पहला पन्ना: पश्चिम बंगाल चुनाव को दिल्ली उठा लाये नेता, समझिए खेल…

संजय कुमार सिंह संजय कुमार सिंह
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आज द टेलीग्राफ के पहले पन्ने की खबरों को छोड़कर बाकी अखबारों के पहले पन्ने पर मुझे निम्नलिखित खबरें महत्वपूर्ण लगीं। इनमें कुछ खबरों के दो शीर्षक हैं और उन्हें जानबूझकर लिखा क्योंकि दोनों शीर्षक से एक ही खबर के दो एंगल मालूम होते हैं। पहले आप इन खबरों को पढ़ लीजिए इनमें सिंगल कॉलम की खबरें शामिल हैं जो मुझे लगता है कि दिल्ली के अखबार में आज की दूसरी खबरों के मद्देनजर ज्यादा जगह पा सकती थीं।

  1. कोरोना के मामले बढ़ने से राजधानी में नए दौर का खतरा
  2. पॉस्को मामलों में 16 साल से बड़ों को वयस्क माना जाए
  3. महाराष्ट्र में (खतरे का) लाल झंडा, दूसरे लॉकडाउन वाला पहला शहर नागपुर
  4. कोविड के समय में कुम्भ: प्रति स्नान तीन डुबकी
  5. एंटिलिया कार मामले में एक और मोड़: स्कॉर्पियो ठाणे के निवासी की थी, न कि हिरेन की
  6. महाशिवरात्रि पर हरिद्वार में 32 लाख लोगों ने डुबकी लगाई
  7. अंबानी के खिलाफ साजिश का संबंध तिहाड़ से होने का खुलासा : सिम जब्त
  8. चीन ब्रह्मपुत्र बांध बनाने के लिए तैयार, नया मुद्दा हो सकता है
  9. रेलवे, दूरसंचार की संपत्ति से 1.3 लाख करोड़ का सरकार का लक्ष्य
  10. कोवैक्सिन चिकित्सीय परीक्षण मोड से आगे निकला
  11. प्रधानमंत्री आज पहले क्वैड सम्मेलन में हिस्सा लेंगे
  12. भाजपा ने किसानों का भरोसा खो दिया है, राष्ट्रीय लोकदल ने कहा
  13. कानपुर बलात्कार : लापरवाही के आरोप में तीन निलंबित
  14. चुनाव आयोग ने ईवीएम हैकिंग की फर्जी खबर के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई
  15. अंबानी पर हमले के डर की जांच दिल्ली पहुंची
  16. दंगे की रिपोर्ट पर दिल्ली विधानसभा में हंगामा

दिल्ली में कोरोना की खबर को हिन्दुस्तान टाइम्स ने पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर लीड बनाया है। टाइम्स ऑफ इंडिया में भी अधपन्ने की खबर है। अंदर भी कई खबरें हैं। सब देखिए तो अंदाजा लगता है कि कोरोना का मामला कितना गंभीर है और इसके साथ यह भी खबर है कि शिवरात्रि पर ऐसे भीड़ जुटी जैसे लोगों को डर ही न हो। वास्तविकता से अलग की यह स्थिति अखबारों की ही बनाई हुई है देखिए, समझिए और जानिए।

