पहला पन्ना: दिल्ली के पुलिस चीफ़ बने राकेश अस्थाना की विशेषता वाले शीर्षक ढूँढते रह जाओगे!

संजय कुमार सिंह संजय कुमार सिंह
काॅलम Published On :


यह दिलचस्प है कि दिल्ली के अखबारों –  हिन्दुस्तान टाइम्स में आज यह खबर तीन कॉलम में, टाइम्स ऑफ इंडिया में दो कॉलम में और इंडियन एक्सप्रेस में सिंगल कॉलम में है। हिन्दी के शीर्षक में भी बहुत सी सूचनाएं हैं पर यह नहीं जो कल सोशल मीडिया पर मुझे दिखा। 

 

 

(राजस्थान पत्रिका की कतरन अजीत कुमार राय की फेसबुक पोस्ट से  साभार। हालाँकि  2018 में छपी इस ख़बर का कुछ अख़बारों ने खंडन छापा है, पर सवाल ये है कि जब जाँच ही नहीं हुई तो फिर ख़बर के ग़लत होने का दावा कैसे किया जा रहा है। इस संबंध में मुंबई मिरर ने ख़बर छापी थी  कि जाँच नहीं हुई जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

 

राकेश अस्थाना को रिटायरमेंट से पहले दिल्ली पुलिस का प्रमुख बनाना सरकारी जबरदस्ती और मनमानी का जोरदार उदाहरण है। खास लोगों को बढ़ावा देने और विरोधियों को जेल में बंद करने की नीति पर चलने के लिए भी ऐसी नियुक्तियां जरूरी होती हैं। मीडिया और न्यायपालिका का काम है इसपर नजर रखना। दिल्ली दंगे की दिल्ली पुलिस की जांच पर हाल की अदालती टिप्पणी और जुर्माना लगाए जाने की खबरों के बीच ऐसे प्रिय अधिकारी को नियम से हटकर दिल्ली पुलिस का प्रमुख बनाना बताता है कि सरकार को किसी की परवाह नहीं है। जिसे सीबीआई प्रमुख नहीं बनाया जा सका उसे दिल्ली पुलिस का प्रमुख बना दिया गया। अंग्रेजी के अखबारों के शीर्षक और खबर के साथ आज मैंने हिन्दी के अखबारों की खबरों का भी जिक्र किया है। इन्हें पढ़िये और समझिए कि अखबार और टेलीविजन आपको कैसी खबरें दे रहे हैं। आज इस एक खबर से आपको अखबारों की मनमानी भी समझ में आएगी। हालांकि, यह विज्ञापन के लालच में और सरकारी दबाव के डर से भी हो सकता है।      

मीडिया जब पंजाब, राजस्थान में सरकार बदलने की अटकलें लगा रहा था तो कर्नाटक में सरकार बदल गई। कल मैंने इसपर लिखा था और बताया था कि खबरों में क्या नहीं है। राकेश अस्थाना को दिल्ली पुलिस का प्रमुख बनाए जाने की खबरों में जो नहीं है वह और ज्यादा है तथा उसके नहीं होने का कारण उतना ही स्पष्ट है जितनी वो सूचनाएं जो आज याद नहीं दिलाई गई हैं। उदाहरण के लिए मैं आज जान पाया कि वे नेतरहाट विद्यालय के पढ़े हुए हैं और उनके बारे में जो जानता हूं वह बहुत कम दिखा। इसका कारण आज के नौसिखुए रिपोर्टर भी हो सकते हैं जो सरकारी विज्ञप्ति से ही खबर लिखते हैं और इसीलिए अमर उजाला ने (साइट पर अपनी खबर में) बताया है कि यह नियुक्ति मोदी सरकार ने की है। ऐसी प्रतिभाओं के हाथों निकलने वाले अखबारों में दिल्ली के पुलिस कमिश्नर की नियुक्ति की खबर को भी समान महत्व नहीं मिला है जबकि अस्थाना को बनाए जाने के कारण यह खबर अब खासतौर से महत्वपूर्ण हो गई है।  

