चीफ़ जस्टिस के ख़िलाफ़ साज़िश हो सकती है पर जाँच न होगी– क्यों? किसी अख़बार ने बताया?  


द टेलीग्राफ का शीर्षक इस मायने में अनूठा है कि उसकी सूचना में ही यह सवाल छिपा हुआ है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ मामले में जो छपा और जो हुआ उससे साजिश की आशंका तो लगती ही है। अदालत भी मान रही है पर जांच नहीं हो रही। ऐसी खबर आप जानकर क्या करेंगे आप तय कीजिए।


संजय कुमार सिंह संजय कुमार सिंह
काॅलम Published On :


आज का दिन निर्विवाद लीड का नहीं है। यानी आज के अखबारों में कोई एक ऐसी खबर नहीं है जो अंग्रेजी के मेरे पांच अखबारों में पहले पन्ने पर प्रमुखता से हो। ऐसे मौके पर किस अखबार में कौन सी खबर लीड है यह देखना मुझे हमेशा दिलचस्प लगता है। कहा जा सकता है कि ऐसे दिन अखबार अपनी पसंद के अनुसार किसी एक खबर तो प्रमुखता देते हैं। जो दूसरे अखबार में नहीं भी होती है। जाहिर है, उसका कारण नहीं बताया जा सकता है लेकिन अटकल लगाने से कौन रोक सकता है।

मेट्रोमैन ई श्रीधरण के भाजपा में शामिल होने की अटकलें, पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के खिलाफ मामला खत्म करने, उन्नाव में तीन बेटियों के बेहोश मिलने और उनमें से दो की मौत हो जाने की खबरें भी आज पहले पन्ने लायक हैं। अलग-अलग अखबारों ने इन्हें अलग ढंग से छापा है। कुछ ने पहले पन्ने पर नहीं भी छापा है। यही संपादकीय आजादी है और संपादकों का विवेक। आप टीआरपी (यानी विज्ञापन पाने की योग्यता) भी कह सकते हैं। इंडियन एक्सप्रेस ने रंजन गोगोई की खबर का शीर्षक लगाया है, “सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ मामला बंद किया, कहा साजिश की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है”। 

द टेलीग्राफ ने इसी खबर को लीड बनाया है। शीर्षक है, “साजिश? हो सकता है। मामला? खत्म।“ कहने की जरूरत नहीं है कि साजिश की संभावना (या आशंका) जब हो सकती है तो मामला बंद क्यों किया जा रहा है। इस लिहाज से यह बड़ी खबर है लेकिन अखबारों में कितनी प्राथमिकता मिली है आप देखिए और समझिए। द टेलीग्राफ का शीर्षक इस मायने में अनूठा है कि उसकी सूचना में ही यह सवाल छिपा हुआ है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ मामले में जो छपा और जो हुआ उससे साजिश की आशंका तो लगती ही है। अदालत भी मान रही है पर जांच नहीं हो रही। ऐसी खबर आप जानकर क्या करेंगे आप तय कीजिए। मुझे तो यह जानना है कि जांच क्यों नहीं हो रही है। अदालत ने कहा है, द टेलीग्राफ में फ्लैग शीर्षक है लेकिन वह इंडियन एक्सप्रेस के शीर्षक में नहीं है। आप इस कारण से सहमत हों या नहीं, खबर पढ़कर लगता तो है कि इस मुद्दे पर भी गौर किया गया। शीर्षक में यह बात होती तो खबर मजबूत या सही लगती पर इसकी परवाह किसे है। या कितनों की परवाह करें। 

वैसे, टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर सबसे मजेदार लगी। अंग्रेजी में कहावत है, लुक हू इज टॉकिंग। मुझे उसकी याद आ गई। अमित शाह का प्रवचन निश्चित रूप से एक गृहमंत्री के रूप में उनकी सोच है। आप इसे सरकारी नीति, फैसला आदेश या आदर्श  भी मान सकते हैं। पर टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस खबर को इतनी प्रमुखता से नहीं छापा होता तो मेरा यह मनोरंजन नहीं होता और ना मैं आपसे अपनी यह खुशी जता रहा होता। 

