पहला पन्ना: टीके की राजनीति और मीडिया का सहयोग- खुल्ला खेल फर्रुख़ाबादी !


जब टीकों का स्टॉक कम होने की बात सामने आई तो विपक्ष की राजनीति करार देने की कोशिश हो रही है जबकि राजनीति हो भी तो उससे राजनीतिक ढंग से निपटा जाना चाहिए। पर निपटा जा रहा है अखबारों के जरिए। स्वास्थ्य मंत्री कहते हैं कि महाराष्ट्र में टीके कम हैं तो उसकी जिम्मेदारी है। लेकिन पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री कहते हैं कि केंद्र जरूरत से ज्यादा टीके मुहैया करवाता है। जो भी स्थिति हो – महाराष्ट्र सरकार अगर गलत बोल रही है तो उसे तथ्यों और आंकड़ों के साथ गलत साबित किया जा सकता है। बयानबाजी की कोई जरूरत नहीं है। ये काम अखबार अपनी तरफ से सरकार की सेवा में कर सकते हैं।


संजय कुमार सिंह संजय कुमार सिंह
काॅलम Published On :


आज कोविड-19 के टीके और उसकी कमी की चर्चा से संबंधित खबर। टीके की राजनीति सब समझते हैं। दूसरी तरफ भारत जैसे देश में इसकी कमी कोई बड़ी बात नहीं है। कुछेक राज्यों में तो परिवहन बाधित होने से भी कमी हो सकती है। लेकिन खबर कैसे छपती और दी जाती है वह दिलचस्प है। आज यह खबर सभी अखबारों में लीड है। पहले शीर्षक देखिए 

 

  1. इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक है, “दूसरे दौर वाले राज्यों ने ज्यादा टीकों की मांग की, केंद्र ने उनपर राजनीति करने का आरोप लगाया।” शीर्षक में टीके की कमी वाले राज्यों का संदर्भ देने के अलावा इंडियन एक्सप्रेस में महाराष्ट्र की खबर अलग से हैं। शीर्षक है, “महाराष्ट्र ने खतरे की घंटी बजाई:स्टॉक कम हो रहा है, टीकाकरण रोकना पड़ सकता है।”आप जानते हैं कि महाराष्ट्र में कोरोना का प्रभाव शायद सबसे ज्यादा और इस समय बहुत ज्यादा है। हो सकता है, उसकी नालायकी के कारण हो। पर जनहित में यह केंद्र सरकार का ही काम है कि उस नालायकी की भरपाई करे और उसकी कमजोरी (किसी भी कारण से हो) दूर करे। केंद्र ने ऐसा कुछ किया कि नहीं बताने की बजाय अखबार बता रहे हैं कि स्वास्थ्यमंत्री बरस रहे हैं या आरोप लगा रहे हैं। टीका गर जरूरी है तो लगता रहे वरना राजनीति तो केंद्र सरकार भी कर रही है। 
  2. हिन्दुस्तान टाइम्स में इस खबर का शीर्षक है, “वैक्सीन की आपूर्ति को लेकर केंद्र महाराष्ट्र आमनेसामने।” अगर वाकई ऐसा हो तो जनता को बताया जाना चाहिए कि इसका असर टीकाकरण पर पड़ेगा कि नहीं। ताकि लोग सतर्क हो सकें और खबर का अगला हिस्सा यही है। लेकिन पहले पन्ने के शीर्षकों में ऐसा कुछ नहीं है। यहां एक अलग खबर है, जो बताता है कि मांग क्यों बढ़ी है। यानी टकराव पर कुछ नहीं जबकि यह केंद्र सरकार की राजनीति का हिस्सा है कि वह विपक्षी सरकारों को येनकेन प्रकारेण बदनाम करती है।
  3. हिन्दू का शीर्षक है, “टीकों की कोई कमी नहीं, विपक्ष मुद्दे का राजनीतिकरण कर रहा है: हर्षवर्धन।कहने की जरूरत नहीं है कि यह शीर्षक सबसे राहत भरी है हालांकि केंद्र सरकार का हाथ मजबूत करती है। और इसी क्रम में उपशीर्षक है, “टीककरण के अपने खराब प्रयासों को ढंकनेपोतने के महाराष्ट्र सरकार के प्रयासों पर मंत्री ने हमला बोला।” शीर्षक से यह पता नहीं चल रहा है कि टीकों की कमी का आरोप सही है कि नहीं और टीकाकरण के खराब प्रयासों को ठीक करने के लिए केंद्र क्या करेगा या कुछ करेगा कि नहीं। पूरी खबर से महाराष्ट्र सरकार को बदनाम करने का केंद्र सरकार का लक्ष्य तो सध ही रहा है।
  4. टेलीग्राफ में यह खबर लीड नहीं है, लेकिन पहले पन्ने पर जरूर है। यहां फ्लैग शीर्षक है, “राज्यों ने ज्यादा खुराक की मांग की”, मुख्य शीर्षक है, “केंद्र नाराज हो गया।” मुझे लगता है कि जो मामला है वह लगभग ऐसा ही है। इतने समय से केंद्र टीका लगवाने का श्रेय ले रहा था, जिन विपक्षी राज्यों में कोरोना है उसकी खबरें छप रही थीं। अब उन्हीं राज्यों ने सबको टीका लगवाने के लिए ज्यादा टीकों की मांग कर दी तो केंद्र राजनीति करने के आरोप लगाने लगा।
  5. टाइम्स ऑफ इंडिया में इस खबर का शीर्षक है, “केंद्र, राज्यों में टीके के स्टॉक पर मतभेद” (मुख्य शीर्षक) आपूर्ति धीमी है कहने के लिए हर्षवर्धन महाराष्ट्र सरकार पर बरसे। हालांकि, अखबार ने इसके साथ एक और खबर छापी है, 10 राज्यों ने कहा कि 3-4 दिनों का ही स्टॉक बचा है। जाहिर है कि आरोप सिर्फ महाराष्ट्र का नहीं है 10 राज्यों का है। ऐसे में अकेले में महाराष्ट्र पर बरसने का क्या लाभ? हेडलाइन मैनेजमेंट। और मीडिया की सेवा का आलम यह है कि 10 राज्यों ने कहा कि स्टॉक कम है यह दूसरे अखबारों में लगभग नहीं है। 

