दलित राजनीति का उद्भव, विकास और पतन-4

कँंवल भारती कँंवल भारती
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क्रान्ति और प्रतिक्रान्ति का दौर

 

भारतीय राजनीति में 1990 का दशक सामाजिक न्याय और सामाजिक परिवर्तन का दशक माना जायेगा, क्योंकि इसी दशक में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू हुईं और दलित-पिछड़ी जातियों को शासन-प्रशासन में भागीदारी हासिल हुई। इसी दशक में दलित राष्ट्रपति का मुद्दा भारतीय राजनीति में गरम हुआ और इसी दशक में दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों का राजनैतिक ध्रुवीकरण अस्तित्व में आया। उत्तरप्रदेश में दलित महिला को मुख्यमंत्री  और केन्द्र में पिछड़े वर्गों की सरकार बनाने वाला भी यही दशक है और अति-दलितों तथा महिलाओं के लिये पृथक आरक्षण की माँग भी इसी दशक में मुखर हुई।

भारतीय राजनीति में 1990 का दशक ही हिन्दुत्व के आन्दोलन का भी दशक है। इसी दशक में राम मन्दिर का धर्मोन्माद पैदा हुआ और रामरथ यात्राएँ निकलीं। इसी दशक में हिन्दू लहर ने अयोध्या की बाबरी मस्जिद को तोड़ा और सारे देश का सामाजिक सद्भाव बिगाड़ा।

सामाजिक परिवर्तन और हिन्दुत्व का आन्दोलन दोनों आकस्मिक घटनाएँ नहीं हैं, वरन् इन दोनों के बीच गहरा सम्बन्ध है। ये दोनों क्रान्ति और प्रतिक्रान्ति की घटनाएँ हैं। स्थापित व्यवस्था के विरुद्ध  दलित-पिछड़ी जातियों की क्रान्ति ने सामाजिक परिवर्तन की राजनीति को जन्म दिया और उनके विरुद्ध भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) तथा अन्य हिन्दू संगठनों ने हिन्दुत्व का आन्दोलन चलाकर प्रतिक्रान्ति की थी।

आइये इसके विस्तार में जाते हैं। 1990 में दो बड़ी राजनैतिक महत्व की घटनाएँ हुईं। पहली, सामाजिक परिवर्तन के समानान्तर ‘सामाजिक न्याय’ की राजनीति अस्तित्व में आई। राजनीति में यह नारा जनता दल नेता विश्वनाथ प्रताप सिंह ने दिया। यह नारा निश्चित रूप से बसपा के विरुद्ध  था, जो सामाजिक परिवर्तन का आन्दोलन चला रही थी। एक तरफ से यह भी राजनैतिक प्रतिक्रान्ति थी, जिसके जनक धर्मनिरपेक्षवादी और लोहियावादी सवर्ण राजनीतिज्ञ थे। इस प्रतिक्रान्ति का खास मकसद शूद्र राजनीति को उभारना था। दार्शनिक अर्थ में सामाजिक न्याय का नारा अत्यन्त आकर्षक था, पर इसकी राजनैतिक अर्थवत्ता सामाजिक परिवर्तन की अर्थवत्ता से भिन्न थी। सामाजिक परिवर्तन जहाँ व्यवस्था-परिवर्तन के अर्थ में था, वहाँ सामाजिक न्याय का अर्थ था, उसी व्यवस्था से न्याय की अपील करना, जो अन्याय के लिये जिम्मेदार हैं। इसलिये भारतीय राजनीति में इस नये नारे को व्यापक समर्थन मिला। काँग्रेस तथा वामपंथी दलों ने सामाजिक न्याय के नारे को स्वीकार कर लिया। लेकिन भाजपा को इस नारे से भी परेशानी थी। उसकी परेशानी का कारण था जाति-संघर्ष, जिसकी इस नयी राजनीति में भरपूर सम्भावना थी। इसलिये भाजपा कुछ समय तक तो दुविधा  की स्थिति में रही और सामाजिक न्याय स्वीकार करती रही। पर शीघ्र ही संघ परिवार के उच्च बौद्धिक मंडल ने ‘सामाजिक न्याय’ की प्रतिक्रान्ति में ‘सामाजिक समरसता’ का नया मुहावरा गढ़ लिया। किन्तु इस नारे को  गैर-भाजपाई राजनीति में स्थान नहीं मिल सका।

