दलित राजनीति का उद्भव, विकास और पतन-3

कँंवल भारती कँंवल भारती
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सम्पूर्ण क्रान्ति का युग

 

सत्तर के दशक को महत्वपूर्ण राजनैतिक आन्दोलनों के लिये जाना जाता है। इस युग में दलित राजनीति का कोई उल्लेखनीय विकास नहीं हुआ। पर आम चुनावों में जगजीवन राम वाली काँग्रेस को दलित वर्गों का देशभर में समर्थन मिला और 1972 में इंदिरा गाँधी की नई सरकार बनी। इंदिरा गाँधी ने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया, पर उनकी सरकार ने इस नारे को अमली जामा कभी नहीं पहनाया। इसी समय उन्होंने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया और पहली बार दलित और कमजोर वर्गों के आर्थिक विकास का रास्ता बैंकों के मार्फत खुला। इस कदम ने दलितों के उत्थान में कोई क्रान्तिकारी भूमिका तो नहीं निभाई, पर उन्हें परम्परागत और मलिन व्यवसायों से जोड़े रखने के लिये कर्ज की दलदल में जरूर ढकेल दिया गया.

इस दशक की सबसे महत्वपूर्ण घटना है आपातकाल, जो 1975 में इंदिरा गाँधी ने देश पर थोपा। यह ढाई साल रहा और इस दौर में इंदिरा गाँधी और सरकार का विरोध आतंक का पर्याय बन गया था, जो आम जनता और विरोध करने वालों पर कहर बरसा रहा था। सरकार में संजय गाँधी का हस्तक्षेप क्रूर तानाशाह की तरह था। जगजीवन राम भी उपेक्षित कर दिये गये थे। अतः 1976 में जगजीवन राम सरकार और काँग्रेस दोनों को छोड़कर बाहर आ गये थे। दलितों के लिये यह भी एक बड़ी घटना थी। भारतीय राजनीति में जगजीवन राम के काँग्रेस छोड़ने फैसले को एक परिवर्तनकारी घटना के रूप में देखा गया। दलितों पर इसका बहुत असर पड़ा। वे इंदिरा गाँधी और काँग्रेस दोनों के विरोधी हो गये।

आपातकाल के दौर में समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण ने आपातकाल और इंदिरा गाँधी के खिलाफ देशव्यापी आन्दोलन चलाया, जो कुछ ही समय बाद ‘सम्पूर्ण क्रान्ति’ के नारे में बदल गया। दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद ने लिखा है कि जे.पी. आन्दोलन मात्र इंदिरा गाँधी की निरंकुशता के परिणामस्वरूप नहीं था, बल्कि ‘‘ग्रामीण-सम्पत्ति के स्वामित्व में पिछड़े वर्ग की (पिछड़ों में अगड़े वर्ग की) बढ़ती हिस्सेदारी, ग्रामीण समाज के मोटे हो रहे कुलीन वर्ग का शहर केंद्रित काँग्रेसी दृष्टिकोण के प्रति असंतोष, 1972 के नये भूमि हदबंदी कानूनों को लागू करना, सवर्ण शिक्षित युवकों में व्यापक पैमाने पर बेरोजगारी, गरीबी हटाओ जैसे डरावने नारों की स्थापना, अंतराष्ट्रीय स्तर पर सोवियत रूस से श्रीमति गाँधी की निकटता तथा उनके द्वारा समाजवादी मूल्यों के प्रति आकर्षण जैसे प्रश्न जमीनी तौर पर बड़े कारक थे।’’ बाबू जगजीवन राम के लिये यह वह समय था, जब वे दलित राजनीति को पुनर्जीवित कर उसका पृथक रूप से क्रान्तिकारी विकास कर सकते थे, पर वे ऐसा नहीं कर सके। उन्होंने अपनी ‘काँग्रेस फार डेमोक्रेसी’ पार्टी बनाई, पर भारतीय राजनीति में वह कोई दस्तक नहीं दे सकी।

1977 में जनता पार्टी बनी, जिसमें लगभग पूरे विपक्ष की भागीदारी थी। जनसंघ भी इसमें शामिल था। जनता पार्टी ने बदली हुई राजनैतिक परिस्थितियों में दलितों के वोट के मकसद से जगजीवन राम को प्रधनमन्त्री के रूप में प्रस्तुत कर चुनाव लड़ा। चुनावों में इंदिरा गाँधी की पराजय हुई और जनता पार्टी विजयी हुई। पर जनता पार्टी के उच्च जातीय नेतृत्व ने अपना वादा पूरा नहीं किया। उन्होंने जगजीवन राम को दरकिनार कर मोरार जी देसाई को प्रधनमन्त्री बनाया। इस प्रकार इस नये राजनैतिक प्रयोग में भी दलितों के साथ विश्वासघात हुआ।

