चुनाव चर्चा: अस्सी-नब्बे पूरे सौ, सौ में लागा धागा, चोर निकल कर भागा!

चन्‍द्रप्रकाश झा चन्‍द्रप्रकाश झा
काॅलम Published On :


‘अस्सी नब्बे पूरे सौ, सौ में लगा धागा, चोर निकल के भागा’- सूत्र वाक्य तरह की ये बात बिहार में बच्चों के बीच बेहद पुराने ‘सूई–धागा खेल’ में कहते है. इस खेल में बाल धावक को सूई की नोंक में धागा डालते-डालते ही दौड लगानी पडती है. लेकिन ऐसा क्यों कहते हैं? जाहिर है इसमें बाल मनोविज्ञान का एक सूत्र निहित है. बच्चों को खेल में जीतना, दौड़ में अव्वल ही नहीं आना है अपितु उनको सुई की नोक में धागा डाल लेने की कामयाबी के साथ मंजिल पर पहुंचना है. ये बिल्कुल न हो कि धावक बच्चे के मंजिल तक पहुंचने से पहले धागा तो सुई की नोक के पार चला जाये और वह दौड़ मे भी सबसे आगे रहे लेकिन खेल जीत लेने के पूर्वानुमान से उत्साह में मंजिल तक पहुंचते-पहुंचते सूई की नोंक से पहले पार निकल चुका धागा अंततःएक तरफ और सुई दूसरी तरफ रह जाये. इस खेल से बच्चों को नसीहत मिलती है कि वे जीवन की प्रतिस्पर्धा में, प्रयोगशालाओं के वैज्ञानिक परीक्षण में अनिवार्य समझी जाने वाली ‘क्लिनिकल एक्युरेसी’ बरतने पर ध्यान दें.

बिहार में मतदान तीन चरण में 28 अक्टूबर, 3 नवम्बर और 7 नवम्बर को कराये जायेंगे. मतदान पिछली कई बार की ही तरह इलेक्ट्रॉंनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के जरिये होगा. मतों की गिनती भी ईवीएम के जरिये 10 नवंबर को निर्धारित है. 10 नवंबर को दोपहर बाद तक सारे परिणाम घोषित कर देने का कार्यक्रम है. विधानसभा में कुल 243 सीटें हैं. इनमें 38 अनुसूचित जाति और केवल दो अुनूसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं.

बिहार चुनाव को लेकर मोर्चाबंदी लगभग पूरी हो चुकी है. भाजपा के ख़िलाफ़ बने मुख्य मोर्चे में पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल और  काग्रेस के अलावा कम्युनिस्ट भी शमिल हो गये हैं.

दूसरी ओर, चुनावी मौसम वैज्ञानिक कहे जाने वाले केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी), मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से नाराज होकर भाजपा के मोर्चे से बाहर चली गयी है.

देश में मुस्लिम पहचान वाली सियासत में बरसो से जुटे सांसद असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तहादुल मुसलमीन (एआईएमआईएम) ने केंद्र में एचडी देवेगौडा और आईके गुजराल सरकार में मंत्री और झंझारपुर से सात बार सांसद रहे देवेन्द्र प्रसाद यादव के समाजवादी जनता दल (डेमोक्रेटिक) को संग लेकर ‘यूनाइटेड डेमोक्रेटिक सेक्युलर अलायंस’ (यूडीएसए) नाम से नया मोर्चा बनाया है. इसमें पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी  और पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री उपेंद्र कुशवाहा की रालोसपा के भी शामिल होने की अटकल चल रही है. जाहिर है ये मोर्चाबंदी, राजद के लिये नुकसानदेह होगी. यादव और मुस्लिम वोटों का ज्यादा बंटना एनडीए के लिये मददगार होगा. देवेन्द्र प्रसाद यादव इस मोर्चे के संयोजक और अख्तरुल ईमान सह-संयोजक हैं. दोनों ही राजद की ही सियासी कोख से निकले हैं.