1990 में जो दूसरी घटना घटी, वह महान क्रांतिकारी है। यह घटना है विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकर द्वारा 1982 से निर्णय के लिये लंबित मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू करने की घोषणा। पिछड़ी जातियों के लिये सामाजिक न्याय की यह एक बड़ी राजनैतिक क्रान्ति थी। इस घोषणा से पहली बार पिछड़ी जातियों को शासन-सत्ता में भागीदारी मिलने जा रही थी, इसलिये पिछड़े वर्गों में इस घटना का जबरदस्त स्वागत हुआ।

लेकिन उतनी ही तेजी से इस क्रान्ति के विरुद्ध  सवर्ण वर्गों की जबरदस्त प्रतिक्रान्ति भी हुई। भाजपा के नेतृत्व में पूरे देश में आरक्षण-विरोधी संघर्ष समितियाँ बनीं, जिनके तहत हिंदू ताकतें दलित वर्गों के विरुद्ध हिंसा पर उतारू हो गईं। सवर्ण राजनीति और सवर्ण मीडिया ने रातों-रात विश्वनाथ प्रताप सिंह को खलनायक बना दिया। सवर्ण छात्र-छात्राओं से आत्मदाह कराया जाने लगा। बसें-रेलें और सरकारी सम्पत्ति जलाई जाने लगीं और दलित वर्गों के छात्रों को, जो जहाँ मिलता, पीटा जाने लगा। पूरे देश में एक भयानक हिंसक जातीय तनाव पैदा हो गया। केन्द्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने इस जातीय तनाव को दूर करने के लिये मंडल आयोग की रिपोर्ट उच्चतम न्यायालय को सौंप दी, जिसने तुरन्त सरकार की घोषणा के कार्यान्वयन पर रोक लगा दी। एक ही वर्ष में क्रान्ति-प्रतिक्रान्ति की दोनों घटनाएँ घट गईं। भाजपा को इतने पर भी संतोष नहीं हुआ। उसने समर्थन वापस लेकर विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार गिरा दी। चन्द्रशेखर की सरकार बनी, जो ज्यादा दिनों नहीं चली। ध्यान रहे कि आरक्षण के प्रश्न पर ही आगे चलकर समाजवादी पार्टी में विभाजन हुआ। मुलायम सिंह यादव और चन्द्रशेखर के गुट अलग-अलग हो गये। चन्द्रशेखर ने आरक्षण विरोधी गुट का नेतृत्व किया।

यहाँ पिछड़ी जातियों के वैधनिक अध्किरों के विरुद्ध  देशव्यापी सवर्ण विरोध और उसके विमर्श पर चर्चा करना जरूरी है, क्योंकि उसके बिना यह समझना मुश्किल होगा कि ‘मंडल’ की रिपोर्ट का लागू होना कितनी बड़ी क्रान्तिकारी घटना थी। इसमें हम आत्मदाह की घटनाओं तथा सवर्ण-विमर्श ही लेते हैं। आसानी होगी, यदि हम एक पत्रकार महेन्द्र प्रसाद  गुप्त, सम्पादक ‘सहकारी युग’, रामपुर के इन शब्दों से अपनी चर्चा को आगे बढ़ायें, ‘‘आज युवा शक्ति के क्षोभ को उस बिन्दु तक पहुँचा दिया, तुमने ओ बैसाखियों पर टिके प्रधानमंत्री, कि देश के चिथड़े-चिथड़े करके तुम्हारे नापाक षड़यन्त्र का पर्दाफाश करने के लिये युवक-युवतियाँ अपने जिस्मों के चिथड़े कर तुम्हारी एकमेव आराधना, एकमेव लक्ष्य कुर्सी के सामने अर्पित करने को उतारू हो गये।’’

ये विचार एक पत्रकार विशेष के नहीं थे, बल्कि सम्पूर्ण देश का सवर्ण विमर्श यही था। इस सवर्ण-विमर्श ने यह देखने का प्रयत्न नहीं किया कि युवक-युवतियों ने अपने जिस्म के चिथड़े किये नहीं थे, बल्कि ऐसा करने के लिये उनको उकसाया गया था। उस समय नवभारत टाइम्स (लखनऊ) ने इस साजिश का काफी हद तक पर्दाफाश किया था। एक पत्रकार की रिपोर्ट के अनुसार, जब अँग्रेजी के एक छात्र से पूछा गया कि मंडल आयोग क्या है, तो वह छात्र अटपटा कर बोला था, ‘‘हमे ज्यादा तो पता नहीं, पर इतना पता है कि अब हम लोगों को नौकरी नहीं मिलेगी। तो अब हम हुल्लड़ ही करेंगे।’’