जनता पार्टी का गठन और उसका सत्ता में आना सत्तर के दशक की सचमुच महत्वपूर्ण घटना थी। पर सत्ता का चरित्र और उसकी शासन-शैली ब्राह्मणवादी ही थी। इस सरकार ने शहरी विकास के बजाय ग्रामीण विकास को विशेष महत्व दिया, जो गाँवों में दलितों के शोषण का कारण बना। गाँव का कुलीन वर्ग शक्तिशाली बना और दलितों के लिये ग्रामीण समाज-व्यवस्था अभिशाप ही बनी रही। जनता पार्टी की सरकार ने दलित वर्गों में अशिक्षा और बेरोजगारी दूर करने की दिशा में कोई काम नहीं किया। 1979 में जनता सरकार का पतन हो गया। चौधरी  चरण सिंह ने सरकार बनाने का दावा किया, जिसे राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने स्वीकार कर लिया। चरण सिंह की सरकार संसद का मुँह भी नहीं देख सकी और ढाई महीने में उसके पतन के बाद बाबू जगजीवन राम ने सरकार बनाने का दावा प्रस्तुत किया, पर राष्ट्रपति ने उसे नामंजूर कर दिया और लोकसभा भंग कर दी गई।

अतः कहना न होगा कि दलित राजनीति के लिये सत्तर का दशक सबसे ज्यादा दुःखद था। दलितों के वोटों ने जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत तो दिलाया, पर सरकार के सवर्ण रहनुमा जगजीवन राम को प्रधानमंत्री बनाने की उदारता नहीं दिखा सके। उन्होंने दलितों का उपयोग करने के बाद उन्हें नकारने की नीति को अंजाम दिया। निस्सन्देह दलित इस खेल में ठगे गये थे। इस दौर में उत्तरप्रदेश के भी दलितों के साथ यही क्रूर खेल खेला गया। उत्तरप्रदेश में भी जनता पार्टी बहुमत में आई थी। वहाँ दलित नेता रामधन  को मुख्यमंत्री  के रूप में प्रस्तुत किया गया था, पर यहाँ भी सवर्ण नेतृत्व ने लोकतांत्रिक पद्धति का क्रूर नाटक खेला और रामधन को दरकिनार कर रामनरेश यादव को मुख्यमंत्री  बना दिया गया। यह सचमुच एक षड़यन्त्र था, जो दलित नेतृत्व के खिलाफ रचा गया था। इस तरह सत्तर के दशक के उत्तरार्द्ध में उभरा सम्पूर्ण क्रान्ति का जेपी आन्दोलन भी राजनैतिक रूप से दलित क्रान्ति का वाहक नहीं बन सका। यह वह राजनैतिक काल था, जिसमें प्रगतिशील और वाम राजनैतिक विचारधारा के लोग दलित राजनीति से जुडकर उसे एक व्यापक स्वरूप प्रदान कर सकते थे। पर एक प्रकार से दलितों के लिये यह एक आजमाइश का दौर भी था। दलित पूरी तरह से हताश और निराश हो चुके थे, जिसका विस्फोट हमें आगे चलकर दिखाई देता है।

 

