पहला पन्ना: ममता का हारना, दोबारा मतगणना न होना और उपचुनाव टलना-खेला बड़ा है! 

संजय कुमार सिंह संजय कुमार सिंह
काॅलम Published On :


वैसे तो आज भी ऑक्सीजन की कमी से मौत की खबरें हैं और आरोप को स्वीकार नहीं करने का तरीका भी खबरों में है। लेकिन ये मौतें भाजपा शासित कर्नाटक में हुई हैं इसलिए यह मान लेने में कोई दिक्कत नहीं है कि केंद्र सरकार जरूरत भर ऑक्सीजन की व्यवस्था करने में पूरी तरह लाचार है। उसे चुनाव लड़ना ही आता है अब वह जीत भले नहीं पा रही है। दिल्ली में ऑक्सीजन का इंतजाम हो तो यह माना जा सकता था कि राज्य सरकार निकम्मी है या केंद्र की भाजपा सरकार अपनी राजनीति कर रही है लेकिन कर्नाटक में इतने दिनों बाद 23 लोगों की मौत हो गई तो इससे शर्मनाक क्या हो सकता है? डबल इंजन वाले उत्तर प्रदेश की खबरों पर भारी रोक है फिर भी डबल इंजन राज्य होने के कारण यहां ऑक्सीजन से मौत हुई हो ऐसा नहीं है। कुल मिलाकर, सरकार बिल्कुल असहाय और पंगु लग रही है। पर अखबारों की लाचारी है। 

दूसरी ओर, बंगाल में चुनाव आयोग और सहयोगी मीडिया की सहायता से कारनामे हो रहे हैं। आप जानते हैं कि इस चुनाव में ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस का पूरे बंगाल में शानदार प्रदर्शन रहा है। पर खुद ममता बनर्जी नंदीग्राम से विजयी घोषित किए जाने, राज्यपाल से बधाई मिलने के बाद हार गयीं। चुनाव प्रचार के दौरान यह अफवाह उड़ाई जाती रही कि वे कहीं और से चुनाव लड़ेंगी पर वे नहीं लड़ीं और अब कोई नहीं कह रहा है कि दीदी तो गईं। अब 200 सीटें जीतने वाली भाजपा आठ चरण में चुनाव होने और आयोग के खुले समर्थन के बावजूद आसपास भी नहीं पहुंची। इसके साथ यह भी तथ्य है कि चुनाव आयोग को मर्डरर यानी हत्यारा कहा गया है और उसने पूरी कोशिश कर ली कि मीडिया को ऐसा कहने से रोका जाए पर यह राहत नहीं मिली। 

ऐसे चुनाव आयोग पर ममता बनर्जी ने नतीजों से छेड़छाड़ करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा है कि वे 8,000 से ज्यादा वोटों से जीत रही थीं लेकिन सर्वर खराब होने तथा बिजली जाने के बाद के बाद वे हार गईं। इसके अलावा, दोबारा मतदान कराने की ममता बनर्जी की मांग पर एक चुनाव अधिकारी ने किसी को संदेश भेजा है, “सर यह मेरे अधिकार में नहीं है। सर कृपया मुझे बचाइए। मेरा परिवार बर्बाद हो जाएगा। मेरे पास आत्महत्या के अलावा कोई विकल्प नहीं है। जान मारने की धमकी मिल रही है। मेरी हत्या हो सकती है। मेरा कोई लेनादेना नहीं था। कृपया मुझे माफ कर दें। मेरी एक छोटी बेटी है।”और इसके साथ हाथ जोड़ने के तीन निशान।

मेरा मानना है कि यह चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल है। लेकिन इंडियन एक्सप्रेस की खबर का शीर्षक है, “नंदीग्राम को लेकर ममता चुनाव आयोग भिड़े, दोनों ने कहा कि चुनाव अधिकारी खतरे में है। अगर ऐसा ही है तो चुनाव आयोग किस चिड़िया का नाम है। डरे हुए अधिकारियों से निष्पक्ष चुनाव कैसे कराएगा? या अधिकारी क्यों डरे हुए हैं? वह किस मर्ज की दवा है? टाइम्स ऑफ इंडिया ने ममता बनर्जी के आरोप को डेढ़ कॉलम में छापा है और इसके साथ बंगाल की हिंसा में 11 व्यक्तियों के मारे जाने की खबर छापी है और बताया है कि गृहमंत्रालय ने रिपोर्ट मांगी है। वैसे भी, ममता बनर्जी ने शपथ नहीं ली है और हिंसा अगर हो रही है तो चुनाव आयोग का काम है और रिपोर्ट गृहमंत्रालय यानी भाजपा सरकार मांग रही है। आप समझ सकते हैं कि पूरे मामले में कितनी निष्पक्षता है और अगर चुनाव अधिकारी वाकई खतरे में हैं तो यह स्थिति कैसे सुधरेगी? किसका काम है? अखबारों का काम सिर्फ सूचना देना नहीं, सवाल उठाना और उठने वाले सवालों के जवाब देना भी है। 

