क्या टाटा को ट्रस्ट के मामले में ब्लैकमेल कर चंदा देने को मजबूर किया गया? 

संजय कुमार सिंह संजय कुमार सिंह
काॅलम Published On :


जब सरकारी फैसले पलटना आम हो, ‘शुद्धि पत्रों’ की भरमार हो!

 

आज के द टेलीग्राफ में एक खबर है, टाटा ट्रस्ट मामले में सायरस मिस्त्री बरी। इस खबर के अनुसार, आयकर अपील पंचाट की मुंबई पीठ ने सायरस मिस्त्री के खिलाफ अपनी कटु टिप्पणी वापस ले ली है। यह टिप्पणी तीन प्रमुख टाटा ट्रस्ट की कर मुक्त स्थिति बहाल करने के हाल के आदेश में की गई थी। पंचाट ने 28 दिसंबर 2020 के अपने आदेश के संबंध में यह शुद्धि पत्र जारी किया है जो बुधवार यानी 30 दिसंबर को दिया गया था। वैसे तो यह एक सामान्य शुद्धिपत्र का मामला समझ कर टाल दिया जाएगा पर टाटा ट्रस्ट से संबंधित कुछ तथ्यों और खबरों पर गौर करने के बाद आप मानेंगे कि यह मामले में ‘शुद्धि पत्र’ जारी किया जाना सामान्य नहीं भी हो सकता है। 

  1. सायरस मिस्त्री टाटा समूह के शेयरधारकों के परिवार से हैं और रतन टाटा के चेयरमैन पद से रिटायर होने की उम्र में पहुंचने के बाद चेयरमैन बनाए गए थे पर बाद में उन्हें हटा दिया गया जिसे उन्होंने चुनौती दी है और इस लिहाज से टाटा समूह के घोषित विरोधियों में हैं। 
  2. नेशनल कंपनी कानून अपील पंचाट ने सायरस मिस्त्री को टाटा संस का चेयरमैन बहाल करने का आदेश दिसंबर 2019 में दिया था। इसपर टाटा संस और सायरस मिस्त्री की अपील सुप्रीम कोर्ट में है और इस पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है।  
  3. ट्रस्ट मामले में सायरस मिस्त्री के परिवार के समूह शपूरजी पलोनजी ने सुप्रीम कोर्ट में यह आरोप लगाया है कि टाटा ट्रस्ट से संबंधित विवाद के मामले में जो भी फैसले हुए हैं वह टाटा समूह की सलाह से हुए हैं और कंपनी कानून 2013 की धारा 10 का उल्लंघन हुआ है। 
  4. सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में टाटा ट्रस्ट का पक्ष रखने का काम वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे कर रहे हैं। 
  5. टाटा ट्रस्ट (टाटा के कई ट्रस्ट हैं) के खिलाफ मामला कई साल से चल रहा है। 2015 में छह ट्रस्ट ने पंजीकरण रद्द करने की अपील की थी और यह मान लिया था कि उनकी कुछ परिसंपत्तियां कर कानूनों के अनुपालन में नहीं हैं। (विस्तार में जाउंगा तो लंबा हो जाएगा) 
  6. इनका पंजीकरण 2019 में रद्द कर दिया गया था जिसे टाटा ट्रस्ट की ओर से चुनौती देने की खबर थी। इस मामले में संक्षेप में तथ्य यह है कि लोकोपकारी संस्था टाटा ट्रस्ट की आय सुनिश्चित करने के लिए टाटा समूह के कुछ शेयर ट्रस्ट के पास हैं जो उसकी संपत्ति हुई और जिसपर कराधान को लेकर विवाद है। यह 2013 में सरकारी नियम बदलने के बाद शुरू हुआ। ऐसे में 2015 का टाटा ट्रस्ट का निर्णय और फिर 2019 में अपील करने की खबरें इस आलोक में हो सकती हैं। 
  7. टाटा ट्रस्ट और टैक्स अधिकारियों का विवाद चल रहा था उस बीच दो खबरें रेखांकित करने लायक हैं। एक तो यह कि सीबीडीटी (केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड) ने आयकर विभाग के तीन बड़े अफसरों से टाटा ट्रस्ट का पंजीकरण रद्द करने में देरी का कारण बताने के लिए कहा। ठीक है कि ये ट्रस्ट और इनका मामला मिस्त्री वाले मामले से अलग है। 
  8. मोटी बात यह है कि मामला कानून बदलने के बाद शुरू हुआ था और टाटा समूह ने यह बात पहले ही नोटिस के जवाब में कही होगी। इसलिए कार्रवाई आनन-फानन में नहीं हो सकती थी और जल्दबाजी का मतलब आप समझ सकते हैं – मुझे वह टाटा समूह को धमकाना लगता है। हालांकि इसका मकसद मामले को मजबूती देना भी हो सकता है। दूसरा मामला टाटा समूह द्वारा भाजपा को दिया गया चंदा है।  
  9. नैतिकता का तकाजा है कि टाटा समूह के खिलाफ नियमों के अनुपालन का मामला चल रहा था, छह ट्रस्ट का पंजीकरण रद्द करने की मांग समूह ने स्वयं की थी तो उससे चंदा नहीं लिया जाता? खबरों के अनुसार भारतीय जनता पार्टी को वित्त वर्ष 2018-19 में (टाटा समूह के) प्रोग्रेसिव इलेक्ट्रल ट्रस्ट से 356 करोड़ रुपए मिले जो 2017-18 में सिर्फ 167 करोड़ रुपए थे। 
  10. अब चंदे की राशि में इस वृद्धि का कारण आममतौर पर जाना नहीं जा सकता है। जो स्थितियां हैं, सरकार पर जो आरोप लग रहे हैं उसमें यह जबरन वसूली का मामला लगता है। वैसे तो इसका खंडन आएगा नहीं और आया तो क्या होगा आप जानते हैं। इसलिए इसकी पुष्टि हो नहीं सकती है। पर तथ्य यह भी है कि वित्त वर्ष 18-19 में भाजपा को सबसे ज्यादा पैसे टाटा समूह ने दिए थे। इसका कोई ज्ञात या घोषित कारण होता तो मैं अटकल नहीं लगाता। पर दुर्भाग्य से ऐसा नहीं है।

