पहला पन्ना: आज असम के अख़बारों में पहले पन्ने के ख़बरनुमा विज्ञापन का राज़ जानिए!

संजय कुमार सिंह संजय कुमार सिंह
काॅलम Published On :


सोमवार को होली थी लिहाजा पहला पन्ना लिखा नहीं जा सका। आज छुट्टी है, अखबार नहीं आए इसलिए – लिखना नहीं था। हालांकि, मैं जानता था कि द टेलीग्राफ आएगा। पर मैंने छुट्टी मनाने का ही निर्णय किया था। आज जब अखबार आए ही नहीं हैं तो तुलना की नहीं जा सकती है पर एक खबर है जो अखबार आते तो भी शायद पहले पन्ने पर नहीं होती। इसका पहला हिस्सा तो कल नहीं ही था। इसलिए आज उसपर चर्चा बनती है। खबर यह है कि खबरों जैसा एक विज्ञापन छपा जो भाजपा के जीत की भविष्यवाणी कर रहा है।

पेश है विवादास्पद विज्ञापन छापने वाले अखबारों में हिन्दी के अखबार, दैनिक पूर्वोदय का पहला पन्ना। दूसरे सभी विज्ञापनों और तथाकथित खबरों के साथ जैसा नेट पर उपलब्ध है, वैसा ही। द टेलीग्राफ ने इसके संपादक, आर रवि का पक्ष बताया है। उन्होंने साफ-साफ कहा है कि यह विज्ञापन है। लेकिन दि असम ट्रिब्यून के संपादक, पीजी बरुआ ने कहा, यह विज्ञापन देर से आया। अंग्रेजी और बांग्ला के एक-एक अखबार, दि असम ट्रिब्यून और बांग्ला के दैनिक असम में प्रकाशित यह विज्ञापन देखिए और अंदाज को समझिए। आप चाहें तो बांग्ला अखबार दैनिक असम में प्रकाशित इस विज्ञापन को भी देख सकते हैं और समझ सकते हैं कि पूरी तरह झूठा विज्ञापन छापने की आरोपी वाली पार्टी से कितनी नैतिकता की उम्मीद की जाए।

इसमें कहा गया है, “ऊपरी असम में भाजपा की जीत तय”। बाल बराबर इस ‘खबर’ का फ्लैग शीर्षक भी है, “शुभचिन्तकों और कार्यकर्ताओं के बीच भारी उत्साह” और पार्टी के चुनाव निशान के साथ आठ कॉलम में छपी है सो अलग। निश्चित रूप से यह विज्ञापन है और सामान्य के रूप में प्रकाशित नहीं किया गया है ताकि पाठक इसे खबर मानें। अब कहने के लिए इसे विज्ञापन कहा जा सकता है पर यह अभी तक प्रकाशित होने वाले सभी विज्ञापनों से अलग है जो ऊपर आठ कॉलम का और नीचे चार कॉलम का है। आठ कॉलम का शीर्षक लोगो के साथ ऐसे है जैसे खबर सही होती तो कोई गोदी वाला छाप भी सकता था।

द टेलीग्राफ में इससे संबंधित खबर कल लीड थी पर होली में इसकी क्या चर्चा होनी थी। बंगाल के चुनाव आठ चरण में होने हैं। जहां एक ही चरण में हो और जहां तीन चरण में हो उसका एक चरण कितना महत्वपूर्ण है आप समझ सकते हैं। शनिवार को पश्चिम बंगाल के साथ असम में मतदान का पहला दौर था। इतवार को राज्य के कई अखबारों में पहले पन्ने पर यह विज्ञापन छपा था, भाजपा अपर असम की सभी सीटें जीतेगी। यह दावा कुल 47 सीटों के संबंध में था जहां शनिवार को मतदान हुए थे। ज्यादातर पाठकों को यह खबर जैसा लगा होगा पर असल में यह भाजपा का विज्ञापन था और पार्टी के चुनाव निशान कमल के साथ छपा था।