यह दिलचस्प है कि दिल्ली के अखबारों –  हिन्दुस्तान टाइम्स में आज यह खबर तीन कॉलम में, टाइम्स ऑफ इंडिया में दो कॉलम में और इंडियन एक्सप्रेस में सिंगल कॉलम में है। हिन्दुस्तान टाइम्स का तीन कॉलम का शीर्षक है, राकेश अस्थाना दिल्ली पुलिस आयुक्त बनाए गए। यह एक सीधा, सरल और सपाट शीर्षक है और राकेश अस्थाना ऐसी हस्ती नहीं हैं कि उनकी विशेषता शीर्षक में न हो। पर नहीं है तो नहीं है। हालांकि खबर में सीबीआई की आधी रात की कार्रवाई का जिक्र है और यह भी कि उन्हें सीबीआई प्रमुख बनाने की कोशिशें नाकाम रहीं। द हिन्दू में मुख्य शीर्षक तो हिन्दुस्तान टाइम्स जैसा ही है पर उपशीर्षक कुछ बताता है। इसके अनुसार, गुजरात काडर को अंतर काडर प्रतिनियुक्ति के साथ विस्तार मिला। इतने से भी लोगों को पुरानी कहानी याद आ जाएगी पर दिल्ली के तीन में से दो अखबारों में यह सब नहीं है। द टेलीग्राफ में यह पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम में है। 

इंडियन एक्सप्रेस में इस खबर का शीर्षक है, सीबीआई में नियुक्ति नहीं हो पाई, अस्थाना अब दिल्ली पुलिस के नए प्रमुख हैं। इंडियन एक्सप्रेस ने अस्थाना से बात की और उन्होंने दावा किया कि वे सूरत और बड़ौदा के पुलिस प्रमुख रह चुके हैं और अपराध रोकना तथा उसका पता लगाना उनकी प्राथमिकता होगी। इसके अलावा कानून व्यवस्था का पालन करना भी। एक्सप्रेस ने सीबीआई के उनके कार्यकाल और सीबीआई प्रमुख बनाने की सरकार की कोशिशों की चर्चा की है और बताया है कि कैसे वे सीबीआई प्रमुख बनने से रह गए तो दिल्ली पुलिस के प्रमुख बना दिए गए। यहां मुझे याद आता है कि सीबीआई प्रमुख की नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट के बनाए नियमानुसार हुई है और फिर भी आदेश में लिखा है (था) कि या अगले आदेश तक जबकि अस्थाना का कार्यकाल एक साल बढ़ाया गया है। मुझे अस्थाना की नियुक्ति या सेवा विस्तार वाला आदेश नहीं दिखा लेकिन अस्थाना की प्रतिभा का उपयोग दिल्ली पुलिस में एक ही साल होगा या उनकी प्रतिभाओं का सीबीआई में उपयोग करने के लिए सीबीआई निदेशक की नियुक्ति वाले आदेश में अगले आदेश तक लिखा गया है यह समय बताएगा। अस्थाना अगर रिटायर हो जाते तो अलग बात थी अब उसका महत्व बढ़ गया लगता है।   

टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक है, एक चौंकाने वाली चाल के तहत राकेश अस्थाना शहर के नए पुलिस प्रमुख हैं। पता नहीं टीओआई अपने इस शीर्षक से किसके चौकने की बात कर रहा है। पाठक भले चौंकें पर यह शीर्षक इस अखबार में अटपटा है क्योंकि इसके संपादक काम और उसके महत्व के लिहाज से एक समय खुद को प्रधानमंत्री के समकक्ष मानते थे। आज शहर कोतवाल की नियुक्ति की सूचना अखबार को चौंका रही है। पर खबर में ऐसा कुछ नहीं है कि क्यों चौका रही है। अंदर के पन्ने पर चारा घोटाले की जांच पर खबर होने की सूचना है और जाहिर है उसके जरिए इनका महिमंडन किया गया होगा और इनकी योग्यता साबित की गई होगी। अखबार ने लिखा है कि यह पद एक महीने से खाली था। ऐसे में नियुक्ति चौंकाने वाली या पहले वाक्य की तरह नाटकीय कदम क्यों है यह नहीं बताया गया है। रिटायरमेंट के चार दिन पहले जरूर चौंका सकता है पर मामला राकेश अस्थाना का हो और उन्हें सेवा विस्तार न मिले यह कैसे हो सकता था? मुझे इसमें भी कुछ नाटकीय या चौंकाने वाला नहीं लग रहा है। 