कुल मिलाकर, स्थिति यह है कि केंद्र सरकार  टीकाकरण की राजनीति कर रही है और टीकों की कमी की बात आते ही विपक्ष पर राजनीति के आरोप जड़ दिए। इस क्रम में केंद्रीय स्वास्थ्यमंत्री ने सबसे पहले कहा कि टीकों की कोई कमी नहीं है। (इस पर) दिल्ली की आम आदमी की पार्टी की सरकार ने कहा कि 25 साल से ऊपर के सभी लोगों को टीका लगे। इसपर स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा कि टीका चाहने से नहीं, जरूरत से लगेगा। यहां चाहने और जरूरत का मामला साफ नहीं है, सिर्फ कह दिया गया है। चाहना जरूरत से ही प्रेरित होता है और किसी को टीका लगवाने की इच्छा रखने वाली उस मरीज का संरक्षक भी हो सकता है। फिर भी यह सवाल तो है ही कि टीके की कोई कमी नहीं है, सबको लगना ही है, सारे मुफ्त में सरकारी केंद्रों पर ही लग रहे हों ऐसा जरूरी नहीं है तो जिसके पास पैसे हैं वह क्यों लगवा ले

इसके बाद महाराष्ट्र में टीके की कमी की खबरों से  अलगअलग ढंग से निपटा गया पर यह लगभग छिपा लिया गया कि ऐसा 10 राज्यों ने कमी की बात की है। इससे महाराष्ट्र पर केंद पर सरकार का आरोप भी निराधार लगता है लेकिन किसे परवाह है? सबसे दिलचस्प है, केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावेडकर का यह कहना कि केंद्र जरूरत से ज्यादा टीके मुहैया कराता है। फिर स्वास्थ्यमंत्री महाराष्ट्र सरकार पर क्यों बरस रहे हैं और ज्यादा मुहैया कराता है तो 10 राज्य क्यों कह रहे हैं कि कमी है। कौन बताएगा? वह इसलिए भी कि विदेशी टीकों को भारत में अभी तक मंजूरी नहीं मिली है। सरकार अगर इस काम को भी उसी तेजी से निपटाए तो जिन्हें पैसे देकर लगवाना है और देसी दवाइयों पर भरोसा नहीं है वे टीका लगवा लेंगे तो आखिर देश में मरीजों और फिर उनसे संक्रमित होने की तादाद घटेगी ही। फिर भी सरकार अनुमति नहीं दे रही है तो मैं ये नहीं कह रहा कि यह देशी टीकों को अनावश्यक प्रोत्साहन देने और उसका श्रेय लेने की कोशिश हो सकती है। 

