पहला पन्ना: टीकों की कमी और समुद्री सीमा में घुसा अमेरिका, कितना रफ़ू करें अख़बार!


द टेलीग्राफ में खबर है कि अमेरिका ने भारत के समुद्री क्षेत्र में काम किया और यह केंद्र सरकार की पूर्व सहमति के बिना किया गया। इसका मकसद भारत के अत्यधिक समुद्री दावों को चुनौती देना था। और बात इतनी ही नहीं है, अमेरिकी नौसेना ने यह सब करके उसे प्रचारित भी किया। देशभक्ति दिखाने के इस जमाने में देशभक्तों का काम था कि इसके लिए अमेरिका की निन्दा करके और उसे फिर ऐसा नहीं करने की चेतावनी देते। पर आज के अखबारों में आपको ऐसा कुछ दिखा क्या?


संजय कुमार सिंह संजय कुमार सिंह
काॅलम Published On :


 

  1. इंडियन एक्सप्रेस ने देश में कोरोना का हाल बताने की बजाय सिर्फ मुंबई का हाल बताया 
  2. टीके के प्रचारक अब शांत हैं, कमी पर सिर्फ शीर्षक या वह भी नहीं, ऐप्प को लोग भूल गए  
  3. इटली के नाविकों के खिलाफ मुकदमा खत्म कराने की जल्दी में क्यों है सरकार 
  4. बंगाल चुनाव प्रचार का गुडी-गुडी ही दिल्ली में छपता है 

 

इन दिनों अखबारों में कायदे से सरकार के कोरोना प्रबंध पर चर्चा होनी चाहिए थी। पिछले साल जब तालीथाली बजवाने और बत्ती बुझाकर मोमबत्ती जलवाने जैसी नौटंकी की गई तो अब उसकी बरसी पर उसे याद करना और अपने मकसद में वह कितना, कैसे कामयाब रहीजैसी चर्चा तो बनती है। ठीक है कि सरकार की नालायकी दिखानेबताने से सरकार नाराज हो सकती है लेकिन पूरी चर्चा का गायब हो जाना गधों के सिर से सींग गायब होने की तरह है। इन दिनों देश में कोरोना की वास्तविक स्थिति का आपको जैसा भी अनुमान हो, यह तो मानना पड़ेगा कि स्थिति गंभीर है, पहले से ज्यादा है और अब ना लॉकडाउन है, ना ऐप्प है और ना टीका। यहां तक कि जिस बहुप्रचारित टीके से लग रहा था कि कोरोना नियंत्रित या खत्म हो जाएगा वह भी बीच बाजार खत्म हो गया है। खत्म भी हुआ हो तो भी ऐसी खबर है ही लेकिन कमी की चर्चा अखबारों में नहीं है। दूसरी ओर, टीका बनाने वाली एक कंपनी ने उत्पादन बढ़ाने के लिए 3000 करोड़ रुपए की जरूरत बताई है। टीके की कमी की खबरें तो कम ही छपी हैं, उत्तर प्रदेश में तीन बुजुर्ग महिलाओं को टीके की जगह एंटी रैबिज इंजेक्शन लगा दी गई, यह खबर भी पहले पन्ने पर नहीं दिखी। यही नहीं, कोरोना के इलाज के लिए दी जाने वाली एक दवा की कमी की चर्चा कल सोशल मीडिया पर थी जो आज अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। जो माहौल बनता है वह अखबारों में दिख रहा है?  

राहुल गांधी ने कहा कि सरकार को दूसरे टीकों को भी उसी तेजी से मंजूरी देनी चाहिए तो केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने आरोप लगा दिया कि राहुल विदेशी कंपनी के लिए प्रचार कर रहे हैं जबकि राहुल गांधी ने  किसी कंपनी का नाम लिया  विदेशी कहा और देसी कंपनी का प्रचार स्वास्थ्य मंत्री समेत एक और मंत्री कर चुके हैं। और सरकार प्रचारित टीके से संबंधित संशोधनों की खबर देने नहीं आए। आप जानते हैं कि पिछले साल जब कोरोना आया था तो यह माना गया था कि इससे निपटने के लिए देश के अस्पतालों में वेंटीलेटर की जरूरत होगी। सरकारी स्तर पर कितने वेंटीलेटर खरीदे गए और कहां लगे यह तो नहीं ही पता है पीएम केयर्स के धन से 10,000 वेंटीलेटर खरीदने का प्रचार हुआ। वे कहां लगे, कब लगे कुछ पता नहीं है। प्रचार भी नहीं है। कुछ फर्जी और नकली वेंटीलेटर खरीदने की खबरें भी थीं पर अब जब वेंटीलेटर की जरूरत हो सकती है तो उसकी भी कोई चर्चा अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। आज के अखबारों में कोरोना और टीके की कमी से संबंधित कोई खबर है कि नहीं, ढूंढ़ते हुए मुझे ये खास खबरें मिलीं। 