वैकल्पिक दलित राजनीति का उदय

दलित राजनीति को अपना स्वतन्त्र अस्तित्व बनाने का एक अवसर अस्सी के दशक में मिला। दलित राजनीति के लिये यह दशक अत्यन्त महत्वपूर्ण है। वास्तव में समकालीन दलित विमर्श का उदय उसी काल में हुआ। 1980 में काँशीराम ‘बामसेफ’ (बैकवर्ड एंड मायनारिटीज शेड्यूल्ड कास्ट इंप्लाई फेडरेशन) के माध्यम से भारतीय समाज में एक नया दलित विमर्श लेकर अवतरित हुए। रिपब्लिकन  पार्टी के पतन के बाद काँशीराम ने जो स्वयं भी उसी पार्टी में काम करते थे, नये सिरे से दलित वर्गों को लामबंद करना शुरु किया। इसके तहत उन्होंने पहले दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदाय के कर्मचारियों का फेडरेशन (बामसेफ) कायम किया, जिसकी स्थापना तो यद्यपि उन्होंने 1978 में हुई थी, पर उसका व्यापक असर 1980 में देश में दिखाई दिया। नई दिल्ली, चंडीगढ़ और नागपुर में उसके विशाल अधिवेशन हुए। उन्होंने बामसेफ को एक कैडर के रूप में विकसित किया, जिसके दस विभाग थे। बामसेफ के तहत ही उन्होंने हिन्दी में ‘बहुजन संगठक’ (साप्ताहिक ) तथा अँग्रेजी में ‘आप्रेस्ड इंडिया’ (मासिक) पत्रों का प्रकाशन किया। यह एक क्रान्तिकारी कदम था, जिसने बहुत बड़े पैमाने पर देशभर के दो लाख कर्मचारियों को बामसेफ का नियमित सदस्य बनाया था, जिसमें डाक्टर, इंजीनियर, स्नातक, स्नातकोत्तर और रिसर्च स्कालर थे।

हर जनपद में बामसेफ से जुड़े लोगों को कैडर प्रशिक्षण कराया जाता था। प्रशिक्षण में किस तरह ब्राह्मणी व्यवस्था देश में स्थापित हुई तथा वह किस तरह दलित वर्गों का शोषण करती है, यह जानकारी दी जाती थी। काँशीराम भारतीय समाज-व्यवस्था को ब्राह्मणवाद का उत्पाद कहते थे। इस समाज व्यवस्था का जो चित्र उन्होंने बनाया था, उसमें दो वर्ग थे। पहला वर्ग व्यवस्था से लाभान्वित लोगों का था, जिसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य थे और उनकी संख्या 10 से 15 प्रतिशत है। दूसरे वर्ग में वे लोग हैं, जो इस व्यवस्था के शिकार हुए हैं और उनकी संख्या वे 80 से 90 प्रतिशत दर्शाते थे।

इस नये दलित विमर्श ने दलित वर्गों को सबसे ज्यादा प्रभावित किया। काँशीराम ने दलित वर्गों को ‘बहुजन’ कहा और व्यवस्था से लाभान्वित होने वाले लोगों को ‘मनुवादी’ नाम दिया। ये दोनों नाम भारतीय समाज और राजनीति के लिये बेहद विचारोत्तेजक थे और शीघ्र ही ये दोनों नाम प्रसिद्ध  हो गये। व्यवस्था से पीड़ित लोगों को ‘बहुजन’ नाम राजनैतिक उद्देश्य से दिया गया था। यह ‘दलित’ और ‘हरिजन’ शब्दों के मुकाबले ज्यादा बोधगम्य और ग्राह्य था। इसकी अर्थवत्ता ‘बहुसंख्यक समाज’ के हिन्दू मिथक को ध्वस्त करती है और इस सत्य का उद्घाटन करती है कि वास्तविक बहुसंख्यक वे हैं, जो ब्राह्मणवादी व्यवस्था से पीड़ित हैं। इस नये दलित विमर्श ने राजनैतिक क्षेत्र में हिन्दुओं अर्थात् द्विज वर्ग को अल्पसंख्यक घोषित कर दिया।

इसी समय काँशीराम की दलित विमर्श की राजनैतिक पुस्तक ‘चमचा एज’ प्रकाशित हुई। इस पुस्तक ने राजनैतिक क्षेत्र में तहलका मचा दिया। हालाँकि इस पुस्तक में ब्राह्मण राजनीति की पिछलग्गू दलित राजनीति पर चर्चा है, परन्तु राष्ट्रीय राजनैतिक पार्टियों की ब्राह्मणवादी चिंताओं को भी यह पुस्तक खोलकर रख देती है। काँशीराम लिखते हैं, ‘‘राष्ट्रीय स्तर की सभी सातों पार्टियों का नेतृत्व उच्च जाति के हिन्दुओं के हाथों में है। उनका काम सिर्फ उच्च जातियों के शासन को स्थायी बनाना है।’’