कहने की जरूरत नहीं है कि विवाद नियम बदलने के बाद की स्थितियों से था और इसका नतीजा यह हुआ कि टाटा समूह ने छह लोकोपकारी ट्रस्ट बंद कर दिए या उन्हें बंद करना पड़ा। जनहित में होना यह चाहिए था कि ट्रस्ट के लोकोपकार और नीयत को देखते हुए उसके चलते रहने को प्राथमिकता दी जाती। अगर जांच वाकई निष्पक्ष थी तो चंदा नहीं लिया जाना चाहिए था। पर भाजपा की जो रणनीति अभी तक दिखी है उसके अनुसार ऐसी खबरों से निष्पक्ष होने का दावा किया जा सकता है। 

टाटा को भी नहीं बख्शने की छवि बनी और दबाव में या वैसे ही पार्टी को मिलने वाले चंदे की राशि बढ़ गई तो कोई नुकसान भी नहीं हुआ। जहां तक जनहित की बात है, सरकार के अभी तक के काम से स्पष्ट है कि वह कोई मुद्दा ही नहीं है। सरकार चाहती है कि जो भी काम हो वह भाजपा आरएसएस करे या फिर नहीं हो। गरीब कमजोर भूखा आदमी वैसे भी विरोध नहीं कर सकता है और यह सरकार तथा उसके समर्थकों को सूट करता है। किसानों के पिज्जा खाने, फुट मसाज कराने और उपलब्ध सुविधाओं-संसाधनों से यह दिखाने बताने और माहौल बनाने की कोशश की गई है कि जो गरीब नहीं है वह आंदोलन कर रहा है। हालांकि यह अलग मुद्दा है। 

एक तरफ अगर टाटा ट्रस्ट का मामला है जो कमाई की निश्चित व्यवस्था करके लोकोपकार का काम करता है तो दूसरी ओर, पीएम केयर्स भी ट्रस्ट है। टाटा ट्रस्ट के मामले में पुराना मामला निकाल लेना और प्रधानमंत्री कार्यालय से गैर सरकारी ट्रस्ट शुरू कर देना परस्पर विरोधी है और उसपर तुर्रा यह की चीनी कंपनी से भी पैसे ले लिए गए जबकि टैक्स का मामला नहीं निपटा इसलिए टाटा के कई ट्रस्ट व्यावहारिक रूप से बंद हो गए। ट्रस्ट के पैसे खर्च करने और उससे लोकोपकार का मामला अपनी जगह है उसपर तो बात ही नहीं हुई।  

आइए, अब आज की खबर देख लें ताकि यह कहकर मामले को टाला नहीं जा सके कि मैंने टाटा से संबंधित कई मामलों को मिला दिया है। दरअसल मैंने वही किया है और जानबूझकर किया है। मेरे पिताजी टाटा की नौकरी करते थे, मैं बचपन में जमशेदपुर में रहा हूं और टाटा समूह को अच्छी तरह जानता समझता हूं। उसके लोकोपकार देखे हैं और उसका महत्व जानता हूं। और इसलिए मानता हूं कि टाटा समूह की अलग कंपनियां और अलग ट्रस्ट सब एक ही विचारधारा के तहत चलते हैं। 

देश में जब निजीकरण शुरू हुआ था और निजी विमान कंपनियों को अंतर्देशीय उड़ान की इजाजत दी गई थी तब टाटा भी दौड़ में था और उस समय टाटा समूह का यह बयान था (जो मोटा मोटी मुझे याद है) कि हमसे वह सब करने की अपेक्षा की जा रही है जो हम नहीं करते हैं। उस समय उसका मतलब मैंने रिश्वत देने से लगाया था क्योकि मैं जानता था। और मेरा यह विश्वास कई मामलों के बावजूद अभी तक बना हुआ है। टाटा ट्रस्ट के मामले में भी बना रहा और अब तो पक्का हो गया। 