इसमें कोई दो राय नहीं है कि कोरोना के टीके का मामला पूरी तरह राजनीति का रहा है, शुरू से ही। यहां तक कि कोरोना का अस्तित्व स्वीकार करने के तुरंत बाद बने पीएम केयर्स ने भी टीके का विकास करने के लिए 100 करोड़ रुपए देने की बात कही है। पीएम केयर्स के पैसों से साल भर में शायद इतना ही काम हुआ है। 10 हजार वेंटीलेटर खरीदने और ऑर्डर देने के बाद जो आपूर्ति हुई और जो नहीं हुईके बाद वह मामला खत्म ही हो गया। वेंटीलेटर कहां गए या लगे पता नहीं चला। पर वह अलग मुद्दा है। मेरा मानना है कि भारत जैसे देश को महामारी से निपटने की बजाय टीका बनाने में लगने की जरूरत ही नहीं थी। दुनिया में तमाम देश हैं जो टीका बना सकते हैं, हमसे आगे और सक्षम हैं। वो बनाते हम उनसे खरीद लेते। बना चुके हैं उन्हें बेचने की अनुमति नहीं मिली है। टीका लगना छह महीने देर से शुरू होने से उतना नुकसान नहीं होता जितना लोगों को बिना काम बिना पैसे लॉकडाउन करने से हुआ, पैदल चलने के लिए छोड़ देने और पैदल चलने वालों को पीटने से हुआ है। 

देसी टीकों को अनुमति, अंतराल बढ़ाने से लेकर शेल्फ लाइफ बढ़ाने तक के मामले जैसे और जिस तेजी से हुए उसमें सरकार का समर्थन हो यह हो ही नहीं सकता है। सच पूछिए तो इसी को समर्थन कहा जाता है। प्लांट का दौरा कर जो प्रचार दिया गया सो अलग। यह सब किसी सरकारी कंपनी से करवाया जाता तो बात लग होती पर वह भी नहीं। इसके अलावा, टीके किसे लगे, कब लगे, कहां लगे, कितने पैसे में लगे, सरकार कितना खरीदे सब कुछ तो सरकार ही कर रही है और टीके से नुकसान की भरपाई की शर्त नहीं है। निश्चित रूप से इसका राजनीतिक लाभ (या नुकसान) होगा। इसलिए पूरा टीकाकरण अभियान ही राजनीति का हिस्सा है इसमें कोई शक नहीं है। 

ऐसे में अब जब टीकों का स्टॉक कम होने की बात सामने आई तो विपक्ष की राजनीति करार देने की कोशिश हो रही है जबकि राजनीति हो भी तो उससे राजनीतिक ढंग से निपटा जाना चाहिए। पर निपटा जा रहा है अखबारों के जरिए। स्वास्थ्य मंत्री कहते हैं कि महाराष्ट्र में टीके कम हैं तो उसकी जिम्मेदारी है। लेकिन पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री कहते हैं कि केंद्र जरूरत से ज्यादा टीके मुहैया करवाता है। जो भी स्थिति होमहाराष्ट्र सरकार अगर गलत बोल रही है तो उसे तथ्यों और आंकड़ों के साथ गलत साबित किया जा सकता है। बयानबाजी की कोई जरूरत नहीं है। ये काम अखबार अपनी तरफ से सरकार की सेवा में कर सकते हैं। पर वो भी नहीं कर रहे। क्यों? आप समझ सकते हैं।

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं।


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