अख़बारनामा: जीएसटी के ‘पोस्टर ब्वाय’ के लिए जेटली का समयपूर्व विदाई संदेश कुछ कहता है

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संजय कुमार सिंह


आज टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पेज पर सिंगल कॉलम में टॉप पर छोटी सी खबर है, “अधिया ने महत्वपूर्ण पदों की पेशकश ठुकरा दी : वित्त मंत्री”…इस खबर में यह सूचना भी है कि यूआईडीएआई के प्रमुख अजय भूषण पांडे अगले राजस्व सचिव होंगे। सरकार का कोई दुलारा अधिकारी महत्वपूर्ण पदों की पेशकश ठुकरा दे- यह साधारण बात नहीं है। पर खबर इतनी ही है। खबर के आखिर में अंदर एक खबर होने की सूचना है, सरकार ने विकल्पों पर विचार किया। इस खबर का शीर्षक है, सरकार ने अधिया को सीएजी ये मंत्रिमंडल सचिव बनाने के विकल्पों पर विचार किया। पर अधिया ने नवंबर के बाद काम करने से मना कर दिया इसलिए दोनों ही विकल्पों को छोड़ दिया गया। लेकिन अधिया ने मना क्यों किया? एक तो सेवा विस्तार और उसपर भी महत्वपूर्ण पद। वित्त सचिव हसमुख अधिया को 30 नवंबर के बाद पद पर बनाए रखने की उत्सुक सरकार उन्हें कैबिनेट सेक्रेट्री बनाना चाहती थी। यह एक ऐसा पद है जिससे उनके लिए दो साल का कार्यकाल सुनिश्चित होता।

सूत्रों ने कहा कि केंद्र ने उन्हे नियंत्रक और महालेखा परीक्षक बनाने पर भी विचार किया। इस खबर में आगे लिखा है कि यह सूचना केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली के ब्लॉग से ली गई है। इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर यह सूचना भर है कि इस बारे में खबर अंदर है। अंदर की खबर का शीर्षक है, “अधिया 30 को रिटायर होंगे; पांडे नए राजस्व सचिव होंगे”। हिन्दुस्तान टाइम्स ने आला अधिकारियों के तबाले और नई नियुक्तियों की सूचना को लीड बनाया है और शीर्षक है, दिल्ली के मुख्य सचिव हटाए गए, यूआईडीएआई के मुख्य सचिव अब राजस्व सचिव होंगे। वैसे तो इससे भी स्पष्ट है कि राजस्व सचिव रिटायर होने वाले होंगे और नए की घोषणा हो गई और खबर देने का एक तरीका तो यह है ही।

सुबह-सुबह अखबार पलटते हुए शीर्षकों में कुछ ध्यान खींचते हैं। आज यह शीर्षक कुछ दबाता छिपाता लग रहा था। उम्मीद थी की कोलकाता के दैनिक द टेलीग्राफ से ही मामला साफ होगा और वही हुआ। टेलीग्राफ ने आज चार कॉलम की लीड के साथ दो कॉलम में तीन फोटो लगाई है – हसमुख अधिया अरुण जेटली और सुब्रमण्यम स्वामी। अब वित्त मंत्रालय की खबर और सुब्रमण्यम स्वामी भी हैं तो मसाला होगा ही। उसपर से शीर्षक है, “अधिया को अलविदा कहना कभी भी बहुत जल्दी नहीं है।” आज 18 नवंबर है,अधिया 30 को रिटायर होंगे और अरुण जेटली ने ब्लॉग लिखकर बता दिया कि उन्होंने सेवा विस्तार लेने से मना कर दिया। कोई पद नहीं लेंगे और नए राजस्व सचिव के नाम की घोषणा हो चुकी है। यह कुछ असामान्य तो है ही। और इसीलिए मैं कई अखबार पलटता हूं। सभी अखबारों को पूरा पढ़ना तो संभव नहीं है (रोजी रोटी भी कमाना होता है) पर खबर पढ़कर लगे कि जानकारी पूरी नहीं मिली तो दूसरा-तीसरा अखबार जरूरी होता है। ऐसा नहीं है कि मैंने टेलीग्राफ पहले देखा होता तो ऐसी जरूरत नहीं होती। तब मैं किसी और खबर पर अटक जाता।

जैसे, टेलीग्राफ में ही आज इस खबर के साथ एक खबर है, “अगर किसी अधिकारी को हटाना हो तो रास्ते हजार हैं।” आर बालाजी की इस खबर के मुताबिक, सीबीआई के एक ‘मुश्किल’ अधिकारी को हटाने के लिए क्या बहाना बनाया जा सकता है। इसका प्रदर्शन शनिवार को तब हुआ जब एक डीएसपी अपने तबादले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। डीएसपी अश्विनी कुमार गुप्ता सीबीआई के उन 13 अधिकारियों में हैं जिन्हें सीबीआई डायरेक्टर और उनके डिप्टी को जबरन छुट्टी पर भेजने के बाद कुछ ही घंटों में सीबीआई से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। क्योंकि ये लोग विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कर रहे थे। छुट्टी पर भेजे गए इस अधिकारी (अस्थाना) को प्रधानमंत्री का करीबी माना जाता है। अखबार ने तबादले का कारण बताया है और आज अगर मैंने टेलीग्राफ पहले पढ़ा होता तो देखता कि यह खबर हिन्दी के अखबारों में है कि नहीं और है तो कितनी। वैसे, अभी तक तो मुझे पहले पेज पर नहीं दिखी है। वहां वित्त मंत्री सीबीआई का बचाव करते ही दिख रहे हैं।