  1. महाराष्ट्र ने पाबंदियों के सप्ताहांत में कदम रखा, दो मंत्रियों ने कहा कि पूरे लॉकडाउन की आवश्यकता होगी।” (इंडियन एक्सप्रेस)  
  2. टीके की मांग बढ़ रही है तब भी फर्मों को उत्पादन बढ़ाने में कुछ हफ्ते लग सकते हैं।इसके साथ एक और खबर है, “मुंबई के निजी केंद्रों में अगले तीन दिनों के लिए टीके नहीं।” (टाइम्स ऑफ इंडिया
  3. सक्रिय मामले सितंबर से पहली बार एक मिलियन हुए” (हिन्दुस्तान टाइम्स) एक दिन में मिलने वाले मामलों की संख्या दूसरी सबसे ज्यादा भी यहां है। यह देश भर की खबर है।
  4. टीकाकरण कम हुआ क्योंकि राज्यों में कमी है” ( हिन्दू) यहां भी दिल्ली की खबर अलग से है औरएक दिन में 8.5 हजार का निशान पारकरने की भी सूचना है।
  5. टीके की कमी का दबाव केंद्र पर” (फ्लैग शीर्षक) “राज्यों में टीके की खुराक कम हो रही है ( टेलीग्राफ

इंडियन एक्सप्रेस के दिल्ली संस्करण में दिल्ली या एनसीआर या देश भर का शीर्षक नहीं है, सिर्फ एक राज्य की खबर का शीर्षक है। अगर वाकई महाराष्ट्र की हालत सबसे खराब हो तो यह खबर बाकी के अखबारों में भी होती। टाइम्स ऑफ इंडिया में एक राष्ट्रीय खबर के साथ दूसरी खबर दिल्ली शहर की भी है। इसका शीर्षक है,  “एक दिन में 8521 मामलों के साथ शहर में दूसरा सबसे ज्यादा मामला दर्ज होने का रिकार्ड शुक्रवार को एक दिन में 39 मौतें हुई हैं और 1.1 लाख मामले जांचे गए हैं जो सबसे ज्यादा है। ऐसा नहीं है कि ये मामले इतने खराब या कम हैं कि इन्हें छोड़कर दिल्ली में मुंबई की खबर को महत्व दिया जाए। यही नहीं, टाइम्स ऑफ इंडिया की मुंबई की खबर इंडियन एक्सप्रेस में (पहले पन्ने) नहीं है। वह भी तब जब अखबारों में दिल्ली के लिए दिल्ली की खबर छापने या बदलने का रिवाज है। अगर विपक्ष की सरकार की बात करूं तो दिल्ली में भी विपक्ष की ही सरकार है। अब दिल्ली को यह सुविधा मिल रही है तो इसका कारण यह भी हो सकता है कि दिल्ली में हाल में सरकार का मतलब बदल गया है। फैसला आप कीजिए। हिन्दुस्तान टाइम्स में भी दिल्ली की खबर पहले पन्ने पर है। यहां मुंबई की कोई खबर नहीं है पर राहुल गांधी की सलाह को महत्व दिया गया है कि निर्यात रोककर देसी लोगों को टीके लगवाने दिया जाए। यह भी खबर है कि जॉनसन एंड जॉनसन ने भारत में अपने टीके के पहले और दूसरे चरण के चिकित्सीय परीक्षण के लिए अनुमति मांगी है।

 

    

कोविड और टीके की खबरों में सरकार की छवि खराब होने वाली खबरें नहीं या कम छापने के इन स्पष्ट उदाहरणों के बीच ऐसी कई खबरें होती हैं जो सरकार के प्रचार के उलट होती हैं। 56 ईंची सीने का बुलबुला अब फट या पिचक गया है और अब उसकी चर्चा नहीं होती लेकिन आज टेलीग्राफ में खबर है कि अमेरिका ने भारत के समुद्री क्षेत्र में काम किया और यह केंद्र सरकार की पूर्व सहमति के बिना किया गया। इसका मकसद भारत के अत्यधिक समुद्री दावों को चुनौती देना था। और बात इतनी ही नहीं है, अमेरिकी नौसेना ने यह सब करके उसे प्रचारित भी किया। देशभक्ति दिखाने के इस जमाने में देशभक्तों का काम था कि इसके लिए अमेरिका की निन्दा करके और उसे फिर ऐसा नहीं करने की चेतावनी देते। पर आज के अखबारों में आपको ऐसा कुछ दिखा क्या? दिलचस्प यह है कि इंडियन एक्सप्रेस ने इस खबर को लीड तो बनाया है पर शीर्षक में ही लिखा है, दिल्ली ने चिन्ता जताई। आप समझ सकते हैं कि यह मुद्दा चिन्ता जताने भर का नहीं है। मामला यह है कि एक मित्रवत देश ने ऐसा किया और खुद बताया। टेलीग्राफ के अनुसार, “अमेरिकी बयान में कहा गया हैभारत के अत्यधिक समुद्री दावों को चुनौती देकर नौवहन परिचालन में इस आजादी का मतलब है समुद्र के कानूनी उपयोग के अधिकार और आजादी को कायम रखना।विदेश संबंध जैसे मामले में यह एक गंभीर स्थिति है और जनता का अधिकार है कि उसे यह सब पता रहे लेकिन अखबार ऐसी जानकारी देते हैं? और अगर जानकारी देते भी हैं तो ऐसी खबरों को कितना महत्व देते हैं। 