अखबार का शीर्षक है, “दिशा (रवि) के मामले में (अमित) शाह : आपराधिकता तय करने में आयु, लिंग बेमतलब”। मुझे लगता है कि यह इतनी बड़ी या नई बात नहीं है कि इसे लीड बनाया जाए। मुझे लगता है कि यह बच्चा-बच्चा जानता और समझता है। फिर भी इसे गृहमंत्री के हवाले से छापा जाता तो अलग बात होती। बेशक अमित शाह और गृहमंत्री एक ही हैं और यही विडंबना इस खबर से रेखांकित हो रही है। अदालत से बच गया तो वह दोषी नहीं है और पुलिस चाहे तो किसी को भी उठाकर बंद कर दे। वह अदालत से जब जमानत मिले तब तक जेल भोगे और जमानत किसे कब कैसे मिलती रही है वह हमेशा से अलग दिखता रहा है, फिर भी। आज के समय में जब अपराध टेलीविजन पर दिखते हैं और सीसीटीवी में रिकार्ड होते हैं तो भी अदालतें हैं और सजा सीसीटीवी में देखकर नहीं दी जा सकती है। और पुलिस बेशक सीएए विरोधियों (तमाम पुलिस वालों के सामने)  रिवाल्वर लहराने वाले और एक टूल किट फॉर्वार्ड करने वाले के खिलाफ भी एक जैसी कार्रवाई कर सकती है। 

माइक पर गोली मारो सालों के नारे लगवाने के बावजूद कुछ नहीं बिगड़ता है,  जेएनयू में हमले की मुख्य आरोपी को पकड़ा नहीं जा सकता है तो कौन नहीं समझ रहा है कि अपराधिकता कैसे तय होती है। अमित शाह इसे बताएं उसके मायने हैं। भारतीय राजनीति के ‘चाणक्य’ कहे जाते हैं इसीलिए गृहमंत्री नहीं अमित शाह लिखने के मायने हैं। मेरे ख्याल से इस तरह की नीतिगत बात अगर गृह मंत्री के हवाले से कही जाती तो खबर जितनी गंभीरता से छापी गई है उतनी ही गंभीर लगती। अभी लग रहा है अमित साह का प्रचार हो रहा है उनके अधिकार या विचार बताए जा रहे हैं। मेरा मानना है कि अखबार ने गृहमंत्री नहीं लिखकर (अमित) शाह क्यों लिखा इसपर अटकल लगाने के लिए हम सब स्वतंत्र हैं। 

खबर यह है कि गृहमंत्री ने कहा है कि दिल्ली पुलिस पर कोई दबाव नहीं है, उन्हें पूरी आजादी है। वह कानून के अनुसार काम कर रही है। अखबार ने लिखा नहीं है लेकिन कोई भी समझ सकता है कि अगर आजादी है, वाकई है तो उसका खुला दुरुपयोग हो रहा है। सरकार समर्थकों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती और 21 साल की एक बच्ची को शनिवार को बेंगलुरु में गिरफ्तार किया जाता है और विमान से दिल्ली लाकर इतवार को अदालत में पेश कर दिया जाता है। पुलिस चाहती तो ट्रेन से लाती और सप्ताह के दिन भी पेश करती। वह कितना अच्छा या बुरा होता वह अलग बात है। हमें उसकी आजादी का पता तो पहले से है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने आज फिर बताया है। लीड के रूप में बताया है, अमित शाह के हवाले से बताया है यह बड़ी खबर है।   

अखबार ने इसके साथ एक और खबर छापी है, पुलिस ने (दिशा के) चैट लीक करने से इनकार किया, हाई कोर्ट ने चैनल्स को नोटिस जारी किया। दिल्ली पुलिस के मुखिया जब कह रहे हैं कि दिल्ली पुलिस नियमानुसार काम कर रही है तो इस खबर को इतना महत्व देने की कोई जरूरत थी? पुलिस कब क्या किसलिए ‘लीक’ करती रही है वह किसी से छिपा नहीं है। पर पुलिस के सर्वोच्च मुखिया के कहने का क्या इतना महत्व होना चाहिए। उन्होंने कहा, पुलिस ने कहा – एक ही बात है। इसे बताने के लिए अखबार में पहले पन्ने पर चार कॉलम की खबर! क्या कहूं? हालांकि अमित शाह ने जो कहा है उसका मतलब यह भी है कि  पुलिस अपने हिसाब से काम करेगी और जिसे शिकायत हो वह अदालत जाए। यह कम दिलचस्प नहीं है कि इस खबर को बाकी चार अखबारों में से किसी ने भी पहले पन्ने पर नहीं छापा है। 

 

 लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं।

 


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