एक छात्र इसी रिपोर्ट पर बताता है कि हमसे तो अन्य स्कूलों पर प्रदर्शन करने के लिये हमारे प्रिंसिपल ने कहा था। एटा में पुलिस ने पाँच व्यक्तियों को गिरफ्तार  किया था, जिन्होंने संजीव कुमार चौहान नामक छात्र को आत्मदाह करने के लिये उकसाया था। उस छात्र ने बयान दिया था कि उसको उसके दोस्तों ने यह लालच दिया था कि अगर वह अपने शरीर में थोड़ी-सी आग लगा लेगा तो उसे निश्चय ही नौकरी मिल जायेगी। दरअसल, आत्मदाह, तोड़-फोड़, आगजनी, प्रदर्शन इन सबके पीछे अपर कास्ट का हाथ था। सरकार में उच्च पदों पर बैठे हुए सवर्ण अधिकारी जातीय अहंकार से ग्रस्त राजनेता, अराजकता फैलाने वाले गुंडा तत्व और ब्राह्मणवादी प्रेस इन सभी की संयुक्त मुहिम इस विध्वंसक सवर्ण-विमर्श और युवा क्षोभ को हवा दे रही थी। स्थिति यहाँ तक जातीय विस्फोट की हो गई थी कि सवर्ण छात्रों के आत्मदाह के प्रति पिछड़े वर्गों के छात्रों ने यह कहना शुरु कर दिया था, ‘‘आरक्षण विरोध में सवर्ण युवक अकेले ही आत्मदाह न करें। अब समय आ गया है कि वे परिवार सहित आत्मदाह करें, क्योंकि सदियों से शोषण करने वालों के लिये प्रायश्चित का यही सुगम और आसान रास्ता है।’’

भाजपा की इस आरक्षण-विरोधी मुहिम को व्यापक समर्थन नहीं मिला। यह केवल द्विज वर्गों के बीच ही सीमित रहा, जो भाजपा और संघ परिवार का सदस्य था। इस मुहिम के खिलाफ दलित वर्गों की लड़ाई का जनवादी संगठनों और रचनाकारों ने समर्थन किया था। शरद जोशी ने ‘नवभारत टाइम्स’ में अपने कालम ‘प्रतिदिन’ में इस आरक्षण-विरोधी सवर्ण-विमर्श पर प्रहार करते हुए लिखा था- ‘‘क्यों नहीं वर्णव्यवस्था में ऊँचे पायदान पर बैठे वर्ण यह कह देते कि निम्न जातियाँ और पिछड़े वर्ग हिन्दू नहीं हैं?’’ (29 दिसम्बर, 1990) उन्होंने आगे लिखा- ‘‘उच्च वर्ण के कुलदीपक, तुम्हारी किस्मत है कि इस गरीब देश में तुम्हें पढ़ने के लिये कालेज मिल गया। अब इस डर से कि वह कम्प्यूटर छू लेगा, तुम उसे टाईपराइटर भी नहीं छूने देना चाहते। वह अफसर बन जायेगा, इस डर से क्लर्क नहीं बनने देना चाहते। मैकेनिक बन जायेगा, इस डर से तुम उसे पालिटेकनिक में नहीं घुसने देना चाहते। तुम कितने निर्मम और अमानवीय हो, जानते हो।’’ (4 अक्टूबर, 1990) मंडल का मामला सर्वोच्च न्यायालय में जाने के बाद पिछड़े वर्गों को निराशा हुई थी, क्योंकि यह एक तरह से उनके संघर्ष की पराजय थी। पर सवर्ण-विरोध शान्त हो गया था और आर्थिक सुधार पर सरकार और अन्य संगठनों ने न्यायालय में अपनी अपीलें दयार कर उसके निर्णय को अपने पक्ष में करने के लिये प्रयास तेज कर दिये थे।

