स्वतंत्रता और लोकतंत्र के देश में चुपचाप हुआ नस्ली विस्फोट!


” ट्रंप का राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतना अधिकांश लोगों को अचंभित कर गया था  लेकिन वह जीते यह एक सच्चाई थी ,जैसे आज हारे हैं, यह एक सच्चाई है. क्या हम ने उनकी जीत के कारणों का कभी विश्लेषण किया है? शायद नहीं. उनकी जीत क्या ओबामा के दो दफा राष्ट्रपति बन जाने की एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया नहीं थी? मेरा मानना है यही सच था. बराक ओबामा का राष्ट्रपति होना अमेरिका के सामाजिक-राजनीतिक जीवन में यदि एक क्रांति थी तो डोनाल्ड ट्रम्प का जीतना एक प्रतिक्रांति. यह एक नस्ली विस्फोट था जो चुपचाप हुआ था. इसकी जड़ें कु-क्लक्स -क्लान जैसी सोच में थीं  और यहीं पूरी दुनिया को सोचना है कि उसे क्या करना है.”


प्रेमकुमार मणि प्रेमकुमार मणि
काॅलम Published On :


पिछले बुधवार को संयुक्त राज्य अमेरिका में वर्तमान, लेकिन अगले राष्ट्रपति पद के चुनाव में पराजित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सैंकड़ों हथियारबंद समर्थकों ने अमेरिकी संसद में घुस कर ऐसी अफरा -तफरी पैदा कर दी , कि पूरी दुनिया हैरान रह गई. ये हथियारबंद ट्रम्प समर्थक संसद की उस कार्यवाही पर दबाव बना रहे थे, जहाँ चुनाव नतीजों पर संसद की मुहर लगनी थी . यह अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव की एक प्रक्रिया है. अर्थात हिंसक भीड़ ताकत से जनमत को प्रभावित करना चाह रही थी.

74 वर्षीय डोनाल्ड ट्रम्प फिलहाल राष्ट्रपति हैं. अगले राष्ट्रपति पद के लिए जो चुनाव हुए, उस में वह अपनी रिपब्लिकन पार्टी के दुबारा उम्मीदवार थे लेकिन पिछले दिनों जो चुनाव हुए उसमें वह डेमोक्रेट उम्मीदवार जो बाइडेन से पिछड़ गए. उन्होंने अदालत की शरण ली लेकिन अदालत का समर्थन भी नहीं मिला. अमेरिकी कायदों के मुताबिक इसी माह की 20 तारीख को नवनिर्वाचित राष्ट्रपति को पदभार ग्रहण करना है. इसके पहले संसद की मुहर लगती है. इसी वास्ते जो प्रक्रिया चल रही थी उसे बलात प्रभावित करने के इरादे से राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपने समर्थकों से संसद की तरफ कूच करने की अपील की और तैयार बैठे समर्थक संसद भवन में दोपहर लगभग दो बजे घुस भी गए. उन लोगों के घुसते ही अफरा-तफरी स्वाभाविक थी . यह लगभग वैसा था जैसा हमारे देश भारत में 13 दिसंबर 2001 को संसद की चल रही कार्यवाही के बीच लश्करे तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादियों का हमला था. अमेरिकी संसद की इस अफरा-तफरी में पाँच (एक पुलिस अफसर समेत) लोगों के मारे जाने की भी खबर है. इस बीच संसद ने जो बाइडेन और भारतीय मूल की कमला हैरिस के क्रमशः राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुने जाने की पुष्टि कर दी है. 538 सदस्यों वाली कांग्रेस ( यूएसए संसद ) में जो बाइडेन को 306 और डोनाल्ड ट्रम्प को 232 सीटें मिली हैं .