किस मोर्चे का कौन दल कितनी और कौन-कौन सी सीट पर चुनाव लड़ेगा, इसकी वास्तविक तस्वीर नामांकन की प्रक्रिया के बाद ही मिलेगी. तब हम हर मोर्चे की चुनावी सम्भावना के बारे में विस्तृत चर्चा करेंगे.

लेकिन हम इस कॉलम के आज के अंक में सूई-धागा दौड़ की चर्चा का मर्म समझ लें तो बेहतर होगा. मर्म ये है कि चुनावी दौड़ के धावकों को भी क्लिनिकल ‘प्रेसीसन’ (अचूकता) की दरकार होती है.

तो क्या बिहार विधान सभा के चुनाव के ‘खेल’ में ऐसा ही कुछ होने वाला है? जो जीत रहा लगता है, क्या वो अंतत: जीत नहीं सकेगा? क्या वाकई ऐसा होगा?  मीडिया विजिल और उसके ‘चुनाव चर्चा’ कालम का स्तम्भ्कार चुनावी भविष्यफल बताने की पत्रकारिता में यकीन नहीं करता है. जिनका इसमें यकीन हो उन्हें उनके ‘गोद’ लिये हुए धावक की जीत की सम्भावना की गोदी मीडिया वाली पत्रकारिता मुबारक हो.

हाँ, हम जानते हैं कि विधान सभा के नवम्बर 2015 में हुए पिछले चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने बुरी तरह से हार जाने के बावजूद सियासी जोड़-तोड़, बाहुबल, धनबल और सत्ताबल से जुलाई 2017 आते-आते चोर दरवाजे से विजयश्री हासिल कर ली. और दो पूर्व मुख्यमंत्रियों- लालू प्रसाद यादव और उनकी पत्नी राबडी देवी का राष्ट्रीय जनता दल (राजद) सदन की सबसे ज्यादा सीट जीतने के बाद भी विपक्ष में बैठा है.

इस बारे में हम ‘चुनाव चर्चा’ स्तम्भ की फरवरी 2018 में हुई शुरुआत से 2019 के लोकसभा चुनाव के अनेक अंकों में और मौजूदा बरस के हालिया कई अंकों में भी विस्तार से चर्चा कर चुके हैं. फिर भी चुंकि सुई-धागा खेल की चर्चा चल निकली है तो पिछ्ले विधानसभा चुनाब का परिणाम आने के पहले कुछ घंटे तक गोदी मीडिया के दिखाये सीन की चर्चा कर ही सकते हैं.

पहला सीन

2015 के बिहार चुनाव के समय तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष  अमित शाह ने सार्वजनिक रूप से यहां तक कह दिया था कि चुनाव में महागठबंधन की हार निश्चित है. उन्होने समय तक बता दिये कि कितने बजे परिणाम निकलेंगे, कितने बजे तत्कालीन मुख्यमंत्री नितीश कुमार अपने मंत्रिमंडल की बैठक बुलायेंगे, वे अपनी कैबिनट की बैठक के बाद कितने बजे अपना इस्तीफा देने राजभवन जाएंगे और उसके कितने समय बाद भाजपा की खुद की सरकार का गठन हो जाएगा.

ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. दीगर बात है कि महागठबंधन की नीतीश कुमार के मुख्यमंत्रित्व में बनी नयी सरकार ज्यादा टिक नही सको. कारण जो भी थे, नीतीश कुमार ने पलटी मारी और अपनी सरकार से मबंधन के अन्य दलों को बाहर करने के लिए 26 जुलाई 2017 को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. उनके इस्तीफे से महागठबंधन की वह सरकार गिर गई. नीतीश कुमार ने भाजपा को शामिल करते हुए नए सिरे से सरकार बना ली।

दूसरा सीन

चुनाव परिणाम का अंदाज लगाने में लगभग सभी एग्जिट पोल कम्पनियाँ और उनके प्रायोजक टीवी चैनल बुरी तरह विफल रहे. मतगणना शुरु होने के पहले घंटे के रूझान के आधार पर गोदी मीडिया ने भाजपा की जीत की डुगडुगी बजानी शुरु कर दी. गोदी मीडिया को जरा भी भान नहीं रहा कि ये रूझान फौजी वोटर के मिले पोस्टल वोट के आधार पर थे और नागरिक समाज के वोट गिने जाने बाकी थे.