द टेलीग्राफ ने कल लिखा था, चुनाव प्रक्रिया के दौरान प्रकाशित होने वाले सभी सभी विज्ञापन चुनाव आयोग के निर्धारित अधिकारियों की पुष्टि के बाद ही प्रकाशित किए जा सकते हैं। यही नहीं, चुनाव आयोग ने 26 मार्च को मीडिया संस्थानों ऐसा कुछ भी प्रकाशित प्रसारित करने से प्रतिबंधित किया था जो किसी भी तरह चुनाव के नतीजों की भविष्यवाणी करता है। ऐसी खबर या सूचना (विज्ञापन के रूप में भी) 27 मार्च को सवेरे सात बजे से 29 अप्रैल को शाम 7:30  बजे तक प्रकाशित प्रसारित नहीं की जानी है। इसके बावजूद विज्ञापन प्रकाशित हुआ।

नाराज कांग्रेस ने असम के बाकी दो चरणों के मतदान से पहले मतदाताओं को जानबूझकर प्रभावित करने और धोखा देने की साजिश का आरोप लगाया है। पार्टी ने मांग की है कि विज्ञापन को प्रकाशित करने के लिए क्लीयर करने वाले अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई की जाए। यही नहीं, पार्टी ने चुनाव आयोग द्वारा अखबारों और टीवी चैनलों को फिर से निर्देश देने की मांग की ताकि मतदान के दौरान ऐसे विज्ञापन प्रकाशित प्रसारित नहीं किए जाएं।

वैसे तो टेलीग्राफ और कांग्रेस ने असम के अखबारों में प्रकाशित विज्ञापन को ही मुद्दा बनाया है लेकिन केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने भी पश्चिम बंगाल के मतदान वाले 30 में से 26 साीटें जीतने का दावा 28 मार्ट को किया था। इसे इंडिया टुडे ने उसी दिन शाम को प्रकाशित प्रसारित किया। इसमें असम के 47 में से 37 सीटें जीतने का दावा भी था। इंडिया टुडे समूह ने इस आशय का ट्वीट भी किया था। आप जानते हैं कि ऐसे ट्वीट, खबरों या विज्ञापन से क्या नुकसान हो सकता है और इसीलिए इसपर रोक है।

अगर एक से ज्यादा चरणों में चुनाव  होते हैं तो चुनाव आयोग के लिए यह सुनिश्चित करना जरूरी है। दूसरी ओर, सत्तारूढ़ दल के बड़े नेता अगर इसका उल्लंघंन करें तो चुनाव आयोग क्या कर सकता है और दूसरे दलों को हो सकने वाले नुकसान की भरपाई कैसे की जा सकती है – यह एक अलग मुद्दा है। वैसे इस विज्ञापन से साफ है कि चुनाव निष्पक्ष नहीं हैं और इस विज्ञापन को जारी करने वाले अधिकारी दबाव में हैं। छापने वाले तो पैसे के लोभ में अंधे हैं ही।

सत्तारूढ़ दल नियमों को न मानें या उसका उल्लंघन करे तो ‘निष्पक्ष’ चुनाव आयोग की भूमिका और जिम्मेदारी बहुत बड़ी है। ऐसे में वह क्या करता है यह देखना-जानना दिलचस्प होगा। बेशक यह काम मीडिया का है पर विज्ञापनों के जरिए यह काम मीडिया के जरिए ही करवाया जाए तो आप समझ सकते हैं कि स्थिति कितनी विकट है। और चुनाव आयोग अपने लिए ताकत कहां से हासिल करे। सोशल मीडिया एक सहारा है पर उसे भी नियंत्रित करने की कोशिशें जारी हैं और नए नियम साफ तौर से ऐसा ही संकेत देते हैं पर वह अलग मुद्दा है।

असम में जो हुआ उसके खिलाफ कांग्रेस ने रविवार को रात कोई आठ बजे दिसपुर थाने में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष रंजीत कुमार दास के खिलाफ एफआईआर लिखवाई है। मुझे लगता है कि यह एक बड़ी और महत्वपूर्ण घटना और इसे दबाने-छिपाने की कोशिश चल रही है। आपको खबर मिली?


लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं।


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