पहला पन्ना: सबकी ख़बर लेने और सबकी ख़बर देने वाले मीडिया में चार दिन से टीका!

संजय कुमार सिंह संजय कुमार सिंह
काॅलम Published On :


पहला पन्ना में रोज कोलकाता के द टेलीग्राफ की तारीफ नहीं करने की कोशिश के बावजूद द टेलीग्राफ की खबरें ऐसी होती हैं कि उनकी चर्चा करनी ही पड़ती है। कल जनसत्ता के एक सीनियर से पता चला कि अखबारों के जरिए या वैसे भी, रोज दिन भर के लिए मुद्दा सेट कर दिया जाता है और टेलीविजन वही राग अलापते हैं। दिन भर टेलीविजन के शोर से अखबारों में वही लीड बन जाता है। बात सही भी है। अभी तो तीन-चार दिन से टीकाकरण चल रहा है। सच कहिए तो उससे भी ज्यादा समय से- ये तो लगातार है। आज स्वास्थ्यमंत्री ने टीका लगवाया, आज प्रधानमंत्री ने और आज रक्षा मंत्री ने- पहले पन्ने की पहली खबर हो गई। कोई याद नहीं कर रहा है कि आयुष सेतु कितना जरूरी था। किसी को याद नहीं है कि टीका लगवा कर भी ना मास्क से मुक्ति है ना घर से निकलने की आजादी। ना इस बात की गारंटी कि कोरोना नहीं होगा। फिर भी, खबरें रोज टीके की छप रही है। आज लगातार चौथा दिन है।

प्रचार के लिए जब तक कोई दूसरा मुद्दा नहीं आता है, लगता है यही चलेगा। आज सुबह-सुबह एक खबर दिखी, सभी निजी अस्‍पतालों को कोविड वैक्‍सीन लगाने की मंजूरी। मुझे लगा आज का मसाला यही है। पर यह इंडियन एक्सप्रेस की लीड है। अब आज दिन भर निजी अस्पतालों को टीका लगाने के फायदों पर बात होगी। कोई यह नहीं बताएगा कि निजी अस्पतालों में कितने सांसद, मंत्री और नेता कोरोना से मरे। जब टीका लगाने की अनुमति आज की लीड है तो ये नेता मंत्री वहां इलाज कराने क्यों गए थे। और जो इलाज कर सकता है वह टीका क्यों नहीं लगा सकता था। ना कोई सोचेगा, ना बताएगा और ना पूछेगा।

मैंने पहले भी लिखा है, जनसत्ता के चार संस्करण निकलते थे। यानी एक तारीख के चार अखबार होते थे। पहला शाम चार बजे के करीब छप जाता था, दूसरा रात 11 बजे के करीब तीसरा शहर में बंटने के लिए रात दो बजे के करीब और चौथा दूर के शहरों के लिए अगले दिन की तारीख का होता था। हमलोग अखबार देखकर बता देते थे कि किसने बनाया होगा। अब दिल्ली के चार अंग्रेजी के अखबार अक्सर ऐसे होते हैं जैसे संपादक एक ही हो या एक ही जगह से निर्देश लिए जा रहे हों। हो सकता है यह पत्रकारिता की पढ़ाई का असर हो जनसत्ता में उन दिनों पत्रकारिता पढ़े हुए लोग नहीं थे। यहां तक कि चुने जाने के बाद मैंने कोर्स करने की अनुमति मांगी तो नहीं मिली।

इसके बावजूद जनसत्ता में उस समय इतनी विविधता थी तो इसीलिए कि अपने मन से काम करने की आजादी थी। हम किसी का प्रचार नहीं करते थे। उलटे जनसत्ता का नारा था, सबकी खबर ले, सबको खबर दे। विनोद दुआ ने अपने हाल के प्रोग्राम में इसका जिक्र किया और सबकी खबर लेने की भी बात की। तो अखबार का काम यही है – सबकी खबर ले, सबकी खबर, सबको दे। लेकिन आजकल ऐसा हो नहीं रहा है और यह अपना काम नहीं करना भर नहीं है। यह प्रचारकों की सेवा करना और प्रचार करना है। इस चक्कर में जरूरी खबरें रह जा रही हैं। यह मैं इसलिए कह रहा हूं कि आज फिर सभी अखबारों में लीड टीके से संबंधित खबर है।

1– इंडियन एक्सप्रेस ने इसे छह कॉलम में दो लाइन के शीर्षक से छापा है। ऊपर लाल रंग में फ्लैग शीर्षक भी है – 50 लाख पंजीकृत, दो दिन में 4.34 लाख लोगों को टीका लगा। मुख्य शीर्षक है, केंद्र ने टीकाकरण की पहुंच बढ़ाई : लंबे सत्र, सभी निजी अस्पतालों को इस काम में लगाया जा सकता है। उपशीर्षक में अखबार ने बताया है, सरकार ने भीड़ पर ध्यान दिया है, आईसीएमआर के प्रमुख ने स्पष्ट किया कि खून पतला करने की दवा खाने वालों के लिए दोनों टीके लगवाना सुरक्षित है।