1981 में काँशीराम ने डीएस 4 (दलित समाज शोषित संघर्ष समिति) की स्थापना की। यह आन्दोलन का वह प्लेटपफार्म था, जिसने आगे चलकर राजनैतिक संघर्ष का रूप धारण किया। समता और सम्मान के नारे के साथ डीएस 4 ने कन्याकुमारी से कारगिल और कोहिमा से पोरबंदर तक अखिल भारतीय साईकिल मार्च शुरु किया, जो सौ दिन के बाद दिल्ली में समाप्त हुआ और जिसमें तीन लाख लोगों ने भाग लिया। पूना-पैक्ट के पचास वर्ष पूरे होने पर 1982 में काँशीराम ने डीएस 4 की देशभर में ‘धिक्कार रैली’ निकाली, जिसका दलित वर्गों में व्यापक स्वागत हुआ। 1982 में हरियाणा के विधानसभा चुनावों में राजनैतिक प्रयोग के लिये डीएस 4 को एक सीमित कार्यवाही के तहत उतारा गया। इन चुनावों में डीएस 4 को 57,588 वोट प्राप्त हुए, जो कुल वोटों का 1.19 प्रतिशत था। यह स्थिति अन्य तीन राजनैतिक दलों सीपीआई (0.04 प्रतिशत), सीपीआईएम (0.38 प्रतिशत) और काँग्रेस एस (0.01 प्रतिशत) के मुकाबले काफी अच्छी थी। इस सीमित राजनैतिक कार्यवाही का लक्ष्य चुनाव जीतना नहीं था, वरन् यह देखना था कि दलित वर्गों के लोग अपने अधिकारों के प्रति कितने जागरूक हैं? 1983 के जम्मू एंड कश्मीर के चुनावों में भी डीएस 4 को उतारा गया। चुनाव परिणाम यहाँ भी पूरी तरह हतोत्साहित करने वाले नहीं थे।

1984 में काँशीराम ने डीएस 4 की राजनैतिक कार्यवाही से उत्साहित होकर ‘बहुजन समाज पार्टी’ (बसपा) की स्थापना की। इसी वर्ष उन्होंने बसपा से लोकसभा का चुनाव लड़ा और दस लाख वोट प्राप्त किये। उत्तरप्रदेश विधानसभा के चुनावों में बसपा का यद्यपि एक भी प्रत्याशी नहीं जीता था,  पर उसे मिलने वाले वोट सात लाख से भी ज्यादा थे। पंजाब विधानसभा के चुनावों में भी बड़ी सफलता मिली. 1985 में बिजनौर में लोकसभा के उपचुनाव में बसपा की एक अपरिचित महिला उम्मीदवार मायावती को जगजीवन राम की पुत्री  मीरा कुमार से सिर्फ पाँच हजार वोट कम मिले थे।

काँशीराम ने 1988 तक अस्पृश्यता, अन्याय, असुरक्षा और असमानता के विरुद्ध  एक सघन सामाजिक कार्यक्रम चलाया। 1990 तक उन्होंने पूरे देश में सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक मुक्ति का आन्दोलन चलाया। सामाजिक परिवर्तन के अन्तर्गत उनके पाँच कार्यक्रम थे- (1) आत्म-सम्मान, (2) स्वतन्त्रता, (3) समता,( 4) जाति का विनाश और (5) अस्पृश्यता, अन्याय, अत्याचार तथा आतंक का उन्मूलन। आर्थिक मुक्ति के अन्तर्गत भी उन्होंने पाँच आन्दोलन चलाये- (1) किसान-मजदूर आन्दोलन, (2) सफाई-मजदूर आन्दोलन, (3) दस्तकार आन्दोलन, (4) शरणार्थी आन्दोलन और (5) भागीदारी आन्दोलन।

सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक मुक्ति के ये दोनों कार्यक्रम भारतीय राजनीति में एक नये युग का सूत्रपात थे। ये कार्यक्रम क्रान्तिकारी थे, क्योंकि इन्होंने दलित विमर्श को ही नहीं, दलित राजनीति को भी नया आयाम दिया था। यहाँ दो आन्दोलनों पर चर्चा करना जरूरी है। एक किसान आन्दोलन पर और दूसरे शरणार्थी आन्दोलन पर, क्योंकि ये अन्य आन्दोलनों से एकदम अलग थे और मूलरूप से दलित सम्वेदना से जुड़े थे। काँशीराम ने किसानों को तीन वर्गों में विभाजित किया था- (1) भूमिहीन किसान, जो 34 प्रतिशत हैं, (2) सीमांत किसान, जो 26 प्रतिशत हैं, और, (3) खेतिहर किसान, जो 18 प्रतिशत हैं। इनमें देश की कुल कृषि-प्रधान आबादी के लगभग 50 प्रतिशत लोग इन्हीं तीन वर्गों में आते हैं। इस आन्दोलन का मकसद कृषि मजदूरों के आर्थिक हितों की सुरक्षा करना था। यह आन्दोलन अन्य किसान आन्दोलन से इस मामले में इस मायने में अलग था कि दूसरे लोग  सिर्फ कृषि उपज के मूल्य में  वृद्धि की बात करते थे, जिनका लाभ बड़े जमींदारों को मिलता है। कृषि मजदूरों की मजदूरी बढ़ाने की बात वे नहीं करते थे।