आज अंग्रेजी अखबारों के अलावा मैंने हिन्दी के अखबारों में भी शीर्षक में राकेश अस्थाना की प्रतिभा तलाशने की कोशिश की। शीर्षक के साथ पहले पैरे में कौन सी सूचना है, कौन सी नहीं, किसे प्रमुखता दी गई और किसे छिपा लिया गया है – इसे समझना चाहें तो पढ़िए।   

 

जनसत्ता 

राकेश अस्थाना पर लगे थे भ्रष्टाचार के आरोप, अब बनाए गए दिल्ली पुलिस के प्रमुख। यह खबर इंडियन एक्सप्रेस वाली ही अनुवाद की हुई है। नेट पर बाईलाइन महेंद्र सिंह मनराल को है और अनुवादक सचिन शेखर का भी नाम दिया हुआ है। (हिन्दी का पाठक और जनसत्ता का पुराना प्रशंसक हूं इस कारण कई बार लगता है कि मरा हुआ हाथी भी सवा लाख का है)। 

खबर में लिखा है कि ऐसे बहुत कम उदाहरण हैं जब एजीएमयूटी कैडर के बाहर के एक आईपीएस अधिकारी को दिल्ली पुलिस प्रमुख के रूप में नियुक्त किया गया हो। सीबीआई वाले मामले का भी जिक्र है। 2018 में सीबीआई में कार्यकाल के दौरान उनका सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा से विवाद हुआ था और दोनों ने एक दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। वर्मा के द्वारा 15 अक्तूबर, 2018 को अस्थाना के खिलाफ एक प्राथमिकी भी दर्ज करवायी गयी थी। अस्थाना पर आरोप लगा था कि मोइन कुरैशी मामले में एक संदिग्ध को मामले में राहत देने के लिए उन्हें दो बिचौलियों के माध्यम से 2.95 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया था। केंद्र सरकार ने इसके बाद दोनों अधिकारियों को केंद्रीय जांच एजेंसी से हटा दिया था और इसके बाद अस्थाना को आरोपमुक्त कर दिया गया था। अखबार ने नहीं लिखा है कि आलोक वर्मा के खिलाफ मामले की जांच नहीं हुई या नहीं और आरोप में दम था या नहीं। आम सूचना है कि उन्हें रिटायर हो जाने दिया गया (क्योंकि वे सरकार समर्थक नहीं थे) और ऊपर की सूचना के अनुसार सरकार की सेवा करने के लिए उन्हें ईनाम दिया जा रहा है। 

 

नवभारत टाइम्स 

सीबीआई विवाद, चारा घोटाला, सुशांत केस …. हमेशा चर्चा में रहे दिल्ली के नए सीपी राकेश अस्थाना 

 

हिन्दुस्तान 

सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के महानिदेशक राकेश अस्थाना दिल्ली पुलिस कमिश्नर बनाए जा सकते हैं। गुजरात कैडर के 1984 बैच के आईपीएस अधिकारी अस्थाना को सेवानिवृत्त होने से तीन दिन पहले दिल्ली पुलिस प्रमुख के रूप में नियुक्त किए जाने की संभावना है। सूत्रों की माने तो आज रात तक आदेश जारी हो सकता है।

 