2– हिन्दुस्तान टाइम्स में चार कॉलम में दो लाइन का शीर्षक है। टीकाकरण के दूसरे चरण में दिल्ली 2.1 मिलियन को कवर करेगी। अखबार ने इसके साथ एक और खबर छापी है जिसका शीर्षक है, ऐप्प की गड़बड़ी, इंतजार का लंबा समय, आपूर्ति की गड़बड़ी जैसी शुरुआती समस्याएं बनी हुई हैं। कल बंबई के किसी केंद्र में भीड़ से परेशानी का वीडियो सोशल मीडिया पर घूम रहा था। बाद में बताया गया कि वह थोड़ी देर के लिए था।

3– टाइम्स ऑफ इंडिया में भी यह खबर चार कॉलम दो लाइन में है। शीर्षक है, केंद्र ने और भी निजी अस्पतालों को टीका लगाने की अनुमति दी। अखबार ने यह भी बताया है कि निर्णय भीड़ ज्यादा होने और संभारतंत्र से संबंधित मुद्दों के कारण लिया गया है। अखबार ने सिंगल कॉलम की खबर में बताया है कि ग्लिचेज (बाधाओं) के बावजूद शहर में 10 लाख बुजुर्गों ने टीका लगवाया।

4– द हिन्दू ने भी खबर को चार कॉलम में छापा है। यहां शीर्षक एक लाइन में है और एक लाइन का उपशीर्षक है। खबर में बताया गया कि सूचना स्वास्थ्य सचिव ने प्रेस कांफ्रेंस करके दी। मुख्य शीर्षक है, 4.34 लाख वरिष्ठ नागरिकों ने टीके लगवाए। यहां भी बताया गया है कि आईसीएमआर के अनुसार देश में उपलब्ध वैक्सीन खून पतला करने की दवा खाने वालों के लिए सुरक्षित है।

इंडियन एक्सप्रेस में आज टीके से संबंधित खबर लगातार चौथे दिन लीड है। 28 फरवरी को बताया गया था कि टीका 250 रुपए में लगेगा, एक मार्च को बताया गया कि आज से टीकाकरण के दूसरे दौर की शुरुआत होगी, दो मार्च को बताया गया कि कितने लोगों को टीका लगा और कितने लोगों ने पंजीकरण कराया। आज का बता ही चुका हूं। अब आप चाहें तो द टेलीग्राफ की या किसी भी अखबार के पिछले दिन की लीड देखकर तय करें कि आपको कौन सा अखबार पढ़ना चाहिए या आपका अखबार आपको कौन सी सूचनाएं दे रहा है। जनसत्ता के अपने सीनियर से बात करने के बाद मैंने तय किया है कि अपने कमरे में कंप्यूटर के साथ एक टेलीविजन भी लगाया जाए और समाचार चैनलों की भी खबर ली जाए। उम्मीद है जल्दी ही ऐसा भी कर सकूंगा।

अगर देश दुनिया में सब कुछ ठीक चल रहा होता, सब लोग राम राज्य में मौज कर रहे होते, या मंदिर बनाने में ही व्यस्त होते तो कोई दूसरी खबर नहीं होती। और तब यह बताने का कोई मतलब नहीं था। लेकिन रोज द टेलीग्राफ बता देता है कि बाकी अखबारों ने कौन सी खबर गोल कर दी। हाल में मैंने लिखा था कि कोलकाता की रैली की खबर दिल्ली के किसी भी अखबार में नहीं है तो कुछ लोगों ने बताया कि फलां अखबारों में थी। दरअसल मैं सिर्फ पांच अखबारों की बात करता हूं और उनमें पहले पन्ने पर नहीं थी। कायदे से तो पांच अखबार को भी पूरी तरह देखकर कहना कि फलां खबर नहीं है, लगभग असंभव है। ऐसे में मैं सिर्फ पांच अखबारों की बात करता हूं और कॉलम का नाम ही है पहला पन्ना तो बात सिर्फ पहले पन्ने की करता हूं। और पिछली प्रतिक्रिया से लगा कि पहले जिन खबरों के बारे में मैंने लिखा है कि किसी और अखबार में नहीं है तो शायद ऐसा ही था। और यह कम दिलचस्प नहीं है।

आज द टेलीग्राफ में लीड है, “वोट भाजपा के खिलाफ : किसान”। निश्चित रूप से यह बड़ी खबर है और दिल्ली डेटलाइन की ही है। पर दिल्ली के किसी अखबार में पहले पन्ने पर है क्या? बाकी चार में तो नहीं है। अनीता जोशुआ की इस खबर में कहा गया है, संयुक्त किसान मोर्चा ने मंगलवार को तय किया कि चुनाव वाले सभी राज्यों में किसानों से अपील की जाए कि वे भाजपा और इसके सहयोगियों के खिलाफ वोट डालें तथा उसकी हार सुनिश्चित करें। मोर्चा ने स्पष्ट कर दिया है कि वह किसी खास पार्टी के लिए काम नहीं करेगा। ना किसी से कहेगा कि किसे वोट दें। मुझे लगता है कि यह एक महत्वपूर्ण रणनीति है और अपेक्षा के अनुकूल है। इसमें नया कुछ नहीं है। और यह होना ही था। पर खबर नहीं है यही नई बात है।

भविष्य में मैं कोशिश करूंगा कि पहले पन्ने की खास खबरों का उल्लेख कर दूं ताकि आप जान सकें कि हिन्दी अखबार कितनी खबरें पचा ले रहे हैं।


लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं।


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