1991 में काँशीराम इटावा संसदीय क्षेत्र से विजयी हुए। इस जीत ने राजनैतिक दलों को, खासतौर से काँग्रेस को बेचैन कर दिया। बसपा का राजनैतिक आन्दोलन और भी तेज हो गया। इधर भाजपा और संघ परिवार ने जब देखा कि ‘मंडल’ का मामला कमजोर पड़ने वाला नहीं है और दलित वर्गों में भागीदारी आन्दोलन जोर पकड़ता जा रहा है, तो वे ‘मंडल’ के मुकाबले ‘कमंडल’ लेकर खड़े हो गये। उन्होंने अयोध्या में बाबरी मस्जिद को राम का जन्म स्थान बताते हुए उसके स्थान पर राम मंदिर बनाने का आन्दोलन छेड़ दिया। हिन्दुत्व के इस कार्ड ने सचमुच चमत्कार किया। उत्तरप्रदेश में चुनाव हुए और भाजपा राम, रोटी और इंसाफ के नारे के साथ सत्ता में आ गई। कल्याण सिंह को भाजपा ने मुख्यमंत्री  बनाकर पिछड़ी जातियों को प्रभावित करने की कोशिश की। यह 1992 का दौर था। कल्याण सिंह पिछड़ी जाति के भाजपाई मुख्यमंत्री  जरूर थे, पर उनकी शासन-सत्ता का सारा नियंत्रण और संचालन संघ परिवार के हाथों में था। इस बीच केन्द्र में काँग्रेस की सरकार बन चुकी थी और नरसिम्हा  राव प्रधानमंत्री थे। भाजपा के प्रति उनका उदार दृष्टिकोण था। इसके चाहे जो राजनैतिक कारण रहे हों, पर उनके इस दृष्टिकोण ने देश के लिये घातक स्थितियाँ पैदा कर दी थीं।

बसपा की राजनीति पूरे उत्तरप्रदेश में जोरों पर थी। जून 92 में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने दलित राष्ट्रपति का मुद्दा उठाया। अपने प्रधानमंत्री-काल में वे डा. आंबेडकर को ‘भारत रत्न’ का अलंकरण देकर तथा मंडल रिपोर्ट लागू करने की घोषणा करके दलित और ओबीसी के नायक बन चुके थे। दलित राष्ट्रपति का प्रश्न उठाकर भारतीय राजनीति में उन्होंने एक और धमाका किया। काँग्रेस ने इसका समर्थन नहीं किया और उसने डा. शंकर दयाल शर्मा को अपना प्रत्याशी बनाया। वामपंथी दलों ने भी दलित राष्ट्रपति के मुद्दे पर अपना समर्थन नहीं दिया। उन्होंने राष्ट्रपति पद को जातिगत दायरों से ऊपर रखने का तर्क देकर काँग्रेस के प्रत्याशी का पक्ष लिया। भाजपा दुविधा  में थी। वह काँग्रेस को नाराज भी नहीं करना चाहती थी और अपनी दलित-विरोधी छवि भी बनाना नहीं चाहती थी। उसने कूटनीति से काम लिया। उसने दलित राष्ट्रपति के सवाल पर विश्वनाथ प्रताप सिंह के प्रत्याशी स्वेल को, जो आदिवासी ईसाई थे, समर्थन देने की घोषणा की, पर यह निर्णय उसी तरह का राजनैतिक खेल था, जो वी.वी. गिरि के मामले में इंदिरा गाँधी ने खेला था। चंद्रशेखर भी काँग्रेस के साथ थे। भाजपा सदस्यों ने पार्टी की घोषणा को दरकिनार कर अंतरात्मा की आवाज पर डा. शंकर दयाल शर्मा के पक्ष में मतदान किया। परिणामतः स्वेल हार गये और डा. शर्मा राष्ट्रपति पद के लिये विजयी हो गये।

इस घटना ने दलित वर्गों में इस चेतना का विकास किया कि वर्णव्यवस्था को बनाये रखकर सामाजिक न्याय की राजनीति एक छलावा है। 25 अगस्त, 1992 को जनता दल नेता शरद यादव ने बी.पी. मंडल के गाँव मधेपुरा, बिहार से मंडल रथयात्रा का आरम्भ किया। इसने भाजपा के हिन्दू कार्ड के लिये संकट पैदा कर दिया। अतः इसी प्रतिक्रिया में तुरन्त ही विश्व हिन्दू परिषद ने बारह हजार पिछड़े बहुल गाँवों में श्रीराम की चरणपादुका पूजन यात्रा आरम्भ कर दी। इस धर्म-यात्रा ने मुस्लिम बहुल गाँवों में साम्प्रदायिक तनाव पैदा कर दिया।