शरणार्थी आन्दोलन भी उन दलितों की सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा के लिये चलाया गया था, जो सामन्तों और ब्राह्मणों के आतंक से भागकर गाँवों से शहर आते हैं और यहाँ भी उनके पुनर्वास पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। काँशीराम ने इन शरणार्थियों के पुनर्वास के सम्बन्ध में कहा कि केन्द्र सरकार पाकिस्तान और कश्मीर से (यहाँ तक कि पंजाब से भी) भागकर आये लोगों के लिये अलग से पुनर्वास पर करोड़ों रुपये खर्च करती है। इन लोगों के लिये अलग से पुनर्वास मन्त्रालय काम करता है, परन्तु लगभग दस करोड़ दलित शरणार्थियों के पुनर्वास के लिये कोई पैसा खर्च नहीं किया जाता। बसपा के इन कार्यक्रमों ने दलित वर्गों में जबरदस्त ध्रुवीकरण पैदा किया और वे हजारों वर्षों से असमानता पर टिकी व्यवस्था को बदलने के कार्यक्रम पर बसपा से जुड़ते चले गये।

अस्सी का लगभग पूरा दशक काँशीराम के दलित विमर्श के लिये याद किया जायेगा। भारतीय राजनीति में सामाजिक परिवर्तन की दस्तक देने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है। इससे पहले के दशक में जिस तरह दलित हाशिये पर चले गये थे, इस दशक में वे राजनीति के केन्द्र में आ गये थे। सभी राजनैतिक दल इस नये दलित उभार से प्रभावित हुए बिना नहीं रहे थे और किसी भी दल के लिये दलित चेतना की उपेक्षा करना मुश्किल हो गया था।

काँशीराम ने दो जबरदस्त काम इस दशक के अंतिम वर्षों में (87 से 90 त)  किये। वे थे, मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिये पिछड़ी जातियों में आन्दोलन चलाना, जिसने पहली बार पिछड़ी जातियों को अपनी राजनैतिक ताकत का अहसास कराया था। उनमें यह चेतना काँशीराम ने ही पैदा की थी कि वे सत्ता में भागीदारी से वंचित वर्ग हैं, जबकि उनकी न सिर्फ सर्वाधिक आबादी है, बल्कि उनके वोट के बल पर ही ब्राह्मण वर्ग उन पर शासन कर रहा है।

दूसरा बड़ा काम काँशीराम ने उन मुसलमानों को आन्दोलित करने का किया, जो मजलूम हैं। दूसरे शब्दों में, उन्होंने दलित मुसलमानों की बदहाली का सवाल उठाया, जिन पर उच्च तबके का मुस्लिम वर्ग उसी प्रकार शासन करता है, जिस प्रकार दलितों पर ब्राह्मण वर्ग शासन करता है। उन्होंने दलित मुसलमानों के साथ-साथ दलित ईसाईयों और दलित सिखों को भी बसपा से जोड़ने के आन्दोलन चलाये, जिसमें उन्हें सफलता भी मिली। यह यथास्थितिवाद के खिलाफ आन्दोलन था, जो इससे पहले अस्तित्व में नहीं आया था। ब्राह्मणवाद के लिये यह दौर सचमुच संकट का दौर था। वह सामाजिक परिवर्तन की इस क्रान्ति में अपने अस्तित्व के लिये चिंतित देखा जा रहा था।

पिछली कड़ी- दलित राजनीति का उद्भव, विकास और पतन-2

*कँवल भारती हमारे युग के एक विशिष्ट चिंतक हैं। सामाजिक परिवर्तन के विचार से गहराई से जुड़े कँवल जी का लेखन अपनी विश्लेषण शैली और वस्तुपरकता के कारण अलग से पहचाना जाता है। यह इस महत्वपूर्ण लेख की  तीसरी कड़ी  है। कल चौथी और अंतिम कड़ी में चर्चा करेंगे  बीएसपी  के  सफर की जो  बीजेपी का सहयोगी बनकर क्रांति को  प्रतिक्रांति में बदल गयी।


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