पहला पन्ना: बिन ऑक्सीजन घुटते तन को अख़बार बतायें ‘मन की बात!’

संजय कुमार सिंह संजय कुमार सिंह
काॅलम Published On :


दिल्ली में ऑक्सीजन की सप्लाई अभी भी जरूरत भर नहीं है और कमी सिर्फ ऑक्सीजन की नहीं है, अस्पतालों में बिस्तर की भी है। कुछ अस्पताल बिस्तर मिलने पर ऑक्सीजन भी दे सकते हैं लेकिन जहां बिस्तर नहीं है या जिसे बिस्तर नहीं मिला वह अब भी ऑक्सीजन के लिए परेशान है। लेकिन अखबारों से ऐसा नहीं लगता है। सरकारी प्रचार अपनी जगह हैं ही। आज, कल का मन की बात कई अखबारों में पहले पन्ने पर है। टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड है। इसका कारण (मन की बात बासी ‘खबर’ होती है) यह है कि अखबार के अनुसार यह पहला ‘एमकेबी’ था जो एक विषय – ‘महामारी” पर केंद्रित था। द टेलीग्राफ ने बताया है कि 4732 शब्दों के मन की बात में प्रधानमंत्री ने सिर्फ एक बार ऑक्सीजन कहा। पूरे ‘एमकेबी’ में पांच बार ऑक्सीजन का जिक्र हुआ। चार बार एक डॉक्टर ने ऑक्सीजन कहा जिनसे मोदी ने बात की।

ऐसी हालत में टाइम्स ऑफ इंडिया ने ‘एमकेबी’ को इतना महत्व तब दिया है जब इसी अखबार में अधपन्ने पर लीड है, “दिल्ली-एनसीआर का दम अब भी घुट रहा है, गुड़गांव के अस्पताल में चार मरे।” इस खबर के अनुसार, दिल्ली गुड़गांव के कई अस्पताल ऑक्सीजन की भारी कमी से जूझ रहे हैं और कोविड-19 के गंभीर रोगियों को बचाने के लिए घंटे-घंटे ऑक्सीजन से संबंधित सूचनाओं से झटके खाते रहे। इसके बावजूद चार मरीज मर गए। इनमें दो दिल्ली से गुड़गांव के कथूरिया अस्पताल में स्थानांतरित किए गए थे पर दोपहर बाद दो बजे ऑक्सीजन खत्म हो गई तो मरीजों की मौत हो गई। दिलचस्प यह है कि अस्पताल प्रबंधन के अनुसार जिला प्रशासन को सूचना दी गई थी पर उपायुक्त यश गर्ग ने कहा है कि उन्हें सूचना होती तो कुछ करते। लिहाजा जांच के आदेश दे दिए गए हैं। इस मामले में गौरतलब यह है कि एनसीआर का गुड़गांव हरियाणा में है और राज्य में डबल इंजन की सरकार है।

इस तरह, मामला यह है कि इतने दिनों में दिल्ली / एनसीआर के अस्पतालों या बीमारों के लिए पर्याप्त ऑक्सीजन की व्यवस्था नहीं हो पाई है पर गुड़गांव के अस्पताल में चार लोगों के मरने की खबर (शीर्षक के रूप में) मुझे टाइम्स ऑफ इंडिया के अलावा कहीं नहीं दिखीं। आज के अखबारों में पहले पन्ने पर कुछ परस्पर विरोधी खबरें हैं उसी अखबार में या किसी और में। उदाहरण के लिए, मन की बात के आधार पर टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर का शीर्षक है, “कोविड की दूसरी लहर ने देश को हिला दिया है: प्रधानमंत्री।”  यह एक स्वीकारोक्ति है पर हिन्दुस्तान टाइम्स में इसी खबर का शीर्षक है, “…. दूसरी लहर ने हमें चौंकाया पर हम जीतेंगे”। कहने की जरूरत नहीं है कि, “हम जीतेंगे” – 15 लाख मिलेंगे जैसा खोखला दावा है और अभी उसका कोई आधार भी नहीं है। लेकिन हिन्दुस्तान टाइम्स ने इस खबर के साथ सरकारी प्रचार की खबर छापी है, पीएम केयर्स के तहत 551 जिलों को पीएसए मेडिकल ऑक्सीजन प्लांट मिलेंगे। इंडियन एक्सप्रेस ने तो इसे लीड में शामिल कर लिया है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह निर्णय बहुत पहले हो जाना चाहिए था और अब हुआ है तो कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन प्रचार है तो पहले पन्ने पर होना ही है।

टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस खबर या प्रधानमंत्री के दावे के साथ दूसरी खबर में बताया है कि देश में एक हफ्ते में 22.5 लाख नए मामले सामने आए हैं मौतें 89 प्रतिशत बढ़ी हैं। यह तो वास्तविकता का एक हिस्सा है अकले इतवार को 2907 लोगों की मौत हुई है। फिर भी, “अगर हम जीत जाएंगे” तो क्या ये लोग जिन्दा हो जाएंगे? या इनके परिवार का दुख कम करने के लिए सरकार कुछ करेगी? ऐसी कोई खबर नहीं है। सिर्फ शीर्षक है। प्रधानमंत्री के इस दावे और देश की हालत के साथ इंडियन एक्सप्रेस की खबर है, दूसरे दौर से ठीक पहले एक-एक कर कई राज्यों ने विशेष कोविड सेंटर बंद किए। आप समझ सकते हैं कि सरकारी योजना, तैयारियों, पूर्व सूचना आदि का क्या हाल था और है। लेकिन खबर सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस में है या नहीं के बराबर है।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि सरकार जनता को मुश्किल के समय राहत देने के मामले में बुरी तरह नाकाम रही है। पर अखबार इसे बताते नहीं हैं सरकार तथा उसके समर्थक झूठे प्रचार के दम पर गलत धारणा बना रहे हैं। और यह नोटबंदी के समय से चल रहा है। नोटबंदी के समय सरकार के समर्थकों ने कहा था कि इससे काले धन वाले परेशान हैं, फिर जीएसटी से टैक्स चोर परेशान थे, धारा 370 हटाने से कश्मीरी परेशान हुए और यह चला आ रहा है। कोरोना तो राष्ट्रीय आपदा है। सरकार ने नहीं बुलाया है (हालांकि यह भी असत्य हो सकता है) पर इससे निपटने में बुरी तरह नाकाम रही है और यह तभी साफ था जब लोग पैदल सैकड़ों किलोमीटर जाने के लिए मजबूर हुए और उन्हें राहत देने की बजाय पुलिस से पिटवाया गया। जनता को तब लगा कि गरीब मजदूर इसी लायक हैं। अब वही लोग परेशान हैं जो घर में नहीं रहते हैं, मास्क नहीं लगाते हैं आदि आदि। पर मूल बात यह है कि सरकार एक हफ्ते में भी दिल्ली के अस्पतालों के लिए पर्याप्त ऑक्सीजन का बंदोबस्त नहीं कर पाई और राजधानी दिल्ली में लोग ऑक्सीजन के लिए मारे-मारे फिर रहे हैं, मर रहे हैं तो देश का क्या हाल होगा। पर कहीं कोई खबर है?

राम राज्य देने वाले डबल इंजन के एक सरकार के मुखिया ने कह दिया कि उनके यहां सब ठीक है। कहीं कोई कमी नहीं है। ऐसे लोग अफवाह फैलाते हैं और उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। ऐसी सरकार से कोई किसलिए भिड़े। आप अपना समझिए। लेकिन तथ्य यही है कि लोग रिक्शे पर मरीजों को ले जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश को छोड़कर बाकी राज्यों की बात करूं तो दिल्ली का मामला कुछ लोगों को लग रहा होगा कि मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की कमजोरी है। या प्रधानमंत्री उन्हें सहयोग नहीं कर रहे हैं। पर गुड़गांव में चार लोगों की मौत हो जाना साधारण नहीं है। और उससे भी शर्मनाक है यह खबर नहीं छपना। निश्चित रूप से यह पहले पन्ने की खबर है। लेकिन अखबारों में स्वास्थ्य मंत्री का बयान छपा है, यह आरोप कि केंद्र को टीके सस्ते मिल रहे हैं और राज्यों को नहीं, पूरी तरह गलत है। अलग-अलग कीमत छपी है फिर भी कैसे गलत है शायद मंदिर बनने के बाद समझ में आए।

 

 

आप जानते हैं कि केंद्र सरकार ने टीके की अलग कीमत निर्धारित की है। यह बाजार के सामान्य सिद्धांत के खिलाफ है। पर उसे मानना नहीं है। सरकार नहीं मान रही है, झूठ फैला रही है तो अखबार उनका साथ क्यों दे रहे हैं? जहां तक केंद्रीय मंत्रियों की बात है, ये प्रचारक से ज्यादा कुछ करते नजर भी नहीं आ रहे हैं। कल मैंने लिखा था, अखबारों में यह खबर जरूर है कि टीकों और ऑक्सीजन पर सीमा शुल्क कम कर दिया गया है। इसी तरह ऑक्सीजन बनाने वाले उपकरण भी सेस से मुक्त होंगे। मुझे लगता है कि यह सरकारी प्रचार के सिवा कुछ नहीं है। सरकार ने ऐसे समय में दूसरे जरूरी फैसलों की जगह यह फैसला लिया तो इससे बहुत ज्यादा लोग प्रभावित नहीं होने वाले हैं और इतनी बड़ी खबर नहीं है कि पहले पन्ने पर जगह नहीं हो तो अंदर के पन्ने पर होने की सूचना प्रधानमंत्री की फोटो के साथ दी जाए (इंडियन एक्सप्रेस)।” बाद में मैंने देखा कि सरकार के इस फैसले के समर्थन में दो-दो केंद्रीय मंत्रियों ने ट्वीट किया था। किसी ने मंत्रियों को बताया भी कि यह प्रधानमंत्री का काम है, उन्होंने देर से किया है। आप तारीफ किस लिए कर रहे हैं? पर सरकार ऐसे ही चल रही है।