दूसरी तरफ सरकार के ‘शुद्धि पत्र’ (त्रों) का बात करूं तो वह बहुत ही घटिया, लापरवाह और फूहड़ है। सरकार से ऐसे काम तो छोड़िए उसे लिखित में स्वीकार करने और बार बार ऐसी स्थिति बनना बेहद शर्मनाक है। पर यह आम है। इसलिए मेरे मन में बचपन से सरकारी क्षेत्र के प्रति जो नालायकी का भाव है वह बना हुआ है और मजबूत हुआ है जबकि निजी क्षेत्र के प्रति भी वह वैसे ही मजबूत है। 

 

 

पहले मीडिया में ऐसी खबरों का ऐसा विश्लेषण आम था। जो बीट कवर करते थे उन्हें सारी बातें याद रहती थीं और हमलोग तब इसे पेज भरने की खबर कहते थे। क्योंकि इसमें एक लाइन की सूचना होती है बाकी सब पुरानी बातें। तब सरकार के खिलाफ ऐसी खबरें खूब छपती थीं अब नहीं के बराबर छपती हैं। चूंकि मेरा यह नियमित काम नहीं है इसलिए हो सकता है इसमें कुछ महत्वपूर्ण छूट गया हो या कोई चूक रह गई हो लेकिन मोटे तौर पर यह मामला मीडिया में नहीं आएगा तो जनता जानेगी कैसे कि सरकार कॉरपोरेट के साथ कैसा सलूक कर रही है। और टाटा ने क्यों सबसे ज्यादा चंदा दिया।

 

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं।

 

संदर्भ-

  • Detail of the dispute

https://www.indiatoday.in/india-today-insight/story/why-tata-trusts-is-at-loggerheads-with-the-income-tax-authorities-1625306-2019-12-05

  • Trusts

The Income Tax Department had cancelled the registrations of six Tata Trusts — Jamsetji Tata Trust, RD Tata Trust, Tata Education Trust, Tata Social Welfare Trust, Sarvajanik Seva Trust and Navajbai Ratan Tata Trust — in October 2019 after the Comptroller & Auditor General (CAG) and Public Accounts Committee of Parliament had pointed out that the Department was losing revenue by allowing the trusts to continue with the tax-exempt status.

The six trusts had in March 2015 moved to surrender their registrations after accepting that some of their assets were not in accordance with the tax laws.

https://www.thehindu.com/business/Industry/tax-tribunal-upholds-tax-exempt-status-of-tata-trusts/article33446280.ece

  • Pulls up Officers

https://www.thehindubusinessline.com/companies/cbdt-asks-three-officers-to-explain-delayed-action-in-tata-trusts-case/article30576125.ece

  • Mistry’s Complaint 

The Income Tax Appellate Tribunal (ITAT) has upheld the tax-exempt status of three Tata Group trusts, quashing a revision order of the Income Tax Department that sought to cancel tax exemption on grounds that they held shares of Tata Sons.

It also censured former Tata Sons Chairman Cyrus Mistry for supplying documents to the tax department soon after his unceremonious exit as the head of the salt-to-software group.

The ITAT’s Mumbai bench — comprising its President Justice P P Bhatt and Vice President Pramod Kumar — passed three separate orders on December 28, upholding the tax-exempt status of Ratan Tata Trust, JRD Tata Trust and Dorabji Tata Trust.

It said the March 2019 revision order of the Income Tax Department that sought to cancel tax exemption to the three trusts was “devoid of any legally sustainable merits”.

 https://www.hindustantimes.com/business-news/tax-tribunal-upholds-tax-exempt-status-of-tata-trusts-censures-mistry/story-5E50tpEnxJiNKMRkczhgDN.html

 Donation 

 The Bharatiya Janata Party (BJP) received Rs 356 crores from the Progressive Electoral Trust in the financial year 2018-19, which was the highest amount received by the party from any corporate.

This information was shared with the Election Commission of India recently and the commission published it on Monday.

During 2018-2019, the BJP received donations worth Rs 473 crore from different corporates. The share of Progressive Electoral Trust, a trust owned by the Tata Group, was 75 per cent of this. In comparison to the donations received by the BJP in 2018-19, the party had received just Rs 167 crores from corporates in 2017-18.

 https://www.indiatoday.in/india/story/bjp-received-biggest-donation-from-progressive-electoral-trust-1618401-2019-11-13

  • Tatas are the larges donors 19-20 

Read more at:

http://timesofindia.indiatimes.com/articleshow/78696078.cms?utm_source=contentofinterest&utm_medium=text&utm_campaign=cppst

 

 

 

 


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