सितम्बर 1992 में हाईकोर्ट इलाहाबाद का एक और फैसला आरक्षण के विरोध में आया, जो मई 1992 में दिये गये न्यायमूर्ति  मार्कंडेय काटजू के पहले फैसले जैसा ही सवर्णों के पक्ष में था। न्यायमूर्ति काटजू के फैसले में यह व्यवस्था थी कि विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में आरक्षण असंवैधानिक है। उनका तर्क था, ‘‘विज्ञान की कोई जाति नहीं होती, इसलिये रसायनशास्त्र, भौतिकशास्त्र, गणित तथा अन्य वैज्ञानिक संस्थाओं या कालेजों में प्रवेश जाति के आधार पर नहीं होना चाहिए।’’ उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से यह व्यवस्था दी कि साहित्य, इतिहास और कला विषयों की जाति होती है। अतः दलित वर्गों को इन्हीं विषयों तक सीमित रहना चाहिए। उच्च न्यायालय के इस निर्णय ने दलितों का बहुत नुकसान किया। उन्हें कालेजों में विज्ञान विषयों में प्रवेश देना बंद कर दिया गया। बहुत से कालेजों में दलितों ने प्रवेश के लिये संघर्ष किया। इसके बावजूद कुछ ही दलित छात्रों को काफी दबाव के बाद प्रवेश मिल सका। न्यायालय के इस निर्णय के विरुद्ध दलित वर्गों में तीखी प्रतिक्रिया हुई। एक कटु प्रतिक्रिया उत्तर प्रदेश में सुलतानपुर जनपद में देखने को मिली, जहाँ दलित छात्रों ने गधे की पीठ पर ‘न्यायमूर्ति काटजू’ लिखकर बाजारों में छोड़ दिया था।

तीन महीने बाद उच्च न्यायालय इलाहाबाद का दूसरा फैसला न्यायमूर्ति  ए.डी. अग्रवाल और न्यायमूर्ति  ए.एन. सक्सेना की खंडपीठ द्वारा दिया गया। इस फैसले में उत्तरप्रदेश अधिनियम संख्या 21, सन् 1989 की वैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका को स्वीकार करते हुए उसके आधार पर उत्तरप्रदेश सरकार को लोक सेवा आयोग की संस्तुति पर नियुक्तियाँ न करने का आदेश दिया गया था। इस निर्णय के खिलाफ भी दलित वर्गों ने आन्दोलन किए। इस आन्दोलन ने न्यायपालिका को प्रभावित तो नहीं किया, पर न्यायापालिका के प्रति दलित वर्गों का अविश्वास बढ़ गया।

सितम्बर और अक्टूबर 1992 में हिन्दू कट्टरवाद चरम सीमा पर पहुँच गया और देशभर का सामाजिक वातावरण दूषित हो गया। बसपा और जनता दल के आन्दोलन भी मंडल आयोग की रिपोर्ट पर दलित वर्गों को लामबंद कर रहे थे। नवम्बर में दिल्ली में जनता दल ने मंडल-महासम्मेलन किया, जिसमें केन्द्र सरकार को चेतावनी दी गई कि यदि उसने 26 जनवरी 1993 तक मंडल आयोग की सिफारिशों को पूरी तरह लागू नहीं किया, तो उसके खिलाफ जंग छेड़ दी जायेगी। इस मंडल-महासम्मेलन ने भाजपा और संघ परिवार को भी प्रतिक्रान्ति की निर्णायक भूमिका में खड़ा कर दिया। सो विहिप ने छह दिसम्बर से अयोध्या में कार सेवा शुरू  करने की घोषणा कर दी। देशभर में ‘रामलला हम आयेंगे, मंदिर वहीं बनायेंगे’ के नारों ने साम्प्रदायिक तनाव चरम सीमा पर पहुँचा दिया, हालात ठीक वैसे ही हो गये, जैसे 1947 के पूर्व देश में थे। नरसिम्हा राव की केन्द्र सरकार का भाजपा को पूर्ण समर्थन प्राप्त था, इसलिये उसने इन हालात पर काबू पाने के लिये कोई कदम नहीं उठाया।