आइए अब देखें आज का यह मामला है क्या। जयंत राय चौधुरी और जेपी यादव की लिखी टेलीग्राफ की खबर इस प्रकार है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा खुद चुने गए और एक समय जीएसटी अभियान के ‘पोस्टर ब्वाय’ रहे वित्त सचिव हसमुख अधिया 30 नवंबर को रिटायर हो जाएंगे। आम चुनाव से पहले बजट को अंतिम रूप देने में सहायता के लिए सेवा विस्तार के लाभ के बिना। रिटायरमेंट योजना में दिलचस्पी तब बढ़ गई तब वित्त मंत्री अरुण जेटली ने शनिवार को अधिया के लिए एक असामान्य और समयपूर्व फेयरवेल (विदाई संदेश) लिखा। जिसमें बताया गया है कि सरकार चाहती थी कि वे कोई ‘वैकल्पिक’ भूमिका संभालें पर उन्होंने ऐसा नहीं करने का निर्णय किया। विदाई का यह ब्लॉग उस दिन आया जिस दिन भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने एक अखबार में लिखे अपने आलेख में जीएसटी को ‘फ्लॉप’ कहा और नीतियों में ‘वास्तविक’ परिवर्तन नहीं होने पर अर्थव्यवस्था में ‘गंभीर संकट’ की चेतावनी दी।

अधिया के दिन बदल रहे हैं इसका पता मई के शुरू में लग गया था जब उन्हें कैबिनेट सेक्रेट्री नहीं बनाया गया। किसी भी नौकरशाह की महत्वाकांक्षा का यह शिखर है। मंत्रिमंडल सचिव पीके सिन्हा ने एक साल का विस्तार पाकर तमाम अटकलों को शांत कर दिया था। अधिया का कार्यकाल खत्म होने की सूचना जेटली द्वारा एक फेसबुक पोस्ट से प्रसारित किया जाना वैसा ही है जैसा उन्होंने जून में अरविन्द सुब्रमण्यम के मुख्य आर्थिक सलाहकार के पद से अलग होने पर किया था। वित्त मंत्रालय में सर्वोच्च नौकरशाहों को विस्तार देने की एक अलिखित परंपरा है कि ताकि वे बजट से जुड़े काम पूरी कर सकें। पर जेटली ने उनके रिटायर होने की घोषणा पहले ही कर दी।

अखबार ने ब्लॉग की बहुत सारी बातों का उल्लेख करते हुए बताया है कि जेटली अधिया के साथ काम करते हुए आराम से थे ऐसा नहीं जाना जाता है। अधिया को वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का आदमी मानते थे जो नॉर्थ ब्लॉक पर नजर रखता है। अधिया की फाइल प्रधानमंत्री के कार्यालय तक गई जहां इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। अखबार ने एक अधिकारी के हवाले से लेखा है, किसी वित्त सचिव के रिटायर होने से कोई एक पखवाड़ा पहले ही वित्त मंत्री का यह एलान करना असामान्य है कि वे पद छोड़ देंगे और फिर यह भी बताना कि सरकार चाहती थी कि वे बने रहें पर उन्होंने ऐसा नहीं करने का चुनाव किया। अखबार ने आगे लिखा है कि जेटली के जाने-माने आलोचक, सुब्रमण्यम स्वामी ने ‘द हिन्दू’ में शनिवार को प्रकाशित एक आलेख में मोदी सरकार के तहत अर्थव्यवस्था के प्रबंध की निन्दा की है।

उन्होंने लिखा है, “इसलिए, अब किसी भी मात्रा में विदेशी एजेंसियों जैसे, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष या अंतरराष्ट्रीय आयोजनों के हवाले से कहने या स्पष्टीकरण देने से संकट दूर करने में सहायता नहीं मिलेगी। इसके लिए बड़े आर्थिक सुधारों की शुरुआत करनी पड़ेगी जो लोगों के लिए प्रोत्साहन आधारित हों और जिनकी साख हो। इसलिए, आज हमें वास्तविकता की जांच करने की आवश्यकता है। स्वामी ने जीएसटी पर भी हमला किया। उन्होंने लिखा है, …. मेरे विरोध के बावजूद इसे धूम-धाम से लागू किया गया था। स्वामी ने आम लोगों के लिए प्रोत्साहन के रूप में आयकर खत्म करनेका सुझाव दिया है पर कहा है कि इसके लिए सरकार को क्या बलिदान चाहिए होंगे उन्हें स्पष्ट किया जाना चाहिए। हिन्दी अखबारों में यह खबर ऐसे नहीं दिखी कि उसकी चर्चा की जाए।

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।



 


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