बुधवार की घटना किसी नवोदित लोकतान्त्रिक देश में नहीं, उस अमेरिका में हुई है जहाँ स्वतंत्रता और लोकतंत्र की लम्बी लड़ाई लड़ी गई है.  4 जुलाई 1776 को जॉर्ज वाशिंगटन के नेतृत्व में एक लम्बे संघर्ष के बाद अमेरिका ने आज़ादी हासिल की थी और लोकतंत्र का संकल्प लिया था. हर वर्ष 4 जुलाई को अमेरिका अपनी आज़ादी का जश्न मनाता है. वह यूरोपीय देशों से कुछ अर्थों में भिन्न है कि वहां रेंनसां या प्रबोधनकाल नहीं आया और समाजवादी बुखार भी उस तरह नहीं आया जैसा यूरोप के देशों में आया लेकिन लोकतंत्र के उसके वायदे हमेशा चिन्हित किए जाते रहे हैं. आधुनिक ज़माने के अनेक सामाजिक दार्शनिकों ने वहां के लोकतान्त्रिक आंदोलन से प्रेरणा ली है. इसमें कार्ल मार्क्स भी हैं और हमारे देश के जवाहरलाल नेहरू और भीमराव आम्बेडकर भी. उन्नीसवीं सदी में भारत के किसान नेता और महाराष्ट्रीय नवजागरण के प्रतीक पुरुष महात्मा जोतिबा फुले ने अपनी प्रसिद्ध किताब ‘गुलामगीरी’ उन अमेरिकी योद्धाओं को समर्पित की है जिन्होंने अमानवीय दास अथवा गुलाम प्रथा के खिलाफ आंदोलन किया था और सफलता हासिल की थी. मानवता की मुक्ति के लिए अमेरिका को हमेशा याद किया जाता है. वह जॉर्ज वाशिंगटन का देश है तो एंड्रू जैक्सन और अब्राहम लिंकन का भी. 1829 में जब वहाँ एंड्रू जैक्सन राष्ट्रपति चुना गया तो उसने एकबारगी कई तरह के तामझाम को उतार फेंका. वह सामान्य कार्यकर्ताओं के साथ व्हाइट हाउस में घुसा और उसके पूरे अभिजात ढकोसलों को तहस नहस कर दिया. कहा जाता है कि वह अमेरिका में वास्तविक लोकतंत्र लाया. यह भी कहा जाता है कि अमेरिका में वास्तविक (रियल ) लोकतंत्र है  जबकि ब्रिटिश लोकतंत्र में आज भी अभिजात ( रॉयल ) तत्व हावी हैं .

लेकिन यह भी है कि हर देश की तरह वहाँ भी वर्चस्ववादी ताकतें बनी हुई हैं और कभी -कभार सिर भी उठाती हैं. उन्नीसवीं सदी में गृहयुद्ध के बाद के दिनों में वहां गोरों के एक नस्लवादी संगठन कु-क्लक्स-क्लान की धूम रही. एक अजीब सी वर्दी पहने कु-क्लक्स-क्लान (3K) के स्वयंसेवक जगह -जगह परेड करके अपने प्रभाव का प्रदर्शन करते थे. इनकी ओर से आतंककारी कार्रवाइयां भी की गईं  लेकिन कुछ ही वर्षों बाद इनके प्रभाव सिमटने लगे. इस सदी के आरम्भ में यह सुना गया कि  3K की सदस्यता में एक बार फिर इजाफा हो रहा है लेकिन तभी खबर आई कि एक ब्लैक बराक ओबामा अमेरिकी राष्ट्रपति चुने गए हैं. एक बार फिर अमेरिकी लोकतंत्र ने दुनिया को आश्वस्त किया कि हम वही अमेरिका हैं जिसकी नींव वाशिंगटन, जैक्सन और लिंकन जैसे लोगों ने रखी है जिसने एक समय नस्लवादी दास प्रथा का कानून द्वारा अंत किया है, जहाँ सोजॉर्नर ट्रुथ ने कभी गुलामी प्रथा के खिलाफ आंदोलन किया है लेकिन अफ़सोस दुनिया भर में लोकतंत्र के बुझते चिरागों को बल देने वाला अमेरिका आज खुद कहाँ आ गया है?