15 नवम्बर 1992 को मंडल रिपोर्ट पर सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला आया, जिसकी प्रतीक्षा पूरा देश कर रहा था। यह फैसला भी अन्य फैसलों की तरह अपर जातियों के पक्ष में था। सर्वोच्च न्यायालय ने पिछड़ी जातियों के लिये 27 प्रतिशत आरक्षण को स्वीकार किया, पर हवाई जहाजों में पायलट, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष तथा रक्षा उत्पादन में लगे प्रतिष्ठानों में तकनीकी पदों तथा शिक्षण क्षेत्र में प्रोफेसर, चिकित्सक, इंजीनियर और वैज्ञानिक के पदों के लिये आरक्षण को अस्वीकार कर दिया। दूसरे, उसने आर्थिक आधार पर ‘क्रीमी लेयर’ शब्द का प्रयोग किया और पिछड़ी जातियों के ऐसे लोगों के लिये जो ‘क्रीमी लेयर’ में आते हैं, आरक्षण का अधिकार समाप्त कर दिया। ‘क्रीमी लेयर’ का शब्द, जिसका हिन्दी अर्थ ‘मलाईदार परत’ या ‘खुरचन’ होता है, विधिक  शब्दावली का शब्द नहीं है। यह घृणात्मक शब्द है। डा. धर्मवीर ने इस निर्णय के विश्लेषण में लिखा है कि ‘यह व्यंग्य और व्यंजना का शब्द है। यह अभिधा  का शब्द नहीं है। संविधान में यह शब्द कहीं भी नहीं है। उसमें सिर्फ अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग, अल्पसंख्यक और दुर्बल वर्ग जैसे शब्द हैं। इन शब्दों के माध्यम से संविधान देश को एक दिशा देता है, लेकिन ‘क्रीमी लेयर’ के शब्द का प्रयोग उसे दिग्भ्रमित कर देता है।’

अपर जातियों के हितों की प्राथमिकता वाले सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय का भी पिछड़े वर्गों ने स्वागत किया और जनता दल ने ‘विजय दिवस’ मनाया। पर अपर जातियों ने इस निर्णय को भी स्वीकार नहीं किया। उसने न सिर्फ इसका विरोध किया, बल्कि देशभर में दलित वर्गों के विरुद्ध  एक और प्रतिक्रान्ति को जन्म दिया। यह प्रतिक्रान्ति विध्वंसक थी और दलित वर्गों के लिये किसी आतंक से कम नहीं थी। मंडल विरोधी वर्ग ने इलाहाबाद में उसी दिन, जिस दिन सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया, न्यायालय के निर्णय की भर्त्सना की और सरकारी वाहन जलाये। चूँकि उत्तरप्रदेश में भाजपा ज्यादा सक्रिय थी, इसलिये यहाँ भाजपा ने मंडल विरोध एक बार फिर भड़काया। इस बार अपर जातियों के छात्रों द्वारा आत्मदाह की घटनाएँ नहीं हुईं, पर पूरे प्रदेश में दलित वर्गों के छात्र उनकी हिंसा के शिकार जरूर हुए। प्रदेश के लगभग सभी जनपदों में दलित छात्रावासों पर भाजपा समर्थक और मंडल विरोधी तत्वों ने हमले किए। कमरों में घुस-घुस कर दलित छात्रों को पीटा गया। ललितपुर में एक दलित छात्र को छात्रावास भवन की तीसरी मंजिल से नीचे फेंक  दिया गया, जिसे गम्भीर चोटें आईं। मैं इस आतंक का दृष्टा और भोक्ता दोनों ही हूँ। मैं उस समय जनपद सुलतानपुर में एक दलित छात्रावास में रहता था। आरक्षण विरोधी जत्थों के हमले से छात्र आतंकित थे। शहर में डा. आंबेडकर की प्रतिमा पर आरक्षण विरोधियों  ने जूतों का हार पहना दिया था। उसके विरोध में आंबेडकर पार्क में प्रशासन के विरोध में दलितों की बड़ी सभा हुई। दलितों पर हिन्दू आतंक का यह साया कई हफ्तों तक रहा। चूँकि ये हमले भाजपा के नियंत्रण में हो रहे थे, इसलिये भाजपा ने ही इन हमलों को शांत भी किया, क्योंकि भाजपा की ही उत्तरप्रदेश में सरकार थी।