बात इतनी ही नहीं है। इसके बावजूद दावा किया जा रहा है कि एक मई से सबको टीका लगने लगेगा। पर किस कीमत पर लगेगा, पैसे कौन देगा, सरकारी अस्पतालों में लगेगा कि नहीं जैसे तमाम सवालों के जवाब नहीं हैं। फैसला सरकार नहीं कर पाई है। इसका पता द हिन्दू की आज की लीड से लगता है। शीर्षक है, 18-44 आयु वर्ग के लोग सिर्फ निजी इकाइयों में टीका लगवा सकेंगे। अगर ऐसा होगा तो पैसे देकर, वह भी ज्यादा कितने लग लगवा पाएंगे और सरकार किस लिए होती है? द हिन्दू में इसी खबर के साथ छपा है, पांच राज्यों में टीके लगने में देरी होगी। गैर भाजपा शासित राज्यों ने कहा है कि टीका निर्माता ने कहा है कि वे कीमत पर बातचीत (सौदेबाजी / मोलभाव) केंद्र सरकार की जरूरतें पूरी करने के बाद करेंगे। ऐसे में केंद्र सरकार की घोषणा का मतलब आप समझ सकते हैं। हिन्दू में इस खबर के साथ अंदर एक खबर होने की सूचना है, प्रधानमंत्री ने कहा, टीकों से संबंधित अफवाहों को नजरअंदाज करें। अंदर खबर है कि 45 साल से ऊपर वालों के लिए निशुल्क टीकाकरण चलता रहेगा। यह समझने वाली बात है कि जहां, जैसे, जिस रफ्तार से चल रहा है वैसे ही चलता रहेगा और निजी अस्पतालों में भी टीका लगवाना एक घंटे से कम का काम नहीं है। कल टीका लगवाने वाले एक मित्र ने बताया कि ऑनलाइन के इतने प्रचार के बावजूद ऑनलाइन पैसे नहीं लिए जा रहे हैं (या उसे ऑप्शन नहीं मिला) और अस्पताल पहुंचने ही लाइन में बैठने के लिए कुर्सियां और पंखे दिखा दिए गए। वहां पीने का पानी भी था और सोशल डिस्टेंसिंग भी पर समय की कोई पूछ नहीं थी। पैसे तो लग ही रहे हैं। अब सरकारी अस्पताल में मुफ्त टीके की क्या हालत होगी उसपर अखबार अफवाह न फैलाएं मतलब कुछ न बताएं। टीके का ही एक सच यह है कि एक मित्र ने पंजीकरण कराया पर टीका लगवाने जा नहीं पाया। बिना गए उसके पास टीका लगवाने का सर्टिफिकेट आ गया। प्रधानमंत्री की फोटो के साथ। सांसद महुआ मोइत्रा ने ट्वीट किया है कि मत्यु प्रमाणपत्र पर भी प्रधानमंत्री की फोटो होनी चाहिए!

इंडियन एक्सप्रेस में आज पहले पन्ने पर भोपाल की एक तस्वीर है। कैप्शन के अनुसार यह रेलवे द्वारा तैयार किया गया आइसोलेशन कोच है और कोविड 19 के मरीजों के लिए है। मुझे लगता है कि यह एक अलग किस्म का घोटाला और भ्रष्टाचार है। रेलवे कोच को आइसोलेशन सेंटर बनाने का प्रचार पिछले साल खूब हुआ था। खूब खबरें छपी थीं पर इनके उपयोग की कोई खबर नहीं आई। बाद में पता चला कि ये एयरकंडीशन नहीं थे इसलिए उत्तर भारत की गर्मी में इनका उपयोग नहीं किया जा सकता है। अब इनमें कूलर जैसा कुछ लगा दिख रहा है। पर यह समय से एक साल से भी ज्यादा लेट है और तमाम विशेष ट्रेनों की तरह बेशर्मी के साथ जरूरत के बहुत बाद आई है। बिना किसी अन्य विवरण के यह प्रचार से ज्यादा कुछ नहीं है। दूसरी ओर हिन्दुस्तान टाइम्स में आज दिल्ली की परेशान जनता की कोई फोटो नहीं है। जो है वह परेशानी कम बताती है और अन्य सूचनाओं के साथ दब गई है। इसे आप जलती चिताओं की तस्वीरों से होने वाली वितृष्णा को दूर करने की संपादकीय कोशिश मान सकते हैं। सकारात्मक पत्रकारिता।

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं।

 


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