इसके बावजूद पश्चिम बंगाल का चुनाव दिल्ली के अखबारों में छाया हुआ है। चुनाव तो और राज्यों में हो रहे हैं पर दिल्ली में चर्चा बंगाल के चुनाव की ही है। और यह ऐसे ही नहीं है। उसकी क्रोनोलॉजी देखिए – पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पेट्रोल की बढ़ती कीमतों का विरोध करने के लिए स्कूटी चलाती हैं। विपक्ष ने इसे चुनावी स्टंट कहा। प्रधानमंत्री ने कोलकाता की अपनी रैली में कहा, कुछ दिन पहले जब आपने स्कूटी चलाई, हर कोई आपकी सुरक्षा की कामना कर रहा था। अच्छा हुआ कि आप गिरी नहीं वरना आप स्कूटी बनाने वाले राज्य को अपना दुश्मन बना लेतीं। …. आपने अपनी स्कूटी भवानीपुर की बजाय नंदीग्राम की ओर मोड़ दी। दीदी हम हर किसी का भला चाहते हैं। हम नहीं चाहते कोई जख्मी हो। पर जब स्कूटी ने नंदी ग्राम में ही गिरना तय किया है तो मैं क्या कर सकता हूं। (इंडियन एक्सप्रेस की खबर का अनुवाद)

इसके बाद नंदीग्राम में ममता बनर्जी को चोट लगी। इसमें दिलचस्प यह नहीं है कि भाजपा ने  इस हमले को सहानुभूति बटोरने का तरीका कहा है। दिलचस्प यह है कि कांग्रेस सांसद, अधीर रंजन ने कहा है कि उन्हें नाटक करने की आदत है। मामला यहीं नहीं ठहरा, तृणमूल पार्टी की शिकायत या ममता पर हमले से संबंधित आरोपों को चुनाव आयोग ने जवाब देने लायक भी नहीं माना। मतलब यह कि जो चुनाव आयोग देश के एक राज्य में आठ चरण और एक महीने में चुनाव करा रहा है वही आयोग लगभग उतनी ही सीटों वाली दूसरी विधान सभा का चुनाव बहुत कम समय और चरण में करा दे फिर भी उसे बंगाल में चुनाव करान लायक माना जाए। और वह आरोपों को जवाब देने लायक नहीं माने। इस तरह पश्चिम बंगाल चुनाव को चर्चा का विषय बना दिया गया है। चुनाव तो और भी राज्यों में हो रहे हैं पर उनकी चर्चा नहीं है क्योंकि उन्हें ऐसा बनाया नहीं गया है क्योंकि एक पार्टी विशेष को इसकी जरूरत नहीं है। इस चक्कर में दिल्ली की खबर दिल्ली में ही पिट जा रही है सो अलग।

मुझे लगता है कि आज बंगाल चुनाव की खबर से महत्वपूर्ण और भी कई खबरें हैं जिन्हें जगह दी जा सकती थी, महत्व दिया जाना चाहिए था पर अखबार जनहित छोड़कर राजनीति कर रहे हैं क्योंकि राजनेता यही चाहते हैं। अगर चुनाव मुद्दों पर लड़ा जाए तो निश्चित रूप से नेताओं को काम करना होता अभी वे चुनाव के समय मुद्दा ढूंढ़ लेते हैं या बना देते हैं और अखबार उनकी जरूरत पूरी करने लगते हैं। एक राज्य का चुनाव वहीं निपटना चाहिए। प्रधानमंत्री को प्रचारक बनने की क्या जरूरत थी और बने तो अखबारों को उसी तरह रिपोर्ट करना चाहिए था। लेकिन दिल्ली में खबर छा गई। टेलीविजन चैनल ने भाजपा नेता को माइक थमा दिया। वह सब बढ़ता हुआ दिल्ली के अखबारों में छाया हुआ है और दूसरे तमाम मुद्दे दब गए हैं।

अब जब बंगाल का खेला दिल्ली के अखबारों में भी चोल रहा है तो आइए देखें शीर्षक :

