया था। लेकिन सोनिया गाँधी जीतीं और 2004 में पार्टी को सत्ता में वापस लाने में क़ामयाब हुईं, वह भी अटल बिहारी वाजेपयी जैसे दिग्गज को परास्त करके। प्रधानमंत्री पद सामने था, लेकिन उन्होंने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया। ज़ाहिर है, गाँधी परिवार की उपस्थिति ‘मृतकाश्रित कोटे’की वजह से नहीं, पार्टी के प्रति अपनी सेवाओं और अखिल भारतीय स्तर पर पार्टी कार्यकर्ताओं के समर्थन की वजह से है। यह सत्ता का नहीं संघर्ष का वंशवाद है जिसके साथ कुर्बानियों की एक लंबी दास्तान नत्थी है, जिसका मुकाबला पार्टी का कोई और नेता या परिवार नहीं कर सकता। 

 

.बर्बरीक

 



 

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