अमेरिका आज इस स्तर तक कैसे पहुंचा? इसके लिए अमेरिकी समाज में आई गिरावट और उसके बीच उभरते नए जीवन मूल्यों को देखा जाना चाहिए. डोनाल्ड ट्रम्प के व्यक्तित्व और सरोकारों को भी देखा जाना चाहिए. ट्रम्प की राजनीतिक पृष्ठभूमि अत्यंत क्षीण रही है. वह राजनेता नहीं ,बल्कि बिजनसमैन रहे हैं ,कारोबारी रहे हैं. उन्होंने येन-केन रिपब्लिकन पार्टी की उम्मीदवारी हासिल कर ली और जीत भी गए. उनका राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतना अधिकांश लोगों को अचंभित कर गया था  लेकिन वह जीते यह एक सच्चाई थी ,जैसे आज हारे हैं, यह एक सच्चाई है. क्या हम ने उनकी जीत के कारणों का कभी विश्लेषण किया है? शायद नहीं. उनकी जीत क्या ओबामा के दो दफा राष्ट्रपति बन जाने की एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया नहीं थी? मेरा मानना है यही सच था. बराक ओबामा का राष्ट्रपति होना अमेरिका के सामाजिक-राजनीतिक जीवन में यदि एक क्रांति थी तो डोनाल्ड ट्रम्प का जीतना एक प्रतिक्रांति. यह एक नस्ली विस्फोट था जो चुपचाप हुआ था. इसकी जड़ें कु-क्लक्स -क्लान जैसी सोच में थीं  और यहीं पूरी दुनिया को सोचना है कि उसे क्या करना है.

मैं नहीं समझता कि इस एक घटना से अमेरिका में लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होंगी. मेरा मानना है कि इसके विपरीत वह मजबूत होगी. यदि अमेरिका के स्वातंत्र्य आंदोलन का पूरी दुनिया में असर पड़ा था तो इस घटना का पड़ना भी लाज़िमी है. हमारे देश भारत में इसकी क्या प्रतिक्रिया होगी अभी देखना है. यह वही अमेरिका है जो आपातकाल के दौरान (1975 ) हमें सीख दे रहा था. भारत में जैसे ही इंदिरा गांधी पराजित हुईं उन्होंने सत्ता छोड़ दी. कोई सोच भी नहीं सकता था कि कोई ऐसी घटना होगी कि इंदिरा चुनाव नतीजों को मानने से इंकार कर दें  जैसा कि कुछ वर्ष पूर्व भारत के पड़ोसी संयुक्त पाकिस्तान में हुआ था कि चुनाव में शेख मुजीबुर्रहमान को स्पष्ट बहुमत प्राप्त कर लेने के बाद भी याह्या खान – जुल्फिकार अली भुट्टो की जोड़ी ने सत्ता सौंपने से इंकार कर दिया था. भारत में ऐसा कभी नहीं हुआ.

भारतीय प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव-प्रचार में हिस्सा ले कर ट्रम्प के लिए वोट मांगे थे. किसी दूसरे देश के शासनाध्यक्ष का दूसरे देश की राजनीति में इस तरह का हस्तक्षेप निंदनीय होना चाहिए. यही कारण है कि आज भारत के सवा सौ करोड़ लोग शर्मिंदगी का अनुभव कर रहे हैं . हालांकि भारतीय प्रधानमंत्री ने अपने तथाकथित मित्र के समर्थकों हरकतों पर औपचारिक नाराजगी और क्षोभ दर्ज किया है.

प्रेम कुमार मणि वरिष्ठ लेखक और पत्रकार हैं। सामाजिक प्रश्नों पर अपने बेबाक लेखन के लिए जाने जाते हैं। बिहार विधान परिषद के सदस्य भी रह चुके हैं।

 


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