  1. द टेलीग्राफ : शांत रहिए, व्हीलचेयर से प्रचार कर सकती हूं। अखबार के पहले पन्ने पर इस मुख्य खबर के साथ एक और खबर है, “खेतों और बंगाल का एक ही दुश्मन”। अगर ममता बनर्जी को कथित चोट लगी है, नाटक है, सहानुभूति बटोरने के लिए है तो दिल्ली में पहले पन्ने पर छापने की क्या जरूरत। और पहले पन्ने पर जगह है तो क्या यह नहीं छापा जाना चाहिए कि 100 दिन से दिल्ली सीमा पर धरना दे रहे देश भर के किसानों का दुश्मन वही है जो बंगाल में है – यह बात किसानों ने कही है तो दिल्ली के सीमा पर इसके पाठक है। और निश्चित रूप से ममता बनर्जी के बारे में जानने से इच्छुक लोगों के मुकाबले यहां किसानों की संख्या ज्यादा है और किसानों की इस खबर से उन्हें बंगाल चुनाव की भी अपने काम की खबर मिल जाएगी। पर दिल्ली के अखबारों में ढूंढ़िए। पहले पन्ने पर तो क्या, मुमकिन है कहीं न मिले। मैं नहीं जानता कि कोलकाता में किसी हिन्दी अखबार का पूर्णकालिक रिपोर्टर भी कभी रहा है। पर वह अलग मुद्दा है।
  2. टाइम्स ऑफ इंडिया – ममता की हड्डी में चोट है, अब व्हीलचेयर पर चुनाव प्रचार कर सकती हैं। यहां भी चुनाव आयोग की चिट्ठी है पर सिंगल कॉलम में। अखबार ने कार्यकर्ताओं से ममता बनर्जी की अपील को भी प्रकाशित किया है जो द टेलीग्राफ में लीड है।
  3. इंडियन एक्सप्रेस – ममता को चुनाव प्रचार में वापस आने की उम्मीद है – व्हीलचेयर पर। अखबार में इसके साथ लगभग उतने ही बड़े शीर्षक में चुनाव आयोग की खबर छापी है। इसका शीर्षक है, “भाजपा के ईशारे पर काम करने का तृणमूल कांग्रेस का आरोप : जवाब देने के लिहाज से असम्मानजक”।
  4. द हिन्दू – ममता को चोट लगने पर पार्टियां भिड़ीं। विपक्ष ने इसे राजनीतिक ड्रामा कहा। इसके साथ अखबार ने तृणमूल और भाजपा नेताओं के बयान छापे हैं। तृणमूल कांग्रेस हमले का शांतिपूर्ण विरोध करेगी। भाजपा नेता ने कहा है कि सुरक्षा के बावजूद हमला हुआ तो जांच होनी चाहिए। लेकिन मुद्दा यह है कि जेपी नड्डा पर भी सुरक्षा के बावजूद हमला हुआ था। तब केंद्र बहुत परेशान हुआ था। जांच का नतीजा क्या रहा? पुलवामा समेत कितनी ही जांच के नतीजे नहीं आए हैं। उसपर भाजपा क्यों नहीं कुछ बोलती और करती है।
  5. हिन्दुस्तान टाइम्स – ममता के जख्मों को लेकर नए विवाद। अखबार ने इसके साथ चुनाव आयोग की खबर छापी है। आयोग ने चुनाव आयोग की चिट्ठी को आरोपों, आक्षेपों से भरा, दुर्भाग्यपूर्ण कहा है।

दिल्ली दंगे की जांच ऐसा ही एक मुद्दा है। मुझे लगता है कि मौजूदा समय में दिल्ली दंगे पर विधानसभा में हंगामा बड़ी खबर है और आज दिल्ली के अखबारों में लीड होनी चाहिए थी। ऐसी ही एक खबर दिल्ली सरकार के बजट की थी। आज की बाकी खबरें देखकर आप भी सोचिए। आज ममता बनर्जी या बंगाल चुनाव की खबर कोलकाता के द टेलीग्राफ के अलावा दिल्ली में हिन्दुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड है, इंडियन एक्सप्रेस और दि हिन्दू में पहले पन्ने पर है। मतलब कोलकाता की खबर दिल्ली में लीड – पर यह स्थिति कोलकाता में वामपंथियों की रैली के लिए या उसके समय तक नहीं थी।


लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं।


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