तीसरा सीन

बिहार चुनाव में भाजपा के जीतने की प्रत्याशा में पार्टी के दिल्ली मुख्यालय पर बाँटने के लिए ढेर सारे लड्डू मंगा लिये गये थे.

अमित शाह की चाणक्य बुद्धि

इस बार के बिहार चुनाव के लिये भाजपा की अंतिम रणनीति पार्टी अध्यक्ष जे.पी नड्डा और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बाद बनी. शाह को राजनीति का चाणक्य कहे जाने पर कुछ सवाल उठते रहे हैं. यह सवाल तब भी उठा जब भाजपा, बिहार विधानसभा के 2015 के पिछले चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव, मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जनता दल-यूनाइटेड और कांग्रेस के महागठबंधन से परास्त हो गई थी.

अमित शाह को उनके गृह राज्य गुजरात की विधानसभा के 2017 में हुए चुनाव में भी कोई ख़ास सफलता नहीं मिली क्योंकि उसमे भाजपा को कांग्रेस की कड़ी टक्कर के बीच पहले की अपेक्षा बहुत ही काम अंतर से बहुमत मिला था.  गोआ के चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में कांग्रेस उभरी थी. ये दीगर बात है कि भाजपा, जोड़-तोड़ और मोदी सरकार के इशारे पर राज्यपाल से प्राप्त अनुकम्पा के सहारे अपनी सरकार बनाने में कामयाब हो गई. इसके पहले भाजपा को हरियाणा विधानसभा जीत कर वहाँ पहली बार अपनी सरकार बनाने में सफलता जरूर मिली. दूसरी बार भाजपा ने हरियाणा में चुनाव बाद की जोड़-तोड़ से गठबंधन सरकार ही बनाई.  भाजपा, महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद वहाँ भी पहली बार अपने नेतृत्व में गठबंधन सरकार बनाने में सफल रही।  लेकिन यह गठबंधन सरकार अलग-अलग चुनाव लड़ने वाली भाजपा और शिवसेना के हाथ मिलाने से ही बन पाई जिसमें अमित शाह की ‘चाणक्य बुद्धि’ की कोई भूमिका नहीं थी.  महाराष्ट्र विधानसभा के अगले ही चुनाव में मुख्यमंत्री द्वेंद्र फडनवीस ने भाजपा राज्यपाल की ‘अनुकम्पा’ से फिर अपनी सरकार बना ली लेकिन वह टिक नहीं सकी. वहाँ अभी शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे की मिलीजुली सरकार है जिसमें काग्रेस और अन्य दल भी शामिल हैं.

कर्नाटक विधानसभा के पिछले चुनाव से उत्पन्न परिस्थितियों में अमित शाह की ‘चाणक्य बुद्धि’ कोई काम नहीं आई. वहाँ पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस येदियुरप्पा की बनी अल्पमत भाजपा सरकार को पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा के जनता दल-सेकुलर और कांग्रेस के चुनाव-बाद अप्रत्याशित गठबंधन के स्पष्ट बहुमत के कारण इस्तीफा देना पड़ा. दीगर बात है कि भाजपा के सियासी जोड़-तोड़ से येदुरप्पा जी की फिर सरकार बन गई है.

यही हाल मध्य प्रदेश में हुआ जहाँ चुनाव बाद कांग्रेस की बनी कमलनाथ सरकार को भाजपा ने राहुल गांधी के मित्र रहे  ज्योतिरादित्य सिंधिया को अपने पाले में खींचकर शिवराज सिंह चौहान की सरकार फिर बनवा दी। लेकिन भाजपा लाख चाह कर राजस्थान में कांग्रेस के उप मुख्यमंत्री रहे सचिन पायलट को पटाकर भी ये खेल नहीं कर सकी.