अब भाजपा और संघ परिवार ने सारा ध्यान कार सेवा की तरफ लगा दिया। संत-साधुओं और साध्वियों के जोशीले भाषणों ने ऐसा महौल पैदा कर दिया कि अयोध्या में ‘कार-सेवा’ करने वाले लोगों का भारी जमावड़ा होने लगा। केन्द्र सरकार ने बाबरी मस्जिद की सुरक्षा के लिये सुरक्षा बल भेजे, पर उन्हें फैजाबाद में ही रोक दिया गया। उन्हें अयोध्या नहीं भेजा गया। अयोध्या में 5 दिसम्बर को धर्म-संसद हुई। उसमें बाबरी मस्जिद को गिराने का संकल्प लिया गया। दूसरे दिन 6 दिसम्बर की सुबह भाजपा और संघ परिवार के वरिष्ठ नेताओं तथा देश-विदेशों के पत्रकारों की मौजूदगी में हिन्दू उन्मादी तत्वों  ने बाबरी मस्जिद को तोड़ना शुरु किया, और दो घंटे में ही उसे  पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। ‘जय श्री राम’ के नारों से हिन्दू नेताओं ने आकाश गुँजा दिया। उसी दिन केन्द्र सरकार ने उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त कर वहाँ राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया। कल्याण सिंह हिन्दू लहर के नायक बन गये। मुसलमानों का एकमात्र भरोसा नरसिंह राव की सरकार पर था, पर अब वे मुसलमानों के सबसे बड़े खलनायक बन चुके थे। इस शर्मनाक घटना की प्रतिक्रिया पूरे देश में साम्प्रदायिक दंगों में हुई। बम्बई, सूरत और उत्तरप्रदेश में भीषण हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष हुए, जिनमें हजारों बेगुनाह लोगों की जानें गईं। पड़ोसी देशों पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी इसकी प्रतिक्रिया हुई, जहाँ हिन्दू मन्दिर हिंसा के शिकार हुए। इस प्रकार 1992 का वर्ष राजनैतिक दृष्टि से बेहद उथल-पुथल वाला वर्ष रहा, जिसमें पिछड़े वर्गों की क्रान्ति और हिन्दुत्व की प्रतिक्रान्ति की महत्वपूर्ण घटनाएँ हुईं।

इन घटनाओं ने भारतीय समाज में जबरदस्त राजनैतिक ध्रुवीकरण किया। नवम्बर 1993 में उत्तरप्रदेश में विधानसभा के चुनाव हुए और इनमें भाजपा के खिलाफ दलित वर्गों के ध्रुवीकरण ने क्रान्तिकारी भूमिका निभाई। जनवरी 1993 में ही समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव और बसपा सुप्रीमो काँशीराम के बीच ऐतिहासिक गठबन्धन  हुआ। 8 फरवरी 1993 को बसपा की विशाल रैली लखनऊ में हुई। इस रैली में काँशीराम ने सम्बोधित किया। उन्होंने दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों को भाजपा के  खिलाफ सपा-बसपा गठबन्धन से जुड़ने की अपील की। इस रैली का इतना प्रभाव हुआ कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्रों ने विहिप के अशोक सिंघल को ध्वजारोहण नहीं करने दिया और अयोध्या में भाजपा ‘धर्म-संसद’ फ्लाप हो गई।

सपा-बसपा गठबन्धन  भारतीय राजनीति में एक ऐसा ध्रुवीकरण था, जो शासक वर्ग को सत्ता से अलग करने के लिये और शासित वर्ग को सत्ता में लाने के लिये बना था। शासक वर्गों ने इसे इसी अर्थ में लिया। इसलिये शासक जातियों के लोग भी भाजपा के साथ लामबंद होने लगे थे। इसी समय बहुत से शासक वर्गों के नेता भी काँग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गये। नवम्बर 93 में चुनाव हुए और उत्तरप्रदेश में काँग्रेस के अनेक उच्च जातीय जिलाध्यक्षों ने भाजपा के पक्ष में मतदान करने की खुली अपीलें की।

दलित वर्गों ने इन चुनावों को आजादी की दूसरी लड़ाई के रूप में लड़ा। यह शासक और शासित वर्ग की लड़ाई बन गई थी। भाजपा के लिये यह ब्राह्मणवाद के जीवन-मरण की लड़ाई थी। इसलिये इन चुनावों में ब्राह्मणों और सामंतों ने दलितों पर खुलकर अत्याचार किये। उनकी बन्दूकों ने निहत्थे दलित मतदाताओं को मार-मारकर लहूलुहान कर दिया और वोट नहीं डालने दिया। बस्ती, गोंडा, गाजीपुर, सुलतानपुर, फैजाबाद, प्रतापगढ़, देवरिया, आजमगढ़ और जौनपुर जिलों में दलित मतदाताओं और प्रत्याशियों पर हमले हुए। कई प्रत्याशियों को मौत के घाट उतार दिया गया। सबसे ज्यादा हिंसा फैजाबाद और सुलतानपुर में हुई। मैनपुरी, एटा, मथुरा और सहारनपुर में भी सवर्णों ने दलित मतदाताओं को आतंकित किया और वोट नहीं डालने दिया। इस हिंसा के बावजूद भाजपा सत्ता में नहीं आ सकी और सपा-बसपा गठबन्धन  को भारी सफलता मिली। उत्तरप्रदेश के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि विधानसभा में दलित वर्गों के विधायक सबसे ज्यादा थे। इतिहास में पहली बार ऐसे विधायक चुने गये, जिनके पास ढंग के कपड़े भी नहीं थे और पैरों में हवाई चप्पलें थीं। इतिहास में पहली बार ऐसे लोगों को विजय मिली, जिन्होंने साईकिल से चुनाव प्रचार किया था। यह सचमुच दूसरी आजादी की लड़ाई थी, जिसे दलित वर्गों ने अपने संघर्ष से जीता था। यह दलित वर्गों की भागीदारी आन्दोलन की सबसे बड़ी सफलता थी। यह लोकतन्त्र और धर्मनिरपेक्षता की भी जीत थी।