बंगाल में अगर भाजपा नेता मारे जा रहे हैं तो मतदान के दौरान सुरक्षा बलों द्वारा मतदाताओं के मारे जाने के बाद भाजपा नेताओं ने क्या कहा था उसे भी याद किया जाना चाहिए और उसकी भी जांच हो जानी चाहिए थी। मुझे नहीं पता उसका क्या हुआ। आज अखबारों में ममता बनर्जी के आरोपों को कम करके छापने या कम करने की कोशिश जरूर की गई है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने इस खबर का शीर्षक लगाया है, “चुनाव अधिकारी ने कहा उसकी जान खतरे में है : ममता ममता बनर्जी के आरोपों के मद्देनजर इस बयान का अपना महत्व है और इंडियन एक्सप्रेस की तरह यह मान लेना कि चुनाव अधिकारी ने ममता (या उनके समर्थकोंके दबाव में या डर से ऐसा लिखा है तो इसे साबित करने के लिए कौन कहेगा? और ममता कहेंगी तो क्या भाजपा और चुनाव आयोग सुनेगा। सुन रहा है कि नहीं, इसकी जानकारी देना भी अखबारों का काम है। हिन्दू ने, “ममता कल शपथ लेंगीशीर्षक से खबर छापकर मुद्दे को पहले पन्ने पर जगह नहीं दी है। 

टेलीग्राफ में यह खबर लीड है। शीर्षक है, “नंदीग्राम की गिनती पर उंगली उठी।”  इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, “ममता अदालत जाने पर विचार कर रही हैं।  इस खबर के बीच में शांति की अपील प्रमुखता से है। इसमें बताया गया है कि चुनाव अधिकारी का संदेश उनके पास नहीं आया था और ना ही उन्होंने संदेश भे जने वाले अधिकारी का नाम बताया है। ऐसे में भाजपा या चुनाव आयोग के लोग उसे संदेश भेजने के बाद या पहले धमकाने या पुनर्मतदान कराने की मांग करने क्यों गए? जवाब कैसे मिलेगा, कौन देगा? अखबार ने संबंधित अधिकारी से संपर्क किया लेकिन उन्होंने इस विषय पर टिप्पणी करने से मना कर दिया। चुनाव अधिकारी ही तय करते हैं कि दोबारा मतगणना की आवश्यकता है कि नहीं। इतवार को पुनर्गणना की मांग खारिज कर दी गई। ममता बनर्जी के हवाले से टेलीग्राफ ने लिखा है, (मतगणना केंद्र पर) चार घंटे तक सर्वर खराब था, बिजली गई थी ….. राज्यपाल ने मुझे बधाई दी थी। अचानक सब कुछ बदल गया। 

टेलीग्राफ ने एक और दिलचस्प जानकारी दी है, “चुनाव आयोग को कोविड का पता चला, दीदी के लिए फिर से चुनाव मुश्किल। आप जानते हैं कि ममता बनर्जी की पार्टी को पूर्ण और स्पष्ट बहुमत है इसलिए वे मुख्यमंत्री हो सकती हैं लेकिन छह महीने के अंदर उन्हें विधानसभा का सदस्य होना है। पहले ऐसे उपचुनाव छह महीने की सीमा के अंदर हो जाया करते थे। कोविड और भाजपा की राजनीति ने चुनाव टालने के नए तरीके और कारण दिए हैं। आधी रात में भाजपा की सरकार को शपथ दिलवाने वाले महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के मामले में खूब रोड़े अटकाए। वैसे तो यह केंद्र के इशारे पर ही किया गया होगा और यह याद करना बनता है कि बंगाल में आगे क्या हो सकता है। टेलीग्राफ ने इसका जिक्र किया है। 

आप जानते हैं कि दो उम्मीदवारों की मौत के कारण जांगीपुर और समसेरगंज के चुनाव 16 मई तक टाल दिए गए थे। पर सोमवार को इन्हें फिर टाल दिया गया। खरदा में भी उपचुनाव होना है क्योंकि तृणमूल उम्मीदवार काजल सिन्हा का निधन चुनाव परिणाम आने से पहले ही हो गया था। फिलहाल तो चुनाव टल गए हैं। देखना है चुनाव आयोग आगे क्या पैंतरा लेता है। इन खबरों के बीच आज इंडियन एक्सप्रेस ने पश्चिम बंगाल के कांग्रेस सांसद अधीर रंजन से पूछा है और पहले पन्ने पर छापा है कि कांग्रेस को क्यों एक भी सीट नहीं मिली। वोट प्रतिशत क्यों कम हो गया आदि। वैसे तो इन सवालों का जवाब राजनीति या पत्रकारिता का ककहरा सीख रहा कोई बच्चा भी दे देगा पर अभी भाजपा से यह पूछा जाना चाहिए था कि वे 200 सीटें जीतने का दावा किस आधार पर कर रहे थे और कैसे हार गए। ममता बनर्जी कहीं और से लड़ेंगी की अफवाह या प्रशांत किशोर की लीक बातचीत से क्या उम्मीद थी और कहां धोखा खाए। 

भारतीय मीडिया को ऐसे सवाल पूछने या सत्तारूढ़ पार्टी के पास इन सवालों का जवाब होता तो देश की ये हालत होती? रेल मंत्री हफ्ते भर से मालगाड़ियों पर ऑक्सीजन टैंकर दिखाकर मरीचिका बना रहे हैं और लोग मर रहे हैं। पर सवाल अधीर रंजन से पूछे जा रहे हैं और दिलचस्प यह है कि वे जवाब दे भी रहे हैं। 

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं।

 

 


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