आज टेलीग्राफ में यह खबर लीड है। चार कॉलम में छपी इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, भारतीय समुद्री क्षेत्र में ऑपरेशन को लेकर अमेरिका ने शेखी बघारी। मुख्य शीर्षक यू तू ब्रुटस के अंदाज में यू तू अमेरिका है। 

हिन्दुस्तान टाइम्स में भारत चीन सीमा विवाद निपटाने के लिए हुई चर्चा की खबर लीड है। अमेरिका वाली खबर यहां इसके साथ है। बेशक चीन की खबर महत्वपूर्ण है। उससे वह काम करती दिखती है। अमेरिका वाली खबर ऐसी नहीं है। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर है। बिना अनुमति भारतीय समुद्री क्षेत्र में अमेरिकी नौसेना के परिचालन पर भारत ने गुस्सा जताया। इंडियन एक्सप्रेस की खबर का शीर्षक है, “अमेरिकी युद्ध पोत नेभारत की सहमति के बिनासमुद्र में हंगामा किया, दिल्ली ने चिन्ता जताई। हिन्दू में यह खबर पहले पन्ने पर है, भारत ने अमेरिकी नौसेना अभ्यास पर विरोध जताया। अब आप सबकी भाषा और पोजिशनिंग देखिए और फिर इंडियन एक्सप्रेस तथा टेलीग्राफ के शीर्षक की तुलना कीजिए। 

आज बंगाल में मतदान है। प्रधानमंत्री भाषण दें तो पहले पन्ने पर लेकिन आज सूचना भी नहीं है। टेलीग्राफ में खबर है भाजपा पश्चिम बंगाल में खर्च कम रही है। जब बंगाल चुनाव की खबरें दिल्ली में छपती हैं तो दूसरी पार्टियों की खबरें क्यों नहीं? यह कम दिलचस्प नहीं है कि असम और तमिलनाडु के चुनाव तीन चरण में पूरी हो गए (नतीजे अभी बाकी हैं) लेकिन बंगाल का आठ चरण में चल रहा है और चुनाव आयोग ने अब मास्क पहनने या कोविड नियमों का पालन करने के लिए कहा है जबकि भाजपा अध्यक्ष ने ऐसे सवाल के जवाब में मीडिया वालों से कहा कि आप हमारी जीत देखकर ऐसे सवाल पूछ रहे हैं। क्या बंगाल चुनावों की यह दशा आपको अखबारों से मालूम हो रही है? क्या आपको पता चला कि नंदीग्राम में मतदान के दिन भाजपाई गुंडों के हमले में घायल एक तृणमूल कार्यकर्ता की कल मौत हो गई ( टेलीग्राफ) प्रधानमंत्री ने बंगाल में चुनाव प्रचार के तहत जो कुछ बोला उसकी और उसकी निन्दा की चर्चा भी दिल्ली के अखबारों में कम हुई पर सेवा में कसर नहीं है। 

आपको याद होगा, 2012 में केरल तट पर इटली के नाविकों ने दो भारतीय मछुआरों की हत्या कर दी थी। मामला अदालत में था। इस मामले में समझौता हो चुका है और इटली ने 10 करोड़ रुपए का हर्जाना देने की सहमति दी है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर इटली के नाविकों के खिलाफ आपराधिक मामला बंद करने की अपील की है। भारत सरकार की यह प्राथमिकता निश्चित रूप से चौंकाती है। हर्जाने का भुगतान करने का आदेश 21 मई 2020 का है और जुलाई 2020 में सरकार ने इससे सहमत होने की जानकारी दे दी थी। आज छपी खबरों से लगता है कि इटली ने यह भुगतान अभी तक नहीं किया है पर भारत सरकार को मुकदमा खत्म करने की जल्दी है। अखबार वाले इसका कारण बताने की बजाय यह बता रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा है कि वह क्षतिपूर्ति जमा कराए (इंडियन एक्सप्रेस)। इससे लगता है कि क्षतिपूर्ति भी भारत सरकार को देना है जबकि अदालत का आदेश है कि इटली से आया पैसा एक हफ्ते के अंदर सुप्रीम कोर्ट में जमा कराया जाए। बात इतनी ही नहीं है, इस मामले में हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर का शीर्षक है, “यही जल्दबाजी दूसरे मामलों में क्यों नहीं : सुप्रीम कोर्ट ने (इटली के) नाविकों के मामले में सरकार से पूछा”। पर यह खबर ऐसे शीर्षक से कहीं और नहीं दिखी। 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं।


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