आज के हिंदी अख़बारों के संपादकीय: 19 फ़रवरी, 2018

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नवभारत टाइम्स


सबकी है नदी
 

कावेरी जल विवाद में शुक्रवार को फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि पानी राष्ट्रीय संपत्ति है और नदी के जल पर किसी भी राज्य का मालिकाना हक नहीं है। जाहिर है, इस फैसले से देश के अन्य राज्यों के बीच चल रहे जल विवाद को सुलझाने का एक मजबूत आधार तैयार हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने कावेरी जल विवाद ट्राइब्यूनल के फैसले के मुताबिक तमिलनाडु को मिलने वाले पानी में कटौती की है जबकि बेंगलुरु की जरूरतों का ध्यान रखते हुए कर्नाटक को मिलने वाले पानी की मात्रा में 14.75 टीएमसी फीट का इजाफा किया है। इस तरह तमिलनाडु को 177.25 टीएमसी फीट पानी मिलेगा। केरल और पुदुच्चेरी का हिस्सा पहले जैसा ही क्रमश: तीस टीएमसी फीट और सात टीएमसी फीट रहेगा। कोर्ट ने केंद्र को कावेरी जल प्रबंधन बोर्ड गठित करने को कहा है। इसका गठन होने से यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि तमिलनाडु को उसके हिस्से का पानी मिले। अदालत ने कहा है कि ताजा फैसला पंद्रह साल के लिए है। अब केंद्र और कर्नाटक तथा तमिलनाडु की सरकारों को फैसले के सुचारू क्रियान्वयन पर ध्यान देना चाहिए। कावेरी का उद‌्गम कर्नाटक के कोडागु जिले में है और यह कर्नाटक से होकर तमिलनाडु, केरल और पुदुच्चेरी में भी बहती है। सात सौ पैंसठ किलोमीटर लंबी कावेरी नदी कर्नाटक और तमिलनाडु की जीवनरेखा कही जाती है। दोनों राज्य सिंचाई के लिए ज्यादा से ज्यादा पानी की मांग करते रहे हैं। विवाद के निपटारे के लिए जून 1990 में केंद्र सरकार ने कावेरी ट्राइब्यूनल बनाया था, जिसने लंबी सुनवाई के बाद 2007 में फैसला दिया। लेकिन इससे कोई संतुष्ट नहीं हुआ। कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। कावेरी के पानी का बंटवारा कर्नाटक और तमिलनाडु में राजनीति का प्रमुख मुद्दा रहा है। इस पर दोनों प्रदेशों के राजनेताओं ने कई बार जनभावनाएं भड़काईं जिस कारण दोनों राज्यों के लोगों के बीच कटुता पैदा हुई। अब इस पर किसी भी तरह की सियासत बंद होनी चाहिए। क्योंकि कोई भी ऐसा फैसला, जो दोनों राज्यों को पूरी तरह संतुष्ट कर सके, लगभग नामुमकिन है। वैसे यह अच्छी बात है कि ताजा फैसले के संदर्भ में दोनों राज्य सरकारों ने एहतियात बरती और फैसला आते ही उन्होंने एक-दूसरे की सीमा में जाने वाली बसें फिलहाल न चलाने की घोषणा कर दी। देश के और राज्यों के बीच भी नदियों के पानी को लेकर विवाद हैं। जैसे पंजाब और हरियाणा के बीच सतलुज को लेकर, गुजरात और मध्य प्रदेश के बीच नर्मदा को लेकर, दिल्ली और हरियाणा के बीच यमुना को लेकर, बिहार, यूपी और एमपी में सोन को लेकर अक्सर टकराव की स्थिति बन जाती है। उम्मीद की जानी चाहिए कि कावेरी पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की रोशनी में जल्द ही इन विवादों का हल निकाल लिया जाएगा।


जनसत्ता 


पारदर्शिता का तकाजा

संसदीय लोकतंत्र सुचारु रूप से और संतोषजनक ढंग से काम करे, इसके लिए जरूरी है कि हमारी विधायिका में वही लोग जाएं जिनका दामन पाक-साफ हो। पर तथ्य बताते हैं कि हर चुनाव के बाद संसद और विधानसभाओं में ऐसे लोगों की संख्या और बढ़ जाती है जिनकी आय और संपत्ति के बीच कोई तार्किक मेल नहीं होता। इस पर लगाम कसने के मकसद से चुनाव के लिए पर्चा भरते समय उम्मीदवारों को अपनी, जीवनसाथी और आश्रितों की संपत्ति का ब्योरा देना अनिवार्य किया गया। पर इससे उनकी बेतहाशा कमाई पर रोक लग पाना मुश्किल ही बना रहा है। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय के ताजा फैसले से कुछ बेहतर नतीजे की उम्मीद बनी है।

न्यायालय ने कहा है कि सभी उम्मीदवारों को अपनी, जीवनसाथी और आश्रितों की संपत्ति का ब्योरा देने के साथ-साथ सब की आय का स्रोत भी बताना होगा। यह भी स्पष्ट करना होगा कि उनकी या उनके किसी परिजन की कंपनी ने कभी सरकारी टेंडर हासिल किया या नहीं। अदालत ने सरकार को निर्देश दिया है कि वह एक ऐसा तंत्र विकसित करे, जो जनप्रतिनिधियों की संपत्ति में वृद्धि पर नजर रखे और उनके खिलाफ जांच या कार्रवाई की सिफारिश कर सके। अदालत ने कहा है कि एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए चुनाव प्रक्रिया की पवित्रता बेहद जरूरी है; सांसदों-विधायकों द्वारा संपत्ति की जमाखोरी पर रोक नहीं लगाई गई तो यह सिलसिला लोकतंत्र के विनाश की ओर बढ़ेगा और इससे माफिया राज का रास्ता खुल जाएगा।

ऐसे अनेक राजनीतिकों के उदाहरण मौजूद हैं, जो बहुत कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि से आकर चुनाव लड़े, फिर लोकसभा या विधानसभा में पहुंचे और पांच साल बाद उनके पास करोड़ों की संपत्ति आ गई। इसका खुलासा भी उनके अगली बार चुनाव का पर्चा भरते समय दाखिल हलफनामे से हो जाता है। जाहिर-सी बात है, वह सब उन्होंने जनप्रतिनिधि के तौर पर मिले अपने वेतन के बल पर अर्जित नहीं किया होगा। एक अध्ययन के मुताबिक सैंतीस सांसदों और दो सौ सत्तावन विधायकों की संपत्ति में बेहद अतार्किक वृद्धि हुई। पांच गुने से लेकर करीब इक्कीस गुना तक। इस तरह धन-संपत्ति जुटाने में उन्हें हिचक इसलिए नहीं होती थी क्योंकि यह बताना अनिवार्य नहीं था कि उन्होंने उसे किन स्रोतों से हासिल किया। अब सर्वोच्च न्यायालय के ताजा आदेश के बाद उन्हें बेतहाशा संपत्ति जुटाने में शायद कुछ संकोच हो।

अगर उस पर नजर रखने और उसके बारे में पूछताछ करने का कोई कारगर तंत्र विकसित होगा, तो उनकी संपत्ति की भूख पर निस्संदेह कुछ लगाम लगेगी। यह भी होगा कि बहुत-से लोग अपनी संपत्ति का सही ब्योरा पेश करने के बजाय उसे छिपाएंगे। बेनामी संपत्ति पर काबू पाना सरकार के लिए अब भी बड़ी चुनौती है। फिर अपने परिजनों, नजदीकी रिश्तेदारों के नाम कंपनियां खोल कर जुटाई गई धन-संपत्ति अलग मसला है। जनप्रतिनिधियों के पास आय से अधिक संपत्ति आना भ्रष्टाचार पर काबू पाने में बड़ी बाधा है। यह भी स्पष्ट है कि इससे चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने, चुनाव खर्च पर लगाम कसने और मतदाताओं को धनबल के जरिए प्रभावित करने की प्रवृत्तियों को रोकना मुश्किल बना हुआ है। इस चुनौती से पार पाया जा सकता है अगर सर्वोच्च न्यायालय के ताजा आदेश का संजीदगी से पालन हो। सरकार की तरफ से भी कुछ गंभीर पहल होनी चाहिए। लोकपाल की शीघ्र नियुक्ति हो। सीबीआइ को स्वायत्त बनाया जाए। सूचना आयोगों के खाली पद शीघ्र भरे जाएं।


अमर उजाला


बदहाल बैंकिंग व्यवस्था

सार्वजनिक क्षेत्र के दूसरे सबसे बड़े बैंक में 11,400 करोड़ रुपये के फर्जीवाड़े के बाद कुछ बैंककर्मियों की गिरफ्तारी से जो तथ्य सामने आ रहे हैं, वे बताते हैं कि वर्षों तक वहां नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ाई जाती रहीं और इसे पकड़ने वाला भी कोई नहीं था। गिरफ्तार पूर्व डिप्टी मैनेजर और फॉरेन एक्सचेंज विभाग में कार्यरत गोकुलनाथ शेट्टी ने बिना उच्चाधिकारियों की अनुमति के नीरव मोदी और मेहुल चौकसे की फर्मों के लिए करीब तीन सौ एलओयू (लेटर ऑफ अंडरटेकिंग) बिना जरूरी दस्तावेज के जारी कर दिए थे और इस बारे में सीबीएस (कोर बैंकिंग सिस्टम्स) में भी कुछ दर्ज नहीं था। इनमें से भी शेट्टी ने आखिरी 143 एलओयू महज 63 दिन में जारी कर दिए थे, क्योंकि उनके रिटायरमेंट की तारीख करीब थी और जिस स्विफ्ट फाइनेंशियल प्लेटफार्म के जरिये वह धोखाधड़ी को अंजाम दे रहे थे, उसकी जिम्मेदारी किसी और के पास जाने वाली थी। शेट्टी का एक ही ब्रांच में इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी वर्षों से संभालने और एक जीएम द्वारा उनके ट्रांसफर ऑर्डर रोक दिए जाने से संदेह गहराता है कि फर्जीवाड़े के इस सुनियोजित तंत्र में कुछ और भी लोग रहे हो सकते हैं। जालसाजी के जरिये गैरकानूनी ट्रांजेक्शन कर कुछ खाताधारकों को सात साल तक लाभ पहुंचाया गया, पर किसी ऑडिट में यह घोटाला नहीं पकड़ा गया, यही बताने के लिए काफी है कि बैंकों में आंतरिक नियंत्रण प्रणाली किस तरह ध्वस्त हो चुकी है। मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमणियम ने खासकर सार्वजनिक बैंकों की इस कमजोर कड़ी की ओर इशारा किया है। यह घोटाला, दुर्योग से, ऐसे समय सामने आया है, जब नोटबंदी और जीएसटी की व्यावहारिक मुश्किलों से उद्योग-व्यापार उबर ही रहे थे और बढ़ते एनपीए के बढ़ते बोझ से सार्वजनिक बैंकों की हालत खस्ता है। रिजर्व बैंक के लिये जाहिर है, यह बेहद चुनौतीपूर्ण समय है। सार्वजनिक बैंकों की व्यवस्था सुधारने के लिये आंतरिक नियंत्रण प्रणाली को बेहतर करने के साथ नियुक्ति प्रक्रिया को सख्त बनाने की आवश्यकता है। गौरतलब है कि स्विफ्ट प्रणाली के जरिये अब निजी क्षेत्र के सिटी यूनियन बैंक से भी करोड़ों की धोखाधड़ी की खबर है। सरकार को अब बैंकिंग व्यवस्था में जरूरी सुधार के लिए सक्रिय होना ही चाहिए।


हिंदुस्तान 


संतोषधन का विज्ञान

अक्सर कहा जाता है कि पैसे से सुख-शांति खरीदी नहीं जा सकती। भारत में सोच यह भी है कि संतोष सबसे बड़ा धन है। संतोषधन आ जाए, तो इसके सामने बाकी सारे धन धूल समान हैं। हालांकि पैसे और सुख के समीकरण को लेकर एक चुटकुला भी अक्सर सुनाया जाता है- यह ठीक है कि पैसे से सुख-शांति खरीदी नहीं जा सकती, लेकिन अगर पैसे पास हों, तो आराम की जिंदगी जीते हुए दुखी हुआ जा सकता है। दुख क्या है, यह तो सभी समझते हैं, लेकिन सुख क्या है, यह समझना हमेशा से काफी कठिन रहा है। तमाम धर्मों, संप्रदायों और संस्कृतियों ने इसकी अलग-अलग ढंग से व्याख्या की है, और ज्यादातर इसी नतीजे पर पहुंचे हैं कि दुख तो जीवन साथी है। कहीं यह कहा जाता है कि नानक दुखिया सब संसार,  तो गालिब कहते हैं कि यह शरीर और इंसान का गम, असल में दोनों एक हैं, ‘मौत से पहले आदमी गम से निजात पाए क्यों’? आधुनिक मनोवैज्ञानिक सुख को कुछ अलग ढंग से ही देखते हैं। वे मानते हैं कि सुख का अर्थ होता है कि यह दो चीजों पर निर्भर करता है, एक तो यह कि आप अपने जीवन से कितने संतुष्ट हैं और दूसरे यह कि आप अपने दैनिक जीवन में कितना अच्छा महसूस करते हैं। इसी के साथ आज के युग की भौतिकवादी सोच यह कहती है कि संतोष और अच्छा महसूस करना अक्सर इस पर निर्भर करता है कि आपकी जेब में पैसे कितने हैं? हमारा दर्शन कुछ भी कहे, लेकिन वास्तविक जीवन में धन और सुख का एक रिश्ता तो दिखता ही है।

अमेरिका में इंडियाना के परड्यू विश्वविद्यालय ने पिछले दिनों इस पर एक लंबा शोध किया कि एक आदमी को सुखी रहने के लिए कितने धन की जरूरत पड़ सकती है? इसके लिए 164 देशों के विभिन्न शहरों में 17 लाख लोगों से बात की गई। इन शहरों में भारत का बेंगलुरु भी शामिल है। सर्वे के नतीजे धन के किसी एक आंकड़े पर तो नहीं पहुंच सके, लेकिन जो नतीजे मिले, वे काफी दिलचस्प हैं। सर्वे में पाया गया कि अगर ऐसा कोई आंकड़ा तय किया जाए, तो वह अलग-अलग देश व आबादी के लिए अलग-अलग होगा। जैसे सर्वे में पाया गया कि अमेरिका में 95 हजार डॉलर प्रति वर्ष की आबादी वाला व्यक्ति अपने लिए सभी जरूरी सुविधाएं जुटा सकता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि ऐसी आमदनी वाला हर व्यक्ति सुखी ही होगा। यह इस पर भी निर्भर करता है कि आपके पड़ोसी या आपके रिश्तेदार की आमदनी कितनी है? यह देख पराई चूपड़ी वाला मामला ही है, अक्सर हम अपना जीवन अकेले नहीं जीते, दूसरों से तुलना करके जीते हैं। यानी ये नतीजे भी हमें संतोषधन की ओर ही ले जाते हैं।

इसके साथ ही हमें कुछ और वैज्ञानिक व मनोवैज्ञानिक अध्ययनों पर नजर डालनी होगी। अमेरिकी लेखिका ट्योडोरा जरेवा ने ऐसे तमाम अध्ययनों को समेटकर यह नतीजा निकाला कि आधुनिक विज्ञान और मनोविज्ञान यह मानते हैं कि आपकी खुशी या आपकी संतुष्टि 50 फीसदी इस पर निर्भर करती है कि आपकी बॉयोलॉजी कैसी है, जिसमें आपके जींस भी शामिल हैं। 40 फीसदी यह इस पर निर्भर करता है कि आपकी मानसिक अवस्था क्या है। बाकी दस फीसदी यह आपकी परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इन परिस्थितियों में ही आपकी आर्थिक स्थिति भी शामिल है। जाहिर है, सुख और दुख के समीकरण हमें जितना जीवन में उलझाते हैं, उतना ही ये विज्ञान को भी उलझाते हैं।


राजस्थान पत्रिका 


राजमार्गों की राजनीति!

भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचआई) अब देश के ज्यादातर टोल प्लाजा पर हाइवे नेस्ट बनाने जा रहा है। इसके लिए 372 टोल प्लाजा चुने गए हैं। इन्हें 31 मार्च 2018 तक शुरू करने का लक्ष्य रखा गया है। पहला ऐसा हाइवे नेस्ट राजस्थान में उदयपुर के नारायणपुरा टोल प्लाजा पर बनाया गया है। एनएचआई इसके बाद राष्ट्रीय राजमार्गों पर हाइवे विलेज भी विकसित करेगी। पांच एकड़ भूमि पर बनने वाले हाइवे नेस्ट और विलेज में यात्रियों के लिए खाने-पीने के साथ हस्तशिल्प बाजार भी होंगे। सरकार की यह योजना विफल न हो इसके लिए इन विलेज के आस-पास तीस किलोमीटर के क्षेत्र में कोई भी व्यावसायिक गतिविधि प्रतिबंधित होगी। प्राधिकरण का यह फैसला राजनीति से प्रेरित और आगामी चुनावों के मद्देनजर लिया गया लगता है। राजमार्गों के विकास की जमीनी हकीकत देखी जाए तो इस फैसले से आम नागरिकों की परेशानियां ही बढ़ेंगी। अभी किसी भी टोल प्लाजा पर जाइए, सभी जगह वाहनों की लंबी कतारें मिलती हैं। सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी की तमाम घोषणाओं के बावजूद ज्यादातर हाइवे जगह-जगह क्षतिग्रस्त हैं। अधूरी सड़कों पर टोल वसूली चल रही है। टोल प्लाजा पर पृथक फास्ट टैग लाइनें नहीं बनी हैं। वहां लंबी कतारों की वजह से जाम की स्थिति बनी रहती है। अब यदि वहां हाइवे नेस्ट खोल दिए जाएंगे तो मुश्किलें और बढ़ जाएंगी। पहले ही राजमार्गों पर भूमि अधिग्रहण, मुआवजे को लेकर अनेक मामले न्यायालयों में विचाराधीन हैं। हाइवे नेस्ट के लिए अतिरिक्त भूमि अधिग्रहण की जरूरत पड़ेगी। इन पर खर्च होने वाली राशि भी यात्रियों से ही टोल दरों में वृद्धि कर वसूली जाएगी। फिर जब टोल प्लाजा को भीड़ से मुक्ति दिलाने के लिए सरकार फास्ट टैग आवश्यक करने और सभी नई गाड़ियों में फास्ट टैग डीलर से ही लगाने की बात कर रही है, इन नेस्ट का क्या औचित्य रह जाएगा। प्रस्तावित हाइवे विलेज के 30 किलोमीटर के दायरे में व्यावसायिक गतिविधियों पर रोक लगाने का फैसला भी व्यावहारिक नहीं होगा। अभी ज्यादातर राजमार्गों पर हर एक किलोमीटर पर ढाबे, मोटल, रिजॉर्ट खुल गए हैं। हर 15-20 किलोमीटर पर कस्बे विकसित हो गए हैं। जब ये हाइवे विलेज बन जाएंगे तो उन हजारों लाखों लोगों के रोजगार का क्या होगा जो कि इन ढाबों, होटल, मोटल आदि से जुड़े हैं। राजमार्गों के विकास, टोल वसूली के कम से कम भार तथा राजमार्गों पर सुरक्षा के उपाय सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए।


दैनिक जागरण


महंगी पड़ती देरी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुनियादी ढांचे से संबंधित विभिन्न परियोजनाओं को गति देने की जो प्रतिबद्धता जताई उसकी सार्थकता तभी है जब जमीन पर भी ऐसा होता हुआ दिखे। भले ही प्रधानमंत्री यह कह रहे हों कि सड़क, बिजली संबंधी परियोजनाओं के क्रियान्वयन में तेजी आई है और यह तेजी से नियमों एवं प्रक्रियाओं को आसान बनाने का परिणाम है, लेकिन ऐसा लगता है कि अभी इस मोर्चे पर काफी कुछ किया जाना शेष है। इसकी पुष्टि केंद्रीय सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की रपट भी कर रही है जिसमें यह कहा गया है कि बुनियादी ढांचे से संबंधित करीब साढ़े तीन सौ परियोजनाएं देरी का शिकार हैं। यह रपट यह भी बता रही है कि इस देरी के चलते इन परियोजनाओं की लागत करीब दो लाख करोड़ रुपये बढ़ गई है। यदि परियोजनाओं को समय से पूरा करने के लिए कुछ ठोस कदम नहीं उठाए गए तो यह लागत और भी बढ़ सकती है। ऐसे में केंद्र सरकार को उन कारणों का निवारण प्राथमिकता के आधार पर करना होगा जिनके चलते इतनी बड़ी संख्या में परियोजनाएं समय से पीछे चल रही हैं। ऐसा लगता है कि परियोजनाओं को समय से पूरा करने के मामले में वे ही तौर-तरीके आड़े आ रहे हैं जो पिछली सरकार में देखने को मिलते थे। सांख्यिकी मंत्रालय की रिपोर्ट भले ही यह कह रही हो कि लंबित परियोजनाओं की संख्या में कमी आई है, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं कि जा सकती कि इस गणना का आधार परियोजनाओं की समयसीमा में फेरबदल है।
इसका कोई औचित्य नहीं कि एक ओर प्रधानमंत्री यह दावा करें कि परियोजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है और दूसरी ओर यह सामने आए की तमाम परियोजनाएं देरी का शिकार हैं। आमतौर पर परियोजनाएं इसीलिए लंबित होती हैं, क्योंकि नौकरशाही उन्हें समय से पूरा करने के लिए आवश्यक इच्छाशक्ति का प्रदर्शन नहीं करती। इस मामले में राज्यों के स्तर की नौकरशाही का रवैया सबसे बड़ी बाधा है। एक अन्य गंभीर समस्या समय पर पर्यावरण मंजूरी न मिलने अथवा अदालती हस्तक्षेप की भी है। यह ठीक है कि प्रधानमंत्री समय-समय पर विभिन्न परियोजनाओं की समीक्षा करते रहते हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि समीक्षा के दायरे में वे पहलू नहीं आ पा रहे हैं जो परियोजनाओं की देरी का कारण बन रहे हैं। एक ऐसे समय जब तमाम विदेशी निवेशक भारत में बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए प्रतीक्षारत हैं तब उनकी प्रतीक्षा बढ़ते जाना कोई शुभ संकेत नहीं है। बेहतर यह होगा कि बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं की समीक्षा के क्रम में राज्य सरकारों को भी भागीदार बनाया जाए। ऐसा इसलिए आवश्यक है, क्योंकि राज्यों की सक्रियता के बगैर इन परियोजनाओं को समय से पूरा करना संभव नहीं। सच तो यह है कि जरूरत इसकी भी है कि नौकरशाही के रुख-रवैये में बदलाव लाने के लिए प्रशासनिक सुधारों को प्राथमिकता के आधार पर आगे बढ़ाया जाए। यह समझना कठिन है कि विभिन्न योजनाओं-परियोजनाओं को गति देने के लिए प्रतिबद्ध सरकार प्रशासनिक सुधारों को अपने एजेंडे पर क्यों नहीं ले रहे हैं? वस्तुतः यह इस एजेंडे के अधूरे रहने का ही परिणाम है कि केंद्र सरकार के तमाम दावे जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाते।


प्रभात खबर


मजबूत होते रिश्ते

ईरान उन कुछ देशों में है, जिसके साथ भारत के संबंध सदियों पुराने हैं. आर्थिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के पारंपरिक आयामों तथा नयी अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों के मद्देनजर आपसी सहयोग को मजबूत करने की दिशा में ईरानी राष्ट्रपति डॉ हसन रूहानी का दौरा एक मील का पत्थर है. राष्ट्रपति रूहानी के साथ आये विदेश मंत्री मोहम्मद जरीफ ने सही ही कहा है कि विभिन्न समझौतों पर सहमति महत्वपूर्ण है ही, पर सबसे अहम है पुरानी दोस्ती का और भी गहन होना, चाबहार परियोजना न सिर्फ दोनों देशों के लिए, बल्कि एशिया के इस हिस्से के लिए बेहद फायदेमंद है. इन परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए रेल जैसी इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी जरूरतों तथा व्यापार के नियमों को सरल बनाने पर हुए समझौते आर्थिक सहयोग को ठोस स्वामित्व देंगे. आतंकवाद और हिंसा से ग्रस्त एशिया के राजनीतिक माहौल में शांति और स्थिरता स्थापित करने के प्रयास में भारत और ईरान की उल्लेखनीय भूमिका है. राष्ट्रपति रूहानी और प्रधानमंत्री मोदी ने अफगानिस्तान, सीरिया और यमन में अमन-चैन की बहाली को लेकर भी जरूरी बातचीत की है. इन मसलों और प्रधानमंत्री की हालिया कूटनीतिक कोशिशों पर नजर डालें, तो ईरानी राष्ट्रपति के दौरे का महत्व स्पष्ट होता है. प्रधानमंत्री मोदी ने मई, 2016 में ईरान का दौरा किया था. उसके बाद से वे इजरायल और फिलीस्तीन समेत कुछ अरब देशों की यात्रा कर चुके हैं. मध्य-पूर्व की राजनीतिक जटिलता और विभिन्न देशों के आपसी टकराव के वातावरण में भारतीय प्रधानमंत्री द्विपक्षीय और बहुपक्षीय संबंधों को बेहतर करने और परस्पर विश्वास कायम करने में कामयाब रहे हैं. इस लिहाज से यह भारत की विदेश और व्यापारिक नीतियों की स्पष्टता तथा राजनयिक क्षमता का सूचक है. यह उल्लेखनीय है कि दक्षिणी और मध्य एशिया के साथ मध्य-पूर्व में ईरान का अच्छा-खासा दखल है. ईरान के साथ-साथ इन इलाकों में स्थित देशों के साथ भारत के हित भी व्यापक रूप से जुड़े हुए हैं. ऐसे में ईरान के साथ रिश्तों में बेहतरी उत्साहजनक तो है ही, साथ ही यह भी अहम है कि अन्य देशों के साथ भारत की नीतियों को लेकर ईरान को भी दिक्कत नहीं है. प्रधानमंत्री मोदी से बातचीत के बाद राष्ट्रपति रूहानी ने अपने बयान में साफ कहा है कि हमारे बीच में कोई असहमति नहीं है और दोनों देश आपसी रिश्तों को मजबूत करने के लिए कृतसंकल्प हैं. दोनों देशों के बीच हुए 15 समझौते यह इंगित करते हैं कि तेल और बंदरगाह के अलावा अन्य कई क्षेत्रों में सहयोग और भागीदारी की संभावनाएं मौजूद हैं. प्रधानमंत्री मोदी अक्सर कहते रहे हैं कि क्षेत्रीय सहभागिता को व्यापक बनाकर ही शांति और समृद्धि के साझा लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है. कुछ पड़ोसी देशों की आक्रामकता के बावजूद भारत के साथ अनेक देश संबंध मजबूत करने के आकांक्षी हैं. राष्ट्रपति रूहानी और प्रधानमंत्री मोदी की बातचीत इसका ताजा उदाहरण है.


देशबन्धु 


पीएनबी पर कुछ तो बोलिए सरकार 

बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र में अब तक के सबसे बड़े पंजाब नेशलन बैंक (पीएनबी) घोटाले पर सरकार ने कार्रवाई शुरु कर दी है। कुछेक अधिकारियों की गिरफ्तारी, कुछ का निलंबन भी हो गया है। लेकिन घटना का मास्टरमाइंड जिसे माना जा रहा है, वह नीरव मोदी खबरों के मुताबिक इस वक्त अमेरिका में आलीशान होटल में रह रहा है।
उसका पासपोर्ट निलंबित हो गया है, लुक आउट नोटिस भी जारी किया गया है। लेकिन ये सारे दिखावे तो विजय माल्या और ललित मोदी के लिए भी किए गए। वे अब भी विदेश में ऐश का जीवन बिता रहे हैं और यहां सरकार उन पर बात ही नहीं क रती। और अगर करती भी है तो उसका ठीकरा कांग्रेस पर फोड़ती है। अभी कुछ दिनों पहले संसद में प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेस के पापों का जिक्र किया था कि उसका दंड रोज भारत की जनता भुगतती है। तब तक नीरव मोदी कांड का खुलासा देश के सामने नहीं हुआ था, वर्ना मोदीजी उसका दोष भी कांग्रेस के मत्थे मढ़ते। लेकिन अब उनकी पार्टी के लोग यह काम बखूबी कर रहे हैं।
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस मसले पर कहा कि अलग-अलग मंत्री आकर स$फाई दे रहे हैं। लेकिन वित्त मंत्री या प्रधानमंत्री, जो इसके लिए हैं, उन्होंने इस बारे में कुछ नहीं कहा। इस पर भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हा राव का जवाब आया कि इस घोटाले में जो भी दोषी होगा, उसे छोड़ा नहीं जाएगा, चाहे वो राहुल गांधी ही क्यूं न हों।
राव ने कहा कि ये घोटाला कांग्रेस की यूपीए के समय में शुरू हुआ है। कांग्रेस अब झूठ बोल रही है। उन्होंने कांग्रेस से सवाल किया कि राहुल गांधी नीरव मोदी के कम्पनी के प्रमोशन में क्यों गए थे? इसी तरह रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी पर घोटाले में शामिल नीरव मोदी की एक कंपनी से जुड़े होने के आरोप लगाए। बीजेपी के आरोपों के बाद अभिषेक मनु सिंघवी ने $कानूनी कार्रवाई करने की चेतावनी दी है। इन सब बातों को सुनकर ऐसा लग रहा है कि नेताओं की आपसी लड़ाई में जनता को उलझाकर पीएनबी घोटाले के दोषी भी बचा लिए जाएंगे।
वैसे जो सवाल राहुल गांधी ने किए, वह देश की जनता का भी है कि इस घोटाले पर प्रधानमंत्री कुछ क्यों नहींबोलते? क्या उन्होंने कसम खा रखी है कि केवल मन की बात करूंगा, उसके सिवाए कुछ नहीं बोलूंगा। अगर नीरव मोदी की कंपनी के कार्यक्रम में जाना भाजपा की नजरों में गुनाह है, तो दावोस में नीरव मोदी को मोदीजी के समूह फोटो का हिस्सा बनाना, क्या सदाचार की श्रेणी में आता है? मान लिया कि नीरव मोदी ने फर्जीवाड़े का खेल यूपीए के शासन में शुरु किया था, लेकिन क्या एनडीए ने सत्ता में आते ही उसे खत्म कर दिया?
क्यों भाजपा चार सालों तक नीरव मोदी की इस ठगी पर कुछ नहीं कर पाई और क्यों उसके शासन में वह परिवार समेत देश छोड़कर भाग गया? हर बात पर राहुल गांधी का मजाक उड़ाकर या कांग्रेस के शासन को जिम्मेदार ठहरा कर मोदीजी अपनी जिम्मेदारियों से बरी नहीं हो सकते हैं। अगर उन्होंने लंबे-चौड़े वादे कर सत्ता हासिल की थी, तो उसका थोड़ा मान तो उन्हें रखना ही चाहिए। रहा सवाल इस घोटाले के आरोपियों पर कार्रवाई का, तो इसमें मु_ी भर लोगों पर कानून का डंडा चलाने से क्या हासिल होगा? असल सवाल तो व्यवस्था की खामियों को जड़ से पकड़ने का है।
डिजीटल इंडिया के युग में हर काम कंप्यूटर से होने लगा है। बैंकों के बही-खाते भी कोई कलम-दवात से तो होते नहींकि उनमें हेरफेर करना आसान हो। बैंक का कामकाज खत्म होने के बाद हर लेनदेन का रोजाना हिसाब-किताब किया जाता है और रिजर्व बैंक हर बैंक के बही-खातों की ऑडिटिंग करता है, फिर किस तरह भारत और विदेश के बैंकों में सालों साल ठगी का यह खेल चलता रहा? कंप्यूटर और सेंट्रलाइज्ड सर्वर के दौर में ऐसी चूक अनजाने में नहीं हो सकती। इतने बड़े पीएनबी के केवल दो कर्मचारी, एक उप प्रबंधक और एक क्लर्क इस फर्जीवाड़े को 5 साल तकखुलकर करते रहे और किसी वरिषठ अधिकारी ने इसे नहीं पकड़ा? सवाल यह भी है कि बैंकों में तो तबादले होते रहते हैं, फिर ये दोनों कर्मचारी कैसे एक ही जगह बने रहे? क्या उनका तबादला या प्रमोशन नहीं हुआ? अगर नहीं, तो इस पर किसी का ध्यान क्यों नहीं गया?
साधारण ग्राहक के लिए तो कर्ज का भुगतान नहीं करके बचना तकरीबन नामुमकिन है। जरा सी चूक पर बैंक से तगादे होते हैं, तो नीरव मोदी के संबंध में क्या बैंक की ओर से ऐसा कुछ नहीं हुआ? हैरत की बात तो यह है कि पंजाब नेशनल बैंक को भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम जैसे कुछ पहलुओं पर 2016-17 का विजिलेंस अवॉर्ड मिला था। यह वही दौर था, जब नीरव मोदी भ्रष्ट तरीकों से बैंक का धन हड़प रहा था। आज इस खुलासे के बाद न केवल भारत की बैंकिंग प्रणाली की साख पर सवाल खड़े हो गए हैं, बल्कि ऐसे सम्मान भी सवालों के दायरे में आ गए हैं।

 



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