भाजपा को इस चुनाव में 176 सीटें मिली थीं, जो उत्तरप्रदेश में भाजपा और काँग्रेस के अमूर्त गठबन्धन का परिणाम थी। लेकिन इन चुनावों ने भाजपा को नई राजनैतिक समझ भी दी, जिसने आगे चलकर दलित वर्गों की सत्ता को समाप्त करने में प्रतिक्रान्ति की भूमिका निभाई। सपा-बसपा सत्ता में आई और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री  बने। पहली बार स्वतन्त्र रूप से दलित वर्गों के लोग सत्ता में आये। शासक वर्गों को दलित वर्गों की यह सरकार बर्दाश्त नहीं हो रही थी, अतः उन्होंने सपा-बसपा गठबन्धन  के खिलाफ प्रतिक्रान्ति के लिये अपनी साजिशें रचनी शुरु कर दीं। यह साजिश तीन प्रकार से की गईं। पहली कोशिश के तहत शासक वर्गों के नेता सपा में शामिल होकर मुलायम सिंह यादव और काँशीराम के बीच दूरियाँ पैदा करने लगे। दूसरी कोशिश के तहत मुलायम सिंह यादव की प्रशंसा की जा रही थी और काँशीराम को जातिवादी, राष्ट्र में विघटन पैदा करने वाला, अमेरिका की मदद से देश में अराजकता पैदा करने वाला और ईसाई मिशनरियों से धन  लेने वाला बताकर मुलायाम सिंह यादव को काँशीराम से सम्बन्ध् तोड़ने की सलाह दी जा रही थी। तीसरी कोशिश के तहत भाजपा के द्वारा मायावती को सत्ता का चारा फेंका जा रहा था।

दुर्भाग्यवश शासक वर्ग इस साजिश में सफल हुआ। इस साजिश को सफल बनाने में सबसे ज्यादा भूमिका मायावती की राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं ने निभाई। सारा करा-धरा  मिट्टी में मिल गया और गठबन्धन  टूट गया। भाजपा के समर्थन से मायावती मुख्यमंत्री बन गईं। बसपा अपने ही सिद्धान्तों के खिलाफ चली गई। वह उसी ब्राह्मणवाद की समर्थक बन गई, जिसके खिलाफ उसका संघर्ष था। यह बसपा का पतन तो था ही, सामाजिक परिवर्तन के आन्दोलन का पतन भी था। इसके बाद फिर बसपा गिरती गई तो गिरती ही चली गई और वह भाजपा की सहायक पार्टी बनकर रह गई। सपा-बसपा की 18 महीने की क्रान्तिकारी सरकार के बाद जून 1995 में मायावती की जो ताजपोशी हुई, उससे यह तो हुआ ही कि इतिहास में उत्तर प्रदेश में पहली बार एक दलित महिला मुख्यमंत्री बनीं, परन्तु यह भी इतिहास याद रखेगा कि वह आंबेडकरवाद और मनुवाद का ऐसा गठजोड़ था, जिसकी भारी कीमत दलित आन्दोलन को इस रूप में चुकानी पड़ी कि ब्राह्मणवाद पुनः विजयी मुद्रा में स्थापित हुआ और 1932 के पूना-पैक्ट के बाद दलित वर्ग अपनी मुक्ति की जीती हुई लड़ाई फिर हार गये।

 

*कँवल भारती हमारे युग के एक विशिष्ट चिंतक हैं। सामाजिक परिवर्तन के विचार से गहराई से जुड़े कँवल जी का लेखन अपनी विश्लेषण शैली और वस्तुपरकता के कारण अलग से पहचाना जाता है। यह इस महत्वपूर्ण लेख की  चौथी और अंतिम कड़ी है।  पिछली कड़ियों के  लिए नीचे के लिंक पर जायें।

 

पिछली कड़ी– दलित राजनीति का उद्भव, विकास और पतन-3


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