दैनिक जागरण 

गुजरात कैडर के आइपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना बने दिल्ली पुलिस के नए कमिश्नर – दिल्ली पुलिस आयुक्त की अतिरिक्त जिम्मेदारी संभाल रहे बालाजी श्रीवास्तव को गृह मंत्रालय ने तत्काल प्रभाव से हटाकर राकेश अस्थाना को दिल्ली पुलिस का नया आयुक्त बना दिया है। वह अभी बीएसएफ़ के डीजी थे। उनके सेवा निवृति में महज दो दिन बचे हैं। उन्हें एक साल का सेवा विस्तार दिया गया है। दिल्ली पुलिस के इतिहास में यह दूसरा (किसी ने तीसरा लिखा है) मौका है, जब गैर यूटी कैडर के आईपीएस को आयुक्त बनाया गया है। 1999 में भाजपा सरकार ने ही यूपी कैडर के आइपीएस अजय राज शर्मा को दिल्ली पुलिस का आयुक्त बनाया था। वह करीब तीन साल  आयुक्त रहे थे और उस दौरान यह मामला शीर्ष अदालत में भी पहुंचा था। 

 

अमर उजाला 

जिम्मेदारी: दिल्ली पुलिस के नए कमिश्नर बने राकेश अस्थाना, मोदी सरकार ने की नियुक्ति (इसमें जिम्मेदारी और मोदी सरकार ने की नियुक्ति अजीब है पर मैं नियमित पाठक नहीं हूं तो अंदाजा नहीं है कि यह किसी खास मकसद से तो नहीं है। इसलिए हटाया नहीं है। कई जगह ऐसे शब्द हटा दिए हैं )। गुजरात काडर के वरिष्ठ आईपीएस अफसर राकेश अस्थाना को दिल्ली पुलिस का आयुक्त बनाया गया है। 31 जुलाई को सेवानिवृत्त हो रहे अस्थाना बुधवार को नया जिम्मा संभालेंगे। (उन्हें एक साल के लिए विस्तार दिया गया है यह नहीं बताया गया है और ऐसा नहीं है कि दिल्ली पुलिस कमिश्नर रिटायर नहीं होता है) पर खबर में कुछ नहीं बताया गया है। यह जरूर लिखा है, अस्थाना अगले एक साल तक दिल्ली पुलिस के आयुक्त रहेंगे। 

 

न्यूज18 डॉट कॉम 

सीबीआई के पूर्व डायरेक्टर राकेश अस्थाना को दिल्ली का पुलिस कमिश्नर बनाया गया है। दिल्ली पुलिस कमिश्नर बनते ही राकेश अस्थाना को विशेष शक्तियां मिल गई हैं। 

तीन महीने के लिए होंगी विशेष शक्तियां

राकेश अस्थाना अब राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम यानी एनएसए के तहत आने वाली सभी शक्तियों का प्रयोग कर सकेंगे।

अस्थाना के पास ये शक्तियां आगामी तीन महीने यानी 18 अक्टूबर तक रहेंगी। 

विशेष अधिकार होने के बाद दिल्ली पुलिस को किसी भी व्यक्ति के बारे यदि यह संदेह होता है कि उससे देश या राज्य को किसी भी तरह का खतरा है तो वह उसे तुरंत गिरफ्तार कर सकती है। 

 

टीवी9 हिन्दी डॉट कॉम 

सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के डीजी राकेश अस्थाना दिल्ली पुलिस के कमिश्नर बनाए गए हैं। उनकी नियुक्ति के साथ खाली हुए बीएसएफ के डीजी के पद का अतिरिक्त प्रभार आईटीबीपी के डीजी के पास होगा। 

इस खबर से लगता है कि सरकार ने सीमा सुरक्षा बल के डीजी के पद को दिल्ली पुलिस के कमिश्नर पद से ज्यादा महत्वपूर्ण माना है और उसे अतिरिक्त चार्ज में रखकर अस्थाना को दिल्ली पुलिस का प्रमुख बनाया है। लेकिन दिल्ली पुलिस प्रमुख का पद पहले से खाली था और अस्थाना को दिल्ली पुलिस का प्रमुख नहीं बनाया जाता तो वे वहां भी रिटायर हो जाते। ऐसे में दोंनों पदों के लिए यह सोची समझी सामान्य कार्रवाई है या किसी तरह काम चलाना या फिर अपने लोगों को सही जगह बैठाना या उचित ईनाम देना – यह भी जिज्ञासा हो सकती है और जितनी खबरें पढ़ीं उनमें इसका जवाब नहीं मिला है। 

 

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं।