पहला पन्ना: जज सवाल पूछे तो तबादला, वीडियो वायरल हो गया तो टीन की दीवार – लेकिन खबर? 


आज मीडिया की हकीकत है। सबको एक जैसी खबरें देनी है और एक जैसी नहीं देनी है। द टेलीग्राफ अक्सर अपवाद होता है। आज यहां जो खबरें हैं वह दूसरे अखबारों में नहीं हैं या उतनी प्रमुखता से अक्सर नहीं होती हैं। बाकी के चार अगर एक जैसे निकलते हैं तो क्यों यह समझना मुश्किल नहीं है। 


संजय कुमार सिंह संजय कुमार सिंह
काॅलम Published On :


वैसे तो आज द टेलीग्राफ को छोड़कर बाकी चारों अखबारों में कोरोना की ख़बर लीड है और इसमें सामान्य सूचनाओं के अलावा कुछ नहीं है। जब खबरें रोकी जा सकती थीं तो रोकी गईं और अब नहीं रोकी जा सकती हैं तो एक ही फोटो दो अखबारों में छपने से पता चलता है कि सब एक जैसा है। मैंने पहले भी कहा है कि एक समय जनसत्ता के अलग संस्करणों को देखकर हम लोग समझ जाते थे कि किसने बनाया होगा। पर आज कई अखबार बहुत कुछ एक जैसे होते हैं। जो बताता है कि निर्देश, आदर्श या लक्ष्य एक ही है। हिन्दुस्तान टाइम्स और इंडियन एक्सप्रेस में रायटर की एक ही फोटो चार कॉलम में छपी है। आप इसे संयोग कह सकते हैं पर यह संयोग ही आज मीडिया की हकीकत है। सबको एक जैसी खबरें देनी है और एक जैसी नहीं देनी है। द टेलीग्राफ अक्सर अपवाद होता है। आज यहां जो खबरें हैं वह दूसरे अखबारों में नहीं हैं या उतनी प्रमुखता से अक्सर नहीं होती हैं। बाकी के चार अगर एक जैसे निकलते हैं तो क्यों यह समझना मुश्किल नहीं है। 

आज पहले पन्ने पर जो खबर नहीं है उसमें सबसे महत्वपूर्ण है लखनऊ के श्मशान को टीन की दीवारों से ढंक दिया जाना। इस संबंध में लाइवहिन्दुस्तान डॉट कॉम की खबर है, वीडियो वायरल होने के बाद लखनऊ के श्मशान घाट को टीन से चारों ओर से ढंका, विपक्ष ने उठाए सवाल। लखनऊ में कोरोना ने जबरदस्त कहर ढाया हुआ है। इस बीच यहां एक साथ जलती दर्जनों लाशों का वीडियो वायरल होने के बाद गुरुवार को श्मशान घाट को चारों ओर से टीन की चादरों से ढंक दिया गया और इसका भी वीडियो वायरल हो गया। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी, आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह समेत तमाम लोगों ने इस पर सवाल खड़े किये हैं। आज के समय में जब सरकार खबरें छिपाती हैं तब जो वीडियो वायरल हो जाते हैं अखबार वाले उसका विवरण भी नहीं देते हैं। आज यह खबर अंग्रेजी के अखबारों में तो नहीं ही है हिन्दी में गूगल करने पर मूल खबर की बजाय किसी के आरोप, किसी के ट्वीट या वायरल वीडियो के आधार पर ही खबर की गई है। 

वीडियो वायरल होने के बाद कायदे से खबर यह होती है कि अचानक यह आदेश कैसे हो गया। सरकारी संस्थानों के काम करने के नियम होते हैं और इसी का नतीजा है कि सड़क की मरम्मत हो, या सड़क पर बहते नाले को रोकना हो, काम होने में महीनों लग जाते हैं। हर व्यक्ति का सरकारी विभागों का अनुभव यही है कि प्रक्रिया लंबी है और समय लगता है। लेकिन यह दीवार एक दिन में कैसे खड़ी हो गई, किसने आदेश दिया, पैसे कहां से आए, आदेश क्या है, ठेकेदार कैसे ढूंढ़ गया, कुल कितने रूपए फूंक दिए गए आदि जानने लायक बातें हैं जो बताई जानी चाहिए थी। लेकिन हिन्दी में गूगल पर खबर नहीं है तो मैं किस अखबार की बात करूं?  इस संबंध में प्रियंका गांधी का ट्वीट है, “अपना समय, संसाधन और ऊर्जा इस त्रासदी को छुपाने, दबाने में लगाना व्यर्थ है। महामारी को रोकने, लोगों की जान बचाने, संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए ठोस कदम उठाइए। यही वक्त की पुकार है।” 

यह ऐसी बात नहीं है कि सरकार को मालूम न हो पर बतानी पड़ रही है। मेरा मानना है कि अखबार ऐसे सहयोगी नहीं होते तो सरकार आज जैसी है वैसी हो ही नहीं सकती थी और यह शायद गुजरात मॉडल का ही हिस्सा है जिसे हमने चुना है। आपको याद होगा, पिछले साल मई में गुजरात हाईकोर्ट की एक बेंच ने राज्य में कोविड की स्थिति के मद्देनजर राज्य सरकार की खिंचाई की थी। इसके कुछ ही दिन के अंदर उस बेंच को बदल दिया गया था। और यह उस दिन हुआ जिस दिन बेंच को राज्य में कोविड की स्थिति पर एक जन हित याचिका की सुनवाई करनी थी। अगर गुजरात में जनहित का यह हाल है तो देश में वही होना है जो हुआ है और आज ज्यादातर अखबारों में लीड है और पर्दा लगाने की खबर कहीं नहीं है। नरेन्द्र मोदी सत्ता में आने से पहले पारदर्शिता की भी बात करते थे लेकिन आरटीआई कानून को मजाक बनाने के बाद अब डबल इंजन वाले राज में सीधे पर्दा खड़ा कर दिया गया और यह सीख गुजरात में दीवार बनाने से ही मिली होगी। 

सोमवार, 12 अप्रैल को मैंने एक खबर, गुजरात में मरीजों की लाइन, भाजपा के रेमडिसेविर स्टॉक को राजनीतिक बना दिया गया की चर्चा की थी। मामला यह था कि कोरोना के लिए जरूरी यह इंजेक्शन नहीं मिल रहा है। ब्लैक में बिक रहा है। गुजरात भाजपा के पास 5000 इंजेक्शन का स्टॉक होने की खबर थी। ऐसे में यह सवाल गंभीर है कि कोई दुर्लभ और जरूरी दवा गुजरात भाजपा अध्यक्ष के पास बड़ी मात्रा में क्यों है। कायदे से दवा का स्टॉक कोई दवा विक्रेता ही रखेगा और जरूरत के समय अगर ज्यादा कीमत लेकर बेचना मुनाफाखोरी, जमाखोरी है तो राजनीतिक लाभ पाने के लिए मुफ्त में बांटना भी भ्रष्टाचार है। लेकिन इस मामले में ना कोई सरकारी कार्रवाई हुई ना किसी स्पष्टीकरण की खबर। ऐसे में यह दिलचस्प है कि आज इंडियन एक्सप्रेस में खबर है कि गुजरात हाईकोर्ट ने रेमडिसेविर से संबंधित मामला उठाया। यानी जो मामले अखबार नहीं उठाते वह अदातल में उठा। यह अलग बात है कि आगे क्या होगा मैं नहीं कह सकता। 

इसी तरह, कोविड के बढ़ते मामलों के बीच हरिद्वार में कुम्भ और बंगाल के घिसटते चुनाव ही नहीं पंचायत चुनाव और उपचुनाव भी चल रहे हैं। ऐसे में उम्मीदवार भी संक्रमित हो रहे हैं। जो उम्मीदवार संक्रमित होकर भी ठीक है क्या वह चुनाव प्रचार करके दूसरों को संक्रमण फैलाए या बीमार हो जाने के कारण चुनाव हार जाए? यह सामान्य स्थिति नहीं है और न जनहितकारी है। फिर भी कुछ लोगों की मनमानी के कारण हो रहा है लेकिन ज्यादातर अखबारों में ऐसे विषयों पर ना कोई खबर होती है ना जनहित की भावना और विरोध तो छोड़ ही दीजिए। आज टेलीग्राफ में खबर है कि उम्मीदवारों के संक्रमित होने के कारण बंगाल के बाकी चुनाव एक चरण में कराने के प्रस्ताव को चुनाव आयोग ने नहीं माना। अखबार ने लिखा है कि पश्चिम बंगाल में एक उम्मीदवार की मौत के बाद आयोग ने सभी दलों की एक बैठक बुलाई है उसमें यह मांग उठ सकती है। पर यह खबर अखबारों में नहीं है। अखबार बता रहे हैं कि चुनाव आयोग ने भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पर भी प्रतिबंध लगाया है शायद इसलिए कि आपको लगे कि वह ममता बनर्जी के खिलाफ नहीं है। लेकिन जहां उम्मीदवार की मौत हो गई वहां तो चुनाव टल जाएंगे पर बाकी के बारे में विचार होगा और स्थिति कितनी मुश्किल है यह खबर ज्यादा महत्वपूर्ण है या कुछ भी बोलने वाले प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पर प्रतिबंध लगना?  

कुछ भी और झूठ बोलने वालों की पार्टी पर द टेलीग्राफ में एक और खबर है। बांग्लादेश के विदेश मंत्री एके अब्दुल मोमेन ने कहा है कि (बांग्लादेश के बारे में) केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की जानकारी बहुत सीमित है। असल में गृहमंत्री ने कहा था कि बांग्लादेश के सीमाई क्षेत्रों में एकदम निचले स्तर पर विकास नहीं पहुंचा है और इसलिए (बांग्लादेशी सीमा) पर गरीबों को अभी भी भोजन नही मिलता है। गृहमंत्री ने कहा था कि इस कारण बांग्लादेश से भारतीय सीमा में घुसपैठ होती है तथा ये घुसपैठिए न सिर्फ बंगाल में हैं बल्कि जम्मू कश्मीर तक फैले हुए हैं। बांग्लादेश के विदेश मंत्री इसी पर प्रतिक्रिया दे रहे थे। बांग्लादेशी मंत्री ने कहा है कि इस तरह की टिप्पणी अस्वीकार्य है और इससे भ्रम पैदा हो सकता है। मेरे ख्याल से यह भी एक महत्वपूर्ण खबर है जो घिसटते बंगाल चुनाव और सीएए के मद्देनजर कुछ ज्यादा ही महत्वपूर्ण है। यही नहीं, बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था भारत से बेहतर बताई जा रही है तब चुनावी लाभ लेने के लिए गृहमंत्री ने यह सब कहा वह अपने आप में कम महत्वपूर्ण नहीं है। पर मीडिया जब वाच डॉग से लैप डॉग बन गया है तो ऐसे उदाहरण आम हैं।  

 

 

इसी तरह, आज एक और महत्वपूर्ण खबर है, दिल्ली दंगे के मामले में जेएनयू के छात्र उमर खालिद को जमानत मिलना। अदालत ने उस पर आपराधिक साजिश की एफआईआर को स्वीकार नहीं किया। हालांकि इसके बावजूद उसे जेल में रहना होगा क्योंकि उस पर यूएपीए के तहत भी एक मामला है। दिल्ली दंगे में फंसाए गए लोगों को जमानत मिलना और आरोपों को अदालत में स्वीकार नहीं किया जाना – दिल्ली पुलिस की साजिशों की पोल खोलता है इसलिए बड़ा खबर है लेकिन आम तौर पर इन खबरों को प्राथमिकता नहीं मिलती है और पुलिस किसी को परेशान करे, बिना अपराध फंसाए इसे हमारी व्यवस्था में गंभीरता मिलती ही नहीं है। इसलिए 1994 के मशहूर इसरो जासूसी कांड के दोषी पुलिस वालों को अभी तक सजा नहीं हुई है जबकि बिना अपराध फंसाए गए वैज्ञानिक नंबी नारायण को अदालत की ओर से मुआवजा भी दिया गया है। बेशक यह एक गंभीर मामला है और सुप्रीम कोर्ट की खबरों को अमूमन पहले पन्ने पर तान देने वाले अखबारों ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की कल की खबर को आज पहले पन्ने पर जगह नहीं दी है। यह सिर्फ द हिन्दू में पहले पन्ने पर है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को फंसाने की रिपोर्ट की जांच सीबीआई करे। 

ऐसी ही एक खबर मध्य प्रदेश के निर्वाणी अखाड़ा के 65 साल के महामंडलेश्वर कपिल देव दास के निधन और इसके बाद निरंजनी अखाड़ा के कुंभ से अलग होने की घोषणा है। पिछले साल मरकज को लेकर मीडिया का जो रुख था उसके बाद कायदे से महाकुंभ होना ही नहीं चाहिए था। लेकिन हुआ और उसमें भागीदारी तथा संक्रमण फैलने की खबरों की तुलना पिछले साल से कीजिए और देखिए कि अखबार कितने निष्पक्ष हैं। मुख्यमंत्री ने जो ज्ञान की बातें की हैं उसके बावजूद अखाड़े का कुंभ से अलग होने का फैसला कितना महत्वपूर्ण है आप जानते हैं लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया के अलावा इतनी प्रमुखता से कहीं और नहीं दिखी। आज भी मस्जिद में कितने लोग नमाज पढ़ेंगे यह अदालत से तय हो रहा है और कुंभ से लोग खुद अलग हो रहे हैं। पर खबरें?   

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं।

 

 

 

 


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