इंडियन एक्सप्रेस का ‘जर्नलिज्म ऑफ करेज’ जो सत्ता की भक्ति ही है !

संजय कुमार सिंह संजय कुमार सिंह
काॅलम Published On :


अरुण शौरी के नेतृत्व में राजीव गांधी के खिलाफ अभियान चलाने और बोफर्स का हौव्वा खड़ा करने वाले इंडियन एक्सप्रेस समूह ने तब अपनी छवि सत्ता विरोधी होने की बनाई थी। तब की सरकार ने इंडियन एक्सप्रेस के परिसर पर छापा भी डलवाया था। पर आज जब देश का ज्यादातर मीडिया भाजपा सरकार के समर्थन में खड़ा है (उस समय के बहुत सारे पत्रकार घोषित रूप से भाजपा के साथ हैं, हालांकि वह अलग मुद्दा है) तो इंडियन एक्सप्रेस भी कोई अलग नहीं है। यह ठीक है कि अखबार में सरकार के खिलाफ खबरें दूसरे अखबारों के मुकाबले संभवतः ज्यादा छपती रहती हैं पर भाजपा का समर्थन भी छिपा हुआ नहीं है। 

उदाहरण के लिए, आज अखबार की लीड का फ्लैग शीर्षक है, “सोनार बांग्ला के लिए हमें पांच साल दें”। मुख्य शीर्षक है, “अमित शाह ने रास्ता / तरीका (टोन) तय किया, ममता पर हमला किया : चुनाव के समय तक आप अकेली होंगी”। इंट्रो है, “अधिकारी तृणमूल सांसद, नौ विधायकों के साथ भाजपा में शामिल हुए”। वैसे तो जनसत्ता के साथ अब वह बात नहीं है पर उसमें भी यह खबर लीड है। उसका शीर्षक है, “चुनाव आने तक अकेली रह जाएंगी ममता : शाह”। फ्लैग शीर्षक है, “शुभेन्दु अधिकारी के साथ तृणमूल के सात विधायक भाजपा में”। अगर भाजपा का विरोध करना होता तो यही शीर्षक हो सकता था, “भाजपा ने तृणमूल में की तोड़फोड़, शुभेन्दु अधिकारी के साथ सात विधायक तोड़े”। पुराने अंकों में कांग्रेस के खिलाफ ऐसे शीर्षक खूब मिलेंगे।  

वैसे भी, खबर यही है कि अमित शाह ने कहा है कि वे चुनाव तक भाजपा के सभी नेताओं को खरीद/ पटा /  तोड़ लेंगे। बेशक, यह बंगाल में भाजपा की ‘लोकप्रियता’ नहीं है। सरकार बनाने की संभावना का असर और उससे संबंधित लालच है। यही भाजपा की राजनीति है और रणनीति है। इसीलिए पूर्व अध्यक्ष ‘चाणक्य’ कहे जाते हैं। तृणमूल के नेताओं को तोड़कर चुनाव लड़ने के बारे में ‘सत्य हिन्दी’ ने लिखा है, “….. टीएमसी सरकार के कथित भ्रष्टाचार के मुक़ाबले के लिए उन्हीं दाग़ी नेताओं की बैशाखी पर चलने का फ़ैसला किया है जो पहले से ही भ्रष्टाचार और हत्या तक के आरोपों से जूझ रहे हैं। यानी पार्टी यहाँ दाग़ियों से ही दाग़ धोने का फ़ॉर्मूला अपना रही है।

दो साल पहले टीएमसी से नाता तोड़ कर बीजेपी के पाले में जाने वाले मुकुल राय हों या फिर अमित शाह के दौरे के समय शनिवार को अपने दल-बल के साथ भगवा झंडा थामने वाले शुभेंदु अधिकारी, किसी का दामन उजला नहीं है। बीजेपी इन दोनों नेताओं को अपनी सबसे बड़ी पकड़ मानते हुए अपनी कामयाबी पर इतरा रही है।” कहने की जरूरत नहीं है कि इंडियन एक्सप्रेस और जनसत्ता की प्रस्तुति गोदी मीडिया से अलग नहीं है। आइए, देखें दूसरे अखबारों ने इस खबर को कैसे छापा है।   

हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर पहले पन्ने पर है, टॉप पर है लेकिन लीड नहीं है। शीर्षक है, अमित शाह की बंगाल रैली में 10 विधायक भाजपा से जुड़े। कहने की जरूरत नहीं है कि यह खबर या सूचना है और जैसे का तैसे पेश किया गया है। यही सही या सामान्य तरीका है। हालांकि, 10 विधायक अगर सत्तारूढ़ पार्टी से भाजपा में आ रहे हैं तो इसके कई मतलब हो सकते हैं और भाजपा के समर्थन वाला या विरोध वाला शीर्षक भी हो सकता था। जैसा उदाहरण मैंने जनसत्ता के शीर्षक के साथ दिया है। पर यह एक संतुलित शीर्षक है। 

टाइम्स ऑफ इंडिया में यही किया गया है। शीर्षक तो सूचना ही है पर विशेषणों और विशेषताओं से इसे भाजपा के समर्थन या पक्ष में बनाने की कोशिश की गई है। संख्या में अंतर अपनी जगह है और यह ऐसे शीर्षक की विश्वसनीयता पर निश्चित रूप से प्रश्नचिन्ह है लेकिन यह भी अलग मुद्दा है। बेशक यह खबर प्रस्तुत करने का अंदाज है और अलग-अलग अखबारों में अलग होता है। मेरा मानना है कि जब आज यह कहा जा रहा है कि मीडिया भाजपा या सरकार का समर्थन कर रहा है तो जो निष्पक्ष हो सकते हैं उन्हें कोशिश करके ऐसा होना चाहिए नहीं तो निश्चित रूप से यह रेखांकित किया जाना चाहिए कि तथाकथित बड़ा, कॉरपोरेट या सत्ता विरोधी अखबार भी वही कर रहा है जो कोई टुटपुंजिया गोदी मीडिया कहा जाने वाला कर रहा है। 

द हिन्दू में भी यह खबर पहले पन्ने पर हैटॉप पर है लेकिन लीड नहीं है। शीर्षक हैअमित शाह की रैली में भाजपा में बड़े पैमाने पर भागीदारी। यह भी सूचना या खबर की वैसी ही प्रस्तुति है जैसी है।  इसलिए इससे कोई शिकायत नहीं हो सकती है। मैं जो अंग्रेजी अखबार देखता हूं उनमें द टेलीग्राफ की खबर भाजपा के खिलाफ होनी थीहै। इससे पता चलेगा कि भाजपा  का समर्थन करने वालों ने क्या नहीं बताया है। सबसे पहले तो इसका शीर्षक ही दिलचस्प है। फिल्म, “20 साल बाद” के अंदाज में बीस को काट कर लिखा गया है, “छह साल बाददो बिछड़े भाई मिदनापुर के मैदान में मिले।” इसके साथ उपशीर्षक हैसुबकने की कहानी : उपेक्षित थे अब रोने के लिए एक कंधा मिला है। अखबार ने कोष्ठक में बताया है कि अभी हाल तक मंत्री थेउनके पिता और भाई सांसद तथा एक और भाई हाल तक अच्छे पद पर थे। बेशकयह सब भी सूचना है और समय पर प्रस्तुत करने का अपना महत्व और अंदाज होता है। द टेलीग्राफ की खबर ऐसी ही है। पढ़ेंगे तो जानेंगे जो दूसरे अखबारों में नहीं है।

इसमें आप गलत का साथ देने की नीति पर भी चल सकते हैं। यही संपादकीय स्वतंत्रता है और इसीलिए ट्रोल सेना का दबाव रहता है कि भाजपा का विरोध क्यों? (और उसे या उग्र हिन्दुत्व का) समर्थन क्यों नहीं? मुझे लगता है कि बहुत सारे पत्रकार इस दबाव में आ भी गए हैं और यह अक्सर दिखता है। यह अलग बात है कि खुद को स्वतंत्र या सही या दमदार मानने वाले गलती भी सीना ठोंक कर कर रहे हैं। इंडियन एक्सप्रेस उन्हीं में से एक है। मुख्य खबर के साथ एक और खबर छपी है जिसमें बताया गया है कि भाजपा में आने वाले कांग्रेस और सीपीएम से भी हैं। और अखबार ने उनका महिमामंडन किया है उनसे मिलवाने की बात कर रहा है जबकि चुनाव के समय या वैसे भी दल बदल अनैतिक है। कोई वामपंथी सीधे दक्षिणपंथी हो जाए तो यह मामूली नहीं है। ना ही भाजपा की वीरता। असल में तो यह सब ईनाम के लिए होता है पर कांग्रेस को भ्रष्ट और खुद को ईमानदार बताने वाली पार्टी अब इसपर चुप है और मीडिया का बड़ा हिस्सा उसके साथ।  


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