दरअसल भारत के पांच राज्यों- छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, मिजोरम, तेलंगाना और राजस्थान में 2019 के उत्तरार्ध में विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा मोर्चाबंदी में अफरातफरी शुरु हो गई थी. इन पांच राज्यों में किसी में भी भाजपा का मोर्चा नहीं था. उनके परिणाम के एक दिन पहले मोदी सरकार में बिहार के ही मानव संसाधन राज्य मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने मंत्री पद और संसद की सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया था. हालांकि कुशवाहा की राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी (आरएलएसपी) के एनडीए में फिर लौट आने की चर्चा थी मगर अभी तक बात नहीं बन पायी.

एनडीए से आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री नारा चंद्राबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) और जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) पहले ही बाहर निकल चुकी है. 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद केंद्र में जब नरेंद मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार बनी तो उसमें 43 दल शामिल हो गए थे. इनमें पंजाब का शिरोमणि अकाली दल और महाराष्ट्र की शिवसेना पहले से भाजपा के मोर्चे में थी. लेकिन उन दोनो के भी एनडीए से बाहर निकल आने के बाद एनडीए के दलों की तदाद अब आधे से भी कम रह गई है.

बहरहाल, केंद्रीय सत्ता पर 2014 से लगातार काबिज भाजपा की सियासी मोर्चाबंदी 2024 में निर्धारित अगले लोकसभा चुनाव में क्या रंग लेगी ये भविष्य के गर्भ में छिपा है.

देखना है कि बिहार विधान सभा के नये चुनाव के बाद इस राज्य में भाजपा का मोर्चा कितना बनता या बिगडता है. और बिहार के बाहर एनडीए का क्या रूप बनता है। यही बात कांग्रेस की मोर्चाबंदी पर भी लागू होती है. बिहार ने नये सियासी तेवर पहले ही दिखा दिये हैं. कांग्रेस की चुनावी मोर्चाबंदी में पहली बार कम्युनिस्ट पार्टियाँ भी खुल कर शामिल हो गई हैं. इन पार्टियो ने इससे पहले कांग्रेस के साथ खुली मोर्चाबंदी कभी नहीं की. दोनो के बीच महाराष्ट जैसे प्रदेश में चुनावी तालमेल, आपसी समझ और सह्योग जरुर रहा था.

प्रसंगवश, महाराष्ट्र विधानसभा के एक चुनाव के समय मुम्बई में आयोजित प्रेस कोन्फ्रेंस मे इस स्तम्भकार ने सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी से जब पूछा था कि कांग्रेस के साथ उनकी पार्टी का ‘ अलायंस, अडजस्टमेंट, अंडरस्टंडिंग’ में से क्या है तो उन्होने साफ कुछ कहने के बजाय यही कहा था कि वह ‘ सिमेंटिक्स ‘ (नाम व्याकरण) के फेर में नहीं पडना चाहते हैं.

इतना तो तय है कि ब्रिटिश हुकमरानी की गुलामी से सियासी तौर पर आजाद होने के बाद ‘हम भारत के लोग’ ने ‘हम भारत के लोग’ को ‘इंडिया दैट इज भारत’ का जो लोकतांत्रिक, सेक़्युलर, समाजवादी संविधान दिया, उसे  पलट कर किसी भी तरह के नये संविधान के तहत नई शासन प्रणाली कायम होने तक सियासी सूई- धागा खेल चलता ही रहेगा.



वरिष्ठ पत्रकार चंद्र प्रकाश झा का मंगलवारी साप्ताहिक स्तम्भ ‘चुनाव चर्चा’ लगभग साल भर पहले, लोकसभा चुनाव के बाद स्थगित हो गया था। कुछ हफ़्ते पहले यह फिर शुरू हो गया। मीडिया हल्कों में सीपी के नाम से मशहूर चंद्र प्रकाश झा 40 बरस से पत्रकारिता में हैं और 12 राज्यों से चुनावी खबरें, रिपोर्ट, विश्लेषण के साथ-साथ महत्वपूर्ण तस्वीरें भी जनता के सामने लाने का अनुभव रखते हैं। सी.पी. आजकल बिहार में अपने गांव में हैं और बिहार में बढ़ती चुनावी आहट और राजनीतिक सरगर्मियों को हम तक पहुँचाने के लिए उनसे बेहतर कौन हो सकता था।



 


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